"क्या इच्छा है लेके चढ़ावा" (भला क्या वो करेगा लेके चढ़ावा) सनातन भक्ति परंपरा का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और वैराग्य भाव से परिपूर्ण भजन है। यह भजन साधक को बाह्य आडंबरों, दिखावे और भौतिक चढ़ावे से ऊपर उठकर अंतःकरण की शुद्धि, निश्छल प्रेम और पूर्ण आत्म-समर्पण की ओर प्रेरित करता है। इस भजन का मुख्य स्वर 'विनय' और 'वैराग्य' है, जो जीवात्मा को यह स्मरण कराता है कि जिस परमेश्वर ने इस अनंत ब्रह्मांड की रचना की है, जो समस्त ऐश्वर्यों का स्वामी है, उसे हम तुच्छ भौतिक वस्तुएं अर्पित करके कैसे प्रसन्न कर सकते हैं? वह तो केवल भाव का भूखा है। इस भजन को विभिन्न सत्संगों, संध्या आरती, और विशेष रूप से शिवरात्रि, जन्माष्टमी या किसी भी देव आराधना के समय गाया जाता है। यह भजन साधक के भीतर छिपे अहंकार को नष्ट कर उसे प्रभु के चरणों में अनन्य शरणागति प्रदान करता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ क्या इच्छा है लेके चढ़ावा ॥
कोरस (स्थायी):
भला क्या वो करेगा लेके चढ़ावा,
जिसकी रचना है ये सारा जग सारा।
क्या इच्छा है उसकी बताओ तो जरा,
जिसने खुद ही रचा है ये संसार सारा॥
अंतरा १:
गंगाजल से तुम उसे क्या नहलाओगे,
जिसकी जटाओं से बहती है गंगा धारा।
फूल और फल तुम उसे क्या चढ़ाओगे,
जिसकी बगिया है ये सारा जग सारा॥
अंतरा २:
सोने और चांदी के महल तुम क्या दोगे,
जिसका है ये अंबर और धरती का किनारा।
छप्पन भोग तुम उसे क्या लगाओगे,
जो सारे जगत को खिलाने वाला॥
अंतरा ३:
दीपक जलाकर तुम उसे क्या दिखाओगे,
जिसके इशारे पर चमके चंदा और तारा।
मन के मंदिर में तुम उसे बिठा लो,
वही तो है बस एक जीवन का सहारा॥
अंतरा ४:
भला क्या वो करेगा लेके चढ़ावा,
जिसकी रचना है ये सारा जग सारा।
सच्ची श्रद्धा से जो भी पुकारे,
बन जाता है वो उसका खेवनहारा॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन सनातन दर्शन के 'अद्वैत' और 'विशिष्ट भक्ति' मार्ग का एक सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। भजन का मूल भाव यह है कि ईश्वर को किसी भी बाह्य वस्तु की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य अज्ञानवश यह सोचता है कि वह भगवान को बहुमूल्य वस्तुएं, छप्पन भोग, सोने-चांदी के आभूषण या गंगाजल अर्पित करके उन्हें प्रसन्न कर सकता है। परंतु, यह भजन इस धारणा पर चोट करता है और सत्य को उजागर करता है।
भजन के माध्यम से कवि कहते हैं कि जो ईश्वर स्वयं इस सृष्टि का नियंता है, जिसने गंगा की पावन धारा को अपनी जटाओं में स्थान दिया है, उसे हम कुछ बूंद गंगाजल अर्पित करके क्या तृप्त करेंगे? जिसने संपूर्ण ब्रह्मांड को फूलों, फलों और प्राकृतिक सौंदर्य से सजाया है, उसे हम मुट्ठी भर फूल चढ़ाकर कैसे रिझा सकते हैं? ईश्वर तो केवल 'भाव' के भूखे हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं—"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति" अर्थात् जो कोई भी मुझे प्रेम और भक्ति से एक पत्ता, फूल, फल या जल भी अर्पित करता है, मैं उसे सहर्ष स्वीकार करता हूँ। यहाँ बल 'वस्तु' पर नहीं, बल्कि 'भक्ति' और 'भाव' पर है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे सामान्य भजनों से अलग और अत्यंत प्रभावशाली बनाती हैं:
- अहंकार का शमन: यह भजन मनुष्य के इस भ्रम को तोड़ता है कि वह अपनी धन-दौलत या चढ़ावे से भगवान को खरीद सकता है या उन्हें प्रभावित कर सकता है।
- आंतरिक शुद्धि पर बल: भजन बाह्य पूजा-पाठ की तुलना में मन की पवित्रता, श्रद्धा और समर्पण को अधिक महत्वपूर्ण बताता है।
- सरलता और सुगमता: इसके शब्द इतने सरल और सीधे हैं कि कोई भी सामान्य साधक इसके गहरे दार्शनिक अर्थ को आसानी से समझ सकता है।
- सार्वभौमिकता: यह भजन किसी एक विशेष संप्रदाय तक सीमित नहीं है। इसे भगवान शिव, भगवान विष्णु, या निराकार ब्रह्म किसी भी रूप के लिए गाया जा सकता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि प्रभु का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:
सर्वोत्तम समय: इस भजन को संध्याकाल की आरती के बाद या सत्संग के दौरान गाना अत्यंत शांति प्रदान करता है। सुबह के समय ध्यान लगाने से पूर्व भी इसका श्रवण मन को एकाग्र करने में सहायक होता है।
गायन की विधि: इस भजन को गाते समय वाद्य यंत्रों (जैसे हारमोनियम, तबला या मंजीरा) की गति को धीमा और गंभीर रखना चाहिए। इसे अत्यंत शांत और करुण भाव से गाना चाहिए ताकि इसके शब्दों का सीधा प्रभाव हृदय पर पड़े। गाते समय अपनी आंखें बंद रखें और यह महसूस करें कि आप अपने अंतर्मन को प्रभु के चरणों में समर्पित कर रहे हैं।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान शिव और परमेश्वर (परम ब्रह्म) को समर्पित माना जाता है। भजन में प्रयुक्त शब्द जैसे "जटाओं से बहती है गंगा धारा" सीधे तौर पर देवाधिदेव महादेव की ओर संकेत करते हैं। शिवजी को वैराग्य का देवता माना जाता है, जो केवल भस्म, बेलपत्र और जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं। वे किसी भी प्रकार के भौतिक चढ़ावे या सोने-चांदी के महलों के आकांक्षी नहीं हैं।
संत कबीरदास और गोस्वामी तुलसीदास जैसे महान संतों ने भी हमेशा इसी बात पर बल दिया है कि ईश्वर घट-घट वासी हैं और वे केवल आंतरिक प्रेम के वश में होते हैं। यह भजन उसी संत परंपरा की वैचारिक कड़ियों को आगे बढ़ाता है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-भक्ति शैली में की गई है। भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में संतों की टोलियों द्वारा इस भजन को सदियों से गाया जाता रहा है। इसकी पृष्ठभूमि भारतीय उपनिषदों के उस ज्ञान पर आधारित है, जहाँ ईश्वर को 'पूर्ण' कहा गया है—"पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते"। जब ईश्वर स्वयं में पूर्ण हैं, तो उन्हें किसी भी बाहरी वस्तु की कमी कैसे हो सकती है? इसी दार्शनिक सत्य को लोकभाषा में पिरोकर इस भजन का रूप दिया गया है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें कहीं-कहीं ब्रजभाषा और अवधी का पुट भी देखने को मिलता है। इसकी काव्य शैली 'संवादात्मक' और 'प्रश्नोत्तरी' रूप में है, जहाँ कवि साधक से सीधे प्रश्न करता है कि "गंगाजल से तुम उसे क्या नहलाओगे..."। यह शैली श्रोता को सोचने पर मजबूर करती है और उसके भीतर एक वैचारिक क्रांति उत्पन्न करती है। भजन में अनुप्रास और रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:
- सादगी का जीवन: हमें अपने जीवन में दिखावे और आडंबर से बचना चाहिए। भगवान को सादगी पसंद है।
- समर्पण भाव: जीवन में जो कुछ भी हमारे पास है, उसे ईश्वर का ही मानकर जीना चाहिए। "तेरा तुझको अर्पण" का भाव ही वास्तविक भक्ति है।
- समानता का संदेश: ईश्वर के दरबार में अमीर और गरीब का कोई भेद नहीं है। अमीर का बहुमूल्य चढ़ावा और गरीब के आंसू, दोनों में से भगवान केवल भाव को देखते हैं।
- मानसिक शांति: जब हम यह समझ जाते हैं कि भगवान को केवल हमारा प्रेम चाहिए, तो हम पूजा-पाठ की जटिलताओं और चिंताओं से मुक्त होकर सहज भक्ति का आनंद लेते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| चढ़ावा | भेंट या उपहार | भौतिक वस्तुएं जो हम भगवान को अर्पित करते हैं। |
| खेवनहारा | नाव चलाने वाला (मल्लाह) | संसार रूपी भवसागर से पार उतारने वाले ईश्वर। |
| जटाओं | बालों का गुच्छा | भगवान शिव के सिर के बाल जहाँ से गंगा निकलती हैं। |
| छप्पन भोग | ५६ प्रकार के व्यंजन | मनुष्य द्वारा भगवान को अर्पित किए जाने वाले स्वादिष्ट भोजन। |
| अंबर | आकाश | ईश्वर की अनंतता और सर्वव्यापकता का प्रतीक। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"भला क्या वो करेगा लेके चढ़ावा, जिसकी रचना है ये सारा जग सारा।"
कवि कहते हैं कि जो संपूर्ण ब्रह्मांड का रचयिता है, उसे किसी भौतिक भेंट की क्या आवश्यकता? वह हमारे तुच्छ चढ़ावे का क्या करेगा?
"गंगाजल से तुम उसे क्या नहलाओगे, जिसकी जटाओं से बहती है गंगा धारा।"
जिस शिव की जटाओं से स्वयं पतित-पावनी गंगा मैया का उद्गम हुआ है, उन्हें हम तांबे के लोटे से थोड़ा सा गंगाजल चढ़ाकर क्या तृप्त कर पाएंगे?
"फूल और फल तुम उसे क्या चढ़ाओगे, जिसकी बगिया है ये सारा जग सारा।"
यह संपूर्ण प्रकृति, वनस्पति, फूल और फल उसी की शक्ति से पल्लवित होते हैं। उसकी अपनी ही बगिया से तोड़कर उसे ही अर्पित करना हमारी अज्ञानता को दर्शाता है।
"मन के मंदिर में तुम उसे बिठा लो, वही तो है बस एक जीवन का सहारा।"
बाहरी मंदिरों और मूर्तियों में भगवान को खोजने और सजाने के बजाय, उन्हें अपने हृदय मंदिर में स्थापित करें। वही हमारे जीवन का एकमात्र वास्तविक सहारा हैं।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को और अधिक गहराई से समझने के लिए निम्नलिखित श्लोक का स्मरण करना चाहिए:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ९, श्लोक २६)
अर्थ: जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पित करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पित किया हुआ वह उपहार मैं सगुण रूप से प्रकट होकर ग्रहण करता हूँ।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | क्या इच्छा है लेके चढ़ावा (भला क्या वो करेगा लेके चढ़ावा) |
|---|---|
| मुख्य देव | भगवान शिव / परमेश्वर (निराकार ब्रह्म) |
| भजन का मुख्य भाव | विनय, वैराग्य, समर्पण, भक्ति |
| भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, संध्या आरती, महाशिवरात्रि, दैनिक प्रार्थना |
| जीवन सीख | आंतरिक पवित्रता, अहंकार का त्याग, निश्छल प्रेम |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "क्या इच्छा है लेके चढ़ावा भजन" के आध्यात्मिक, दार्शनिक और व्यावहारिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस भजन के माध्यम से सनातन धर्म की उस मूल चेतना को जागृत करने का प्रयास किया गया है जो बाह्य आडंबरों का खंडन कर आंतरिक योग और भक्ति मार्ग को प्रशस्त करती है। यह सामग्री पूरी तरह से शोधपरक और प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री - Bhaktilok.in संपादकीय बोर्ड द्वारा समीक्षित और स्वीकृत।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ९, भक्ति योग)
- सनातन भक्ति काव्य परंपरा और लोक भजन संग्रह
- संत कबीरदास एवं तुलसीदास के भक्ति पद
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