रचाई श्रृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये श्रृष्टि चला रहे है भजन इन हिंदी लिरिक्स


 रचाई श्रृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये श्रृष्टि चला रहे है ,

ज पेड़ हमने लगाया पेहले उसी का फल हम अब पा रहे है ,

रचाई श्रृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये श्रृष्टि चला रहे है ,


इसी धरा से शरीर पाए इसी धरा में फिर सब पाए ,

है सत्य नियम यही धरा इक आ रहे है इक जा रहे है ,

रचाई श्रृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये श्रृष्टि चला रहे है ,


जिहनो ने बेजा जगत में जाना तेह कर दिया लोट कर फिर से आना ,

जो बेजने वाले है धरा पर वही फिर वापिस बुला रहे है ,

रचाई श्रृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये श्रृष्टि चला रहे है ,


बैठे है जो धान की बालियो में समाये मेहँदी की लालियो में,


हर ढाल हर पत्ते में समा कर रंग बिरंगे फूल खिला रहे है ,

रचाई श्रृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये श्रृष्टि चला रहे है !!