"रचाई सृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये सृष्टि चला रहे हैं" एक अत्यंत भावपूर्ण और दार्शनिक भजन है जो सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों—ईश्वर की सर्वव्यापकता, कर्मफल के विधान और सृष्टि के संचालन में परमात्मा की नियंता शक्ति को रेखांकित करता है। यह भजन केवल एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं, बल्कि उपनिषदों के 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' (इस संसार में जो कुछ भी है, वह ईश्वर का ही है) के भाव को जन-मानस तक पहुँचाने का एक सरल माध्यम है। इस भजन का मुख्य भाव 'शरणागति' और 'संतोष' है। यह हमें सिखाता है कि जिस ईश्वर ने इस विशाल ब्रह्मांड की रचना की है, वही इसके पालन और संहार के भी सूत्रधार हैं। भक्त जब इस भजन को गाता है, तो वह अपने अहंकार का त्याग कर ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का अनुभव करता है। यह भजन विशेष रूप से सत्संग, प्रातःकालीन प्रार्थना और आत्म-चिंतन के समय अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ रचाई सृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये सृष्टि चला रहे हैं ॥
रचाई सृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये सृष्टि चला रहे हैं,
जो पेड़ हमने लगाया पहले उसी का फल हम अब पा रहे हैं।
रचाई सृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये सृष्टि चला रहे हैं...
अंतरा - 1:
इसी धरा से शरीर पाए इसी धरा में फिर सब समाए,
है सत्य नियम यही धरा का एक आ रहे हैं एक जा रहे हैं।
रचाई सृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये सृष्टि चला रहे हैं...
अंतरा - 2:
न कोई अपना न कोई पराया, ये मोह माया का जाल छाया,
जो सत्य को जान लेते हैं वो ही भवसागर से तर रहे हैं।
रचाई सृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये सृष्टि चला रहे हैं...
अंतरा - 3:
करो भलाई तो फल मिलेगा, बुरा करोगे तो दुख मिलेगा,
ये कर्म की लेखनी प्रभु की, जो लिख दिया वो ही पा रहे हैं।
रचाई सृष्टि को जिस प्रभु ने वही ये सृष्टि चला रहे हैं...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा है। पहली पंक्ति में स्पष्ट किया गया है कि ईश्वर ही इस सृष्टि के रचयिता (Creator) और संचालक (Operator) हैं। हम जो भी सुख-दुख भोग रहे हैं, वे हमारे पूर्व कर्मों का ही फल हैं—"जो पेड़ हमने लगाया पहले, उसी का फल हम अब पा रहे हैं।" यह श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मयोग का सार है।
दूसरे अंतरे में नश्वरता का बोध कराया गया है। यह शरीर पंचतत्वों से बना है और अंत में इसी धरा में विलीन हो जाता है। यह चक्र निरंतर चलता रहता है। तीसरे अंतरे में मोह-माया से ऊपर उठने और कर्म की शुद्धता पर बल दिया गया है। भजन का संदेश स्पष्ट है: यदि हम ईश्वर की सत्ता को स्वीकार कर लें और अपने कर्मों के प्रति सचेत रहें, तो जीवन का भवसागर पार करना सुगम हो जाता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- ईश्वर की सर्वव्यापकता: यह भजन ईश्वर को सृष्टि का एकमात्र संचालक मानता है।
- कर्म का सिद्धांत: 'जैसे कर्म, वैसे फल' के सिद्धांत को अत्यंत सरल भाषा में समझाया गया है।
- वैराग्य का भाव: संसार की नश्वरता को स्वीकार कर मोह-माया से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
- शांति और संतोष: इस भजन को सुनने से मन में संतोष का भाव जागृत होता है और व्यर्थ की चिंताएं कम होती हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को किसी भी समय गाया जा सकता है, परंतु ब्रह्म मुहूर्त (प्रातःकाल) या संध्या आरती के समय इसका गायन विशेष फलदायी होता है। इसे एकांत में बैठकर या सामूहिक सत्संग में गाया जा सकता है। गायन के समय मन में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव होना अनिवार्य है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द | सरल अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| सृष्टि | ब्रह्मांड / संसार | ईश्वर द्वारा रचित जगत |
| धरा | पृथ्वी | नश्वर शरीर का आधार |
| भवसागर | संसार रूपी सागर | जन्म-मरण का चक्र |
| लेखनी | लिखने का साधन (भाग्य) | कर्मों का फल |
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | रचाई सृष्टि को जिस प्रभु ने |
|---|---|
| मुख्य विषय | कर्मयोग एवं ईश्वर की सत्ता |
| भाव | शरणागति, वैराग्य, संतोष |
| भाषा | हिंदी |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, नित्य पूजा, ध्यान |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न: इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?
प्रश्न: क्या यह भजन किसी विशेष देवता को समर्पित है?
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री सनातन धर्म के कर्मफल सिद्धांत और भक्ति परंपरा के आधार पर तैयार की गई है। भजन के भावार्थ को दार्शनिक दृष्टिकोण से स्पष्ट किया गया है ताकि पाठक इसे अपने जीवन में उतार सकें। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
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