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2021/07/manmohan-tum-ruth-gaye-to-kaun-mera-jag.html - SEO Title: मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में | सम्पूर्ण भजन लिरिक्स एवं भावार्थ - Bhaktilok
- Meta Title: मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में भजन लिरिक्स | Manmohan Tum Ruth Gaye Lyrics
- Meta Description: 'मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में' भजन के संपूर्ण लिरिक्स, हिंदी अर्थ, विरह भक्ति का भावार्थ और भजन की आध्यात्मिक महिमा पढ़ें।
- Primary Keyword: मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में भजन इन हिंदी लिरिक्स
- Secondary Keywords: Manmohan Tum Ruth Gaye To Kaun Mera Jag Me Lyrics, कृष्ण विरह भजन, कान्हा भजन लिरिक्स, Shyam Bhajan Hindi
"मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में, कान्हा कौन मेरा जग में" यह हृदयस्पर्शी एवं अत्यंत लोकप्रिय कृष्ण भजन भगवान श्री कृष्ण के प्रति एक भक्त की अनन्य निष्ठा, अगाध प्रेम और उनके बिना जीवन की पूर्ण शून्यता को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त करता है। यह भजन 'विरह भक्ति' (प्रेमाभक्ति की वह अवस्था जहाँ आराध्य से अलगाव का दुःख साधक को भीतर तक झकझोर देता है) का एक उत्कृष्ट और जीवंत उदाहरण है। भारतीय संगीत और संत परंपरा में जब भक्त स्वयं को संसार की आपाधापी, द्वंदों और दुखों के बीच अकेला पाता है, तब वह अपने प्रियतम कान्हा को पुकारता है। इस भजन का प्रत्येक शब्द साधक के भीतर करुणा, समर्पण, और आर्त पुकार के भाव को जाग्रत करता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, उसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ, भावार्थ, गायन की विधि और इसके जीवनोपयोगी संदेशों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में,
कान्हा कौन मेरा जग में।
साथ रहे हो अब ना रहा तो कौन मेरा जग में,
कान्हा कौन मेरा जग में ॥
ज़िंदगी का कारवाँ रुकता नहीं है,
दिल है श्याम तुम बिन धड़कता नहीं है।
चलने से पहले मैं गिर गया तो कौन मेरा जग में,
कान्हा कौन मेरा जग में ॥
तुम्हे क्या नहीं खबर सब कुछ पता है,
दिल ये दर्द मेरा हद से गुज़रता है।
मिलने से पहले बिछड़ गया तो कौन मेरा जग में,
कान्हा कौन मेरा जग में ॥
तेरी आस लगाए बैठा हूँ कान्हा,
मैं दर पे तुम्हारे आया हूँ कान्हा।
हाथ छुड़ा के जो तू चल दिया तो कौन मेरा जग में,
कान्हा कौन मेरा जग में ॥
सुध-बुध मेरी सब बिसर गई है,
नैनन में प्रेम की नदिया बही है।
नैया बीच मझधार बह गई तो कौन मेरा जग में,
कान्हा कौन मेरा जग में ॥
मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में,
कान्हा कौन मेरा जग में।
साथ रहे हो अब ना रहा तो कौन मेरा जग में,
कान्हा कौन मेरा जग में ॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन केवल शब्दों की माला नहीं है, बल्कि एक आर्त हृदय की वह पुकार है जो अपने इष्ट श्री कृष्ण के बिना बिल्कुल असहाय महसूस करता है। भजन की पहली पंक्ति— "मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में"—यह स्पष्ट करती है कि भक्त के लिए संपूर्ण संसार का सुख फीका है यदि उसका 'मनमोहन' (मन को मोहने वाला श्याम) उससे प्रसन्न नहीं है। संसार के लोग केवल स्वार्थ के साथी होते हैं, परंतु भगवान ही वास्तविक और निष्काम हितैषी होते हैं।
दूसरे अंतरे में भक्त कहता है कि "ज़िंदगी का कारवाँ रुकता नहीं है, दिल है श्याम तुम बिन धड़कता नहीं है।" सांसारिक दृष्टिकोण से समय और जीवन की गति कभी नहीं रुकती, चक्र चलता रहता है, परंतु भक्त का आध्यात्मिक प्राण तो श्यामसुंदर में बसता है। यदि प्रभु का संबल छूट जाए, तो इस जीवन पथ पर आगे बढ़ने से पहले ही साधक निराश होकर गिर जाएगा।
आगे भक्त अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहता है कि हे प्रभु! आपको तो त्रैलोक्य की हर बात की खबर है, फिर भी मेरा यह विरह-दर्द सीमा लांघ रहा है। यदि जीवन की इस लंबी यात्रा में मिलने से पहले ही बिछड़ने की घड़ी आ गई, तो इस अथांग संसार में मेरा रक्षक कौन बनेगा? यह भाव गोपी प्रेम और राधाजी की विरह दशा की याद दिलाता है जहाँ कृष्ण ही सर्वस्व हैं। अंततः, भक्त अपनी टूटी हुई नैया को भवसागर के बीच मझधार में पाकर केवल और केवल कृष्ण के चरणों में शरण मांगता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सादगी और गहराई है। इसमें कठिन दार्शनिक शब्दों के स्थान पर सीधे हृदय को छूने वाली शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
- विरह भक्ति प्रधान: यह भजन माधुर्य और विरह रस से ओत-प्रोत है, जो साधक को भगवान के प्रति अनन्य प्रेम सिखाता है।
- आत्मसमर्पण (शरणगति): भजन का केंद्रीय भाव 'शरणागति' है, जहाँ भक्त अपने अहंकार को त्यागकर पूर्णतः भगवान पर निर्भर हो जाता है।
- मानसिक शांति: एकांत में इस भजन का गायन या श्रवण करने से मन का भारीपन दूर होता है और हृदय में दिव्यता का अनुभव होता है।
- संबंधित आध्यात्मिक प्रसंगों और पदों के लिए आप हमारे श्री कृष्ण भजन संग्रह और भक्ति रस एवं विरह पद लेखों का अध्ययन कर सकते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भक्ति संगीत का पूरा लाभ उठाने के लिए उचित समय, स्थान और मानसिक स्थिति का होना आवश्यक है:
- सर्वोत्तम समय: ब्रह्म बेला (प्रातःकाल) या गोधूलि बेला (संध्या के समय) जब मन शांत होता है।
- स्थान: घर के पूजा कक्ष में ठाकुर जी (श्री कृष्ण या बालगोपाल) के विग्रह के समक्ष दीपक प्रज्वलित करके।
- विधि: एकाग्रचित्त होकर आँखें बंद करके इस भजन को धीमी स्वर लहरियों में गुनगुनाएं। यदि आप वाद्य यंत्रों (जैसे हारमोनियम, ढोलक या मंजीरा) का प्रयोग करना चाहें तो और भी उत्तम है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन के केंद्र में भगवान श्री कृष्ण (विष्णु जी के पूर्ण अवतार, लीला पुरुषोत्तम, द्वारकाधीश और ब्रजराज) हैं। भारतीय भक्ति परंपरा में सूरदास, मीराबाई, रसखान और चैतन्य महाप्रभु जैसे संतों ने इसी प्रकार के विरह और प्रेम भजनों के माध्यम से भगवान को रिझाया है। यह भजन उसी महान संत परंपरा की एक आधुनिक किंतु उतनी ही प्रामाणिक कड़ी है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
पारंपरिक लोक भजनों और आधुनिक भजन मंडलियों द्वारा गाए जाने वाले इस गीत की रचना लोक-संस्कृति के उन गुमनाम रचनाकारों द्वारा की गई है जो राधा-कृष्ण के प्रेम को जन-जन तक पहुँचाना चाहते थे। ब्रजभाषा और सरल हिंदी के संमिश्रण से बनी यह रचना उत्तर भारत के मंदिरों, सत्संगों और एकांत साधना कक्षों में अत्यंत चाव से गाई जाती है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा बहुत ही सहज, प्रवाहमयी और आम बोलचाल की हिंदी-अवधी-ब्रज मिश्रित है। इसमें रूपक अलंकार और आर्तनाद शैली (Pathos-filled style) का सुंदर प्रयोग हुआ है। "ज़िंदगी का कारवाँ", "नैया बीच मझधार" जैसे मुहावरों और प्रतीकों ने इसे आम आदमी के जीवन से सीधा जोड़ दिया है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
- अहंकार का त्याग: ईश्वर के सामने व्यक्ति को अपनी लघुता और दीनता स्वीकार करनी ही पड़ती है।
- अटूट विश्वास: परिस्थितियां कैसी भी हों, भगवान का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
- निःस्वार्थ प्रेम: प्रेम वही सच्चा है जिसमें पाने की इच्छा से अधिक खोने का भय और समर्पण का भाव हो।
- अधिक प्रेरणा के लिए आप हमारे गीता के उपदेश और कर्म योग तथा भक्ति मार्ग के रहस्य से जुड़े लेख पढ़ सकते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| मनमोहन | मन को मोहने वाले (श्री कृष्ण) | वह शक्ति जो साधक के मन को आकर्षित करती है। |
| कारवाँ | जीवन का काफिला या यात्रा | समय और कर्मों के साथ आगे बढ़ता मानव जीवन। |
| सुध-बुध | होश, सुदंरता, चेतना | ईश्वर प्रेम में सुधि-बुधि खो देने की स्थिति (उन्माद)। |
| मझधार | नदी या सागर का बीच का हिस्सा | जीवन के संकटपूर्ण मोड़ या कठिनाइयाँ। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में..."
यहाँ भक्त भगवान से कहता है कि हे मेरे प्रभु! यदि आप मुझसे विमुख हो गए, तो इस विशाल संसार में मेरा कोई अपना नहीं है। सभी नाते-रिते स्वार्थ के हैं।
"ज़िंदगी का कारवाँ रुकता नहीं है, दिल है श्याम तुम बिन धड़कता नहीं है।"
दुनिया का क्रम चलता रहता है, लोग अपनी धुन में व्यस्त रहते हैं, किंतु मेरे हृदय की धड़कन केवल आपके नाम और आपकी उपस्थिति से जुड़ी है। आपके बिना जीवन निष्प्राण है।
"तेरी आस लगाए बैठा हूँ कान्हा, मैं दर पे तुम्हारे आया हूँ कान्हा..."
भक्त अपनी सारी दुनिया छोड़कर केवल भगवान के द्वार पर उम्मीद की आस लेकर बैठा है। यदि यहाँ से भी दुत्कार मिल गई, तो उसका कहीं ठिकाना नहीं रहेगा।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को पुष्ट करने के लिए निम्नलिखित श्रीमद्भागवत गीता और पौराणिक श्लोक का स्मरण किया जा सकता है:
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥"
(श्रीमद्भागवत गीता, अध्याय 9, श्लोक 22)
भावार्थ: जो भक्त अन्य किसी का चिंतन न करते हुए निरंतर मेरा स्मरण करते हैं, उन नित्य-युक्त पुरुषों का योग-क्षेम (आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति और रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | मनमोहन तुम रूठ गए तो कौन मेरा जग में |
|---|---|
| आरध्य देव | भगवान श्री कृष्ण (श्यामसुंदर) |
| संगीत शैली | विरह भक्ति / भावप्रधान लोक भजन |
| भाषा | सरल हिंदी / ब्रज-अवधी मिश्रित |
| मुख्य भाव | शरणागति, विरह, प्रेम, आर्त पुकार |
| उपयुक्त अवसर | दैनिक पूजा, सत्संग, एकांत साधना, जन्माष्टमी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री Bhaktilok.in के उच्च गुणवत्ता मानकों के तहत तैयार की गई है। इसमें पाठ की शुद्धता, प्रामाणिक भावार्थ और पारंपरिक भक्ति साहित्य के मूल्यों का पूर्ण ध्यान रखा गया है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है जिसे पाठकों की आध्यात्मिक पिपासा को शांत करने के लिए अद्यतन किया गया है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत महापुराण एवं गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन
- पारंपरिक लोक भजन संग्रह एवं संत वाणी
- वैदिक एवं पौराणिक साहित्य ग्रंथ
- भक्ति काल के विरह और प्रेम काव्य संदर्भ
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