"जगत सारा माँ की मन्नत है चरणों में जन्नत है" एक अत्यंत ही भावपूर्ण, हृदयस्पर्शी और वात्सल्य रस से परिपूर्ण भजन है। यह भजन न केवल लौकिक माता (जननी) के प्रति अगाध श्रद्धा को प्रकट करता है, बल्कि समस्त ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री आदि शक्ति, जगत जननी माँ दुर्गा के प्रति भी पूर्ण समर्पण का संदेश देता है। हिंदू सनातन संस्कृति में माता को ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया गया है, क्योंकि माता ही इस संसार में जीव के आगमन का माध्यम बनती है और उसे प्रथम संस्कार प्रदान करती है। इस भजन की मधुर धुन और गहरे अर्थपूर्ण शब्द श्रोताओं के अंतःकरण में मातृ-भक्ति और ईश्वरीय चेतना का संचार करते हैं। इसे विशेष रूप से नवरात्रि, माता की चौकी, पारिवारिक सत्संग और दैनिक पूजा के अवसरों पर अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ स्थायी ॥
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है।
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है।
॥ अंतरा - १ ॥
माँ में संसार समाया, ऋषि मुनियों ने बतलाया।
प्रभु ने खुद से भी है पूछा, माँ है सबसे बड़ा बताया।
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है।
ममता के मंदिर की है माँ, सबसे प्यारी मूरत।
भगवान नजर आता है जब, देखूं माँ की सूरत।
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है।
॥ अंतरा - २ ॥
माँ के पावन चरणों में, सच्चा वैकुंठ समाया।
इस प्यार भरी ममता को, स्वयं नारायण ने पाया।
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है।
जो भरी धूप में कर दे, अपने आँचल की छाया।
गोद में भर के तन को मेरा, हर दोष मिटाया।
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है।
॥ अंतरा - ३ ॥
जो खुद धरती पर सोए, मेरे हर कष्ट को धोए।
चाहे जो कष्ट उठाए, संतान न भूखी सोए।
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है।
अपने बच्चे के आँसू, आँचल में अपने पिरोती।
शब्दों में बयां न होगा, ऐसा अनमोल ये मोती।
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है।
॥ अंतरा - ४ ॥
नैनों में शीतल धारा, जैसे चमकीला तारा।
तोतली जुबां को देती, शब्दों की अविरल धारा।
जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन का मूल भाव माता की निश्छल ममता, उनके त्याग और उनकी दिव्य महिमा का गुणगान करना है। भजन की शुरुआत इस सत्य की घोषणा के साथ होती है कि यह संपूर्ण संसार माता की ही प्रार्थना और मन्नत का प्रतिफल है। माता के चरणों की धूल में ही चारों धाम और स्वर्ग (जन्नत) का सुख समाया हुआ है।
भजन के प्रथम भाग में बताया गया है कि हमारे पूज्य ऋषि-मुनियों ने भी शास्त्रों में यही उद्घोष किया है कि संपूर्ण ब्रह्मांड माता के भीतर ही समाया हुआ है। स्वयं भगवान ने भी जब इस पृथ्वी पर अवतार लिया, तो उन्होंने माता की महिमा को अपने से भी ऊंचा स्थान दिया। माता की ममता का मंदिर इतना पावन है कि उसकी मूर्ति में साक्षात ईश्वर के दर्शन होते हैं। जब कोई पुत्र या पुत्री अपनी माता के मुखमंडल को देखता है, तो उसे किसी अन्य मंदिर या प्रतिमा की आवश्यकता नहीं रह जाती; उसे अपनी माँ की सूरत में ही भगवान नजर आने लगते हैं।
आगे के अंतरे में माता के त्याग और कष्ट सहने की असीम क्षमता का वर्णन है। माता स्वयं कष्ट सहकर भी अपनी संतान को सुखी देखना चाहती है। वह तपती धूप जैसी कठिन परिस्थितियों में भी अपने आँचल की शीतल छाया प्रदान करती है। वह स्वयं भूखी सो सकती है, परंतु अपनी संतान को कभी भूखा नहीं रहने देती। माता का यह वात्सल्य और निस्वार्थ प्रेम ही उसे इस सृष्टि का सबसे अनमोल रत्न बनाता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह मातृ-ऋण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक आध्यात्मिक माध्यम है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- मातृ-देवो भव का संदेश: यह भजन उपनिषदों के महावाक्य "मातृदेवो भव" को चरितार्थ करता है, जिसमें माता को प्रथम पूज्य और प्रत्यक्ष देवता माना गया है।
- सरलता और सुगमता: भजन की भाषा अत्यंत सरल और सुबोध है, जिससे यह सीधे हृदय को स्पर्श करती है।
- वात्सल्य रस की प्रधानता: इसमें माता और संतान के बीच के पवित्र, निस्वार्थ और दिव्य प्रेम (वात्सल्य) को बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया गया है।
- सर्वभौमिक स्वीकार्यता: यह भजन किसी एक संप्रदाय तक सीमित न होकर हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है जो अपनी माता से प्रेम करता है और उनके प्रति आदर भाव रखता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि माता की आराधना और उनके भजन के लिए किसी विशेष समय की बाध्यता नहीं होती, क्योंकि माता का स्मरण हर क्षण कल्याणकारी है, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर अत्यंत फलदायी माने गए हैं:
- नवरात्रि महोत्सव: आश्विन और चैत्र मास की नवरात्रि के पावन नौ दिनों में इस भजन का गायन देवी दुर्गा की आराधना के साथ किया जाता है।
- माता की चौकी और जागरण: पारिवारिक मंगल कार्यों, गृह प्रवेश या मन्नत पूरी होने पर आयोजित होने वाले माता के जागरण और चौकी में इस भजन को गाने से वातावरण अत्यंत भावुक और भक्तिमय हो जाता है।
- दैनिक संध्या आरती: घर के मंदिर में संध्या काल की पूजा के समय इस भजन को सुनने या गाने से परिवार में शांति, प्रेम और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- गायन विधि: इस भजन को शांत चित्त होकर, हाथ जोड़कर और माता के ममतामयी स्वरूप का ध्यान करते हुए गाना चाहिए। इसमें वाद्य यंत्रों के रूप में ढोलक, मंजीरा और हरमोनियम का प्रयोग इसकी मधुरता को और बढ़ा देता है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से आदि शक्ति माँ दुर्गा और हमारी जन्म देने वाली लौकिक माता दोनों को समर्पित है। सनातन परंपरा में माता को साक्षात शक्ति का रूप माना गया है। भगवान श्री रामचंद्र जी ने भी लंका विजय के उपरांत लक्ष्मण जी से कहा था—"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" (अर्थात जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी उच्च है)।
इसके अतिरिक्त, भगवान श्री कृष्ण और माता यशोदा, भगवान गणेश और माता पार्वती के प्रसंग भी इस भजन के भावों की पुष्टि करते हैं। भगवान गणेश ने माता-पिता की परिक्रमा को ही संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा मानकर प्रथम पूज्य होने का वरदान प्राप्त किया था। यह भजन उसी महान सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन आधुनिक काल की सुंदरतम भक्ति रचनाओं में से एक है। इसकी पृष्ठभूमि लोक-चेतना और पारिवारिक मूल्यों के ह्रास के इस दौर में मातृ-भक्ति को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से प्रेरित जान पड़ती है। आज के व्यस्त जीवन में जहाँ लोग अपने माता-पिता के योगदान को भूलते जा रहे हैं, यह भजन एक अनुस्मारक (Reminder) के रूप में कार्य करता है कि हमारे जीवन की हर सफलता और सुख के पीछे माता की प्रार्थनाएं और उनके आशीर्वाद का हाथ होता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें उर्दू के कुछ अत्यंत लोकप्रिय और मधुर शब्दों जैसे 'मन्नत' (प्रार्थना/मनोकामना) और 'जन्नत' (स्वर्ग) का बहुत ही सुंदर समन्वय किया गया है। यह भाषाई समन्वय भजन को अधिक व्यापक और जन-साधारण के लिए सुलभ बनाता है।
काव्य शैली की बात करें तो इसमें अंत्यानुप्रास अलंकार का प्रचुर प्रयोग हुआ है (जैसे मन्नत-जन्नत, मूरत-सूरत, समाया-पाया), जो इसे अत्यधिक गेय (गाए जाने योग्य) और लयबद्ध बनाता है। इसके रूपक और उपमाएं (जैसे "ममता का मंदिर", "चमकीला तारा") श्रोता के मन में माता की एक अत्यंत सौम्य और ममतामयी छवि अंकित कर देते हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन सीख प्रदान करता है:
- कृतज्ञता का भाव: हमें सदैव अपनी माता के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए, जिन्होंने हमें इस संसार में लाया और पाल-पोसकर बड़ा किया।
- निस्वार्थ सेवा: माता का प्रेम निस्वार्थ होता है। हमें भी बिना किसी स्वार्थ के अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए।
- धैर्य और सहनशीलता: माता जिस प्रकार हमारे दोषों को क्षमा कर देती है और कष्ट सहकर भी मुस्कुराती है, वही धैर्य हमें अपने जीवन में भी अपनाना चाहिए।
- ईश्वर की खोज भीतर ही: भगवान को ढूंढने के लिए तीर्थों में भटकने की आवश्यकता नहीं है; यदि हम अपने माता-पिता की सेवा सच्चे मन से करते हैं, तो हमें उनके चरणों में ही वैकुंठ (ईश्वर का धाम) प्राप्त हो जाता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | भजन के संदर्भ में महत्व |
|---|---|---|
| मन्नत | मनोकामना, प्रार्थना या मन्नत मांगना | यह दर्शाता है कि संतान का जन्म माता की तपस्या का फल है। |
| जन्नत | स्वर्ग, परम सुख का धाम | माता के चरणों की सेवा को स्वर्ग के सुख से भी बढ़कर बताया गया है। |
| वैकुंठ | भगवान विष्णु का परम धाम | माता के पावन चरणों में ही सच्चे वैकुंठ की प्राप्ति होती है। |
| अविरल धारा | लगातार बहने वाली नदी या प्रवाह | माता बालक की तोतली बोली को भी सुंदर शब्दों का प्रवाह दे देती है। |
| आँचल | साड़ी का पल्लू, माता की गोद | कठिन समय में सुरक्षा और शांति प्रदान करने वाला आश्रय। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"जगत सारा माँ की मन्नत है, चरणों में जन्नत है..."
यह संपूर्ण संसार माता की ही तपस्या और प्रार्थना का परिणाम है। यदि कोई व्यक्ति जीवन में परम शांति और स्वर्ग का अनुभव करना चाहता है, तो उसे अपनी माता के चरणों की शरण लेनी चाहिए।
"माँ में संसार समाया, ऋषि मुनियों ने बतलाया..."
हमारे प्राचीन ग्रंथों और ऋषियों ने यह प्रमाणित किया है कि माता के भीतर ही संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित है। स्वयं भगवान ने भी जब अवतार लिया, तो उन्होंने माता को ही सृष्टि का सबसे महान और पूज्य तत्व घोषित किया।
"ममता के मंदिर की है माँ, सबसे प्यारी मूरत..."
माता का हृदय ममता का एक पावन मंदिर है और वह स्वयं उस मंदिर की सबसे सुंदर और सजीव प्रतिमा हैं। जब हम श्रद्धापूर्वक अपनी माता का चेहरा देखते हैं, तो हमें उसमें साक्षात ईश्वर की छवि दिखाई देती है।
"जो भरी धूप में कर दे, अपने आँचल की छाया..."
जब जीवन में दुखों और कठिनाइयों की तपती धूप आती है, तब माता अपने स्नेह और आशीर्वाद के आँचल से हमें शीतलता और सुरक्षा प्रदान करती है। वह हमारे सभी दोषों और कमियों को भुलाकर हमें अपनी गोद में समेट लेती है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
माता की महिमा को प्रकट करने वाले कुछ अत्यंत पावन संस्कृत श्लोक और मंत्र निम्नलिखित हैं, जिनका पाठ इस भजन के साथ किया जा सकता है:
"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥"
यह मंत्र जगत जननी माँ भगवती की स्तुति करता है, जो सभी मंगलों को प्रदान करने वाली और शरण में आए भक्तों की रक्षा करने वाली हैं। इसके अतिरिक्त, माता-पिता की वंदना का यह प्रसिद्ध श्लोक भी इस भजन के भावों को पूर्ण करता है:
"त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥"
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | जगत सारा माँ की मन्नत है चरणों में जन्नत है |
| समर्पित देवी-देवता | माँ दुर्गा, आदि शक्ति एवं लौकिक माता (जननी) |
| मुख्य रस / भाव | वात्सल्य रस, भक्ति और पूर्ण समर्पण भाव |
| भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| उपयुक्त अवसर | नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण, मातृ दिवस, दैनिक पूजा |
| मुख्य संदेश | माता-पिता की सेवा ही परम धर्म और सच्चा स्वर्ग है |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को तैयार करने में विभिन्न प्रामाणिक भक्ति संकलनों, पारंपरिक लोक गीतों और सनातन धर्म के पूज्य ग्रंथों का संदर्भ लिया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, त्रुटिहीन और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध सामग्री पहुंचाना है ताकि वे अपनी दैनिक साधना और पूजा-अर्चना में इसका पूर्ण लाभ उठा सकें।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्देवीभागवत पुराण - माता की महिमा और उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन।
- पारंपरिक भजन संग्रह एवं लोक संगीत परंपरा।
- उपनिषद वाक्य - "मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"।
संबंधित भजन एवं लेख
यदि आपको यह भजन और इसका भावार्थ पसंद आया है, तो आप हमारी वेबसाइट पर निम्नलिखित पावन रचनाओं का भी आनंद ले सकते हैं:
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें