ऐसी करुणा करो किशोरी भजन - परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि
"ऐसी करुणा करो किशोरी" अत्यंत ही पावन, हृदय को द्रवित करने वाला और भक्ति रस से परिपूर्ण एक ऐसा संकीर्तन है जो साधक को सीधे ब्रजमंडल की अगाध कृपा और श्री राधारानी के चरणों से जोड़ देता है। सनातन धर्म, विशेषकर गौड़िया वैष्णव और निंबार्क संप्रदाय में श्री किशोरी जू (श्री राधा) को समस्त आराध्यों की प्राण-शक्ति और करुणा की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। यह भजन अकिंचन जीवात्मा की पुकार है जो अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण शरणागति (Surrender) के भाव के साथ श्रीधाम वृंदावन और बरसाना की रज में अपने जीवन को सार्थक करना चाहती है। इसमें सांसारिक बंधनों, पापों, काम-क्रोध रूपी शत्रुओं और मानसिक संतापों से त्रस्त होकर एकमात्र श्री राधारानी की अहैतुकी कृपा की याचना की गई है। जब कोई भक्त इस भजन का गायन या श्रवण करता है, तो उसके हृदय में दिव्य विरह, अनन्य प्रेम और ब्रजवास की लालसा जागृत हो जाती है। यह भजन प्रातःकालीन बेला में, संध्या वंदन के समय, एकादशी के उपवास में, या किसी भी सत्संग और संकीर्तन के पावन अवसर पर गाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है। इसके माध्यम से साधक यह स्वीकार करता है कि अपनों और संसार के सब बंधनों के क्षीण हो जाने पर भी केवल किशोरी जी का ही एक ऐसा आत्मीय संबल है जो भवसागर से पार लगा सकता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
|| ऐसे करुणा करो किशोरी ||
ऐसा करुणा करो किशोरी जाने या अंजाने में,
वृंदावन में उम्र कटे और मौज मिले बरसाने में,
|| ऐसे करुणा करो किशोरी ||
जीवन के पथ में अंधियारा मैंने तुम्हारा किया,
काम क्रोध लालच में आकर हर पल मैंने पाप किया,
उम्र कैद की सजा सूना दो पापो के हर जाने में,
|| ऐसे करुणा करो किशोरी ||
अपनों ने संग छोड़ दिया है गैरो की अब आस नहीं,
एक तुम्हारे सिवा किशोरी कुछ भी मेरे पास नहीं,
दर्रे हिट भटक रहा हु इस बेमेंर जने में,
|| ऐसे करुणा करो किशोरी ||
श्री हरिदास की प्यारी तुम हो करुना मई कहाती हो,
दीन दुखी जो है दुनिया में उनका साथ निभाती हो,
कहे अनादि क्या दिकत है खत्री को अपनाने में,
|| ऐसे करुणा करो किशोरी ||
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस अद्भुत भजन की प्रत्येक पंक्ति में भक्त की दीनता और श्री राधारानी की असीम करुणा का सजीव चित्रण मिलता है। भजन के मुखड़े में भक्त प्रार्थना करता है कि हे किशोरी जी! मुझ पर ऐसी कृपा बरसाओ कि चाहे मैंने जाने-अनजाने में कितने भी पाप या भूलें क्यों न की हों, मेरा शेष जीवन श्रीधाम वृंदावन में बीते और मुझे बरसाना धाम की परम कृपालु रज का सुख प्राप्त हो। ब्रजवासियों और संतों के अनुसार, वृंदावन में वास करना और बरसाने की कृपा पाना सामान्य कर्मों का फल नहीं, बल्कि राधा रानी की अहैतुकी दया का परिणाम है।
द्वितीय अंतर में भक्त अपने जीवन की भूलों और विकारों का पर्दाफाश स्वयं के समक्ष करता है। वह स्वीकार करता है कि उसने अपने जीवन के मार्ग में अज्ञान और मोह का अंधकार फैलाया है। काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे षडरिपुओं के वशीभूत होकर उसने हर पल अनजाने या जाने में गलत मार्ग अपनाया है। भक्त यहाँ तक कहता है कि यदि उसके पापों का हिसाब हो, तो उसे इस संसार के बंधनों में रखने के बजाय प्रेम की ऐसी सजा दे दी जाए जो उसके सारे कर्मबंधनों को काट दे।
तृतीय चरण में साधक की लाचारी और अनन्य प्रेम निष्ठा प्रकट होती है। वह कहता है कि इस स्वार्थी संसार में जब अपने भी साथ छोड़ देते हैं और गैरों से किसी प्रकार की कोई उम्मीद नहीं रह जाती, तब केवल श्री किशोरी जी का ही नाम उसका एकमात्र सहारा बचता है। संसार की ठोकरें खाते हुए और भटकते हुए जीव के पास श्री राधा रानी के चरणों के सिवा कोई दूसरा ठिकाना नहीं है।
अंतिम चरण में कवि 'अनादि' और 'खत्री' जैसे संबोधनों के माध्यम से राधारानी के करुणामयी स्वरूप का स्मरण कराता है। श्री राधारानी स्वामी श्री हरिदास जी महाराज की अति प्रिय आराध्या हैं और संपूर्ण संसार में करुणा की मूर्ति के रूप में विख्यात हैं। जो भी दीन-दुखी इस संसार में शरण मांगता है, किशोरी जी उसका हाथ कभी नहीं छोड़तीं। भक्त अंत में अत्यंत प्रेमभरे उलाहने के साथ पूछता है कि हे महारानी! मुझ जैसे क्षुद्र और दीनहीन को अपनी शरण में अपनाने में आपको भला क्या संकोच या कठिनाई हो सकती है?
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह शुद्ध भक्ति योग और शरणागति का मार्गदर्शक दस्तावेज है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- शरणागति का भाव: इसमें जीव अपनी समस्त कमजोरियों को स्वीकार करते हुए भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण करता है।
- धाम महात्म्य: वृंदावन और बरसाना के वास को सर्वोच्च आध्यात्मिक उपलब्धि बताया गया है।
- नाम स्मरण की शक्ति: श्री राधारानी के नाम और उनके संकीर्तन से पापों के शमन का स्पष्ट संदेश है।
- संत परंपरा का प्रभाव: इसमें स्वामी हरिदास जी की परंपरा और ब्रज के संतों के विचारों की गहरी छाप दिखाई देती है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन का आनंद और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष नियमों और भावों का ध्यान रखना चाहिए:
- उत्तम समय: प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में, संध्या वंदन के समय, या एकादशी व राधा अष्टमी जैसे विशेष पर्वों पर इसका गान अत्यंत फलदायी होता है।
- स्थान: इसे घर के मंदिर में, किसी शांत एकांत कोने में, अथवा वृंदावन-बरसाना की यात्रा के दौरान संतों के सान्निध्य में गाना चाहिए।
- भाव: गाते समय आँखों में प्रेम के अश्रु और हृदय में दीनता का भाव होना चाहिए, जिससे नाम का प्रभाव सीधा मन पर पड़े।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
इस भजन की केंद्रबिंदु हैं श्री राधा रानी, जिन्हें 'किशोरी जी' के नाम से भी संबोधित किया जाता है। सनातन धर्म में यह मान्यता है कि कृष्ण को रिझाने का एकमात्र मार्ग श्री राधा की कृपा से होकर जाता है। इसके साथ ही, स्वामी हरिदास जी (जो बांके बिहारी जी के प्राकट्यकर्ता और निकुंज उपासना के प्रणेता हैं) का स्मरण इस भजन में साधना की उच्च अवस्था को दर्शाता है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन आधुनिक ब्रज-भक्ति संगीत परंपरा का एक अत्यंत लोकप्रिय पद है जिसे विभिन्न युवा और पारंपरिक संकीर्तन कलाकारों द्वारा गाया जाता है। इसके गीतकार 'अनादि' जी ने खत्री समाज और आम जनमानस के सुलभ शब्दों में ब्रज रस को पिरोया है, जिससे यह आम आस्तिक जनों की जुबान पर आसानी से चढ़ जाता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
भजन की भाषा सरल, सहज और प्रवाहमयी खड़ी हिंदी एवं ब्रजभाषा का सुंदर मिश्रण है। इसमें अनुप्रास और उपमा अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। "वृंदावन में उम्र कटे और मौज मिले बरसाने में" जैसी पंक्तियाँ लोक-साहित्य की मिठास और ब्रज की सांस्कृतिक सुगंध को सजीव कर देती हैं।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें निम्नलिखित अमूल्य जीवन सीख मिलती हैं:
- मनुष्य को अपने अहंकार का त्याग कर हमेशा दीनता और विनम्रता का मार्ग अपनाना चाहिए।
- सांसारिक मोह-माया और षडरिपुओं (काम, क्रोध, लोभ आदि) से बचने का एकमात्र उपाय ईश्वर का स्मरण है।
- कठिन समय में भी भगवान और गुरु पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
- जीवन का अंतिम लक्ष्य भौतिक सुख नहीं, बल्कि भागवत प्राप्ति और संत कृपा होना चाहिए।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| किशोरी | श्री राधारानी | ब्रज की अधीश्वर और करुणा की देवी |
| बरसाना | श्री राधा जी का निवास स्थान | प्रेम और उल्लास की पावन भूमि |
| षडरिपु (काम, क्रोध) | आंतरिक शत्रु | मनुष्य को पतन की ओर ले जाने वाले विकार |
| अनादि | रचियता / कवि नाम | भजन के रचनाकार की आत्मकेंद्रित पुकार |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-به-Line Explanation
पंक्ति: 'ऐसा करुणा करो किशोरी जाने या अंजाने में...'
भावार्थ: भक्त अपनी भूल-चूक की क्षमा मांगते हुए राधारानी से अहैतुकी करुणा की भीख मांग रहा है कि हे माता, मेरे कर्म कैसे भी रहे हों, तू अपनी कृपा से मुझे अपना ले।
पंक्ति: 'वृंदावन में उम्र कटे और मौज मिले बरसाने में...'
भावार्थ: साधक की सर्वोच्च इच्छा भौतिक धन-दौलत की नहीं, बल्कि ब्रज की रज में जीवन बिताने और बरसाने के आनंद को भोगने की है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के गायन के पश्चात निम्नलिखित महामंत्र का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
"श्री राधा राधेश्याम श्री राधा राधेश्याम..."
एवं
"राधा वल्लभ श्री हरिवंश"
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| भजन का नाम | ऐसी करुणा करो किशोरी भजन इन हिंदी |
| आराध्य देवी | श्री राधारानी (किशोरी जू) |
| रचनाकार | कवि अनादि |
| भाषा | हिंदी एवं ब्रजभाषा मिश्रित |
| मुख्य थीम | शरणागति, ब्रजवास और राधारानी की कृपा |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, एकादशी, राधा अष्टमी, दैनिक पूजा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख भक्तों की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं और पारंपरिक ब्रज साहित्य को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसमें प्रयुक्त शब्द और भाव पूरी तरह से सनातन भक्ति परंपरा के अनुकूल हैं। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस भजन के मर्म को अत्यंत सरल और प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत किया गया है ताकि साधक को साधना में सहायता मिल सके।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- गौड़िया वैष्णव संप्रदाय के प्रामाणिक पद एवं संकीर्तन ग्रंथ
- श्रीधाम वृंदावन और बरसाना के संतों के प्रवचन एवं वाणी संग्रह
- भक्ति रसामृत सिंधु एवं पारंपरिक लोक भजन संग्रह
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