सुखी बसे संसार सब दुखिया रहे न कोय लिरिक्स: एक अलौकिक सार्वभौमिक प्रार्थना का परिचय
"सुखी बसे संसार सब दुखिया रहे न कोय, यह अभिलाषा हम सब की, भगवन पूरी होय" – यह अत्यंत पावन, हृदयस्पर्शी एवं उदात्त भावना से परिपूर्ण पंक्तियां भारतीय सनातन संस्कृति की उस विशाल दृष्टि की परिचायक हैं जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड के कल्याण की कामना की जाती है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' (संपूर्ण पृथ्वी ही परिवार है) के वैदिक एवं उपनिषदिक सिद्धांत को चरितार्थ करता यह भजन किसी व्यक्ति विशेष की संकीर्ण कामना न होकर समस्त जीव-मात्र के सुख, शांति, आरोग्य, विद्या और आध्यात्मिक उन्नति का उद्घोष है। भक्ति लोक (Bhaktilok.in) के इस विस्तृत एवं प्रामाणिक scholarly guide में हम इस भजन के शाश्वत संदेश, भावार्थ, साहित्यिक सौंदर्य और आध्यात्मिक गहराई का गहन विश्लेषण करेंगे। कलयुग के इस भागदौड़ भरे और तनावपूर्ण युग में, जहां स्वार्थ और मानसिक अशांति चरम पर है, यह भजन मनुष्य को संकीर्णता से ऊपर उठकर सार्वभौमिक कल्याण (Universal Wellbeing) की भावना से ओतप्रोत होने की प्रेरणा देता है। प्रातःकालीन स्मरण, सामूहिक संकीर्तन, सत्संग और दैनिक पूजा-पाठ के दौरान इस पवित्र प्रार्थना का गान करने से चित्त में सात्विकता, करुणा और परोपकार की भावना का उदय होता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ सुखी बसे संसार सब दुखिया रहे न कोय ॥
सुखी बसे संसार सब दुखिया रहे न कोय,
यह अभिलाषा हम सब की, भगवन पूरी होय।
विद्या बुधि तेज बल सबके भीतर होय,
दूध पूत धन-धान्य से वंचित रहे न कोय।
आपकी भक्ति प्रेम से मन होवे भरपूर,
राग-द्वेष से चित्त मेरा कोसों भागे दूर।
मिले भरोसा आपका, हमें सदा जगदीश,
आशा तेरे नाम की, बनी रहे मम ईश।
पाप से हमें बचाओ, करके दया दयाल,
अपना भक्त बनाय कर, हमको करो निहाल।
दिल में दया उदारता मन में प्रेम अपार,
हृदय में धीरता, हे मेरे करतार।
हाथ जोड़ विनती करूं सुनिए कृपा निधान,
साधु-संगत सुख दीजिए, दया धर्म का दान।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस महान भजन का प्रत्येक चरण मानवीय जीवन के सर्वोच्च मूल्यों और आध्यात्मिक उत्थान को समर्पित है। आइए इसके गहन अर्थ को समझें:
भजन के प्रारंभिक चरण में रचयिता सम्पूर्ण सृष्टि के मंगल की कामना करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करता है कि इस संसार में बसने वाले सभी जीव-जंतु, मनुष्य और प्राणी सुखी हों; इस धरा पर कोई भी व्यक्ति दुखी, पीड़ित या अभावग्रस्त न रहे। यह सनातन धर्म के मूल मंत्र 'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः' का ही काव्यात्मक और सुलभ रूप है। इसके पश्चात साधक समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए बुद्धि, विद्या, आत्मिक तेज और शारीरिक बल की कामना करता है, ताकि समाज का कोई भी वर्ग दुर्बल या अज्ञानता के अंधकार में न रहे।
गृहस्थ जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे अन्न, धन, वंश और समृद्धि (दूध पूत धन-धान्य) की प्रचुरता की कामना करते हुए भी साधक भोग-विलास में नहीं उलझता, बल्कि तुरंत अगले चरण में ईश्वर से अनन्य भक्ति और प्रेम की भीख मांगता है। उसका मन ईश्वरीय प्रेम से परिपूर्ण हो और उसके अंतःकरण से राग (आसक्ति), द्वेष (ईर्ष्या), और घृणा कोसों दूर भाग जाएं। सांसारिक दुखों के सागर में एकमात्र जगदीश का भरोसा और उनके पावन नाम की आशा ही जीवन की नौका को पार लगा सकती है। साधक भगवान से यह भी प्रार्थना करता है कि वह उसे पाप कर्मों से बचाएं, उसपर अपनी अहेतुकी दया बरसाएं और अपना अनन्य भक्त बनाकर कृतार्थ करें।
अंतिम चरणों में साधक अपने व्यक्तित्व के परिमार्जन के लिए ईश्वर से मानवीय गुणों की याचना करता है - हृदय में अगाध दया, मन में उदारता और प्रेम, तथा संकटों के समय भी अडिग रहने वाली धीरता (धैर्य)। अंत में, दोनों हाथ जोड़कर कृपाधान परमेश्वर से यह अंतिम वर मांगा जाता है कि उसे संत महात्माओं की संगति (साधु-संगत) का सुख प्राप्त हो और वह हमेशा दया और धर्म के मार्ग पर चलने का दान प्राप्त कर सके।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन अपनी सादगी और सार्वभौमिकता के कारण अद्वितीय है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- लोकमंगल की भावना: इसमें केवल अपनी मुक्ति या सुख की कामना न करके समस्त संसार के कल्याण का संकल्प है।
- संतुलित दृष्टिकोण: भौतिक समृद्धि (धन-धान्य, बल, बुद्धि) और आध्यात्मिक उन्नति (भक्ति, प्रेम, साधु-संगत) का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया गया है।
- नैतिक उत्थान: राग-द्वेष का नाश, हृदय में दया, उदारता और धीरता जैसे नैतिक गुणों के विकास पर बल दिया गया है।
- शरणागति भाव: ईश्वर को सर्वशक्तिमान और कृपालु मानते हुए पूर्ण समर्पण और विनय का भाव प्रदर्शित किया गया है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस पवित्र भजन को गाने और सुनने के लिए कोई कठोर नियम बाध्यकारी नहीं है, फिर भी इसके आध्यात्मिक लाभ को अधिकतम करने के लिए निम्नलिखित समय एवं विधियां उत्तम मानी जाती हैं:
- प्रातःकालीन वंदना: ब्रह्म बेला में या सुबह की पूजा के समय इसे गाने से पूरा दिन सकारात्मक ऊर्जा और शांति से परिपूर्ण रहता है।
- सांध्यकालीन आरती व सत्संग: संध्या के समय परिवार के साथ बैठकर सामूहिक रूप से इस भजन का गान करने से पारिवारिक सौहार्द बढ़ता है।
- मानसिक शांति के लिए: जब भी मन अशांत हो या मानसिक तनाव महसूस हो, इस भजन की पंक्तियों का स्मरण करने से चित्त को असीम शांति मिलती है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन किसी एक विशेष देवी या देवता की स्तुति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सर्वव्यापक निराकार और साकार ब्रह्म (जगदीश, करतार, ईश) को समर्पित है। इसमें भगवान श्री विष्णु, श्री राम, श्री कृष्ण अथवा भगवान शिव के उस सार्वभौमिक स्वरूप का आह्वान किया गया है जो समस्त जगत के पालक और संहारक हैं। साथ ही, यह संत कबीर, तुलसीदास और मीराबाई जैसी महान संत परंपरा की उस लोक-कल्याणकारी धारा का प्रतिनिधित्व करता है जो 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के ध्येय को जीती थी।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन पारंपरिक लोक-भक्ति साहित्य और संत वाणी का एक उत्कृष्ट रत्न है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी संतों, महात्माओं और भक्तों द्वारा इसे मौखिक रूप से और लिखित रूप से आगे बढ़ाया गया है। इसकी भाषा इतनी सरल, मधुर और प्रवाहपूर्ण है कि बच्चा-बच्चा इसे सहज ही याद कर सकता है। भारतीय भजन परंपरा में ऐसे गीतों का उद्देश्य समाज को जोड़ना, वैमनस्य को मिटाना और भक्ति का अलख जगाना रहा है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इसकी भाषा सरल, सुबोध और लोक-प्रचलित हिंदी (खड़ी बोली मिश्रित ब्रज-अवधि प्रभाव) है। इसकी काव्य शैली सरल तुकबंदी (Rhyming Scheme) पर आधारित है, जिससे इसे गाना और याद रखना अत्यंत सुगम हो जाता है। भजन में रूपक और उपमा के स्थान पर सीधी, सरल और भावपूर्ण प्रार्थना की शैली अपनाई गई है, जो सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
इस भजन से हमें निम्नलिखित अमूल्य जीवन सीख मिलती हैं:
- संकुचित मानसिकता का त्याग: हमें केवल अपने परिवार या स्वयं के बारे में न सोचकर संपूर्ण मानवता के सुख की कामना करनी चाहिए।
- गुणों का अर्जन: विद्या, बल और धन के साथ-साथ दया, उदारता, प्रेम और धीरता जैसे मानवीय गुण अत्यंत आवश्यक हैं।
- सत्संग का महत्व: जीवन में सही राह पर चलने के लिए संत-महात्माओं और सज्जनों की संगति अनिवार्य है।
- अहंकार का शमन: हाथ जोड़कर विनती करने का भाव हमारे भीतर से अहंकार को समाप्त कर विनम्रता का संचार करता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| अभिलाषा | इच्छा या कामना | हृदय की पवित्र और सर्वोच्च आंतरिक पुकार |
| तेज बल | आंतरिक ऊर्जा और शारीरिक-मानसिक शक्ति | धर्म की रक्षा और सेवा के लिए सामर्थ्य |
| राग-द्वेष | मोह-आसक्ति और ईर्ष्या-नफरत | मन के वे विकार जो मुक्ति के मार्ग में बाधक हैं |
| करतार | रचने वाला या सृष्टिकर्ता | संपूर्ण ब्रह्मांड के विधाता परमेश्वर |
| साधु-संगत | संतों और सज्जनों का साथ | ज्ञान, भक्ति और सत्कर्मों की प्राप्ति का माध्यम |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
भजन की प्रत्येक पंक्ति का सूक्ष्म भावार्थ इस प्रकार है:
- "सुखी बसे संसार सब...": भक्त की यह पहली और सबसे बड़ी मांग है कि इस संसार में कोई भी प्राणी दुखी न हो।
- "विद्या बुधि तेज बल...": समाज के हर प्राणी में ज्ञान, विवेक, आत्मबल और शारीरिक क्षमता का विकास हो।
- "आपकी भक्ति प्रेम से...": भौतिक सुखों के बीच भी ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और भक्ति कभी कम न हो।
- "राग-द्वेष से चित्त...": मन विकारों (क्रोध, लोभ, ईर्ष्या) से पूरी तरह मुक्त हो जाए।
- "हाथ जोड़ विनती करूं...": परमपिता परमात्मा के चरणों में पूर्ण समर्पण और विनम्रता की प्रार्थना।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
यह भजन निम्नलिखित प्राचीन वैदिक एवं पौराणिक श्लोकों की भावना का ही विस्तार है:
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥
अर्थात: सभी जीव सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों, सभी का कल्याण हो और किसी भी योनि में कोई दुखी न हो।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | सुखी बसे संसार सब दुखिया रहे न कोय |
|---|---|
| विषय / थीम | सार्वभौमिक कल्याण, विश्व शांति और भक्ति |
| प्रधान भाव | करुणा, शरणागति, परोपकार और विनय |
| भाषा | सरल हिंदी / लोक भाषा |
| उपयुक्त अवसर | प्रातःकालीन प्रार्थना, सत्संग, हवन, और दैनिक पूजा |
| संबंधित परंपरा | सनातन भक्ति एवं संत साहित्य |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
भक्ति लोक (Bhaktilok.in) पर प्रकाशित यह सामग्री सनातन धर्म की लोक-कल्याणकारी परंपरा, संतों के उपदेशों और शास्त्रीय मान्यताओं के अध्ययन पर आधारित है। पाठकों को शुद्ध, प्रामाणिक और प्रेरणादायी सामग्री उपलब्ध कराने के लिए हमारी संपादकीय टीम निरंतर समर्पित है। यह सामग्री पूरी तरह से लोक-कल्याण और आध्यात्मिक उत्थान के उद्देश्य से तैयार की गई है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- सनातन वैदिक साहित्य एवं उपनिषद (सर्वे भवन्तु सुखिनः संकल्प)
- पारंपरिक संत वाणी एवं लोक भजन संकलन
- भारतीय भक्ति आंदोलन के दार्शनिक सिद्धांत
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