hari bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

म्हारी रनू बाई क माननी बुलाई गणगौर गणेश कुशवाह (mhari anu bayi k mnni bulayi khelam aayi gangor mayi gangor bhajan Lyrics in Hindi)

गणेश कुशवाह द्वारा प्रस्तुत 'म्हारी रनू बाई क माननी बुलाई' गणगौर भजन के बोल और भावार्थ पढ़ें। लोक-संस्कृति से जुड़े इस पावन भजन का आनंद लें।

म्हारी रनू बाई क माननी बुलाई गणगौर गणेश कुशवाह भजन परिचय एवं भाव

गणगौर का पावन पर्व भारतीय संस्कृति, विशेषकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में अत्यंत उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाने वाला लोकपर्व है। यह पर्व माता पार्वती (गौर) और भगवान शिव (ईसर जी) की आराधना को समर्पित है, जो सुहागिनों के लिए अखंड सौभाग्य, पारिवारिक सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक है। प्रस्तुत लोक भजन "म्हारी रनू बाई क माननी बुलाई गणगौर गणेश कुशवाह" इसी पारंपरिक लोक-संस्कृति और लोकगीतों की समृद्ध परंपरा का एक अनूठा एवं जीवंत उदाहरण है। इस भजन में लोक-संस्कृति की सोंधी खुशबू के साथ-साथ गली-मोहल्लों में जाकर गणगौर पूजन के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने, एक-दूसरे को आमंत्रित करने और सामूहिक उल्लास का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है। गणेश कुशवाह जी द्वारा संकलित एवं प्रस्तुत यह पारंपरिक गीत लोकजीवन की सहजता, सरलता और देवी के प्रति अगाध समर्पण को दर्शाता है। इसे सुनकर हर श्रोता अपनी जड़ों और लोक-संस्कृति से जुड़ जाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन - शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:


म्हारी रणु बाई क मननि बुलाई , खेलण आई गणगौर माई
गणगौर खेलण हाउ झमराल गली गई थी,
न व्हासी , न व्हासी टोपली लई आईं , खेलण आई गणगौर माई

म्हारी रणु बाई क मननि बुलाई , खेलण आई गणगौर माई
गणगौर खेलण हाउ किसान गली गई थी,
न व्हासी , न व्हासी घउ लई आईं , खेलण आई गणगौर माई

म्हारी रणु बाई क मननि बुलाई , खेलण आई गणगौर माई
गणगौर खेलण हाउ पंचायती गली गई थी,
न व्हासी , न व्हासी चूंदड़ लई आईं , खेलण आई गणगौर माई

म्हारी रणु बाई क मननि बुलाई , खेलण आई गणगौर माई
गणगौर खेलण हाउ कुम्हार गली गई थी ,
न व्हासी , न व्हासी दिवलो लई आईं , खेलण आई गणगौर माई

म्हारी रणु बाई क मननि बुलाई , खेलण आई गणगौर माई
गणगौर खेलण हाउ सुतार गली गई थी ,
न व्हासी , न व्हासी बाजुठ लई आईं , खेलण आई गणगौर माई

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस पारंपरिक लोक भजन का अर्थ और भाव भारतीय ग्रामीण एवं सांस्कृतिक जीवन की सामूहिक भावना को उजागर करता है। भजन की मुख्य पंक्ति "म्हारी रणु बाई क मननि बुलाई, खेलण आई गणगौर माई" का अर्थ है कि हमारे यहाँ रणु बाई के मन को प्रसन्न करते हुए और उन्हें आमंत्रित करते हुए साक्षात माता गणगौर (माता पार्वती) खेलने के लिए पधारी हैं।

भजन के विभिन्न अंतरों में लोक-जीवन की विभिन्न गलियों और वहां के कारीगरों व कृषकों का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है:

  • झमराल गली: जब गणगौर खेलने के लिए झमराल गली की ओर जाया गया, तो वहाँ से माता के पूजन हेतु टोपली (दलिया) प्राप्त हुई, जो पूजन सामग्री ले जाने के लिए आवश्यक है।
  • किसान गली: किसान की गली से अन्न (गेहूं या प्रसाद हेतु) प्राप्त हुआ, जो अन्नपूर्णा माता के आशीर्वाद का प्रतीक है।
  • पंचायती गली: पंचायत या समाज के प्रमुख स्थल से सुहाग की प्रतीक 'चूंदड़' (ओढ़नी) प्राप्त हुई, जो सुहागिनों के सौभाग्य का द्योतक है।
  • कुम्हार गली: कुम्हार की गली से 'दिवलो' (दीपक) प्राप्त हुआ, जो ज्ञान, प्रकाश और आरती का प्रतीक है।
  • सुतार गली: सुतार (बढ़ई) की गली से 'बाजुठ' (चौकी या पाटा) प्राप्त हुआ, जिस पर माता गणगौर की स्थापना की जाती है।

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह समाज के हर वर्ग (किसान, कुम्हार, सुतार आदि) के योगदान से पर्व के संपन्न होने की सुंदर सामूहिक भावना को दर्शाता है। इससे हमारी संस्कृति के आपसी सहयोग और भाईचारे का संदेश मिलता है। इसी प्रकार के अन्य पारंपरिक और भक्ति गीतों के लिए हमारे हरि भजन संग्रह और श्री बांके बिहारी चालीसा को भी पढ़ सकते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं:

  • लोक-संस्कृति का संरक्षण: यह गीत लोक-भाषा और ग्रामीण संस्कृति के मूल स्वरूप को सहेजे हुए है।
  • सामूहिक सद्भाव: विभिन्न जातियों और व्यवसायों के लोगों (कुम्हार, सुतार, किसान) के माध्यम से पूजन सामग्री जुटाना समाज की परस्पर निर्भरता को दिखाता है।
  • स्त्री शक्ति की वंदना: माता गणगौर के माध्यम से नारी शक्ति, सुहाग और प्रकृति की आराधना की गई है।
  • सरल और सहज भाषा: आम बोलचाल की भाषा होने के कारण इसे महिलाएं और बच्चे बहुत आसानी से गा सकते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

गणगौर पर्व के दौरान (विशेषकर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में तृतीया तक) यह भजन सुबह या दोपहर के समय जब महिलाएं एकत्र होकर गणगौर पूजने जाती हैं, तब गाया जाता है। इसके गायन की विधि इस प्रकार है:

  • महिलाएं पारंपरिक परिधान (जैसे लहरिया या चूंदड़ी) पहनकर गोल घेरे में बैठती हैं।
  • हाथों में ताली बजाकर या झूमते हुए समवेत स्वर में इस भजन का गायन किया जाता है।
  • माता गणगौर को भोग लगाने और जल अर्पित करने के समय इस संकीर्तन से माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन की मुख्य आराध्य देवी माता गणगौर (माता पार्वती) हैं, जिन्हें भगवान शिव (ईसर जी) की अर्धांगिनी माना जाता है। इसके अलावा प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी का स्मरण भी इस पर्व के आरंभ में किया जाता है, क्योंकि किसी भी मांगलिक कार्य से पहले गणेश वंदना अनिवार्य होती है। इस भजन के संकलनकर्ता गणेश कुशवाह हैं जिन्होंने लोक-कंठ से इन गीतों को लिपिबद्ध किया है। भगवान श्री हरि और उनके स्वरूपों की महिमा जानने के लिए आप श्री हरि संस्मरण भी पढ़ सकते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन किसी एक ग्रंथ या कवि की रचना नहीं है, बल्कि यह मौखिक परंपरा (Oral Tradition) के माध्यम से पीढ़ियों से महिलाओं के कंठों से होता हुआ हम तक पहुँचा है। लोक-साहित्य के जानकारों और संकलनकर्ताओं जैसे गणेश कुशवाह ने इसे सहेजने का सराहनीय कार्य किया है। इसकी पृष्ठभूमि राजस्थान और मालवा क्षेत्र के उस पारंपरिक लोक-उत्सव से जुड़ी है जहाँ चैत्र मास में सुहागिनें और कुंवारी कन्याएं गणगौर का व्रत रखती हैं और माता से मनचाहा वर एवं अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मांगती हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इसकी भाषा ठेठ राजस्थानी, मेवाड़ी, हाड़ौती या ब्रज-ढूंढाड़ी मिश्रित लोक-भाषा है। इसकी काव्य शैली गेय (Singable) है जिसमें तुकबंदी का विशेष ध्यान रखा गया है ताकि महिलाएं इसे आसानी से गा सकें। 'न व्हासी, न व्हासी' (वहाँ से जाकर/लाकर) जैसे लोक-शब्दावली इस भजन की मिठास को और बढ़ा देती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस लोक भजन से हमें निम्नलिखित जीवन सीख मिलती हैं:

  • परस्पर सहयोग: समाज का हर घटक एक-दूसरे पर निर्भर है, ठीक जैसे गणगौर पूजन की सामग्री अलग-अलग गलियों और लोगों के माध्यम से पूरी होती है।
  • संस्कृति से जुड़ाव: अपनी लोक-परंपराओं और पर्वों को जीवित रखना हमारी सांस्कृतिक धरोहर का दायित्व है।
  • आनंद और उल्लास: पर्व केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं है, बल्कि मिलकर उत्सव मनाने और जीवन में आनंद का संचार करने का माध्यम है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक संदर्भ
रणु बाई माता पार्वती का एक स्थानीय लोक नाम गणगौर की अधिष्ठाता देवी
झमराल गली एक विशिष्ट मार्ग या मोहल्ला गीत में वर्णित पूजन सामग्री प्राप्ति का स्थान
दिवलो छोटा दीपक (दीया) आरती और प्रकाश का प्रतीक
बाजुठ लकड़ी की चौकी या पाटा देवी की स्थापना का आसन
चूंदड़ सुहाग की ओढ़नी या साड़ी सौभाग्य का प्रतीक वस्त्र

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "म्हारी रणु बाई क मननि बुलाई , खेलण आई गणगौर माई"
भावार्थ: हमारे हृदय और मन को प्रसन्न करने वाली माता रणु (गणगौर) हमारे बीच पधारी हैं, आइए हम सब मिलकर उनकी आराधना करें।

पंक्ति: "गणगौर खेलण हाउ झमराल गली गई थी, न व्हासी, न व्हासी टोपली लई आईं"
भावार्थ: जब हम गणगौर खेलने के लिए झमराल गली गए, तो वहाँ से पूजन के लिए टोपली लेकर आए।

पंक्ति: "कुम्हार गली गई थी, न व्हासी, न व्हासी दिवलो लई आईं"
भावार्थ: कुम्हार के यहाँ से माता की आरती के लिए मिट्टी का सुंदर दीपक प्राप्त किया।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

गणगौर पूजन के समय निम्नलिखित पौराणिक मंत्र का स्मरण करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

"उमामहेश्वराभ्यां नमः" अथवा "गौरी गौरी गौराणी, कइया पूजै लच्छा रानी।"

यह मंत्र भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त आराधना का प्रतीक है जो साधक को सुख-समृद्धि प्रदान करता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

श्रेणी विवरण
भजन का नाम म्हारी रनू बाई क माननी बुलाई गणगौर (Mhari Anu Bayi K Mnni Bulayi)
मुख्य आराध्य माता गणगौर (माता पार्वती) एवं भगवान शिव
संकलनकर्ता गणेश कुशवाह
भाषा लोक भाषा / राजस्थानी-हिन्दी मिश्रित
विषय एवं थीम लोक-संस्कृति, गणगौर उत्सव और नारी सौभाग्य
भाव उल्लास, भक्ति, सामूहिक पर्व और समर्पण
उपयुक्त अवसर गणगौर व्रत, चैत्र नवरात्र एवं महिला संगीत उत्सव

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन प्रमुख रूप से राजस्थान और मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध लोकपर्व गणगौर से संबंधित है, जिसमें माता पार्वती की पूजा की जाती है।

इस लोकगीत में 'रणु बाई' माता गणगौर यानी माता पार्वती का ही स्थानीय लोक-नाम है, जिन्हें पुत्री और देवी दोनों रूपों में पूजा जाता है।

इस पारंपरिक लोक भजन को गणेश कुशवाह जी द्वारा लिपिबद्ध एवं संकलित किया गया है।

गणगौर पर्व मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात के कुछ हिस्सों में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है।

सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य, पारिवारिक सुख-शांति और उत्तम स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति के लिए गणगौर पूजती हैं।

इस भजन में झमराल गली से टोपली, किसान गली से गेहूं, पंचायती गली से चूंदड़, कुम्हार गली से दीपक (दिवलो) और सुतार गली से पाटा (बाजुठ) लाने का वर्णन है।

हाँ, इसकी लय बहुत सरल और सुरीली है, जिसे महिलाएं पूजा के दौरान समूह में आसानी से गा सकती हैं।

ऐसे और भी सुंदर पारंपरिक भजन पढ़ने और सुनने के लिए आप Bhaktilok.in के विभिन्न संकीर्तन और भजन वर्गों का अन्वेषण कर सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस आलेख में प्रस्तुत लोक भजन के बोल, अर्थ और सांस्कृतिक महत्व का प्रामाणिक विवरण लोक परंपराओं और पंचांगीय मान्यताओं के आधार पर संकलित किया गया है ताकि पाठकों को भारतीय संस्कृति की असली झलक मिल सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • भारतीय लोक साहित्य एवं परंपराएं
  • पारंपरिक गणगौर व्रत कथा एवं लोकगीत संग्रह
  • क्षेत्रीय लोक-संस्कृति संकलन (गणेश कुशवाह कृत संदर्भ)

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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