hari bhajan बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की (Balihari Balihari Bolo Dasharath Nandan Lal Ki Lyrics in Hindi)

बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की भजन लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित यह लोकप्रिय श्री राम भजन मन को शांति प्रदान करता है।

हिंदू सनातन धर्म की समृद्ध भजन परंपरा में "बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की" एक अत्यंत लोकप्रिय, हृदयस्पर्शी और वैराग्य रस से ओतप्रोत भजन है। यह भजन साधक को सांसारिक चिंताओं, माया-मोह के बंधनों और भौतिक व्याकुलता से मुक्त होकर भगवान श्री रामचंद्र (दशरथ नंदन) और श्री कृष्ण (गोपाल) की अनन्य शरणागति ग्रहण करने की प्रेरणा देता है। इस भजन में शांत रस, विनय भाव और प्रपत्ति (पूर्ण समर्पण) का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। जब मनुष्य जीवन के संघर्षों, आजीविका की चिंताओं और शारीरिक नश्वरता के भय से घिर जाता है, तब यह भजन उसे परम संतोष, धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास का मार्ग दिखाता है। सत्संगों, दैनिक संध्या आरती और विशेष धार्मिक उत्सवों पर गाया जाने वाला यह भजन आत्मा को परमात्मा के प्रति समर्पित करने का एक सशक्त माध्यम है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की,
चिंता करे बलाये हमारी इस माया जंजाल की।
बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की,
चिंता करे बलाये हमारी इस माया जंजाल की।।

जिस मालिक ने जनम दिया है अन्न वस्त्र भी देवेगा,
सर ढकने को छत भी देवेगा खबर हमारी लेवेगा,
भजन करो निर्भय हो चिंता, छोड़ो रोटी दाल की,
भजन करो निर्भय हो चिंता, छोड़ो रोटी दाल की,
बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की।।

भजन करो निर्भय हो छोड़ो चिंता रोटी दाल की,
बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की।।

होगा भाग्य से मिलेगा चाहे घर में हो या बाहर हो,
भाग्य बिना कोई भोग ना पावे तीली हो या नाहर हो,
शांत रहो हर हाल में तुम और शरण रहो गोपाल की,
बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की।।

शांत रहो हर हाल में तुम और शरण रहो गोपाल की,
बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की।।

भिक्षु यति कहे इस काया से तुम ममता का त्याग करो,
एक दिन जलकर राख बनेगी कभी ना इसमें राग करो,
गोरी हो या काली हो पर चादर है ये खाल की,
बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की।।

गोरी हो या काली हो पर चादर है ये खाल की,
बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का केंद्रीय भाव पूर्ण आत्मसमर्पण (शरणागति) और संतोष है। प्रथम अंतरे में कवि समझाते हैं कि जिस परमेश्वर ने हमें इस संसार में जन्म दिया है, वही हमारी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे अन्न, वस्त्र और आवास की व्यवस्था भी करेगा। इसलिए मनुष्य को आजीविका और भौतिक आवश्यकताओं की अत्यधिक चिंता छोड़कर निर्भय होकर भगवान का भजन करना चाहिए।

द्वितीय अंतरे में प्रारब्ध और कर्म के सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया है। कवि का मानना है कि मनुष्य को उसके भाग्य और कर्मफल के अनुसार ही सुख-दुख प्राप्त होते हैं। चाहे कोई अत्यंत बलवान सिंह (नाहर) हो या साधारण तिनका (तीली), बिना विधाता की इच्छा और प्रारब्ध के कोई भी भोग प्राप्त नहीं कर सकता। अतः मनुष्य को हर परिस्थिति में शांत रहकर भगवान गोपाल की शरण में रहना चाहिए।

तृतीय अंतरे में शरीर की नश्वरता और वैराग्य का उपदेश दिया गया है। संत-महात्मा (भिक्षु और यति) कहते हैं कि इस भौतिक शरीर से अत्यधिक मोह या ममता का त्याग कर देना चाहिए, क्योंकि अंततः यह शरीर मिट्टी में मिलकर राख हो जाएगा। शरीर का रंग गोरा हो या काला, यह केवल चमड़ी (खाल) की एक चादर मात्र है, जिसके भीतर वही एक परमात्मा व्याप्त है। इसलिए शरीर के अहंकार को छोड़कर केवल दशरथ नंदन श्री राम की महिमा का गान करना चाहिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह व्यावहारिक वेदांत और भक्ति मार्ग का एक व्यावहारिक दस्तावेज है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • हरि-हर और राम-कृष्ण की एकता: भजन में 'दशरथ नंदन लाल' (श्री राम) और 'गोपाल' (श्री कृष्ण) दोनों नामों का प्रयोग किया गया है, जो वैष्णव संप्रदाय के भीतर राम और कृष्ण की तात्विक एकता को दर्शाता है।
  • चिंता से मुक्ति का संदेश: आधुनिक युग में तनाव और मानसिक अशांति का सबसे बड़ा कारण भविष्य की चिंता है। यह भजन साधक को वर्तमान में जीने और ईश्वर पर भरोसा रखने की अद्भुत सीख देता है।
  • वैराग्य और विवेक की जागृति: शरीर की नश्वरता का वर्णन करके यह भजन साधक के भीतर विवेक (सत्य-असत्य का ज्ञान) और वैराग्य (सांसारिक आसक्ति का अभाव) जागृत करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को गाने और सुनने के लिए कोई विशेष बंधन नहीं है, परंतु निम्नलिखित अवसरों पर इसका प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता है:

  • प्रातःकाल और संध्या वंदन: दैनिक पूजा-आरती के पश्चात शांत चित्त से इस भजन का गायन करने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • सत्संग और संकीर्तन: सामूहिक रूप से ताली बजाकर और वाद्य यंत्रों के साथ गाने पर यह भजन भक्तों को भाव-विभोर कर देता है।
  • कठिन समय में संबल: जब जीवन में निराशा या आर्थिक संकट का आभास हो, तब इस भजन का श्रवण करने से मानसिक शांति और आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और लीला पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। इसमें प्रयुक्त 'दशरथ नंदन लाल' शब्द श्री राम के बाल और युवा स्वरूप की महिमा गाता है, जबकि 'गोपाल' शब्द गायों के रक्षक और भक्तों के संकट हरने वाले श्री कृष्ण की ओर संकेत करता है।

भजन की शैली और इसमें प्रयुक्त 'भिक्षु यति' जैसे शब्द कबीरदास, तुलसीदास और सूरदास जैसे संतों की निर्गुण-सगुण समन्वयवादी परंपरा से प्रेरित हैं। यह रचना हमें याद दिलाती है कि संत समाज हमेशा से ही मनुष्य को भौतिकता से ऊपर उठकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होने का उपदेश देता आया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक लोक-भक्ति और संतों की वाणी का हिस्सा रहा है। आधुनिक समय में इसे सुप्रसिद्ध गायक श्री हरिहरन जी ने अपनी मधुर और शास्त्रीय शैली में गाकर जन-जन तक पहुंचाया है। इस भजन की पृष्ठभूमि भारत के ग्रामीण और आध्यात्मिक परिवेश से जुड़ी है, जहां लोग सादा जीवन और उच्च विचार के सिद्धांत का पालन करते हुए ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखते थे।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली है, जिसमें ब्रजभाषा और अवधी के शब्दों का सुंदर पुट है। इसकी काव्य शैली उपदेशात्मक और संवादात्मक है। इसमें प्रयुक्त रूपक और उपमाएं अत्यंत सरल और दैनिक जीवन से ली गई हैं, जैसे "रोटी दाल की चिंता", "तीली हो या नाहर हो" और "चादर है ये खाल की"। ये सरल उपमाएं गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों को भी एक साधारण व्यक्ति के लिए सुबोध बना देती हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाता है:

  1. संतोषम परमं सुखम्: जो प्राप्त है, उसी में संतुष्ट रहना और अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति से बचना।
  2. ईश्वरीय न्याय पर विश्वास: यह विश्वास रखना कि जिसने हमें जीवन दिया है, वह हमारी रक्षा भी अवश्य करेगा।
  3. समत्व भाव: सुख-दुख, लाभ-हानि और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में मन को विचलित न होने देना।
  4. अहंकार का त्याग: शरीर की सुंदरता या शक्ति पर गर्व न करना, क्योंकि यह नश्वर है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द/शब्दांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
बलिहारी न्योछावर होना / समर्पित होना भगवान के चरणों में सर्वस्व अर्पण करना।
दशरथ नंदन लाल महाराज दशरथ के पुत्र (श्री राम) मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का वात्सल्य रूप।
माया जंजाल सांसारिक मोह-माया का जाल संसार के वे बंधन जो जीव को ईश्वर से दूर करते हैं।
नाहर सिंह / शेर अत्यंत बलवान या शक्तिशाली व्यक्ति।
तीली तिनका / कमजोर जीव अत्यंत निर्बल या साधारण प्राणी।
भिक्षु यति संन्यासी / तपस्वी संसार का त्याग कर सत्य की खोज करने वाले महात्मा।
राग आसक्ति / मोह / प्रेम नश्वर शरीर या सांसारिक वस्तुओं से अत्यधिक लगाव।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की..."
कवि कहते हैं कि हमें बार-बार महाराज दशरथ के लाडले पुत्र श्री राम पर न्योछावर होना चाहिए और उन्हीं के नाम का संकीर्तन करना चाहिए। वही हमारी इस संसार रूपी माया के जंजाल की सभी चिंताओं और बलाओं को दूर करने वाले हैं।

"जिस मालिक ने जनम दिया है अन्न वस्त्र भी देवेगा..."
जिस परमपिता परमेश्वर ने हमें इस धरती पर भेजा है, वह हमारी भूख और तन ढकने की व्यवस्था भी अवश्य करेगा। वह हमें रहने के लिए आश्रय भी देगा और हर पल हमारी सुध लेगा। इसलिए हमें रोटी-दाल की चिंता छोड़कर निर्भय होकर प्रभु का भजन करना चाहिए।

"होगा भाग्य से मिलेगा चाहे घर में हो या बाहर हो..."
मनुष्य को उसके प्रारब्ध के अनुसार ही सब कुछ प्राप्त होता है, चाहे वह घर के भीतर बैठा हो या बाहर संघर्ष कर रहा हो। भाग्य के बिना कोई भी जीव, चाहे वह सिंह के समान शक्तिशाली हो या तिनके के समान कमजोर, कुछ भी भोग नहीं सकता। इसलिए शांत रहकर गोपाल की शरण में रहना ही श्रेयस्कर है।

"भिक्षु यति कहे इस काया से तुम ममता का त्याग करो..."
ज्ञानी और तपस्वी पुरुष उपदेश देते हैं कि इस भौतिक शरीर से मोह छोड़ दो। यह शरीर एक दिन अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा। शरीर गोरा हो या काला, यह केवल चमड़ी की एक चादर है। वास्तविक तत्व तो इसके भीतर बैठी आत्मा है, जो अविनाशी है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय के २२वें श्लोक से अत्यंत मेल खाते हैं, जहां भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं:

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।

अर्थ: जो अनन्य प्रेमी भक्त मेरा निरंतर चिंतन करते हुए निष्काम भाव से मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य निरंतर मुझमें स्थित रहने वाले पुरुषों का योगक्षेम (आवश्यकताओं की पूर्ति और सुरक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम बलिहारी बलिहारी बोलो दशरथ नंदन लाल की
मुख्य आराध्य भगवान श्री राम (दशरथ नंदन) एवं भगवान श्री कृष्ण (गोपाल)
मुख्य गायक (प्रसिद्ध संस्करण) श्री हरिहरन (HARIHARAN Bhajan)
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली / ब्रज का प्रभाव)
मुख्य रस/भाव शांत रस, वैराग्य भाव, शरणागति (प्रपत्ति)
उपयुक्त अवसर दैनिक संध्या आरती, सत्संग, राम नवमी, जन्माष्टमी, एकादशी व्रत
मुख्य संदेश चिंतामुक्ति, संतोष, प्रारब्ध पर विश्वास और शरीर की नश्वरता का बोध

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को सांसारिक और भौतिक आवश्यकताओं (जैसे भोजन, वस्त्र, आवास) की अत्यधिक चिंता छोड़कर ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए और निष्काम भाव से प्रभु की शरण में रहना चाहिए।

यह प्रयोग सनातन धर्म की समन्वयवादी परंपरा को दर्शाता है, जहां भगवान श्री राम (दशरथ नंदन) और भगवान श्री कृष्ण (गोपाल) को एक ही परमेश्वर के विभिन्न अवतारों के रूप में स्वीकार किया गया है। यह भक्तों को दोनों रूपों में एक ही तत्व के दर्शन करने की प्रेरणा देता है।

यहाँ 'तीली' का अर्थ एक अत्यंत कमजोर तिनके या जीव से है और 'नाहर' का अर्थ शक्तिशाली सिंह से है। इस पंक्ति का भाव यह है कि चाहे कोई कितना भी कमजोर हो या कितना भी बलवान, बिना भाग्य और ईश्वर की इच्छा के कोई भी किसी सुख का भोग नहीं कर सकता।

इस पंक्ति के माध्यम से कवि शरीर की नश्वरता और बाहरी सुंदरता की क्षणभंगुरता को दर्शाते हैं। वे कहते हैं कि शरीर चाहे गोरा हो या काला, यह केवल चमड़ी की एक बाहरी चादर है। असली महत्व भीतर की आत्मा और ईश्वर भक्ति का है।

यह भजन मुख्य रूप से सुगम संगीत और लोक धुनों पर आधारित है। इसे शांत और भक्तिमय वातावरण में मध्यम लय के साथ गाया जाता है, जिससे इसके शब्द सीधे हृदय को स्पर्श करते हैं।

हाँ, यह भजन दैनिक संध्या आरती या सुबह की प्रार्थना के समय गाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है। यह मन को शांत करता है और दिनभर की मानसिक थकान व चिंताओं को दूर करता है।

इसके नियमित श्रवण से साधक के भीतर संतोष (Contentment), वैराग्य (Detachment) और ईश्वर के प्रति अनन्य श्रद्धा का विकास होता है। यह अवसाद और भविष्य की अनिश्चितता के भय को समाप्त करने में सहायक है।

इसका अर्थ है कि जब हम ईश्वर की शरण में जाते हैं, तो हमें पूरी तरह से भयमुक्त हो जाना चाहिए। ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखने वाले भक्त को किसी भी प्रकार की सांसारिक कमी या विपत्ति का भय नहीं रहता।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को तैयार करने में पारंपरिक भजन संग्रहों, श्रीमद्भगवद्गीता के शरणागति सिद्धांतों और संतों के प्रामाणिक उपदेशों का सहारा लिया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और त्रुटिहीन भजन लिरिक्स के साथ-साथ उसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ पहुंचाना है, ताकि वे केवल शब्दों को गाएं ही नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे जीवन-दर्शन को भी आत्मसात कर सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ९, श्लोक २२) - योगक्षेमं वहाम्यहम् की व्याख्या।
  • पारंपरिक वैष्णव भजन संग्रह एवं संकीर्तन पद्धतियां।
  • श्री हरिहरन जी द्वारा गाए गए प्रसिद्ध भजनों का आधिकारिक संकलन।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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