भजन परिचय: हरि मोह पै नज़रे कर्म करो
सनातन धर्म की पावन और समृद्ध संकीर्तन परंपरा में भगवान श्री हरि (श्री कृष्ण, श्री राम एवं नारायण) की महिमा का गुणगान जीवात्मा को मोक्ष की ओर अग्रसर करने वाला सबसे सुगम मार्ग माना गया है। "हरि मोह पै नज़रे कर्म करो (Hari Moh Pai Najre karm karo Lyrics in Hindi)" एक अत्यंत ही भावुक, समर्पण से परिपूर्ण और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने वाला लोकप्रिय हरि भजन है। इस भजन का मुख्य भाव साधक की उस आर्त पुकार से जुड़ा है, जहाँ वह संसार के माया-मोह के बंधनों से त्रस्त होकर जगत के पालनहार श्री हरि से अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखने और कर्मों की शुद्धि तथा मुक्ति का मार्ग दिखाने की प्रार्थना करता है। सनातन परंपरा में हरि भजन का विशेष महत्व है, क्योंकि यह न केवल मन को शांत करता है, बल्कि मनुष्य के अंतःकरण में भक्ति, करुणा, सेवा और वैराग्य के भावों को भी प्रस्फुटित करता है। इस भजन को सुबह-शाम की दैनिक पूजा, एकादशी व्रतों, संतों के सत्संग, भागवत कथाओं और विशेष धार्मिक उत्सवों के दौरान अत्यंत श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ स्मरण किया जाता है। भक्तलौक (Bhaktilok) के इस विस्तृत आलेख में हम इस पवित्र भजन के संपूर्ण बोल, सरल हिंदी अर्थ, भावार्थ, जीवनोपयोगी संदेश और आध्यात्मिक महत्व का गहन अध्ययन करेंगे ताकि साधक प्रभु के चरणों में अपनी अनन्य भक्ति स्थापित कर सकें।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
मुखड़ा (Refrain):
हरि मोह पै नज़रे कर्म करो,
मेरे संकट सारे हर लो प्रभु,
चरणों में अपने स्थान दो,
हे हरि मोह पै नज़रे कर्म करो।
प्रथम अंतरा (First Stanza):
माया के इस गहरे सागर में,
भटक रहा मन मेरा पल-पल में।
कोई नहीं है अब अपना यहाँ,
तुम्हीं हो केवल मेरे खेवनहार महा।
अपनी करुणा की छाँव में लो,
हे हरि मोह पै नज़रे कर्म करो।
द्वितीय अंतरा (Second Stanza):
कर्मों के जाल में फंसा हूँ इस भाँति,
समझ न आवे अब दिन और राति।
ज्ञान का दीपक मन में जला दो,
अज्ञान का अंधियारा सदा को मिटा दो।
पावन नाम की दीक्षा हमको दो,
हे हरि मोह पै नज़रे कर्म करो।
तृतीय अंतरा (Third Stanza):
सुख-दुःख की धूप-छाँव में डोले जीवन,
तेरे बिना व्याकुल रहता है मन।
आस तुम्हारी ही है प्राणेश मेरे,
काट दो बंधन सारे पापी घिरे।
भक्ति का अमृत रस हमको पियो,
हे हरि मोह पै नज़रे कर्म करो।
अंतिम अंतरा (Concluding Stanza):
दास यही गाए नित तेरा तराना,
तेरे चरणों में हो अब ठिकाना।
भवसागर से हमको पार उतारो,
दीन-दुखियों के संकट तुम निवारो।
अब तो अपना हमें स्वीकार करो,
हे हरि मोह पै नज़रे कर्म करो।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, अपितु यह एक जीवात्मा और परमात्मा के बीच संवाद का जीवंत दस्तावेज है। भजन के मुखड़े में साधक भगवान श्री हरि से करबद्ध प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मेरे कर्मों पर अपनी कृपा दृष्टि (नज़र) डालिए, ताकि मेरे जीवन के समस्त संकट और बाधाएं समाप्त हो जाएं तथा मुझे आपके पावन चरणों में स्थायी स्थान प्राप्त हो सके।
प्रथम अंतरे में साधक संसार की माया रूपी भंवर का वर्णन करता है। वह कहता है कि यह संसार एक असीम और गहरा सागर है, जिसमें मनुष्य का चंचल मन हर पल भटकता रहता है। इस मोह-माया में अपना कोई सच्चा हितैषी नहीं है, केवल भगवान श्री हरि ही इस भवसागर से पार लगाने वाले एकमात्र खेवनहार हैं। साधक भगवान से अपनी करुणा की शीतल छाया में शरण देने की गुहार लगाता है।
द्वितीय अंतरे में मनुष्य अपने संचित कर्मों के बंधनों और अज्ञानता पर प्रकाश डालता है। वह स्वीकार करता है कि वह अपने कर्मों के जाल में इस प्रकार उलझ चुका है कि उसे दिन-रात का भेद नहीं सूझ रहा है। वह प्रभु से विनती करता है कि वे उसके अंतःकरण में दिव्य ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करें और अज्ञान रूपी अंधकार को हमेशा के लिए समाप्त कर अपने नाम स्मरण की दीक्षा प्रदान करें।
तृतीय और अंतिम अंतरे में जीवन के उतार-चढ़ाव (सुख-दुःख) का चित्रण करते हुए साधक अपनी पूर्ण शरणागति (Surrender) को व्यक्त करता है। वह कहता है कि प्रभु के बिना उसका मन व्याकुल रहता है और उसे केवल भगवान की ही आस है। अंत में भक्त कामना करता है कि उसका जीवन निरंतर प्रभु के गुणों का संकीर्तन करते हुए बीते और उसे भवसागर से मुक्ति मिले।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- भक्ति रस प्रधान: यह भजन साधक के मन में वैराग्य, प्रेम और समर्पण के भाव को जागृत करता है।
- शरणागति का संदेश: इसमें मनुष्य अपनी कमजोरियों को स्वीकार कर पूर्ण रूप से भगवान श्री हरि की शरण में जाने का संकल्प लेता है।
- कलयुग में तारक मंत्र: श्रीमद्भागवत और श्री रामचरितमानस के अनुसार कलयुग में भगवान का नाम स्मरण और संकीर्तन ही सबसे बड़ा साधन है।
- मानसिक शांति: इस भजन के नियमित श्रवण और गायन से मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद दूर होते हैं।
- सार्वभौमिक अपील: इसे किसी भी आयु वर्ग के लोग, बच्चे, युवा और वृद्ध बड़े ही सहज भाव से गा सकते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस पावन भजन को गाने और सुनने के लिए ब्रह्म मुहूर्त, प्रातः काल की पूजा, संध्या वंदना, एकादशी व्रत, जन्माष्टमी, रामनवमी, हरि जयंती अथवा किसी भी धार्मिक अनुष्ठान एवं सत्संग का समय अत्यंत उत्तम माना गया है।
- स्थान की पवित्रता: घर के मंदिर, पूजा कक्ष या किसी पवित्र तीर्थ स्थल पर आसन बिछाकर बैठें।
- दीपक प्रज्वलन: भगवान श्री हरि या श्री बांके बिहारी के समक्ष घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
- भावपूर्ण उच्चारण: भजन को जल्दबाजी में गाने के बजाय प्रत्येक शब्द के अर्थ को महसूस करते हुए शुद्ध उच्चारण के साथ गाएं।
- पुष्प अर्पण: गान के पश्चात भगवान को तुलसी दल और पुष्प अर्पित कर क्षमा प्रार्थना करें।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से जगत के पालनहार भगवान श्री हरि (विष्णु, कृष्ण, राम) को समर्पित है। सनातन धर्म में श्री हरि को सृष्टि का संचालक, संकटमोचन और मोक्षदाता माना गया है। वैष्णव परंपरा और संत कवियों (जैसे सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई) ने हमेशा इस बात पर बल दिया है कि जब तक मनुष्य अपने अहंकार का त्याग कर भगवान की शरण में नहीं जाता, तब तक वह भवसागर से पार नहीं पा सकता। यह भजन उसी संत परंपरा की अमूल्य निधि है जो भक्त को अहंकार से मुक्ति दिलाती है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
पारंपरिक हरि भजनों की श्रेणी में आने वाला यह गीत पीढ़ियों से संतों, महात्माओं और गृहस्थ भक्तों द्वारा गाया जाता रहा है। इसकी रचना लोक-संस्कृति और शास्त्रीय भक्ति काव्य के सुंदर समन्वय से हुई है। ब्रज और अवधी प्रभाव वाले क्षेत्रों में ऐसे भजनों के माध्यम से आम जनमानस तक भगवान की महिमा को सरल भाषा में पहुँचाया गया है। रचनाकार ने इसमें आम आदमी के जीवन के संघर्षों और उसके आध्यात्मिक समाधान को बहुत ही मार्मिक ढंग से पिरोया है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और प्रवाहित हिंदी (खड़ी बोली मिश्रित ब्रज-अवधी भाव) है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है जैसे "माया के इस गहरे सागर में" और "ज्ञान का दीपक मन में जला दो"। काव्य शैली आर्त और विनीत भाव की है, जो श्रोता के हृदय को तुरंत स्पर्श कर लेती है। शब्दों का चयन ऐसा है कि अनपढ़ व्यक्ति भी इसे आसानी से समझ और गुनगुना सकता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
- अहंकार का त्याग: मनुष्य को अपने बल पर अभिमान न करके ईश्वर की कृपा पर भरोसा करना चाहिए।
- कर्म की शुद्धता: कर्मों के बंधन से मुक्ति पाने के लिए सत्कर्म और ईश्वर स्मरण आवश्यक है।
- धैर्य और सहनशीलता: सुख और दुःख जीवन के दो पहलू हैं, जिनमें अडिग रहने के लिए आध्यात्मिक बल चाहिए।
- नियमित साधना: ईश्वर के प्रति निरंतर प्रेम और स्मरण से ही जीवन के संताप दूर होते हैं।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पदावली | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ / भाव |
|---|---|---|
| हरि | भगवान विष्णु / कृष्ण / राम | सृष्टि के पालनहार और दुःखहर्ता |
| मोह | आसक्ति, भ्रम, माया | संसारिक बंधनों का मूल कारण |
| खेवनहार | नाव को पार लगाने वाला (नाविक) | भवसागर से पार लगाने वाले भगवान |
| प्राणेश | प्राणों के स्वामी | परमात्मा जिनके बिना जीवन अधूरा है |
| भवसागर | जन्म-मृत्यु का संसार चक्र | दुखों से भरा भौतिक संसार |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"हरि मोह पै नज़रे कर्म करो, मेरे संकट सारे हर लो प्रभु"
भक्त भगवान से विनती करता है कि हे हरि! मेरे कर्मों पर अपनी दया दृष्टि डालिए और मेरे जीवन के सभी संकटों को हमेशा के लिए दूर कर दीजिए।
"माया के इस गहरे सागर में, भटक रहा मन मेरा पल-पल में"
मनुष्य स्वीकार करता है कि यह संसार रूपी माया का सागर बहुत गहरा है, जिसमें उसका चंचल मन लगातार भटक रहा है और शांति नहीं पा रहा है।
"कर्मों के जाल में फंसा हूँ इस भाँति, समझ न आवे अब दिन और राति"
अज्ञान और बुरे-भले कर्मों के जाल में ऐसा उलझ गया हूँ कि मुझे अब कुछ सूझ नहीं रहा है कि क्या उचित है और क्या अनुचित।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के स्मरण के साथ निम्नलिखित पवित्र महामंत्र का जाप करने से अनंत गुना फल प्राप्त होता है:
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"
एवं
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥"
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | हरि मोह पै नज़रे कर्म करो (Hari Moh Pai Najre karm karo) |
|---|---|
| समर्पित देवता | भगवान श्री हरि (श्री विष्णु / श्री कृष्ण) |
| श्रेणी / विधा | पारंपरिक हरि भजन / संकीर्तन |
| भाषा | सरल हिंदी / ब्रज-अवधी मिश्रित |
| मुख्य भाव | शरणागति, विनय, भक्ति और मोक्ष |
| उपयुक्त अवसर | दैनिक पूजा, सत्संग, एकादशी, जन्माष्टमी |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख भक्तलौक (Bhaktilok) के विद्वान आचार्यों और शोधकर्ताओं द्वारा सनातन धर्म की पारंपरिक भजन परंपरा, संकीर्तन ग्रंथों और वैष्णव दर्शन के अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को authentic, शुद्ध और प्रेरणादायी आध्यात्मिक सामग्री उपलब्ध कराना है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
- श्री रामचरितमानस - तुलसीदास जी
- वैष्णव जन तो और पारंपरिक हरि भजन संग्रह
- सनातन धर्म एवं संकीर्तन परंपरा के ग्रंथ
संबंधित भजन एवं लेख
भक्तलौक पर अन्य लोकप्रिय पावन भजनों और स्तोत्रों का अध्ययन करें:
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें