प्रस्तावना एवं परिचय
सम्पूर्ण मूल पाठ एवं पवित्र श्लोक
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
ऐं ग्लौं नमो वराहवदनायै नमः |
ऐं ग्लौं नमो वराह्यै नमः।
ऐं ग्लौं वररूपिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं क्रोधानायै नमः।
ऐं ग्लौं कोलमुख्यै नमः।
ऐं ग्लौम जगदम्बै नमः।
ऐं ग्लौं तरुण्यै नमः।
ऐं ग्लौं विश्वेश्वर्यै नमः।
ऐं ग्लौं शखिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं चक्रिणयै नमः॥ 10
ऐं ग्लौं खड्गशूलगदहस्तायै नमः।
ऐं ग्लौं मुसलधारिण्यै नमः।
ऐं ग्लौम हलासकादि समयुक्तैयै नमः।
ऐं ग्लौं भक्तानामभायप्रदायै नमः।
ऐं ग्लोम इष्टार्थदैनै नमः।
ऐं ग्लौं घोरायै नमः।
ऐं ग्लौं महाघोराय नमः।
ऐं ग्लौं महामायायै नमः।
ऐं ग्लौं वर्तल्यै नमः।
ऐं ग्लौं जगदेश्वर्यै नमः॥ 20
ऐं ग्लौम अण्डे अण्डिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं दर्दे दर्दिन्यै नमः।
ऐं ग्लौम जम्भे जम्भिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं मोहे मोहिन्यै नमः।
ऐं ग्लौम स्तम्भे स्तम्भिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं देवेश्यै नमः।
ऐं ग्लौं शत्रुनाशिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं अष्टभुजायै नमः।
ऐं ग्लौं चतुरहस्तायै नमः।
ऐं ग्लौं उत्चभैरवग्गस्थयै नमः॥ 30॥
ऐं ग्लौं कपिलालोचनायै नमः।
ऐं ग्लौं पंचमयै नमः।
ऐं ग्लौं लोकेश्यै नमः।
ऐं ग्लौं नीलमणिप्रभायै नमः।
ऐं ग्लौं अंजनादृप्रतिकासायै नमः।
ऐं ग्लौं सिंहरुद्रायै नमः।
ऐं ग्लौं त्रिलोचनायै नमः।
ऐं ग्लौं श्यामलायै नमः।
ऐं ग्लौं परमायै नमः।
ऐं ग्लौं ईशान्यै नमः॥ 40॥
ऐं ग्लोम नील्यै नमः।
ऐं ग्लौं इंदीवरसन्निभयै नमः।
ऐं ग्लौं कनकस्थानासमोपेतयै नमः।
ऐं ग्लौं कपिलायै नमः।
ऐं ग्लौं कालात्मिकायै नमः।
ऐं ग्लौं अम्बिकायै नमः।
ऐं ग्लौं जगद्धारिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं भक्तोपद्रवनासिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं सगुणायै नमः।
ऐं ग्लौं निष्कलायै नमः॥ 50॥
ऐं ग्लौं विद्यायै नमः।
ऐं ग्लोम नित्यायै नमः।
ऐं ग्लौं विश्ववासकार्यै नमः।
ऐं ग्लौं महरूपायै नमः।
ऐं ग्लौं महेश्वर्यै नमः।
ऐं ग्लौं महेंन्द्रितयै नमः।
ऐं ग्लौं विश्वव्यापिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं देव्यै नमः।
ऐं ग्लौं पशूनामाभायकारिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं कालिकायै नमः॥ 60
ऐं ग्लौं भयदायै नमः।
ऐं ग्लौं बलिमांसमहप्रियै नमः।
ऐं ग्लौं जयभैरवयै नमः।
ऐं ग्लौं कृष्णज गायै नमः।
ऐं ग्लौं परमेश्वरवल्लभाय नमः।
ऐं ग्लौं नुदायै नमः।
ऐं ग्लौं स्तुत्यै नमः।
ऐं ग्लौं सुरेशन्यै नमः।
ऐं ग्लौं ब्रह्मादिवरदायै नमः।
ऐं ग्लौं स्वरूपिण्यै नमः॥ 70
ऐं ग्लौं सुराणम्भायप्रदायै नमः।
ऐं ग्लौं वराहदेहसंभूतायै नमः।
ऐं ग्लौं श्रोनिवरलासे नमः।
ऐं ग्लोम क्रोधिन्यै नमः।
ऐं ग्लौम नीलासायै नमः।
ऐं ग्लौं शुभदायै नमः।
ऐं ग्लौम शुभवारिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं शत्रुनां वक्तस्तम्भनाकारिणयै नमः।
ऐं ग्लौं कतिस्तंभनकारिण्यै नमः।
ऐं ग्लोम मतिष्टंभनाकारिण्यै नमः॥ 80
ऐं ग्लौं साक्षीस्तंभनकारिणयै नमः।
ऐं ग्लौं मूकस्तंभिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं जिह्वास्तंभिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं दुष्टानां निग्रहकारिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं शिष्टनुग्रहकारिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं सर्वशत्रुक्षायकार्यै नमः।
ऐं ग्लौं शत्रुसदनकारिणयै नमः।
ऐं ग्लौं शत्रुविद्वेषणकारिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं भैरविप्रियै नमः।
ऐं ग्लौं मन्त्रात्मिकायै नमः॥ 90
ऐं ग्लौं यन्त्ररूपायै नमः।
ऐं ग्लौं तंत्ररूपिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं पीठात्मिकायै नमः।
ऐं ग्लौं देवदेव्यै नमः।
ऐं ग्लौं श्रेयस्करिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं चिन्तितार्थप्रदायै नमः।
ऐं ग्लौं भक्तलक्ष्मिविनाशिन्यै नमः।
ऐं ग्लौं संपत्प्रदायै नमः।
ऐं ग्लौं सौख्यकारिण्यै नमः।
ऐं ग्लौं बहुराहायै नमः॥ 100
ऐं ग्लौं स्वप्नवराह्यै नमः।
ॐ ग्लौं भगवत्यै नमो नमः।
ऐं ग्लौं ईश्वर्यै नमः।
ऐं ग्लौं सर्वराध्यायै नमः।
ऐं ग्लौं सर्वमायै नमः।
ऐं ग्लौं सर्वलोकात्मिकायै नमः।
ऐं ग्लौम महिषानाशिनै नमः।
ऐं ग्लौं बृहद्वराह्यै नमः॥ 108॥
इति श्री वाराही देवी अष्टोत्तर शतनामावली पूर्ण ||
श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों को जानने के लिए भगवद्गीता खंड अवश्य पढ़ें और भगवान कृष्ण की लीलाओं के गहन अध्ययन के लिए ब्रह्म पुराण का पाठ करें।
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ
प्रस्तुत राधा-कृष्ण भजन "वाराही अष्टोत्रम् (Varahi Ashtothram Lyrics in Hindi) - Sri Varahi Ashtotharam by Saradha Raaghav - Bhaktilok" के माध्यम से भक्त और आराध्य के परम संबंध को दर्शाया गया है। वैष्णव संप्रदाय में राधा-कृष्ण का प्रेम लौकिक प्रेम न होकर जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। इस भजन की एक-एक पंक्ति का सार यही है कि भगवान श्री कृष्ण स्वयं राधा रानी के प्रेम के अधीन हैं। बिना राधा के न तो वे मुरली बजाते हैं और न ही गोपी-गोपियों को सुख देते हैं।
भजन के पदों में यह स्पष्ट होता है कि वृंदावन की कुंज गलियों में जब तक 'राधे-राधे' नाम की गूंज नहीं होती, तब तक भगवान श्यामसुंदर का मन भी वहां नहीं रमता। भक्त राधा जी से आग्रह करता है कि वे भी कृष्ण की इस भक्ति और दिव्यता का रहस्य उजागर करें, ताकि एक सामान्य साधक भी कृष्ण प्रेम का अधिकारी बन सके।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ
ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान कृष्ण की आराधना से पूर्व राधा जी का नाम स्मरण करना अनिवार्य माना गया है। राधा नाम की महिमा स्वयं कृष्ण गाते हैं। इस भजन को श्रद्धापूर्वक गाने या सुनने से साधक के हृदय में भक्ति रस का संचार होता है और मानसिक विकारों तथा चिंताओं का समूल नाश होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों को जानने के लिए भगवद्गीता खंड अवश्य पढ़ें और भगवान कृष्ण की लीलाओं के गहन अध्ययन के लिए ब्रह्म पुराण का पाठ करें। राधा-कृष्ण भजन के गायन से गृहक्लेश दूर होता है, दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और पारिवारिक वातावरण सात्विक बनता है। यदि इसका नियमित संकीर्तन किया जाए, तो साधक को मानसिक एकाग्रता और दिव्य शांति की अनुभूति होती है।
🕒 साधना एवं गायन विधि
इस भजन के संकीर्तन के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) अथवा संध्या आरती के समय का है। गायन के समय दीप प्रज्वलित कर, तुलसी दल अर्पित करें और शुद्ध भाव से युगल सरकार (राधा-कृष्ण) की छवि का ध्यान करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
इस भजन के मुख्य आराध्य देव कौन हैं?
इस भजन के मुख्य आराध्य देव युगल सरकार अर्थात भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी जी हैं।
राधा-कृष्ण भजन का पाठ किस दिन विशेष रूप से करना चाहिए?
यद्यपि भगवान के नाम संकीर्तन के लिए हर दिन शुभ है, किन्तु एकादशी, पूर्णिमा और शनिवार/रविवार के दिन इसका संकीर्तन विशेष फलदायी माना गया है।
क्या यह भजन पारिवारिक सुख-शांति के लिए सहायक है?
हाँ, राधा-कृष्ण के भक्तिमय भजनों को घर में नियमित रूप से गाने अथवा सुनने से दांपत्य प्रेम बढ़ता है और नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।
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