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करवा चौथ व्रत कथा द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव पार्वती कथा(Karwa Chauth Vrat Katha - Draupadi Ko Shri Krishn Ne Sunai Katha in Hindi) - Bhaktilok


करवा चौथ व्रत कथा द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव पार्वती कथा(Karwa Chauth Vrat Katha - Draupadi Ko Shri Krishn Ne Sunai Shiv Parvati Ki Katha in Hindi):-


करवा चौथ व्रत कथा द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव पार्वती कथा(Karwa Chauth Vrat Katha - Draupadi Ko Shri Krishn Ne Sunai Katha in Hindi) - Bhaktilok


द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव-पार्वती कथा(Draupadi Ko Shri Krishn Ne Sunai Katha in Hindi):-


करवा चौथ व्रत कथा द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव पार्वती कथा(Karwa Chauth Vrat Katha - Draupadi Ko Shri Krishn Ne Sunai Katha in Hindi) - Bhaktilok

एक बार अर्जुन नीलगिरि पर तपस्या करने गए। द्रौपदी ने सोचा कि यहाँ हर समय अनेक प्रकार की विघ्न-बाधाएं आती रहती हैं। उनके शमन के लिए अर्जुन तो यहाँ हैं नहीं, अत: कोई उपाय करना चाहिए। यह सोचकर उन्होंने भगवान श्री कृष्ण का ध्यान किया।


करवा चौथ व्रत कथा द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव पार्वती कथा(Karwa Chauth Vrat Katha - Draupadi Ko Shri Krishn Ne Sunai Katha in Hindi) - Bhaktilok


भगवान वहाँ उपस्थित हुए तो द्रौपदी ने अपने कष्टों के निवारण हेतु कोई उपाय बताने को कहा। इस पर श्रीकृष्ण बोले- एक बार पार्वती जी ने भी शिव जी से यही प्रश्न किया था तो उन्होंने कहा था कि करवाचौथ का व्रत गृहस्थी में आने वाली छोटी- मोटी विघ्न-बाधाओं को दूर करने वाला है। यह पित्त प्रकोप को भी दूर करता है। फिर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को एक कथा सुनाई:-


करवा चौथ व्रत कथा द्रौपदी को श्री कृष्ण ने सुनाई शिव पार्वती कथा(Karwa Chauth Vrat Katha - Draupadi Ko Shri Krishn Ne Sunai Katha in Hindi) - Bhaktilok

प्राचीनकाल में एक धर्मपरायण ब्राह्मण के सात पुत्र तथा एक पुत्री थी। बड़ी होने पर पुत्री का विवाह कर दिया गया। कार्तिक की चतुर्थी को कन्या ने करवा चौथ का व्रत रखा। सात भाइयों की लाड़ली बहन को चंद्रोदय से पहले ही भूख सताने लगी। उसका फूल सा चेहरा मुरझा गया। भाइयों के लिए बहन की यह वेदना असहनीय थी। अत: वे कुछ उपाय सोचने लगे।


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उन्होंने बहन से चंद्रोदय से पहले ही भोजन करने को कहा, पर बहन न मानी। तब भाइयों ने स्नेहवश पीपल के वृक्ष की आड़ में प्रकाश करके कहा- देखो ! चंद्रोदय हो गया। उठो, अर्ध्य देकर भोजन करो।’ बहन उठी और चंद्रमा को अर्ध्य देकर भोजन कर लिया। भोजन करते ही उसका पति मर गया। वह रोने चिल्लाने लगी। दैवयोग से इन्द्राणी देवदासियों के साथ वहाँ से जा रही थीं। रोने की आवाज़ सुन वे वहाँ गईं और उससे रोने का कारण पूछा।


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ब्राह्मण कन्या ने सब हाल कह सुनाया। तब इन्द्राणी ने कहा- तुमने करवा चौथ के व्रत में चंद्रोदय से पूर्व ही अन्न-जल ग्रहण कर लिया, इसी से तुम्हारे पति की मृत्यु हुई है। अब यदि तुम मृत पति की सेवा करती हुई बारह महीनों तक प्रत्येक चौथ को यथाविधि व्रत करो, फिर करवा चौथ को विधिवत गौरी, शिव, गणेश, कार्तिकेय सहित चंद्रमा का पूजन करो और चंद्र उदय के बाद अर्ध्य देकर अन्न-जल ग्रहण करो तो तुम्हारे पति अवश्य जीवित हो उठेंगे।


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ब्राह्मण कन्या ने अगले वर्ष 12 माह की चौथ सहित विधिपूर्वक करवा चौथ का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनका मृत पति जीवित हो गया। इस प्रकार यह कथा कहकर श्रीकृष्ण द्रौपदी से बोले- ‘यदि तुम भी श्रद्धा एवं विधिपूर्वक इस व्रत को करो तो तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएंगे और सुख-सौभाग्य, धन-धान्य में वृद्धि होगी।’ फिर द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के कथनानुसार करवा चौथ का व्रत रखा। उस व्रत के प्रभाव से महाभारत के युद्ध में कौरवों की हार तथा पाण्डवों की जीत हुई।




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