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दुश्मनी की तो क्या पूछिये दोस्ती का भरोसा नहीं लिरिक्स (Dushmani Ki To Kya Puchhiye Dosti Ka Bharosa Nhi Lyrics in Hindi) - kavvali

अनीस साबरी की प्रसिद्ध गज़ल 'दुश्मनी की तो क्या पूछिये दोस्ती का भरोसा नहीं' के लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। मानवीय संबंधों और जीवन की सच्चाई का सुंदर वर्णन।

Anis Sabri Ghazal & Kalam

अपडेटेड: २०२६ सूफियाना कलाम एवं गज़ल पढ़ने का समय: १० मिनट

प्रसिद्ध सूफियाना कलाम और दिल को छू लेने वाली गज़ल "दुश्मनी की तो क्या पूछिये दोस्ती का भरोसा नहीं" मानवीय संबंधों की नश्वरता, विश्वासघात के दर्द और इस नश्वर संसार की वास्तविक सच्चाई का एक अत्यंत मार्मिक और दार्शनिक चित्रण प्रस्तुत करती है। महान शायर और गज़लकार अनीयस साबरी (Anis Sabri) द्वारा रचित यह कलाम केवल एक शायरी या गीत नहीं, बल्कि आधुनिक युग के रिश्तों की उथली सच्चाई और इंसान की बदलती फितरत पर एक गहरा कटाक्ष है। इस आलेख में हम इस अमर रचना के सम्पूर्ण लिरिक्स, शब्दार्थ, भावार्थ, और इसके दार्शनिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे। भजनों, सूफियाना कलामों और आध्यात्मिक गीतों के इस पावन मंच Bhaktilok पर आपका स्वागत है, जहाँ हम आपको प्रामाणिक और भावपूर्ण सामग्री प्रदान करते हैं।

दुश्मनी की तो क्या पूछिये दोस्ती का भरोसा नहीं - सम्पूर्ण लिरिक्स

दुश्मनी की तो क्या पूछिये,
दोस्ती का भरोसा नहीं।
आप मुझ से भी पर्दा करें,
अब किसी का भरोसा नहीं।।

कल ये मेरे भी आँगन में थी,
जिसपे तुमको गुरूर आज है।
कल ये शायद तुझे छोड़ दे,
इस ख़ुशी का भरोसा नहीं।।

|| विशेष शायरी ||

मुश्किल कोई आन पड़ी तो घबराने से क्या होगा!
जीने की तरक़ीब निकालो मर जाने से क्या होगा!!

क्या ज़रूरी है हर रात में,
चाँद तुमको मिले जानेजाँ।
जुगनुओं से भी निस्बत रखो,
चाँदनी का भरोसा नहीं।।

रात दिन मुस्तकिल कोशिशें,
ज़िन्दगी कैसे बेहतर बने।
इतने दुख ज़िन्दगी के लिये,
और इसी का भरोसा नहीं।।

|| विशेष शायरी ||

सच मेरे बारे में था तो कितना अच्छा था!
तेरे बारे में बोला तो कड़वा लगता है!!

ये तकल्लुफ भला कब तलक,
मेरे नज़दीक आ जाइये।
कल रहे न रहे क्या पता,
ज़िन्दगी का भरोसा नहीं।।

पत्थरों से कहो राज़-ए-दिल,
ये ना देंगे दवा आप को।
ऐ नदीम आज के दौर में,
आदमी का भरोसा नही।।

--- Anis Sabri Ghazal ---

गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

अनीयस साबरी की यह गज़ल केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह जीवन के कड़वे अनुभवों का सार है। आइए इस सूफियाना कलाम के प्रत्येक बंद का विस्तृत और सरल हिंदी भावार्थ समझें:

मुखड़ा: शायर कहते हैं कि इस जमाने में दुश्मनी से क्या गिला करना, जब अपनों की दोस्ती और उनके वादों का ही कोई भरोसा नहीं रहा। स्थिति यह हो गई है कि जो अपने हुआ करते थे, वे भी अब अजनबियों की तरह पर्दा करने लगे हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि इस दौर में किसी भी इंसान पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जा सकता।

पहला अंतरा: भौतिक सुखों और धन-दौलत के घमंड पर चोट करते हुए शायर फरमाते हैं कि जिस वैभव और खुशी पर आज तुम्हें अपनी जवानी और ताकत का गुरूर है, वह कल तक मेरे भी आंगन में हुआ करती थी। समय का पहिया कब घूम जाए और यह खुशी किसे छोड़कर चली जाए, इसका कोई ठिकाना नहीं है। इसलिए किसी भी परिस्थिति पर अहंकार नहीं करना चाहिए।

दूसरा अंतरा: जीवन में हर समय पूर्णता या ऐशो-आराम की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। जैसे आसमान में हर रात पूरा चाँद मिले यह जरूरी नहीं, वैसे ही जीवन में केवल बड़े सुखों के पीछे न भागकर छोटे-छोटे जुगनुओं (यानी छोटी खुशियों) से भी संतोष रखना सीखिए, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि चांदनी हमेशा आपके साथ रहेगी।

तीसरा अंतरा: इंसान रात-दिन इसी कोशिश में लगा रहता है कि उसकी जिंदगी कैसे और बेहतर हो, सुविधाओं से परिपूर्ण हो। विडंबना यह है कि जिन दुखों और चिंताओं से हम जूझ रहे हैं, वे केवल इसी नश्वर जिंदगी को चलाने के लिए हैं, और अंततः इस जीवन का ही कोई भरोसा नहीं है कि यह कब समाप्त हो जाए।

अंतिम अंतरा: बनावटीपन और औपचारिकता (तकल्लुफ) पर कटाक्ष करते हुए कवि कहते हैं कि अपनों से दूरियां बढ़ाने का यह ढोंग कब तक चलेगा? जो नजदीकियां हैं उन्हें जी भर कर अपना लो, क्योंकि कल क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। अंत में शायर चेतावनी देते हैं कि आज के इस मतलबी दौर में, जहाँ आदमी का ही भरोसा नहीं बचा है, अपने दिल के राज पत्थरों से कहो क्योंकि वे कम से कम किसी को धोखा तो नहीं देंगे।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / भाव
पर्दा करना दूरी बनाना, छुपाव रखना रिश्तों में अपनापन खत्म होना
गुरूर अहंकार, घमंड अपनी स्थिति या धन पर अभिमान
निस्बत संबंध, लगाव, उम्मीद छोटी चीजों से संतोष रखना
मुस्तकिल लगातार, निरंतर जीवन सुधारने की अंतहीन दौड़
तकल्लुफ औपचारिकता, बनावटी व्यवहार रिश्तों में कृत्रिमता
नदीम मित्र, साथी, हमराज़ संसार के अकेलेपन को संबोधित करना

गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message

इस कलाम की मूल भावना वैराग्य, यथार्थवाद और आत्म-निरीक्षण (Self-introspection) है। यह रचना हमें सिखाती है कि भौतिक संसार में किसी भी रिश्ते, वस्तु या परिस्थिति को शाश्वत मानकर उस पर अति-विश्वास नहीं करना चाहिए। जीवन परिवर्तनशील है और मनुष्य का स्वभाव स्वार्थी। ऐसे में अपने आंतरिक आध्यात्मिक बल को मजबूत करना ही एकमात्र सत्य है। इसी प्रकार के अन्य दार्शनिक और भक्तिपूर्ण लेखों के लिए आप हमारे भजन संग्रह का अवलोकन कर सकते हैं।

गीत की जानकारी | Song Information

रचना का नाम दुश्मनी की तो क्या पूछिये दोस्ती का भरोसा नहीं
विधा सूफियाना गज़ल / कलाम
रचनाकार / शायर अनीयस साबरी (Anis Sabri)
भाषा हिंदी / उर्दू (मिश्रित लोकप्रिय शैली)
मुख्य विषय मानवीय संबंध, विश्वासघात, जीवन की अनिश्चितता
उपयुक्त अवसर कव्वाली नाइट, सूफी संगीत संध्या, आत्ममंथन के क्षण

गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons

  • अहंकार का त्याग: कभी भी अपनी वर्तमान स्थिति, धन या यश पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि समय बदलते देर नहीं लगती।
  • अति-विश्वास से बचें: इंसानी रिश्तों में स्वार्थ की संभावना हमेशा बनी रहती है, इसलिए किसी पर भी अंधा भरोसा कर मानसिक आघात पाने से बचें।
  • वर्तमान में जीना: भविष्य की अंतहीन चिंताओं में डूबने के बजाय वर्तमान पल को स्वीकार करें और सकारात्मकता से जीवन जिएं।
  • सच्चे मित्र की पहचान: विकट परिस्थितियों में धैर्य रखना और खुद को संभालना ही इंसान की सबसे बड़ी खूबी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह प्रसिद्ध सूफियाना कलाम और गज़ल महान शायर अनीयस साबरी (Anis Sabri) द्वारा रची गई है, जिसे विभिन्न कव्वालों द्वारा बड़े ही सुंदर ढंग से गाया गया है।

इस गज़ल का मुख्य संदेश यह है कि इस नश्वर संसार में इंसानी रिश्तों और दुनिया के सुखों का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए व्यक्ति को यथार्थवादी होना चाहिए और अहंकार से दूर रहना चाहिए।

यह मूल रूप से एक सूफियाना गज़ल और कव्वाली है, जो वैराग्य, मानवता और जीवन के दार्शनिक पहलुओं पर आधारित होने के कारण आध्यात्मिक प्रेमियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है।

इसे सुनने से मन को आत्ममंथन का अवसर मिलता है, सांसारिक मोह-माया के प्रति वैराग्य जागृत होता है और कठिन समय में धैर्य रखने की प्रेरणा मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री पाठकों की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जिज्ञासा को शांत करने के लिए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत की गई है। इसमें प्रयुक्त शब्द, भावार्थ और संदर्भ पारंपरिक सूफी एवं साहित्यिक स्रोतों पर आधारित हैं।

स्रोत एवं संदर्भ: पारंपरिक सूफियाना कव्वाली संग्रह, उर्दू शायरी संकलन एवं लोक-साहित्य परंपरा।

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संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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