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मत कर मोह तूँ हरी भजन को मान लिरिक्स (Mat Kar Moh tu Hari Bhajan Maan Lyrics in Hindi) - by Prakash Gandhi Hari Bhajan

संत कबीर दास जी रचित एवं प्रकाश गांधी द्वारा स्वरबद्ध 'मत कर मोह तूँ हरी भजन को मान' के संपूर्ण लिरिक्स और विस्तृत भावार्थ पढ़ें संदर्भ एवं व्याख्या सहित।

सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा में "मत कर मोह तूँ हरी भजन को मान लिरिक्स" (Mat Kar Moh tu Hari Bhajan Maan Lyrics) एक अत्यंत लोकप्रिय और वैराग्य रस से परिपूर्ण भजन है। महान समाज सुधारक और रहस्यवादी संत कबीरदास जी द्वारा रचित इस अमर वाणी को सुप्रसिद्ध गायक प्रकाश गांधी ने अपनी सुमधुर और भावपूर्ण आवाज में गाकर जन-जन तक पहुंचाया है। यह भजन मनुष्य को सांसारिक माया-मोह, क्षणभंगुर भौतिक सुखों और अज्ञानता की नींद से जगाकर ईश्वर भक्ति के शाश्वत मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इस भजन का मुख्य स्वर वैराग्य, आत्म-साक्षात्कार और पूर्ण शरणागति है। जब मनुष्य जीवन की आपाधापी में अपने वास्तविक उद्देश्य को भूल जाता है, तब यह भजन एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। इस लेख में हम इस पावन भजन के संपूर्ण लिरिक्स, विस्तृत भावार्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि और इसके आध्यात्मिक महत्व का गहराई से विश्लेषण करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मत कर मोह तूँ हरी भजन को मान लिरिक्स

मत कर मोह तू, हरि भजन को मान रे तू
हरि भजन को मान रे तू.....||

नयन दिए दर्शन करने को, श्रवण दिए सुन ज्ञान रे
हरि भजन को मान रे तू.....||

वदन दिया हरि गुण गाने को, हाथ दिए कर दान रे
हरि भजन को मान रे तू.....||

कहत कबीर सुनो भाई साधो, कंचन निपजत खान रे
हरि भजन को मान रे तू.....||

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

संत कबीरदास जी इस भजन के माध्यम से मानव जीवन की सार्थकता और उसके वास्तविक कर्तव्य को रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि हे मनुष्य! इस नश्वर संसार के झूठे मोह-माया, धन-दौलत, और पारिवारिक आसक्तियों में मत फंस। यह संसार केवल एक सराय की तरह है जहाँ कुछ समय के लिए ठहरना है। इसलिए, इस मोह का त्याग कर और भगवान के नाम स्मरण (हरि भजन) को ही अपने जीवन का परम सत्य मान।

कबीर जी मानव शरीर के विभिन्न अंगों की सार्थकता बताते हुए कहते हैं कि ईश्वर ने हमें जो यह सुंदर शरीर दिया है, उसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक उद्देश्य है। आँखें (नयन) इसलिए दी गई हैं ताकि हम सृष्टि में ईश्वर के दिव्य रूपों का दर्शन कर सकें और हर जीव में परमात्मा को देख सकें। कान (श्रवण) इसलिए दिए गए हैं ताकि हम सत्संग सुन सकें, वेदों और शास्त्रों के दिव्य ज्ञान को ग्रहण कर सकें। मुख (वदन) इसलिए मिला है ताकि हम व्यर्थ की निंदा और सांसारिक प्रलाप करने के बजाय भगवान के नाम का संकीर्तन कर सकें। हाथ इसलिए दिए गए हैं ताकि हम परोपकार कर सकें, गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा कर सकें और दान-पुण्य कर सकें।

भजन के अंतिम चरण में कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य अपने शरीर और इंद्रियों का उपयोग इस प्रकार परोपकार और हरि भक्ति में करता है, उसका हृदय शुद्ध हो जाता है। ऐसा पवित्र हृदय सोने (कंचन) की उस खान के समान हो जाता है, जहाँ से केवल अमूल्य दिव्य गुण और आध्यात्मिक अनुभूतियाँ ही उत्पन्न होती हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह उपनिषदों और रामचरितमानस चौपाई के दार्शनिक सिद्धांतों का एक सरल निचोड़ है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • वैराग्य की प्रेरणा: यह भजन मनुष्य को संसार की असत्यता और परमात्मा की सत्यता का बोध कराकर वैराग्य की ओर अग्रसर करता है।
  • इंद्रियों का सदुपयोग: वैदिक दर्शन में इंद्रियों को वश में करने और उन्हें ईश्वर की सेवा में लगाने की बात कही गई है। यह भजन उसी सिद्धांत को अत्यंत सरल भाषा में समझाता है।
  • कर्म और भक्ति का समन्वय: हाथों से दान करना कर्मयोग है और मुख से हरि गुण गाना भक्तियोग है। यह भजन दोनों के सुंदर समन्वय को दर्शाता है।
  • सरलता और सुबोधता: कबीरदास जी की भाषा अत्यंत सरल है, जिसे एक सामान्य व्यक्ति भी आसानी से समझकर अपने जीवन में उतार सकता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन और श्रवण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु सुबह के समय (ब्रह्ममुहूर्त या प्रातःकाल) इसका पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। सुबह के शांत वातावरण में जब मन सांसारिक चिंताओं से मुक्त होता है, तब इस भजन के शब्द सीधे आत्मा को स्पर्श करते हैं।

गायन की विधि:

  • सर्वप्रथम शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठें।
  • अपने आराध्य देव श्री हरि विष्णु या श्री कृष्ण का ध्यान करें।
  • भजन को केवल सुर-ताल में ही नहीं, बल्कि उसके शब्दों के गहरे अर्थ को महसूस करते हुए गाएं।
  • सत्संग, पारिवारिक प्रार्थना या संध्या आरती के समय भी इस भजन का सामूहिक संकीर्तन किया जा सकता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री हरि (विष्णु/कृष्ण) को समर्पित है, जो संपूर्ण जगत के पालनहार हैं। सनातन धर्म में श्री हरि को ही मोक्ष का दाता माना गया है। इसके साथ ही, इस भजन के रचयिता संत कबीरदास जी हैं। कबीरदास जी मध्यकालीन भारत के एक महान संत, कवि और समाज सुधारक थे। उन्होंने अपनी साखियों, सबदों और भजनों के माध्यम से समाज में फैले पाखंडों पर प्रहार किया और ईश्वर के प्रति सच्ची, निष्काम भक्ति का मार्ग दिखाया।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

संत कबीरदास जी की रचनाएं प्रायः उनके व्यक्तिगत अनुभवों और समाज के सूक्ष्म निरीक्षण पर आधारित होती थीं। उन्होंने देखा कि लोग जीवन भर धन, संपत्ति और परिवार के मोह में फंसे रहते हैं और अंत समय में खाली हाथ चले जाते हैं। इसी सत्य को उजागर करने के लिए उन्होंने इस पद की रचना की। आधुनिक समय में, प्रकाश गांधी ने इस पारंपरिक भजन को राजस्थानी लोक संगीत के पुट के साथ नए ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे यह ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सधुक्कड़ी (खड़ी बोली, ब्रजभाषा और राजस्थानी का मिश्रण) है। कबीरदास जी की शैली उपदेशात्मक और संवादात्मक है। वे सीधे पाठक या श्रोता को संबोधित करते हैं ("मान रे तू")। भजन में अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है। "कंचन निपजत खान" में रूपक अलंकार है, जहाँ पवित्र अंतःकरण की तुलना सोने की खान से की गई है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. मोह का त्याग: अत्यधिक आसक्ति ही सभी दुखों का कारण है। हमें कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, लेकिन उनमें लिप्त नहीं होना चाहिए।
  2. जीवन का उद्देश्य: मानव जीवन केवल खाने, सोने और धन कमाने के लिए नहीं है। इसका अंतिम लक्ष्य आत्म-कल्याण और भगवद-प्राप्ति है।
  3. परोपकार की भावना: ईश्वर ने हमें जो कुछ भी दिया है, उसका एक हिस्सा समाज के कल्याण और सेवा में लगाना चाहिए।
  4. सकारात्मकता और सत्संग: हमें अपनी आंखों और कानों को केवल अच्छी और आध्यात्मिक चीजों में लगाना चाहिए, जिससे हमारे विचार शुद्ध रहें।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
मोह (Moh) आसक्ति, अज्ञानता जनित लगाव संसार की नश्वर चीजों के प्रति झूठा खिंचाव जो बंधन का कारण बनता है।
नयन (Nayan) नेत्र, आँखें ईश्वर की बनाई सृष्टि में उनके दिव्य रूप को देखने का साधन।
श्रवण (Shravan) कान, सुनना सत्य, ज्ञान और हरि कथा को ग्रहण करने का माध्यम।
वदन (Vadan) मुख, वाणी प्रभु के नाम का कीर्तन और मीठे वचन बोलने का साधन।
कंचन (Kanchan) सोना (Gold) पवित्र, शुद्ध और मूल्यवान अंतःकरण का प्रतीक।
निपजत (Nipajat) उत्पन्न होना, प्रकट होना हृदय में दिव्य गुणों का प्रादुर्भाव होना।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "मत कर मोह तू, हरि भजन को मान रे तू..."
हे जीवात्मा! तू इस संसार के झूठे संबंधों, धन-दौलत और शरीर के प्रति अत्यधिक मोह मत कर। यह सब यहीं छूट जाएगा। तू केवल भगवान के नाम स्मरण को ही जीवन का एकमात्र सत्य और सहारा मान।

2. "नयन दिए दर्शन करने को, श्रवण दिए सुन ज्ञान रे..."
ईश्वर ने तुझे ये सुंदर आंखें इसलिए दी हैं ताकि तू उनके दिव्य स्वरूप और उनकी बनाई सुंदर सृष्टि के दर्शन कर सके। तुझे ये कान इसलिए मिले हैं ताकि तू व्यर्थ की बातों को छोड़कर ज्ञान की बातें और प्रभु की महिमा सुन सके।

3. "वदन दिया हरि गुण गाने को, हाथ दिए कर दान रे..."
तुझे यह मुख इसलिए मिला है ताकि तू भगवान के नाम का संकीर्तन कर सके और अपनी वाणी से दूसरों को सुख पहुंचा सके। तुझे ये हाथ इसलिए दिए गए हैं ताकि तू परोपकार के कार्य कर सके और जरूरतमंदों को दान दे सके।

4. "कहत कबीर सुनो भाई साधो, कंचन निपजत खान रे..."
संत कबीरदास जी कहते हैं कि हे संतों और साधकों! सुनो, जो मनुष्य अपनी इंद्रियों का इस प्रकार सही उपयोग करता है, उसका हृदय सोने की खान बन जाता है, जहाँ से केवल पवित्रता और आनंद ही उत्पन्न होता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक से अत्यंत मेल खाते हैं, जहाँ भगवान कृष्ण अर्जुन को अपनी इंद्रियों को वश में करने और मन को ईश्वर में लगाने का उपदेश देते हैं:

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥

अर्थात: यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भी विचरण करता है, वहाँ-वहाँ से इसे खींचकर आत्मा के वश में करना चाहिए और भगवान के भजन में लगाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त, भगवान विष्णु की आराधना के लिए प्रसिद्ध श्री हरि स्तोत्रम का पाठ भी इस भजन के साथ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम मत कर मोह तूँ हरी भजन को मान
मूल रचयिता संत कबीरदास जी
प्रसिद्ध गायक प्रकाश गांधी (Prakash Gandhi)
मुख्य विषय (Theme) वैराग्य, ईश्वर भक्ति, इंद्रिय संयम
भाषा सधुक्कड़ी / राजस्थानी लोक शैली
मुख्य रस शांत रस, भक्ति रस
उपयुक्त अवसर प्रातःकालीन प्रार्थना, सत्संग, संध्या आरती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन के मूल रचयिता महान रहस्यवादी संत कबीरदास जी हैं। उन्होंने अपनी साखियों और पदों के माध्यम से इस संसार की नश्वरता को दर्शाया है।

इस भजन को आधुनिक समय में सुप्रसिद्ध लोक गायक प्रकाश गांधी ने अपनी मधुर आवाज में गाकर अत्यधिक लोकप्रिय बनाया है।

इसका अर्थ है "सोना उत्पन्न करने वाली खान"। आध्यात्मिक संदर्भ में, इसका तात्पर्य उस पवित्र और शुद्ध हृदय से है जो ईश्वर भक्ति और परोपकार के कारण दिव्य गुणों से भर जाता है।

यह भजन हमें सिखाता है कि हमें अपनी इंद्रियों (आंख, कान, मुख, हाथ) का उपयोग केवल सांसारिक भोगों में नहीं, बल्कि ईश्वर की सेवा, सत्संग और परोपकार में करना चाहिए।

इस भजन को प्रातःकाल या संध्याकाल के समय शांत मन से गाना या सुनना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि यह मन को शांति प्रदान करता है।

हाँ, यह भजन कबीरदास जी के निर्गुण और व्यावहारिक दर्शन को दर्शाता है, जहाँ वे बाहरी आडंबरों के बजाय आंतरिक शुद्धि और इंद्रिय संयम पर बल देते हैं।

"वदन" शब्द का अर्थ मुख या वाणी से है। भजन के अनुसार, मुख का उपयोग केवल सांसारिक प्रलाप के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर के नाम का गुणगान करने के लिए होना चाहिए।

इस भजन का मुख्य रस "शांत रस" और "भक्ति रस" है, जो श्रोता के मन में वैराग्य और ईश्वर के प्रति प्रेम की भावना जाग्रत करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन की समीक्षा करते हुए हमारे विद्वानों ने यह पाया है कि संत कबीरदास जी की यह रचना सदियों बाद भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी। आज के उपभोक्तावादी युग में, जहाँ मनुष्य केवल भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है, यह भजन हमें रुककर आत्मचिंतन करने का अवसर देता है। प्रकाश गांधी जी के सुरीले कंठ ने इस संदेश को और अधिक प्रभावी बना दिया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • कबीर ग्रंथावली - संत कबीरदास के प्रामाणिक पदों का संग्रह।
  • श्रीमद्भगवद्गीता - इंद्रिय संयम और कर्मयोग के सिद्धांत।
  • पारंपरिक राजस्थानी भजन संग्रह एवं लोक संगीत इतिहास।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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