Kabir Das Ke Dohe बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार दोहे का अर्थ(Kabir Deval Dhahi Pandaya Et Bhai Senvar Dohe Ka Arth in Hindi)

पढ़ें कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार दोहे का अर्थ(Kabir Deval Dhahi Pandaya Et Bhai Senvar Dohe Ka Arth in Hindi) का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भा

महान सूफी संत, समाज सुधारक और अद्भुत दार्शनिक कबीरदास जी की वाणी केवल कविता नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का वह निचोड़ है जो सदियों से मानव जाति का मार्गदर्शन कर रहा है। कबीर साहेब का यह अत्यंत प्रसिद्ध दोहा "कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार, करी चिजारा सौं प्रीतड़ी ज्यूं ढहे न दूजी बार" मानव शरीर की नश्वरता और परमात्मा की शाश्वत सत्ता के बीच के गहरे संबंध को उजागर करता है। इस दोहे में कबीर जी ने मानव शरीर की तुलना एक मिट्टी के देवालय (मंदिर) से की है, जो समय के साथ नष्ट हो जाता है। वे साधक को यह संदेश देते हैं कि इस क्षणभंगुर शरीर के मोह में पड़ने के बजाय उस परम शिल्पकार (ईश्वर) से प्रेम करना चाहिए, जो हमें जन्म और मृत्यु के इस चक्र से सदा के लिए मुक्त कर सकता है। यह दोहा निर्गुण भक्ति परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो हमें बाह्य आडंबरों से दूर रहकर अंतर्मुखी होने की प्रेरणा देता है।

मूल दोहा / साखी | Original Text

कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार ।
करी चिजारा सौं प्रीतड़ी ज्यूं ढहे न दूजी बार ॥

उच्चारण, पाठ एवं संरचना | Pronunciation & Structure

इस दोहे का शुद्ध उच्चारण और पाठ भक्ति भाव के साथ करना चाहिए। कबीर साहेब की भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, जिसमें राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी और ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर समन्वय मिलता है।

  • छंद: यह दोहा छंद में रचित है। दोहा एक अर्धसम मात्रिक छंद होता है, जिसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
  • भाषा शैली: इस साखी में राजस्थानी और देशज शब्दावली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। 'प्रीतड़ी' (प्रेम), 'चिजारा' (राजगीर/शिल्पकार) और 'देवल' (देवालय/मंदिर) जैसे शब्द लोकभाषा से लिए गए हैं, जो जनमानस को सीधे प्रभावित करते हैं।
  • लय और प्रवाह: इस दोहे की लय अत्यंत सुगम और गेय है, जिसे आसानी से संकीर्तन या सत्संग के दौरान गाया जा सकता है।

कठिन शब्दार्थ | Word Meanings

कठिन शब्द सरल हिंदी अर्थ संदर्भ सहित अर्थ (आध्यात्मिक अर्थ)
देवल देवालय, मंदिर मानव शरीर रूपी मंदिर (काया)
ढहि पड्या ढह गया, नष्ट हो गया मृत्यु को प्राप्त होना, शरीर का अंत होना
ईंट भवन निर्माण की ईंटें शरीर के पंचतत्व (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा)
सेंवार काई, जल में उगने वाली घास मिट्टी में मिल जाना, पंचतत्वों का प्रकृति में विलीन होना
चिजारा राजगीर, मकान बनाने वाला कारीगर सृष्टि का रचयिता, परमेश्वर, परमात्मा
प्रीतड़ी प्रेम, अनुराग, अनन्य भक्ति ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम
ज्यूं जिससे कि, ताकि जिस उपाय से
ढहे न दूजी बार दूसरी बार न ढहे पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति, मोक्ष की प्राप्ति

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ | Line-by-Line Explanation

कबीर साहेब के इस दोहे को दो मुख्य पंक्तियों में विभाजित कर इसके गहरे अर्थ को समझा जा सकता है:

प्रथम पंक्ति: "कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार"

कबीर दास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर रूपी देवालय (मंदिर) एक न एक दिन अवश्य ढह जाएगा। जिस प्रकार एक पुराना मंदिर गिर जाता है और उसकी ईंटें पानी या नमी के संपर्क में आकर काई (सेंवार) बन जाती हैं, उसी प्रकार मृत्यु के पश्चात यह भौतिक शरीर नष्ट हो जाता है और इसके घटक तत्व (पंचतत्व) पुनः प्रकृति में विलीन हो जाते हैं। यहाँ 'देवल' शरीर का और 'ईंट' हमारे भौतिक अस्तित्व का प्रतीक है।

द्वितीय पंक्ति: "करी चिजारा सौं प्रीतड़ी ज्यूं ढहे न दूजी बार"

इस विनाश से बचने का उपाय बताते हुए कबीर जी कहते हैं कि हे जीवात्मा! तू इस नश्वर शरीर से मोह करने के बजाय उस 'चिजारा' यानी उस परम शिल्पकार (परमात्मा) से सच्ची प्रीत लगा, जिसने इस सुंदर सृष्टि और तेरे इस शरीर का निर्माण किया है। यदि तू उस अविनाशी परमात्मा से लौ लगा लेगा, तो तेरा यह मंदिर (अस्तित्व) दूसरी बार नहीं ढहेगा, अर्थात तुझे बार-बार जन्म और मृत्यु के कष्टकारी चक्र में नहीं आना पड़ेगा और तू मोक्ष को प्राप्त कर लेगा।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

कबीर साहेब इस साखी के माध्यम से संसार की असारता और मानव जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य जीवन भर इस भौतिक शरीर को सजाने, संवारने और इसके सुखों को जुटाने में लगा रहता है। लेकिन वह यह भूल जाता है कि यह शरीर मिट्टी का एक खिलौना मात्र है। एक दिन यह देवालय ढह जाएगा और इसकी ईंटें काई बनकर बिखर जाएंगी।

सनातन धर्म में शरीर को 'देवालय' माना गया है—"देहो देवालयः प्रोक्तो जीवो देवः सनातनः" (अर्थात शरीर ही मंदिर है और उसमें रहने वाला जीव ही सनातन देव है)। कबीर साहेब इसी दार्शनिक सत्य को अत्यंत सरल लोकभाषा में समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि यह शरीर मंदिर है, तो इसका निर्माण करने वाला वह परमेश्वर 'चिजारा' (राजगीर) है। बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो बनी हुई इमारत (शरीर) से आसक्ति रखने के बजाय उस इमारत को बनाने वाले कारीगर (ईश्वर) से संबंध जोड़ता है।

जब साधक का मन उस परम पुरुष से जुड़ जाता है, तो वह सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है। कबीर जी का संकेत 'अद्वैत भाव' की ओर है, जहाँ आत्मा परमात्मा में लीन होकर अमर हो जाती है। फिर उसे इस नश्वर संसार में दोबारा जन्म लेकर कष्ट नहीं भोगना पड़ता। यही इस दोहे का परम आध्यात्मिक संदेश है।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार | Core Theme

इस साखी का केंद्रीय विचार निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आधारित है:

  • वैराग्य भाव (Detachment): संसार और शरीर की नश्वरता को देखकर मन में वैराग्य का उदय होना।
  • अनन्य भक्ति (Devotion): केवल ईश्वर को ही एकमात्र सत्य मानकर उनसे प्रेम करना।
  • मोक्ष की कामना (Salvation): जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाकर परमात्मा में विलीन होना।
  • आत्मज्ञान (Self-Realization): शरीर के भीतर छिपे अविनाशी तत्व को पहचानना।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश | Spiritual & Philosophical Message

कबीर साहेब का यह दोहा भारतीय दर्शन के 'अद्वैत वेदांत' और 'विशिष्ट द्वैत' के सिद्धांतों के बेहद करीब है। उपनिषदों में भी शरीर को रथ और आत्मा को रथी कहा गया है। कबीर जी यहाँ 'चिजारा' शब्द का प्रयोग करके यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर ही इस जगत का निमित्त और उपादान कारण है।

जब हम किसी सुंदर कलाकृति को देखते हैं, तो हम कलाकार की प्रशंसा करते हैं। लेकिन इस संसार में मनुष्य ईश्वर की बनाई इस देह रूपी कलाकृति से तो प्रेम करता है, परंतु उस महान कलाकार को भूल जाता है। कबीर जी इसी भूल को सुधारने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि जब तक जीव का प्रेम संसार और शरीर से रहेगा, तब तक उसे बार-बार जन्म लेना पड़ेगा और हर बार उसका शरीर रूपी मंदिर ढहेगा। लेकिन जैसे ही वह 'चिजारा' से प्रीत लगा लेगा, उसका अस्तित्व शाश्वत हो जाएगा।

यह संदेश श्रीमद्भगवद्गीता के उस श्लोक की याद दिलाता है जहाँ भगवान कृष्ण कहते हैं कि जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीरों को छोड़कर नए शरीरों में प्रवेश करती है। कबीर साहेब इस चक्र को ही समाप्त करने का मार्ग बताते हैं—वह मार्ग है 'परमेश्वर से अनन्य प्रेम'।

भक्ति परंपरा में महत्व | Importance in Bhakti Tradition

मध्यकालीन भारत के भक्ति आंदोलन में कबीर साहेब का स्थान अद्वितीय है। उन्होंने ज्ञान और भक्ति के समन्वय से एक ऐसे मार्ग का निर्माण किया जो सबके लिए सुलभ था।

यह दोहा निर्गुण भक्ति धारा का प्राण है। जहाँ सगुण भक्त मूर्ति और मंदिरों की पूजा में लीन थे, वहीं कबीर ने मानव शरीर को ही 'देवल' (मंदिर) घोषित कर दिया। उन्होंने बताया कि असली मंदिर हमारे भीतर है। यदि इस आंतरिक मंदिर को बचाना है और इसे अमर बनाना है, तो हमें बाहरी कर्मकांडों को छोड़कर अंतःकरण की शुद्धि करनी होगी और उस निराकार ईश्वर से प्रेम करना होगा। यह साखी साधकों को बाह्य आडंबरों से हटाकर अंतर्मुखी साधना की ओर प्रवृत्त करती है।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख | Daily Life Relevance & Lessons

आज के आधुनिक और भौतिकवादी युग में कबीर साहेब का यह दोहा और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। आज का मनुष्य बाहरी चमक-दमक, शारीरिक सुंदरता और भौतिक सुख-सुविधाओं को ही सर्वस्व मान बैठा है। वह दिन-रात धन संचय और शारीरिक सुखों के पीछे भाग रहा है।

यह दोहा हमें सिखाता है कि:

  • तनाव से मुक्ति: जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि यह शरीर और संसार नश्वर है, तो हमारे भीतर का अनावश्यक भय और तनाव समाप्त हो जाता है।
  • सच्चा प्रेम: सांसारिक रिश्ते और वस्तुएं परिवर्तनशील हैं। केवल ईश्वर का प्रेम ही शाश्वत है। इसलिए अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मन को ईश्वर में लगाए रखें।
  • संतोष और सादगी: शरीर की नश्वरता का ज्ञान हमें अहंकार से बचाता है और हमारे भीतर विनम्रता का संचार करता है।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली | Literary Analysis

कबीर साहेब की काव्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता उनके द्वारा प्रयुक्त किए गए सटीक प्रतीक और रूपक हैं। इस दोहे में उन्होंने अद्भुत रूपक अलंकार का प्रयोग किया है:

  • देवल (मंदिर): यह मानव शरीर का रूपक है। जैसे मंदिर पवित्र होता है, वैसे ही शरीर भी परमात्मा का निवास स्थान होने के कारण पवित्र है।
  • ईंट भई सेंवार: यह मृत्यु के बाद शरीर के पंचतत्वों के बिखरने का अत्यंत सुंदर और यथार्थवादी बिंब है।
  • चिजारा (राजगीर): यह ईश्वर का प्रतीक है। जैसे राजगीर बड़ी कुशलता से ईंट-ईंट जोड़कर भवन बनाता है, वैसे ही ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना की है।

दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख | Key Lessons

  1. यह मानव शरीर क्षणभंगुर है, इसका अहंकार कभी नहीं करना चाहिए।
  2. मृत्यु जीवन का अंतिम और अटल सत्य है, जिससे कोई नहीं बच सकता।
  3. संसार की नश्वर वस्तुओं से मोह हटाकर शाश्वत परमात्मा की शरण में जाना चाहिए।
  4. ईश्वर ही इस सृष्टि के रचयिता और हमारे सच्चे रक्षक हैं।
  5. सच्ची भक्ति और प्रेम ही मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र (आवागमन) से मुक्ति दिला सकते हैं।

एक नजर में | Quick Summary

विषय विवरण
रचना कबीर साखी (दोहा)
कवि/संत संत कबीरदास जी
भाषा सधुक्कड़ी (राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली)
मुख्य विषय शरीर की नश्वरता और ईश्वर की शाश्वतता
मुख्य रस शांत रस और भक्ति रस
काव्य गुण प्रसाद गुण (सरल और बोधगम्य)
जीवन सीख भौतिकता से दूर रहकर आध्यात्मिक उन्नति करना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि मानव शरीर नश्वर है और एक दिन नष्ट हो जाएगा। इसलिए मनुष्य को इस नश्वर शरीर और संसार से मोह छोड़कर उस अविनाशी परमात्मा (चिजारा) से प्रेम करना चाहिए ताकि उसे मोक्ष मिल सके।

'देवल' का अर्थ है देवालय या मंदिर, जो यहाँ मानव शरीर का प्रतीक है। 'चिजारा' का अर्थ है राजगीर या मकान बनाने वाला कारीगर, जो यहाँ सृष्टि के रचयिता भगवान (परमात्मा) का प्रतीक है।

जैसे मंदिर के ढहने पर उसकी ईंटें पानी और मिट्टी के संपर्क में आकर काई (सेंवार) बन जाती हैं, वैसे ही मृत्यु के बाद मनुष्य का शरीर मिट्टी में मिलकर पंचतत्वों में विलीन हो जाता है। यह शरीर के अंत को दर्शाता है।

इसका अर्थ है कि दोबारा जन्म और मृत्यु के चक्र में न पड़ना पड़े। अर्थात, परमात्मा से सच्ची प्रीत लगाने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

कबीरदास जी की भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, क्योंकि इसमें विभिन्न प्रांतीय भाषाओं और बोलियों के शब्द शामिल हैं।

यह दोहा कबीर साहेब की 'साखी' के अंतर्गत आता है, जो उनके मुख्य ग्रंथ 'बीजक' और 'कबीर ग्रंथावली' में संकलित है।

कबीर के अनुसार, बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों को छोड़कर अंतःकरण से ईश्वर (परमात्मा) के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण ही मोक्ष प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग है।

यह दोहा हमें सिखाता है कि भौतिक सुख और शारीरिक सुंदरता अस्थायी हैं। हमें मानसिक शांति और जीवन की सार्थकता के लिए आध्यात्मिक मूल्यों और निस्वार्थ प्रेम को अपनाना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख कबीर साहेब की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत और उनके कालजयी दोहों के गहन विश्लेषण पर आधारित है। कबीरदास जी के दोहे न केवल साहित्यिक दृष्टि से अमूल्य हैं, बल्कि वे मानव चेतना को जगाने वाले आध्यात्मिक सूत्र भी हैं। हमारी संपादकीय टीम ने इस दोहे के दार्शनिक पहलुओं, कठिन शब्दों के अर्थ और व्यावहारिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता को बहुत ही सरल और प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ताकि पाठक कबीर साहेब के वास्तविक संदेश को आत्मसात कर सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • कबीर ग्रंथावली: बाबू श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित संस्करण।
  • बीजक: संत कबीर साहेब की मूल वाणियों का संग्रह।
  • भारतीय दर्शन एवं उपनिषद: देहात्मवाद और अद्वैत वेदांत के संदर्भ।
  • भक्ति आंदोलन का इतिहास: मध्यकालीन संतों की वाणी और उनका समाज पर प्रभाव।

संबंधित भजन एवं लेख

संत कबीरदास जी के अन्य प्रसिद्ध दोहों और भजनों के विस्तृत अर्थ पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लेखों पर जाएं:

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!