Parvati Stotram

झूठे सुख को सुख कहे मानत है मन मोद दोहे का अर्थ(Jhuthe Sukh Ko Sukh Kahe Manat Hai Man Mod Dohe Ka Arth in Hindi) - Bhaktilok

69 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

महान समाज सुधारक, क्रांतिकारी कवि और निर्गुण भक्ति धारा के प्रणेता संत कबीरदास जी के दोहे केवल साहित्यिक रचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे मानव जीवन को सत्य की राह दिखाने वाले अमूल्य आध्यात्मिक सूत्र हैं। कबीरदास जी ने अपने जीवनकाल में समाज में व्याप्त पाखंड, अंधविश्वास और भौतिकवादी भटकाव पर कड़ा प्रहार किया। उनका यह अत्यंत प्रसिद्ध दोहा "झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद। खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।" सांसारिक जीवन की अनित्यता, नश्वरता और माया के झूठे आवरण को उजागर करता है। इस लेख के माध्यम से हम इस कालजयी दोहे के गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ, दार्शनिक पृष्ठभूमि, व्यावहारिक जीवन में इसकी प्रासंगिकता और इससे मिलने वाली महान सीखों का विस्तार से अध्ययन करेंगे। यह दोहा हमें सचेत करता है कि जिसे हम सुख मानकर प्रसन्न हो रहे हैं, वह वास्तव में काल (मृत्यु) का ग्रास बनने की प्रक्रिया मात्र है।

मूल दोहा / साखी | Original Text

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।

उच्चारण, पाठ एवं संरचना | Pronunciation & Structure

यह दोहा अर्धसम मात्रिक छंद की श्रेणी में आता है, जिसे 'दोहा छंद' कहा जाता है। इसकी प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं, जबकि द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसकी भाषा 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' है, जिसमें ब्रज, अवधी, खड़ी बोली और राजस्थानी का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। इस दोहे का पाठ अत्यंत सरल और गेय है, जो सीधे हृदय को स्पर्श करता है और साधक को वैराग्य की ओर प्रेरित करता है।

कठिन शब्दार्थ | Word Meanings

कठिन शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं संदर्भगत अर्थ
झूठे सुख क्षणिक या नश्वर भौतिक सुख माया जनित सुख, जो स्थायी नहीं है और अंततः दुःख में बदल जाता है।
मन मोद मन की प्रसन्नता या हर्ष अज्ञानतावश मन में उत्पन्न होने वाला झूठा अहंकार और आनंद।
खलक संसार, सृष्टि या समस्त जीव यह संपूर्ण भौतिक जगत और इसके अंतर्गत आने वाले सभी प्राणी।
चबैना भुना हुआ अनाज (चबाने योग्य भोजन) काल (मृत्यु) का भोजन, जिसे वह धीरे-धीरे चबाकर समाप्त कर रहा है।
काल समय या मृत्यु परम सत्य जो हर भौतिक वस्तु को नष्ट कर देता है।
गोद झोली या प्रतीक्षा सूची वे जीव जो अभी जीवित हैं लेकिन शीघ्र ही मृत्यु के ग्रास बनने वाले हैं।

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ | Line-by-Line Explanation

कबीरदास जी के इस दोहे को दो मुख्य भागों में विभाजित करके समझा जा सकता है:

  • प्रथम पंक्ति: "झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद"
    मनुष्य इस नश्वर संसार के भौतिक सुखों (जैसे धन, संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा और शारीरिक विलासिता) को ही वास्तविक और शाश्वत सुख मान बैठता है। इन क्षणभंगुर सुखों को पाकर उसका मन अत्यंत हर्षित और प्रफुल्लित होता है, जबकि वह यह भूल जाता है कि ये सभी सुख अस्थायी हैं और एक दिन नष्ट हो जाएंगे।
  • द्वितीय पंक्ति: "खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद"
    कबीरदास जी एक अत्यंत प्रभावशाली रूपक का उपयोग करते हुए कहते हैं कि यह संपूर्ण संसार (खलक) काल (मृत्यु) का चबैना (भुना हुआ अनाज) है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति चबैना खाते समय कुछ दाने अपने मुंह में रखता है और कुछ अपनी गोद (झोली) में रखता है, ठीक उसी प्रकार काल ने कुछ जीवों को मृत्यु के मुख में ले लिया है (जो मर चुके हैं) और शेष जीव उसकी गोद में हैं (जो अभी जीवित हैं लेकिन अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं)।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth

संत कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से मानव जाति को अज्ञानता की गहरी नींद से जगाने का प्रयास कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हे मानव! तू जिन भौतिक सुखों, ऐश्वर्य और सांसारिक संबंधों में लिप्त होकर स्वयं को सुखी मान रहा है और मन ही मन प्रसन्न हो रहा है, वे सब अत्यंत मिथ्या और क्षणभंगुर हैं। यह संसार एक ऐसी रंगशाला है जहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है। जिसे तू आज अपना मान रहा है, वह कल तेरा नहीं रहेगा।

कबीरदास जी आगे समझाते हैं कि मृत्यु इस सृष्टि का अंतिम और अटल सत्य है। काल निरंतर सक्रिय है। वह किसी भी क्षण किसी को भी अपना ग्रास बना सकता है। हम सभी उस काल के चबैने के समान हैं। जो लोग इस दुनिया से चले गए हैं, वे काल के मुंह में समा चुके हैं, और जो आज जीवित हैं, वे काल की गोद में बैठे हैं। उनकी मृत्यु भी निश्चित है, बस समय का अंतर है। इसलिए, इन अस्थायी सुखों में खोकर अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य यानी ईश्वर भक्ति और आत्मज्ञान को नहीं भूलना चाहिए। जैसे हम प्रतिदिन ओम जय जगदीश हरे आरती गाकर भगवान से मुक्ति और शांति की प्रार्थना करते हैं, वैसे ही हमें अपने मन को ईश्वर की ओर लगाना चाहिए।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार | Core Theme

इस दोहे का केंद्रीय विचार 'वैराग्य' और 'अनित्यता' है। कबीरदास जी ने भारतीय दर्शन के 'मायावाद' और 'क्षणभंगुरता' के सिद्धांत को अत्यंत सरल शब्दों में प्रस्तुत किया है।

  • वैराग्य की भावना: संसार के प्रति आसक्ति को कम करना और ईश्वर के प्रति अनुराग बढ़ाना।
  • काल की सर्वशक्तिमानता: समय और मृत्यु से कोई भी जीव बच नहीं सकता।
  • माया का भ्रम: भौतिक सुखों को वास्तविक सुख समझना ही अज्ञानता की पराकाष्ठा है।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश | Spiritual & Philosophical Message

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी इस संसार को 'अदुःखालयम अशाश्वतम्' (दुःखों का घर और क्षणभंगुर) कहा है। कबीरदास जी का यह दोहा इसी दार्शनिक सत्य की पुष्टि करता है। जब तक मनुष्य सांसारिक सुखों को सत्य मानता रहेगा, तब तक वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।

आध्यात्मिक दृष्टि से, 'झूठा सुख' वह है जो इंद्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है। यह सुख प्रारंभ में तो अमृत के समान प्रतीत होता है, परंतु इसका अंत अत्यंत दुखदायी होता है। इसके विपरीत, 'सच्चा सुख' आत्मा का आनंद है, जो केवल साधना, नाम-स्मरण और सत्संग से प्राप्त होता है। जब साधक इस सत्य को जान लेता है कि यह शरीर और संसार दोनों ही नश्वर हैं, तब उसके भीतर सच्चे ज्ञान का उदय होता है। वह सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर परमपिता परमेश्वर की शरण में जाता है। इस मार्ग पर चलने के लिए साधक को पार्वती स्तोत्र या अन्य दिव्य स्तोत्रों के पाठ से मानसिक शक्ति और एकाग्रता प्राप्त होती है।

भक्ति परंपरा में महत्व | Importance in Bhakti Tradition

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में कबीरदास जी का स्थान अद्वितीय है। उन्होंने ज्ञानमार्गी शाखा के माध्यम से समाज को एक नई दिशा दी। उनका यह दोहा साधकों को सचेत करने के लिए एक 'अलार्म' की तरह कार्य करता है। भक्ति मार्ग में जब तक साधक के मन में संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, तब तक वह ईश्वर की भक्ति में पूरी तरह लीन नहीं हो सकता। इसलिए, कबीर की साखियाँ और दोहे भक्तों को निरंतर यह स्मरण कराते रहते हैं कि यह जीवन अत्यंत अमूल्य है और इसे व्यर्थ के सांसारिक प्रपंचों में नहीं गंवाना चाहिए।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख | Daily Life Relevance & Lessons

आज के आधुनिक और अत्यधिक भौतिकवादी युग में कबीरदास जी का यह दोहा और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। आज मनुष्य सुख की खोज में दिन-रात भाग रहा है, परंतु वह जितना भागता है, उतना ही अशांत होता जाता है।

  • तनाव से मुक्ति: जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि संसार की हर वस्तु अस्थायी है, तो हमारा खोने का डर समाप्त हो जाता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है।
  • संतोष का भाव: यह दोहा हमें सिखाता है कि हमें जो मिला है, उसमें संतुष्ट रहना चाहिए और अत्यधिक लोभ से बचना चाहिए।
  • समय का सदुपयोग: जीवन की नश्वरता को ध्यान में रखते हुए हमें अपने समय का उपयोग अच्छे कार्यों, परोपकार और आत्म-उन्नति में करना चाहिए।
  • सकारात्मक दृष्टिकोण: कठिन परिस्थितियों में भी यह सोचकर धैर्य रखना चाहिए कि "यह समय भी बीत जाएगा।"

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली | Literary Analysis

कबीरदास जी की काव्य शैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी 'प्रतीकात्मकता' है। इस दोहे में उन्होंने 'चबैना' शब्द का अत्यंत सुंदर और मर्मस्पर्शी रूपक गढ़ा है।

  • रूपक अलंकार: 'खलक चबैना काल का' में रूपक अलंकार का प्रयोग किया गया है, जहाँ संसार को चबैना और काल को चबाने वाले के रूप में दर्शाया गया है।
  • शांत रस: इस दोहे को पढ़कर मन में वैराग्य और शांति की भावना उत्पन्न होती है, इसलिए यहाँ शांत रस की प्रधानता है।
  • सधुक्कड़ी भाषा: सरल, सुबोध और जनमानस की भाषा होने के कारण यह दोहा सीधे दिल पर चोट करता है।

दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख | Key Lessons

  1. संसार के भौतिक सुख अस्थायी और परिवर्तनशील हैं, इन पर कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए।
  2. मृत्यु एक अटल सत्य है, जिससे कोई भी प्राणी बच नहीं सकता।
  3. मनुष्य को अपने जीवन का अमूल्य समय केवल धन और विलासिता के संचय में नष्ट नहीं करना चाहिए।
  4. सच्चा सुख केवल ईश्वर की भक्ति, परोपकार और आत्मज्ञान में ही निहित है।
  5. हमें सदैव जागरूक और सचेत रहकर अपने सत्कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

एक नजर में | Quick Summary

विषय विवरण
रचना झूठे सुख को सुख कहे (साखी)
रचयिता / संत संत कबीरदास जी
भाषा सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी)
काव्य विधा दोहा (अर्धसम मात्रिक छंद)
मुख्य रस शांत रस (वैराग्य भावना)
मुख्य संदेश संसार की नश्वरता और काल की सर्वोपरि सत्ता का बोध।
स्रोत ग्रंथ कबीर ग्रंथावली / कबीर बीजक

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि संसार के भौतिक और इंद्रियजन्य सुख क्षणभंगुर और झूठे हैं। मनुष्य को इन नश्वर सुखों में लिप्त होकर अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य (ईश्वर भक्ति और आत्मज्ञान) को नहीं भूलना चाहिए, क्योंकि मृत्यु किसी भी क्षण आ सकती है।

कबीरदास जी ने इस संपूर्ण संसार और इसके जीवों को 'काल का चबैना' (भुना हुआ अनाज) कहा है। जैसे चबैना खाते समय कुछ दाने मुंह में होते हैं और कुछ गोद में, वैसे ही कुछ लोग मर चुके हैं और बाकी बचे लोग भी जल्द ही मृत्यु को प्राप्त होंगे।

'काल' से तात्पर्य समय और मृत्यु से है। यह वह अदृश्य और सर्वशक्तिमान सत्ता है जो सृष्टि की हर भौतिक वस्तु को नष्ट कर देती है। इससे कोई भी जीव बच नहीं सकता।

इस दोहे में 'शांत रस' की प्रधानता है। इसे पढ़ने और समझने से मन में वैराग्य, अनासक्ति और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना जाग्रत होती है।

कबीरदास जी के अनुसार सच्चा सुख आत्मा का आनंद है, जो सांसारिक वस्तुओं से नहीं बल्कि ईश्वर की भक्ति, नाम-स्मरण, सत्संग और परोपकार के माध्यम से प्राप्त होता है।

हाँ, यह दोहा आज के तनावपूर्ण और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी युग में अत्यंत उपयोगी है। यह हमें सिखाता है कि भौतिक चीजों के पीछे अंधाधुंध भागने के बजाय जीवन में संतोष, शांति और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

इसका अर्थ है कि कुछ लोग तो काल के गाल में समा चुके हैं (मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं) और जो बचे हुए हैं, वे भी काल की गोद में हैं, अर्थात उनकी मृत्यु भी निश्चित है और वे अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

कबीरदास जी की भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है। वे अपनी बात को अत्यंत सीधे, सरल और प्रभावशाली ढंग से कहने में माहिर थे, जिसे आम जनमानस आसानी से समझ सकता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख कबीर साहित्य के गहन अध्ययन और पारंपरिक व्याख्याओं के आधार पर तैयार किया गया है। कबीरदास जी के दोहे मानव मन को शुद्ध करने और उसे सत्य मार्ग पर ले जाने के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इस दोहे का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को अहंकार और अज्ञानता से मुक्त कर आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करना है। यह सामग्री पूरी तरह से शोधपरक और संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जो पाठकों को प्रामाणिक आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करती है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • कबीर ग्रंथावली - बाबू श्यामसुंदर दास
  • कबीर बीजक - आचार्य रामचंद्र शुक्ल की समीक्षात्मक व्याख्या
  • श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 8, श्लोक 15 (सांसारिक अनित्यता का संदर्भ)
  • भारतीय दर्शन और वैराग्य परंपरा के प्रमुख ग्रंथ

संबंधित भजन एवं लेख

यदि आप कबीरदास जी के विचारों और अन्य दिव्य स्तोत्रों के बारे में अधिक जानना चाहते हैं, तो निम्नलिखित लेखों को अवश्य पढ़ें:

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 27 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!