hari bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

जब मैं था तब हरी नहीं अब हरी है मैं नाही दोहे का अर्थ(Jab Mai Tha Tab Hari Nahi Ab Hari Hai Mai Nahi Dohe Ka Arth in Hindi)

कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे 'जब मैं था तब हरि नहीं' का सरल हिंदी अर्थ, भावार्थ और रहस्य जानें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित पढ़ें Bhaktilok पर।

सनातन धर्म की भक्ति परंपरा में निर्गुण और सगुण उपासना की अद्भुत धारा बहती है। जहाँ एक ओर तुलसीदास जी ने श्रीराम की सगुण भक्ति का अमृत बाँटा, वहीं दूसरी ओर कबीर, रैदास, नानक और मलूकदास जैसे संतों ने निर्गुण ज्ञान की गंगा बहाई। प्रस्तुत भजन "जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही" इसी निर्गुण भक्ति धारा का एक अमूल्य रत्न है, जो साधक के अहंकार के विलय और प्रभु की सर्वव्यापकता का जीवंत चित्रण करता है। यह भजन भक्ति आंदोलन के उस गहन दर्शन को उजागर करता है, जिसमें 'मैं' का अस्तित्व जब तक शेष रहता है, तब तक 'हरि' का बोध नहीं होता। जैसे ही साधक अपने अहं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है, वैसे ही उसके जीवन से अज्ञान का अंधकार मिट जाता है और ज्ञान का दीपक प्रज्वलित हो उठता है। यह भजन विशेष रूप से हरिहरन जी की मधुर वाणी में अत्यंत लोकप्रिय है और भक्ति के क्षेत्र में इसे एक कालजयी रचना माना जाता है। इसका भाव यह है कि जब तक जीव अपने अहंकार, ममता और मिथ्या अस्तित्व के बंधन में बंधा रहता है, तब तक वह परमात्मा की उपस्थिति को अनुभव नहीं कर पाता। लेकिन जैसे ही वह अपने 'मैं' को मिटाकर 'वह' (हरि) में लीन हो जाता है, उसके जीवन से सारा अंधकार दूर हो जाता है और वह परम ज्योति को प्राप्त कर लेता है। यह भजन साधक को आत्म-विसर्जन और पूर्ण शरणागति का मार्ग दिखाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।


जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं ।
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।।

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत ।
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।।

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

हरि मिलन की चाह रख, मिटा दे अपना देह ।
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।।

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।
सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मुख्य दोहा "जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही" अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य को उजागर करता है। इसका सरल अर्थ यह है कि जब तक साधक के भीतर 'मैं' अर्थात अहंकार का भाव विद्यमान था, तब तक उसे ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव नहीं हुआ। जैसे ही उसने अपने अहंकार को मिटाया और स्वयं को प्रभु के चरणों में समर्पित किया, वैसे ही उसे हरि की प्राप्ति हो गई। यहाँ 'मैं' का तात्पर्य केवल शारीरिक अस्तित्व से नहीं, बल्कि उस सूक्ष्म अहंकार से है जो जीव को परमात्मा से पृथक करता है। जब यह अहंकार नष्ट हो जाता है, तब जीव और ब्रह्म के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है और अद्वैत का अनुभव होता है।

दूसरी पंक्ति "सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही" का अर्थ है कि जैसे ही साधक को परमात्मा का दर्शन हुआ, उसके जीवन से अज्ञान का समस्त अंधकार दूर हो गया। यहाँ 'दीपक' शब्द ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार का प्रतीक है। जब मनुष्य अपने भीतर स्थित आत्मज्योति को पहचान लेता है, तब बाहरी अंधकार का कोई महत्व नहीं रह जाता। यह भजन हमें यह सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी बाहरी यात्रा की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आंतरिक शुद्धि और अहंकार के त्याग की आवश्यकता है।

भजन की अन्य पंक्तियाँ जैसे "प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं" यह बताती हैं कि प्रेम का मार्ग अत्यंत संकीर्ण है, जिसमें दो व्यक्तियों का साथ संभव नहीं है। यहाँ 'दो' का अर्थ जीव और ब्रह्म के द्वैत से है। जब तक जीव अपने अलग अस्तित्व को बनाए रखता है, तब तक वह प्रभु के प्रेम में पूर्ण रूप से लीन नहीं हो सकता। इसी प्रकार "मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" पंक्ति मन की शक्ति और उसके नियंत्रण का महत्व बताती है। जो साधक अपने मन को वश में कर लेता है, वही प्रभु को प्राप्त करता है।

यह भजन संपूर्ण शरणागति का संदेश देता है। जब जीव अपने 'मैं' को पूर्णतः विसर्जित कर देता है, तब उसका 'हरि' में विलय हो जाता है। यही भक्ति का चरम लक्ष्य है। यह भजन साधक को यह प्रेरणा देता है कि वह अपने अहंकार, ममता और मिथ्या अभिमान को त्यागकर प्रभु के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दे। तभी उसे सच्ची शांति और आनंद की प्राप्ति हो सकती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन निर्गुण भक्ति परंपरा की एक अमूल्य धरोहर है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • अहंकार का विलय: यह भजन साधक को यह सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है।
  • अद्वैत दर्शन: यह भजन अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को सरल भाषा में प्रस्तुत करता है, जहाँ जीव और ब्रह्म एक ही हैं।
  • ज्ञान का दीपक: 'दीपक देखा माही' पंक्ति आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार का प्रतीक है।
  • प्रेम की संकीर्णता: 'प्रेम गली अति साँकरी' यह बताता है कि भक्ति मार्ग में द्वैत का कोई स्थान नहीं है।
  • मन की शक्ति: 'मन के हारे हार है' पंक्ति मनोविज्ञान और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है।

इस भजन का महत्व इस बात में है कि यह साधक को आत्म-निरीक्षण और आत्म-शुद्धि की प्रेरणा देता है। यह भजन हमें यह सिखाता है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन और श्रवण किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ विशेष समय और विधि शुभ मानी जाती है:

  • प्रातःकाल: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद इस भजन का गायन करने से मन की शुद्धि होती है और दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा से होती है।
  • संध्या काल: दीप प्रज्वलित करके इस भजन का गायन करने से घर में सुख-शांति का वास होता है।
  • एकादशी एवं अन्य व्रत: व्रत के दिनों में इस भजन का श्रवण और गायन विशेष फलदायी माना जाता है।
  • सत्संग एवं भजन संध्या: सामूहिक भजन संध्या में इस भजन का गायन करने से भक्ति भाव और भी प्रबल होता है।

गायन विधि की बात करें तो इसे शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ गाया जाना चाहिए। मन को एकाग्र करके, प्रभु के चरणों में ध्यान लगाकर इस भजन का गायन करने से साधक को आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है। इस भजन को हरिहरन जी की मधुर वाणी में सुनना विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इसका अर्थ है कि जब तक साधक के भीतर अहंकार का भाव विद्यमान रहता है, तब तक उसे ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव नहीं होता। जैसे ही अहंकार का विलय होता है, प्रभु की प्राप्ति हो जाती है।

यह भजन निर्गुण भक्ति परंपरा से जुड़ा है और इसका श्रेय कबीरदास जी और अन्य संतों की परंपरा को दिया जाता है। यह भजन हरिहरन जी की वाणी में विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ है।

इसका अर्थ है कि प्रेम का मार्ग अत्यंत संकीर्ण है, जिसमें दो का साथ संभव नहीं है। यहाँ 'दो' का अर्थ जीव और ब्रह्म के द्वैत से है। जब तक द्वैत रहता है, तब तक प्रभु के प्रेम में पूर्ण विलय संभव नहीं है।

इस भजन का गायन प्रातःकाल या संध्या काल में किया जा सकता है। इसे शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ गाना चाहिए। मन को एकाग्र करके प्रभु के चरणों में ध्यान लगाकर इसका गायन करने से विशेष लाभ मिलता है।

हाँ, इस भजन का श्रवण करने से मन को गहरी शांति मिलती है। इसके बोल साधक को आत्म-चिंतन और अहंकार के त्याग की प्रेरणा देते हैं, जिससे मानसिक तनाव कम होता है और आंतरिक शांति का अनुभव होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसे भक्ति परंपरा, संत साहित्य और निर्गुण भक्ति दर्शन के संदर्भों के आधार पर तैयार किया गया है। इस भजन का मूल भाव अहंकार के विलय और प्रभु की सर्वव्यापकता पर केंद्रित है, जो भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का मूल स्तंभ है।

संदर्भ: निर्गुण भक्ति साहित्य, संत कबीर वाणी, हरिहरन भजन संग्रह, और भक्ति आंदोलन का दार्शनिक साहित्य।

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 05 Oct 2026

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