Krishna Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

होली खेल रहे बांकेबिहारी आज रंग बरस रहा लिरिक्स (Holi khel rahe baanke bihari aaj rang baras raha Lyrics in Hindi) - Krishna bhajan

ब्रज की पावन होली का आनंद लें! 'होली खेल रहे बांकेबिहारी आज रंग बरस रहा' भजन के लिरिक्स, भावार्थ और आध्यात्मिक महत्व की संदर्भ सहित व्याख्या यहाँ पढ़ें।

श्रीकृष्ण और राधा रानी के अगाध प्रेम तथा ब्रज की होली के पावन उत्सव को समर्पित होली खेल रहे बांकेबिहारी आज रंग बरस रहा भजन सनातन संस्कृति में एक अत्यंत लोकप्रिय और ऊर्जावान संकीर्तन पद है। यह भजन ब्रजमंडल की उस दिव्यता को जीवंत करता है जहाँ फाल्गुन मास के आगमन के साथ ही चराचर जगत में प्रेम, रंग और आनंद का ज्वार उमड़ पड़ता है। बांकेबिहारी लाल और वृषभाननंदिनी श्री राधा रानी के संग जब सखियों और ग्वाल-बालों के बीच होली का प्रसंग छिड़ता है, तो भक्तगण सुधि-बुधि खोकर इस आनंद सागर में गोते लगाने लगते हैं। इस विस्तृत और शास्त्रीय रूप से संवर्धित मार्गदर्शिका में हम इस पावन भजन के शब्द-दर-शब्द भावार्थ, ब्रज की होली की परंपरा, इसके आध्यात्मिक संदेश और भगवान कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम (मधुर भक्ति भाव) पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मुखड़ा:

होली खेल रहे बांकेबिहारी, आज रंग बरस रहा।
और झूम रही दुनिया सारी, आज रंग बरस रहा॥

अंतरा 1:

अबीर गुलाल के बादल छा रहे हैं।
होरी है होरी है शोर मचा रहे हैं॥
झोली भर के गुलाल कि मारी, आज रंग बरस रहा॥

अंतरा 2:

देख देख सखियन के मन हर्षा रहे।
मेरे बांके बिहारी आज प्रेम बरसा रहे॥
उनके संग में हैं राधा प्यारी, आज रंग बरस रहा॥

अंतरा 3:

आज नंदलाला ने धूम मचाई है।
प्रेम भरी होली कि झलक दिखाई है॥
रंग भर भर के मारी पिचकारी, आज रंग बरस रहा॥

अंतिम पद / समापन:

अबीर गुलाल और ठसो का रंग है।
वृंदावन बरसाने झूम रह्यो संग है॥
मैं बार-बार जाऊं बलिहारी, आज रंग बरस रहा॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल एक उत्सव का वर्णन नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। जब कवि या भक्त गाता है कि "होली खेल रहे बांकेबिहारी, आज रंग बरस रहा", तो इसका आशय उस दिव्य आनंद से है जो भगवान कृष्ण की कृपा दृष्टि से पूरे ब्रह्मांड में प्रवाहित हो रहा है। ब्रज की होली में रंगों का यह खेल भौतिक रंगों का नहीं, अपितु भगवत प्रेम के रंगों का प्रतीक है, जिसमें राग-द्वेष, जाति-पाति और अहंकार के सारे भेद मिट जाते हैं।

भजन के दूसरे चरण में जब "अबीर गुलाल के बादल छा रहे हैं" की पंक्ति आती है, तो यह उस वातावरण का सजीव चित्रण करती है जहाँ आनंद की पराकाष्ठा है। आकाश में उड़ता हुआ गुलाबी और पीला गुलाल इस बात का गवाह है कि प्रकृति भी अपने आराध्य के चरणों में आनंदित होकर उत्सव मना रही है। श्री राधा रानी और बांकेबिहारी का एक साथ होली खेलना इस बात का द्योतक है कि पुरुष और प्रकृति, जीवात्मा और परमात्मा का योग ही असली रस है। सखियों का हर्षाना और नंदलाला द्वारा पिचकारी चलाना उस वात्सल्य और सख्य भाव को दर्शाता है जो भक्त अपने इष्ट के साथ अनुभव करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस लोकप्रिय कृष्ण भजन की कई विशेषताएं हैं जो इसे हर संकीर्तन मंडली और भक्त के हृदय के निकट रखती हैं:

  • ब्रज संस्कृति का सजीव चित्रण: यह भजन बरसाना और वृंदावन की लठमार व फूलों की होली के सांस्कृतिक वैभव को जीवंत करता है।
  • मधुर भक्ति रस: इसमें दास्य या विनय भाव से परे सख्य और माधुरी भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
  • सुलभ लय और ताल: इसकी ताल इतनी संक्रामक और आनंददायक है कि बच्चे, युवा और वृद्ध सभी सहज ही झूम उठते हैं।
  • मानसिक तनाव मुक्ति: इस प्रकार के संकीर्तन के श्रवण मात्र से मन की चिंताएं और नकारात्मक विचार दूर हो जाते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि इस भजन को विशेष रूप से फाल्गुन मास, होलिका दहन और धुलंडी (रंगोत्सव) के पावन अवसरों पर मंदिरों और घरों में अत्यधिक उत्साह के साथ गाया जाता है, तथापि इसे वर्ष के किसी भी समय भगवान श्री बांकेबिहारी के स्मरण के लिए गाया जा सकता है।

  • उत्सव के अवसर: होली, राधाष्टमी, जन्माष्टमी और एकादशी के जागरण या संकीर्तन में इसे मुख्य रूप से गाया जाता है।
  • दैनिक पूजा: संध्या कालीन आरती या भोग के पश्चात यदि इसे प्रेम भाव से गाया जाए, तो घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक हो जाता है।
  • विधि: ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की संगत के साथ ताली बजाते हुए सामूहिक रूप से इस भजन का संकीर्तन करने से विशेष मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र बिंदु आराध्य देव श्री बांकेबिहारी (भगवान श्री कृष्ण) और स्वरूपा शक्ति श्री राधा रानी हैं। बांकेबिहारी जी का मूल धाम उत्तर प्रदेश का वृंदावन धाम है, जहाँ उनकी त्रिभंग मुद्रा वाली अलौकिक छवि के दर्शन मात्र से भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। ब्रज क्षेत्र के संत और महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु, स्वामी हरिदास जी जैसे महान आचार्यों ने इसी माधुरी भक्ति की धारा को संपूर्ण विश्व में प्रवाहित किया है, जिसके प्रभावस्वरूप आज भी हर भक्त की जुबान पर ऐसे पावन भजन स्वतः आ जाते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

पारंपरिक ब्रज भाषा और संकीर्तन परंपरा से उपजे यह पद पीढ़ियों से संतों, कीर्तनाचार्यों और लोक कलाकारों द्वारा गाए जाते रहे हैं। इनका कोई एक निश्चित रचयिता ज्ञात नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि यह लोकमानस के हृदय से स्वतःस्फूर्त भावों की अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट हुए हैं। ब्रज के मंदिरों में समाज गायन की जो प्राचीन परंपरा रही है, उसी का एक परिष्कृत और लोकप्रिय रूप यह भजन है, जो आज हर घर में गूंजता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, मधुर और प्रवाहमयी ब्रजभाषा मिश्रित हिंदी है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है जैसे 'अबीर गुलाल के बादल'। ब्रज संस्कृति के शब्दों का प्रयोग इस रचना को और अधिक प्रामाणिक बनाता है। यह काव्य शैली श्रोता को सीधे वृंदावन की कुंज-गलियों और निधिवन के प्रांगण में पहुँचा देती है, जहाँ का कण-कण 'राधे-कृष्ण' के नाम से गुंजायमान रहता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

संतों और दार्शनिकों के अनुसार, यह भजन हमें यह सिखाता है कि जीवन मूल रूप से एक उत्सव है जिसे प्रेम और सद्भाव के साथ जीना चाहिए। जिस प्रकार होली में सभी रंग मिलकर एक नया और सुंदर रंग बनाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी समाज के सभी भेदों को भुलाकर प्रेम के रंग में रंग जाना चाहिए। भगवान कृष्ण के संग होली खेलने का अर्थ है अपने अहंकार का त्याग कर भगवत चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
बांकेबिहारी तीन जगह से मुड़े हुए सुंदर स्वरूप वाले भगवान कृष्ण वृंदावन के मुख्य आराध्य जिनका त्रिभंग रूप प्रसिद्ध है।
अबीर गुलाल सुगंधित रंगीन पाउडर उत्सव, प्रसन्नता और प्रेम के आदान-प्रदान का प्रतीक।
बलिहारी न्योछावर होना, समर्पण इष्टदेव के प्रति अगाध प्रेम और पूर्ण शरणागति का भाव।
ठसो का रंग पक्के और गाढ़े रंग प्रेम का वह रंग जो आसानी से उतरे नहीं, अनन्य भक्ति।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

इस भजन के प्रत्येक चरण का गहराार्णव भाव है। जब हम गाते हैं कि "होली खेल रहे बांकेबिहारी, आज रंग बरस रहा", तो इसका अर्थ है कि साक्षात परब्रह्म भक्तों के साथ सखा भाव से आनंदित हो रहे हैं। "अबीर गुलाल के बादल छा रहे हैं" यह दृश्य ब्रज की उन गलियों का स्मरण कराता है जहाँ गुलाल के उड़ने से आसमान भी रंगीन हो जाता है। "उनके संग में हैं राधा प्यारी" यह दर्शाता है कि कृष्ण की उपासना बिना शक्ति (राधा) के अधूरी है। अंत में "मैं बार-बार जाऊं बलिहारी" भक्त की उस कृतज्ञता को प्रकट करता है जो भगवान के इस अलौकिक दर्शन पाकर धन्य हो जाता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस पावन भजन के स्मरण के साथ निम्नलिखित महामंत्र का जाप करने से आध्यात्मिक फल की प्राप्ति होती है:

॥ श्री राधा वल्लभ लाल की जय ॥

"हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥"

तथा ब्रज की वंदना का यह प्रसिद्ध श्लोक भी स्मरण किया जाता है:

"वृंदावनेश्वरी राधिका, कृष्णकांत प्रिया वरा। सर्वसौख्यप्रदात्री च, वंदये तां निरंतरम्॥"

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम होली खेल रहे बांकेबिहारी आज रंग बरस रहा लिरिक्स
आराध्य देवी-देवता श्री राधा कृष्ण / बांकेबिहारी लाल
संगीत शैली / परंपरा ब्रज संकीर्तन / लोक भक्ति संगीत
भाषा ब्रजभाषा मिश्रित हिंदी
मुख्य भाव (Bhava) माधुरी भक्ति, सख्य भाव, उत्सव और उल्लास
प्रमुख अवसर फाल्गुन मास, होली, और राधा कृष्ण सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से फाल्गुन मास, होली के त्योहार, और राधा-कृष्ण के संकीर्तन उत्सवों पर अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ गाया जाता है।

श्री बांकेबिहारी जी का विश्व प्रसिद्ध मुख्य मंदिर उत्तर प्रदेश के पावन तीर्थ स्थल वृंदावन धाम में स्थित है।

इस भजन के संकीर्तन से मन को असीम शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान श्री कृष्ण के प्रति प्रेम व भक्ति भाव की प्राप्ति होती है।

हाँ, इस भजन को आप अपने घर की दैनिक पूजा, आरती अथवा किसी भी पारिवारिक सत्संग के दौरान आसानी से गा सकते हैं।

ब्रज की होली द्वापर युग से चली आ रही लीलाओं की पुनरावृत्ति है, जहाँ भगवान कृष्ण और राधा रानी ने स्वयं प्रेम और रंगों के इस उत्सव की शुरुआत की थी।

'बांके' का अर्थ है तीन जगह से टेढ़े (त्रिभंग मुद्रा) और 'बिहारी' का अर्थ है विहार करने वाले, अर्थात वृंदावन में आनंद से विचरने वाले भगवान कृष्ण।

इस भजन के साथ ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम और झांझ का उपयोग करने से इसकी लय और भी अधिक आकर्षक हो जाती है।

हाँ, भक्तिलोक पर आपको श्री कृष्ण, श्री राधा रानी, हनुमान जी और अन्य देवी-देवताओं के सैकड़ों लोकप्रिय भजन, चालीसा और स्तोत्र शुद्ध लिरिक्स के साथ मिलेंगे।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिलok पर प्रकाशित यह सामग्री सनातन धर्म की पारंपरिक संकीर्तन शैली, ब्रज संस्कृति के लोक साहित्य और प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन पर आधारित है। पाठकों की शुचिता और भक्ति भाव को ध्यान में रखते हुए इसे संपादकीय रूप से तैयार किया गया है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण - १०वां स्कंध (रास लीला एवं ब्रज प्रसंग)
  • ब्रज के सांस्कृतिक उत्सव एवं लोकगीत परंपरा
  • भक्तमाल एवं प्राचीन संत वाणी संकलन
  • पारंपरिक संकीर्तन एवं भजन संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

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संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 09 Oct 2026

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