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डम डम डमरू बजाये शिव शंकर लिरिक्स (Dam Dam Damru Bajaye Shiv Shankar Lyrics in Hindi) - by Hari Om Sharan Nandini Sharan

भजन "डम डम डमरू बजाये शिव शंकर लिरिक्स (Dam Dam Damru Bajaye Shiv Shankar Lyrics in Hindi) - by Hari Om Sharan Nandini Sharan" के हिन्दी लिरिक्स, विस्तृत अर्थ, और पौराणिक महत्त्व। यह भजन शिव के महान नाद और डमरू की दिव्य ध्वनि का वर्णन करता है जो सृष्टि का आधार है। 'डम ड

प्रस्तावना एवं परिचय

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
डम डम डमरू बजाये शिव शंकर
डम डम डमरू बजाये शिव शंकर
नाचत हैं देवता गण सब मिलकर

डम डम डमरू बजाये शिव शंकर
त्रिनेत्र महादेव की महिमा अपार
चाँद सीस पर शोभा विलक्षण प्रार
गंगा जटाओं में बहती निरंतर

डम डम डमरू बजाये शिव शंकर
भोलेनाथ की मूर्ति दिव्य अनंत
सर्प फणा फैलाये हर्ष वाहक संत
ज्ञान का प्रकाश फैलाये सब तरफ

डम डम डमरू बजाये शिव शंकर
योगियों का आराध्य परमेश्वर शिव
दिव्य नृत्य करते तांडव सजीव
सृष्टि का संहार करते निर्भय

डम डम डमरू बजाये शिव शंकर
पार्वती प्रिय शंकर भोलेनाथ
दास की पुकार सुनो भगवान साथ
मन की शुद्धि करो हे महादेव

डम डम डमरू बजाये शिव शंकर
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ यह भजन शिव के महान नाद और डमरू की दिव्य ध्वनि का वर्णन करता है जो सृष्टि का आधार है। 'डम डम डमरू बजाये' पंक्ति शिव के ब्रह्मांडीय नृत्य तांडव का प्रतीक है, जहाँ डमरू की प्रत्येक आवाज़ ब्रह्मांड की रचना, पालन और संहार का संकेत देती है। भजन में देवता गणों का नृत्य, त्रिनेत्र महादेव की महिमा, और उनके सिर पर चाँद की शोभा का वर्णन किया गया है। गंगा जटाओं में बहती हुई शाश्वत प्रवाह का चित्रण शिव की अनंत कृपा को दर्शाता है। यह भजन भक्त को शिव के सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान रूप का ध्यान करने के लिए प्रेरित करता है और उन्हें साक्षात् दर्शन का अनुभव कराता है।
इस भजन का भावार्थ गहरा और रहस्यमय है। डमरू की आवाज़ 'डम डम' शब्द ही नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल मंत्र हैं जो समस्त ब्रह्मांड को गतिशील रखते हैं। शिव का तांडव नृत्य केवल एक दैवीय कार्यक्रम नहीं है, बल्कि समय के चक्र, कर्म के नियम और मोक्ष के मार्ग का प्रतीक है। जब भक्त इस डमरू की आवाज़ को सुनता है, तो उसका हृदय प्रेम और भक्ति से भर जाता है। देवताओं का नृत्य करना दर्शाता है कि संपूर्ण देवलोक भी शिव की लीला में मुग्ध है। यह भजन भक्त को यह संदेश देता है कि शिव केवल पूजनीय नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक आत्मा में वास करते हैं और अपनी दिव्य लीला का अभिनय करते हैं।

इस भजन का दार्शनिक मूल शैव दर्शन और अद्वैत वेदांत में निहित है। शिव को परमेश्वर, परमब्रह्म और निराकार सत्ता का प्रतीक माना गया है। डमरू शब्द और ध्वनि का स्रोत है, जो शब्द ब्रह्म की अवधारणा को दर्शाता है। भोलेनाथ की उपाधि उनकी सरलता, निरपेक्षता और समस्त भय से मुक्ति का प्रतीक है। योगियों का आराध्य होने के कारण, शिव समस्त आध्यात्मिक साधना के लक्ष्य हैं। भक्ति मार्ग के माध्यम से, साधक शिव के समीप पहुँचता है और अपने आत्मा को परमात्मा से एकीभूत करता है। यह भजन सिद्ध करता है कि ईश्वर अनंत करुणा, ज्ञान और शक्ति का भंडार है।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ शिव का डमरू हिंदू धर्मग्रंथों में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीक है। शिव पुराण और लिंग पुराण में वर्णित है कि शिव के डमरू से ही नाद और संगीत की उत्पत्ति हुई। महाभारत में भी शिव की योगशक्ति और उनके दिव्य नृत्य का वर्णन मिलता है। डमरू की ध्वनि 'डमरु-ध्वनि' कहलाती है, जो संस्कृत व्याकरण के 14 सूत्रों का आधार है, जिसे पाणिनि द्वारा रचित माना गया है। रुद्र यमल तंत्र में शिव के 64 योगिनियों का वर्णन है जो डमरू की ध्वनि से ही सृष्टि करती हैं। शिव को अर्धनारीश्वर, महायोगी, नटराज और महाकाल सभी रूपों में पूजा जाता है। यह भजन उन सभी पहलुओं को समन्वित करता है और भक्त को शिव की सर्वव्यापिता का बोध कराता है।
भगवान शिव की महिमा, लिंगोत्पत्ति और पवित्र तीर्थों के विवरण के लिए शिव पुराण का संपूर्ण अध्ययन करें। इस भजन का नियमित जाप और सुनना मानसिक शांति, आंतरिक प्रकाश और आध्यात्मिक विकास लाता है। डमरू की ध्वनि तरंगें शरीर के सात चक्रों को सक्रिय करती हैं और कुंडलिनी जागरण में सहायक होती हैं। भजन गायन से नकारात्मक विचार दूर होते हैं और मन में भक्ति भाव जागता है। शारीरिक स्तर पर यह ध्यान और सांस पर नियंत्रण प्रदान करता है। नियमित चिंतन से भय, चिंता और अहंकार का नाश होता है। आध्यात्मिक लाभ के रूप में यह मोक्ष मार्ग का द्वार खोलता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि इस भजन का जाप प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में (सूर्योदय से एक घंटा पहले) सबसे अधिक प्रभावकारी है। पवित्र स्नान के बाद, शिव के समक्ष दीप जलाएं और धूप-अगरबत्ती का प्रयोग करें। बैठते समय सिद्धासन या पद्मासन में बैठें, रीढ़ सीधी रखें। माला पकड़कर 108 बार भजन का जाप करें। मन को शिव के नीले रूप पर केंद्रित करें। शाम को भी इसका गायन कर सकते हैं। शिव को दूध, बेल पत्र और फूलों का अर्पण करें। भजन गाते समय भक्ति भाव में पूरी तरह रमे रहें।

�� अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) डमरू क्या है और शिव के साथ इसका संबंध क्या है?डमरू एक ढोल जैसा वाद्य यंत्र है जो शिव का प्रिय और अभिन्न अंग माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार, शिव के डमरू से ही संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना हुई और सभी मंत्रों की उत्पत्ति हुई। इसकी ध्वनि ही शब्द ब्रह्म है जो समस्त सृष्टि को संचालित करती है।
शिव के डमरू की ध्वनि का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?डमरू की 'डम-डम' ध्वनि कार्य और कारण, सृष्टि और संहार, जन्म और मृत्यु के द्वंद्व का प्रतीक है। यह नाद ब्रह्मांडीय चेतना की धड़कन है जो समय को गति देती है। शास्त्रों में कहा गया है कि इसी ध्वनि से संस्कृत के 14 सूत्र बने हैं जो सभी भाषाओं का आधार हैं।
इस भजन को गाने से क्या लाभ मिलते हैं?इस भजन को नियमित गाने से मन की शांति, आंतरिक शक्ति का विकास, और आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह कुंडलिनी जागरण में सहायक है, नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है, और शिव से सीधा आध्यात्मिक संबंध स्थापित करता है। नियमित चिंतन से मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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