भवान्यष्टकस्तोत्रम् (Bhavanyashtakam Stotram) आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत पावन, करुणामयी और हृदयस्पर्शी स्तोत्र है। यह स्तोत्र माँ जगदम्बा भवानी के प्रति पूर्ण शरणागति (Surrender) का अनुपम प्रतीक है। जब मनुष्य संसार के समस्त सांसारिक बंधनों, संबंधों, विद्या, बुद्धि और अहंकार से थककर स्वयं को असहाय पाता है, तब माँ भवानी की शरण ही उसका एकमात्र संबल बनती है। इस स्तोत्र की प्रत्येक पंक्ति में भक्त की दीनता और माँ की असीम करुणा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। सनातन धर्म में इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से साधक के अंतःकरण की शुद्धि होती है, भय का नाश होता है और परम शांति की प्राप्ति होती है। प्रस्तुत लेख में हम भवान्यष्टकम् के मूल संस्कृत श्लोक, उनके शुद्ध उच्चारण, पदच्छेद, अन्वय, विस्तृत शब्दार्थ, सरल हिंदी भावार्थ, दार्शनिक महत्व और साधना विधि का सविस्तार वर्णन कर रहे हैं।
मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ
॥ भवान्यष्टकस्तोत्रम् ॥
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ १ ॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरु
पपात प्रकामं प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ २ ॥
न जानामि दानं न च ध्यानयोगं
न जानामि तन्त्रं न च स्तोत्रमन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ३ ॥
न जानामि पुण्यं न जानामि तीर्थं
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्तिं व्रतं वापि मात-
र्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ४ ॥
कुकर्मी कुसङ्गी कुबुद्धिः कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबन्धः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ५ ॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चान्यत् सदाहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ६ ॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ७ ॥
अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥ ८ ॥
श्लोक का उच्चारण एवं पदच्छेद | Pronunciation & Padaccheda
संस्कृत श्लोकों के शुद्ध उच्चारण से ही उनका पूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। भवान्यष्टकम् के कठिन शब्दों का पदच्छेद और उच्चारण निर्देश नीचे दिए गए हैं:
- बन्धुर्न दाता: बन्धुः + न + दाता (Bandhuh Na Daataa)
- वृत्तिर्ममैव: वृत्तिः + मम + एव (Vrittih Mama Eva)
- भवाब्धावपारे: भव + अब्धौ + अपारे (Bhava-Abdhau-Apaare) - अर्थात संसार रूपी अपार समुद्र में।
- कुसंसारपाशप्रबद्धः: कुसंसार + पाश + प्रबद्धः (Kusansaara-Paasha-Prabaddhah)
- निशीथेश्वरं: निशीथ + ईश्वरम् (Nisheetheshwaram) - अर्थात रात्रि के स्वामी (चंद्रमा)।
- जले चानले: जले + च + अनले (Jale Cha Anale) - जल और अग्नि में।
- जरारोगयुक्तो: जरा + रोग + युक्तः (Jaraa-Roga-Yuktah) - बुढ़ापे और रोगों से ग्रस्त।
पदच्छेद एवं अन्वय | Padaccheda & Anvaya
अन्वय का अर्थ है श्लोक के शब्दों को गद्य के रूप में व्यवस्थित करना ताकि उसका अर्थ आसानी से समझ में आ सके।
प्रथम श्लोक का अन्वय: मम न तातः, न माता, न बन्धुः, न दाता, न पुत्रः, न पुत्री, न भृत्यः, न भर्ता, न जाया, न विद्या, न वृत्तिः एव अस्ति। हे भवानि! त्वम् एका एव मम गतिः असि, त्वम् एका एव मम गतिः असि।
सप्तम श्लोक का अन्वय: हे शरण्ये! विवादे, विषादे, प्रमादे, प्रवासे, जले, अनले, पर्वते, शत्रुमध्ये, अरण्ये च सदा मां प्रपाहि। हे भवानि! त्वम् एका एव मम गतिः असि।
विस्तृत शब्दार्थ | Word-by-word Meaning
| संस्कृत शब्द | पदच्छेद | सरल हिंदी मीनिंग | संदर्भगत अर्थ (Contextual Meaning) |
|---|---|---|---|
| तातः | तातः | पिता | सांसारिक जन्मदाता |
| जाया | जाया | पत्नी | गृहस्थ जीवन की संगिनी |
| वृत्तिः | वृत्तिः | आजीविका / रोजगार | जीवन यापन का साधन |
| भवाब्धौ | भव + अब्धौ | संसार रूपी सागर में | जन्म-मरण का चक्र |
| प्रमत्तः | प्रमत्तः | मदहोश / असावधान | माया के वशीभूत जीव |
| न्यासयोगं | न्यास + योगम् | न्यास विधि | शरीर के अंगों में मंत्रों की स्थापना |
| शरण्ये | शरण्ये | शरण देने वाली | माँ भवानी का एक नाम |
| प्रपाहि | प्र + पाहि | रक्षा करो | पूर्ण सुरक्षा की प्रार्थना |
| जाड्यवक्त्रः | जाड्य + वक्त्रः | मूर्खतापूर्ण मुख वाला | वाणी और बुद्धि की जड़ता से युक्त |
सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या | Hindi Meaning & Explanation
आदि गुरु शंकराचार्य जी ने इस स्तोत्र में मानव जीवन की परम सत्यता को उजागर किया है। यहाँ प्रत्येक श्लोक का विस्तृत भावार्थ प्रस्तुत है:
श्लोक १: सांसारिक संबंधों की निःसारता
भावार्थ: हे माँ! न मेरे पिता हैं, न माता, न भाई, न दाता (दाता/मित्र), न पुत्र, न पुत्री, न सेवक और न स्वामी। न मेरी पत्नी है, न मेरे पास विद्या है और न ही कोई आजीविका है। हे भवानी! अब केवल आप ही मेरी गति हैं, आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं।
व्याख्या: इस श्लोक में शंकराचार्य जी कहते हैं कि मृत्यु के समय या जीवन के अंतिम सत्य के सम्मुख कोई भी सांसारिक संबंध काम नहीं आता। केवल ईश्वर ही जीव का सच्चा संबंधी है।
श्लोक २: संसार चक्र की विभीषिका
भावार्थ: मैं इस अपार संसार-सागर में गिरा हुआ हूँ, जहाँ महादुखों से भयभीत रहने वाला मैं अत्यंत लोभी, मतवाला और बुरे संसार के बंधनों में बंधा हुआ हूँ। हे भवानी! मेरी रक्षा करें, केवल आप ही मेरी गति हैं।
श्लोक ३: साधना विहीनता का स्वीकार
भावार्थ: हे माँ! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न ही ध्यान मार्ग। न मुझे तंत्र का ज्ञान है और न ही स्तोत्र या मंत्रों का। मैं न तो पूजा की विधि जानता हूँ और न ही न्यास योग। हे भवानी! आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं।
श्लोक ४: धार्मिक कर्मकांडों से अनभिज्ञता
भावार्थ: मैं न तो पुण्य जानता हूँ, न तीर्थ यात्रा, न मुक्ति का मार्ग और न ही परमात्मा में लय होना। हे माता! मैं न तो भक्ति जानता हूँ और न ही कोई व्रत। हे भवानी! मेरी रक्षा करें, आप ही मेरी गति हैं।
श्लोक ५: अपनी दुर्बलताओं का प्राकट्य
भावार्थ: मैं कुकर्मी (बुरे कर्म करने वाला), कुसंगी (बुरे लोगों के साथ रहने वाला), कुबुद्धि (बुरी बुद्धि वाला), कुदास (माया का दास), कुलाचारहीन (कुल की मर्यादाओं को छोड़ने वाला), कदाचारलीन (बुरे आचरण में डूबा रहने वाला), कुदृष्टि (बुरी नजर रखने वाला) और सदा कटु वचन बोलने वाला हूँ। हे भवानी! मुझ जैसे पापी की केवल आप ही गति हैं।
श्लोक ६: देवताओं की असमर्थता और अनन्य निष्ठा
भावार्थ: मैं ब्रह्मा (प्रजेश), विष्णु (रमेश), शिव (महेश), इंद्र (सुरेश), सूर्य (दिनेश) या चंद्रमा (निशीथेश्वर) की आराधना करना नहीं जानता। हे शरण देने वाली माँ! मैं इनके अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं जानता। मेरी गति केवल आप ही हैं।
श्लोक ७: हर परिस्थिति में रक्षा की पुकार
भावार्थ: हे शरण्ये! विवाद में, दुःख में, प्रमाद (असावधानी) में, परदेश में, जल में, अग्नि में, पर्वतों पर, शत्रुओं के बीच और भयानक जंगल में सदा मेरी रक्षा करें। हे भवानी! आप ही मेरी एकमात्र गति हैं।
श्लोक ८: पूर्ण आत्मसमर्पण
भावार्थ: मैं अनाथ हूँ, दरिद्र हूँ, बुढ़ापे और रोगों से ग्रस्त हूँ, अत्यंत दुर्बल और दीन हूँ, मेरे मुख पर सदा जड़ता छाई रहती है, मैं विपत्तियों से घिरा हुआ हूँ और नष्ट हो चुका हूँ। हे भवानी! अब केवल आप ही मेरी गति हैं, आप ही मेरी शरण हैं।
श्लोक का मुख्य भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Core Bhava & Spiritual Message
भवान्यष्टकम् का मुख्य भाव 'शरणागति' (Sharanagati) और 'दैन्य भाव' (Humility) है। भक्ति मार्ग में जब तक साधक के भीतर अपने ज्ञान, धन, कुल या शक्ति का थोड़ा भी अहंकार रहता है, तब तक उसे ईश्वर की पूर्ण कृपा प्राप्त नहीं होती। जब साधक यह स्वीकार कर लेता है कि वह अत्यंत निर्बल, साधनहीन और असहाय है, तब माँ भवानी की असीम करुणा जागृत होती है।
यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि सांसारिक संबंध क्षणभंगुर हैं। जीवन के वास्तविक संकटों में केवल भगवती की शक्ति ही हमारी रक्षा कर सकती है। यह स्तोत्र अद्वैत वेदांत के इस सिद्धांत को भी दर्शाता है कि संसार मिथ्या है और केवल माँ भवानी (आद्या शक्ति) ही एकमात्र सत्य हैं।
शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ | Scriptural & Mythological Context
भवान्यष्टकस्तोत्रम् की रचना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब शंकराचार्य जी भारतवर्ष की यात्रा पर थे और उन्होंने संसार के जीवों को माया के जाल में फंसा हुआ देखा, तब उनके हृदय में करुणा का संचार हुआ। उन्होंने जीवों के कल्याण के लिए इस अत्यंत सरल और प्रभावशाली स्तोत्र की रचना की।
यह स्तोत्र देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के सिद्धांतों से मेल खाता है। इसमें माँ भवानी को 'शरण्ये' कहा गया है, जिसका अर्थ है जो शरण में आए हुए पापी से पापी जीव को भी अभय दान दे देती हैं। जैसे माँ अपने अबोध बालक के अपराधों को क्षमा कर उसे गले लगा लेती है, वैसे ही माँ भवानी भी अपने शरणागत भक्त का उद्धार करती हैं।
दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance
भवान्यष्टकम् केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह अद्वैत दर्शन का एक व्यावहारिक रूप है।
- माया का खंडन: श्लोक १ में माता, पिता, पुत्र आदि संबंधों को 'न' (नहीं) कहकर नकारा गया है। यह उपनिषदों के 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, वह भी नहीं) सिद्धांत का प्रतीक है।
- अहंकार का विसर्जन: जब साधक कहता है कि "न जानामि दानं न च ध्यानयोगं", तो वह अपने धार्मिक अहंकार को विसर्जित कर देता है।
- मुक्ति की अभिलाषा: संसार को "भवाब्धावपारे" (अपार भवसागर) कहकर मोक्ष की तीव्र इच्छा प्रकट की गई है।
दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं सीख | Daily Life Lessons
यद्यपि यह एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक स्तोत्र है, परंतु आधुनिक जीवन में भी इसकी अत्यधिक प्रासंगिकता है:
- मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति: जब व्यक्ति अत्यधिक तनाव या अवसाद (Depression) में हो, तो श्लोक ७ का पाठ करने से मन को असीम बल और सुरक्षा का अनुभव होता है।
- अहंकार का शमन: यह स्तोत्र हमें विनम्र बनना सिखाता है। विनम्रता ही सफलता की पहली सीढ़ी है।
- कठिन परिस्थितियों में संबल: यात्रा के दौरान, बीमारी में या किसी बड़े संकट के समय इस स्तोत्र का मानसिक जप करने से भय का नाश होता है।
साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त | Sadhana & Recitation Vidhi
भवान्यष्टकम् का पाठ करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना अत्यंत फलदायी माना जाता है:
- शुभ मुहूर्त: इसका पाठ प्रतिदिन प्रातः काल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या काल में करना सर्वोत्तम है। नवरात्रि के पावन दिनों में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
- आसन और दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
- पूजन विधि: माँ दुर्गा या भवानी की प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें। माँ को लाल पुष्प अर्पित करें।
- पाठ संख्या: नित्य कम से कम १ या ३ बार इसका पाठ करें। संकट के समय १०८ बार पाठ करने का विधान है।
Quick Information Table
| स्तोत्र का नाम | भवान्यष्टकस्तोत्रम् (Bhavanyashtakam Stotram) |
|---|---|
| आराध्य देवी | माँ भवानी (आद्या शक्ति जगदम्बा) |
| रचयिता | आदि गुरु शंकराचार्य |
| भाषा | संस्कृत (Sanskrit) |
| मुख्य छंद | भुजंगप्रयात छंद (Bhujangaprayata Chhanda) |
| मुख्य रस / भाव | करुण रस, भक्ति रस, शरणागति भाव |
| उपयुक्त अवसर | नित्य पूजा, नवरात्रि, संकट काल, मानसिक अशांति के समय |
मुख्य सीख | Key Takeaways
- संसार के सभी संबंध नश्वर हैं, केवल परमात्मा के साथ संबंध ही शाश्वत है।
- ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण (Surrender) ही मोक्ष का सबसे सरल मार्ग है।
- अपनी कमियों और पापों को स्वीकार करना ही वास्तविक प्रायश्चित है।
- माँ भवानी की शरण में जाने वाले भक्त को किसी भी प्रकार का सांसारिक भय नहीं रहता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों और आदि गुरु शंकराचार्य जी की रचनाओं के आधार पर तैयार किया गया है। पाठकों की सुविधा के लिए संस्कृत श्लोकों का शुद्ध रूप और उनका सरल हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। यह सामग्री पूर्णतः संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसका उद्देश्य सनातन संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- आदि शंकराचार्य ग्रन्थावली (Adi Shankaracharya Granthavali)
- देवी भागवत पुराण (Devi Bhagavata Purana)
- दुर्गा सप्तशती - गीता प्रेस गोरखपुर (Durga Saptashati - Gita Press Gorakhpur)
संबंधित लेख
माँ दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं के पावन स्तोत्रों के लिए नीचे दिए गए लेखों को अवश्य पढ़ें:
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें