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माँ तू मेरी प्यारी माँ माँ तू जग से न्यारी माँ लिरिक्स (Maa Tu Meri Pyari Maa Maa Tu Jag Se Nyari Maa Lyrics in Hindi) - Naveen Acharya Mata Bhajan

माँ तू मेरी प्यारी माँ माँ तू जग से न्यारी माँ भजन लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। नवीन आचार्य द्वारा गाये इस माता भजन के बोल, अर्थ और भावार्थ देखें | Bhaktilok

"माँ तू मेरी प्यारी माँ, माँ तू जग से न्यारी माँ" यह भजन मातृभक्ति और ईश्वर-प्रेम का अद्वितीय संगम है। इस पावन रचना में साधक अपनी जननी तथा जगत-जननी दोनों के चरणों में स्वयं को पूर्णतः समर्पित करता है। नवीन आचार्य द्वारा गाया गया यह माता भजन भक्ति-रस से ओतप्रोत है और श्रोता के अंतर्मन को ममता, करुणा एवं शरणागति के भाव से भर देता है। सनातन परंपरा में माता को प्रथम गुरु, प्रथम देवता और मोक्ष की द्वारपालिनी कहा गया है। जहाँ पुत्र का हृदय माँ के चरणों में झुकता है, वहीं जीवात्मा परमात्मा की शरण में पहुँच जाता है। यह भजन उसी भाव-यात्रा का मधुर स्वरूप है, जो भय, शोक और संसार-बंधन को क्षण भर में हर लेता है। भक्ति-साहित्य में मातृ-भजनों का विशेष स्थान है, क्योंकि माँ का प्रेम निःस्वार्थ, निर्विकार और अनंत होता है। यही प्रेम ईश्वर-प्रेम का सर्वोत्तम प्रतीक माना गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीव की अपनी मूल सत्ता से मिलन की तड़प, आत्म-समर्पण की सहजता और करुणा की अविरल धारा प्रवाहित होती है। भक्ति-मार्ग के साधक इस गीत को नित्य स्मरण कर अपने जीवन को पवित्र, शांत और आनंदमय बना सकते हैं।

मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ

माँ तू मेरी प्यारी माँ, माँ तू जग से न्यारी माँ।
तेरे चरणों में आया हूँ, मुझको अपना ले माँ।।
दुःख हर ले मेरा मैया, सुख का दान करे माँ।
तेरी ममता की छाया में, जीवन सफल करे माँ।।
तू ही जग की पालनहारी, तू ही भव-तारिणी माँ।
तेरे नाम की महिमा न्यारी, तू ही दुःख-नाशिनी माँ।।
शरण तिहारी आया हूँ, चरणों में सर रख दूँ माँ।
भव-सागर से पार लगा दे, अपना वरदान दे माँ।।

पदच्छेद एवं अन्वय

इस पावन भजन का पदच्छेद एवं अन्वय इस प्रकार है —

पदच्छेद: माँ / तू / मेरी / प्यारी / माँ / माँ / तू / जग / से / न्यारी / माँ। तेरे / चरणों / में / आया / हूँ / मुझको / अपना / ले / माँ।। दुःख / हर / ले / मेरा / मैया / सुख / का / दान / करे / माँ। तेरी / ममता / की / छाया / में / जीवन / सफल / करे / माँ।। तू / ही / जग / की / पालनहारी / तू / ही / भव-तारिणी / माँ। तेरे / नाम / की / महिमा / न्यारी / तू / ही / दुःख-नाशिनी / माँ।। शरण / तिहारी / आया / हूँ / चरणों / में / सर / रख / दूँ / माँ। भव-सागर / से / पार / लगा / दे / अपना / वरदान / दे / माँ।।

अन्वय: हे माँ, तू मेरी प्यारी माँ है और तू जग से न्यारी अर्थात् संसार से परे एवं अनुपम है। हे माँ, मैं तेरे चरणों में आया हूँ, अतः मुझको अपना ले। हे मैया, तू मेरा दुःख हर ले और सुख का दान कर। तेरी ममता की छाया में मेरा जीवन सफल हो। तू ही जग की पालनहारी है, तू ही भव-सागर से तारने वाली है। तेरे नाम की महिमा अत्यंत न्यारी है, तू ही दुःखों की नाशिनी है। मैं तेरी शरण में आया हूँ, तेरे चरणों में अपना सिर रख देता हूँ। मुझे भव-सागर से पार लगा दे और अपना वरदान दे।

विस्तृत शब्दार्थ

शब्द अर्थ
माँजननी, माता, जगत-जननी
तूतुम, सम्बोधन का सर्वनाम
मेरीमुझसे सम्बंधित, मेरी अपनी
प्यारीप्रिय, स्नेहमयी, वात्सल्यमूर्ति
जगसंसार, लोक, भव-सागर
सेअपेक्षया, की तुलना में
न्यारीअनुपम, विलक्षण, परे, अद्वितीय
तेरेतुम्हारे, तुमसे सम्बंधित
चरणोंपैरों, श्रीचरणों, आश्रय-स्थल
मेंअंदर, भीतर, स्थिति-सूचक
आया हूँउपस्थित हुआ हूँ, शरण में पहुँचा हूँ
मुझकोमुझे, स्वयं को
अपनास्वीय, निजी, सम्बन्धित
लेस्वीकार कर, ग्रहण कर
दुःखकष्ट, पीड़ा, संताप
हरदूर कर, नष्ट कर
मैयामाँ का स्नेहिल सम्बोधन
सुखआनंद, शांति, सुख-समृद्धि
दानप्रदान, अर्पण, कृपा
ममतावात्सल्य, स्नेह, मोह-रहित प्रेम
छायाआश्रय, संरक्षण, शीतलता
जीवनप्राण-यात्रा, जीवन-काल
सफलकृतार्थ, सार्थक, पूर्ण
पालनहारीपालने वाली, रक्षा करने वाली
भव-तारिणीसंसार-सागर से तारने वाली
नामनाम-संकीर्तन, कीर्ति, स्मरण
महिमागौरव, प्रभाव, शक्ति
दुःख-नाशिनीदुःखों का नाश करने वाली
शरणआश्रय, रक्षा, समर्पण
तिहारीतुम्हारी (लोक-भाषा में)
सरसिर, मस्तक, अहं-त्याग का प्रतीक
भव-सागरसंसार-रूपी समुद्र, जन्म-मरण का चक्र
पारउस पार, मुक्ति, किनारा
वरदानआशीर्वाद, कृपा-प्रसाद

सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या

यह भजन भक्त और भगवान के बीच उसी सहज, निश्छल और गहन सम्बन्ध को प्रकट करता है, जो माँ और संतान के बीच होता है। भक्त जब "माँ तू मेरी प्यारी माँ" कहता है, तब वह केवल शारीरिक जननी की ओर संकेत नहीं कर रहा, अपितु उस परम-सत्ता की ओर देख रहा है जो समस्त चराचर की जननी है। "जग से न्यारी" कहकर भक्त यह स्वीकार करता है कि माँ का स्वरूप संसार की समस्त वस्तुओं से विलक्षण, अद्वितीय और परे है। संसार के सम्बन्ध स्वार्थ, अपेक्षा और बदलाव से बंधे होते हैं, किंतु माँ का प्रेम निरपेक्ष, अटल और शाश्वत होता है। यही प्रेम ईश्वर-प्रेम का प्रतीक है।

"तेरे चरणों में आया हूँ, मुझको अपना ले माँ" — यह पंक्ति पूर्ण शरणागति की घोषणा है। भक्त यह स्वीकार करता है कि वह स्वयं अपने बल पर कुछ नहीं कर सकता; उसका सारा अहं, सारा गर्व, सारी स्वतंत्रता माँ के चरणों में समर्पित हो जाती है। शरणागति भक्ति-मार्ग का सर्वोच्च सोपान है। जब जीव अपने को पूर्णतः माँ को सौंप देता है, तब माँ उसे अपना बना लेती है और उसके समस्त भय, चिंता और पाप स्वयं हर लेती है।

"दुःख हर ले मेरा मैया, सुख का दान करे माँ" — यहाँ भक्त की प्रार्थना केवल भौतिक सुख की नहीं, अपितु आंतरिक शांति और आध्यात्मिक आनंद की है। दुःख केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं आता, वह अज्ञान, अहंकार और विषय-वासना से भी उत्पन्न होता है। माँ की कृपा उस मूल दुःख को हर लेती है और आत्म-ज्ञान का सुख प्रदान करती है।

"तेरी ममता की छाया में, जीवन सफल करे माँ" — ममता का अर्थ केवल स्नेह नहीं, वरन् वह वात्सल्य है जो संतान को हर संकट से बचाता है। माँ की छाया में जीवन सुरक्षित, शांत और सार्थक बनता है। जब भक्त माँ की ममता में आश्रय पाता है, तब उसका जीवन कृतार्थ हो जाता है।

"तू ही जग की पालनहारी, तू ही भव-तारिणी माँ" — यह पंक्ति माँ को सृष्टि की पालनकर्त्री और मुक्ति की दात्री के रूप में प्रतिष्ठित करती है। सनातन दर्शन में शक्ति ही ब्रह्म की क्रियाशील अभिव्यक्ति है। माँ ही जगत का पालन करती है और जीव को भव-सागर से पार लगाती है।

"तेरे नाम की महिमा न्यारी, तू ही दुःख-नाशिनी माँ" — नाम-संकीर्तन कलियुग का सर्वश्रेष्ठ साधन है। माँ का नाम ही उसकी कृपा, उसकी शक्ति और उसकी उपस्थिति है। जो नाम का स्मरण करता है, उसके समस्त दुःख स्वयं नष्ट हो जाते हैं।

"शरण तिहारी आया हूँ, चरणों में सर रख दूँ माँ" — यह पूर्ण आत्म-समर्पण का भाव है। सिर चरणों में रखने का अर्थ है अहंकार का अंत। जहाँ अहंकार नहीं, वहाँ ईश्वर का वास होता है।

"भव-सागर से पार लगा दे, अपना वरदान दे माँ" — भव-सागर अर्थात् जन्म-मरण का चक्र। भक्त माँ से प्रार्थना करता है कि वह उसे इस चक्र से मुक्त कर दे और अपनी कृपा का वरदान दे। यही भक्ति का अंतिम लक्ष्य है — मुक्ति और परम आनंद।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

मातृ-भक्ति का उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों और तंत्र-ग्रंथों में अत्यंत गहन रूप में मिलता है। ऋग्वेद में उषा, अदिति, पृथ्वी और वाक् जैसी देवियों की स्तुति मातृ-शक्ति के रूप में की गई है। अदिति को "देवमाता" कहा गया है, जो समस्त देवताओं की जननी है। उपनिषदों में "मातृ देवो भव" का उपदेश मिलता है, जो माता को देवता के समान पूज्य बताता है। श्रीमद्भागवत में भी मातृ-भक्ति के अनेक उदाहरण हैं, जैसे भक्त प्रह्लाद की माता कयाधु और भगवान श्रीकृष्ण की माता यशोदा।

पुराणों में दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, काली, गंगा और अन्नपूर्णा जैसी देवियों की महिमा विस्तार से वर्णित है। मार्कण्डेय पुराण का दुर्गा सप्तशती मातृ-शक्ति का सर्वोच्च ग्रंथ है, जिसमें माँ दुर्गा को "जगदम्बा", "भव-तारिणी" और "दुःख-नाशिनी" कहा गया है। देवी भागवत, कालिका पुराण, शिव पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी मातृ-शक्ति की स्तुतियाँ प्रचुर मात्रा में हैं।

इस भजन के रचयिता नवीन आचार्य हैं, जो समकालीन भक्ति-संगीत के प्रसिद्ध गायक एवं रचनाकार हैं। उनके भजनों में सहज भाषा, गहन भाव और संगीत की मधुरता का अद्भुत संगम मिलता है। यह भजन विशेष रूप से माता के मंदिरों, नवरात्रि उत्सवों, दुर्गा पूजा, ज्योति कलश और घर-घर होने वाले सत्संगों में गाया जाता है। इसका उद्भव भारतीय लोक-परंपरा से हुआ है, जहाँ माँ को गृह-देवी और कुल-देवी के रूप में पूजा जाता है।

भक्ति-आंदोलन के काल में सूरदास, तुलसीदास, मीराबाई, कबीर और रविदास जैसे संतों ने भी मातृ-भक्ति और ईश्वर-प्रेम को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। मीराबाई के पदों में कृष्ण के प्रति मातृ-वात्सल्य और भक्ति का अद्भुत संगम मिलता है। इसी परंपरा में यह भजन भी अपना विशिष्ट स्थान रखता है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

इस भजन का दार्शनिक आधार अद्वैत वेदांत, विशिष्टाद्वैत और शाक्त दर्शन में निहित है। अद्वैत के अनुसार जीव और ब्रह्म एक ही हैं; भक्त और भगवान का भेद केवल अज्ञान के कारण प्रतीत होता है। जब भक्त "माँ तू मेरी प्यारी माँ" कहता है, तब वह अपने और माँ के बीच के भेद को मिटा देता है। यह भेद-भाव का अंत ही आत्म-साक्षात्कार है।

विशिष्टाद्वैत में भक्त और भगवान के बीच प्रेम-सम्बन्ध को सर्वोच्च माना गया है। यहाँ भक्त माँ की शरण में जाता है और उससे प्रेम, कृपा और मुक्ति की याचना करता है। यह सम्बन्ध दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य भावों से परे है — यह पुत्र-भाव है, जो सबसे सहज और निश्छल है।

शाक्त दर्शन में माँ ही परम-सत्ता है, जो सृष्टि, स्थिति और संहार की त्रिविध शक्ति की स्वामिनी है। "भव-तारिणी" और "दुःख-नाशिनी" जैसे विशेषण माँ की उस शक्ति को प्रकट करते हैं, जो जीव को अज्ञान-रूपी अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है।

कर्म-सिद्धांत के अनुसार जीव अपने कर्मों के फल भोगता है और जन्म-मरण के चक्र में बंधा रहता है। किंतु भक्ति और शरणागति कर्म-बंधन को काटने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। जब भक्त माँ के चरणों में पूर्ण समर्पण कर देता है, तब उसके प्रारब्ध कर्म भी माँ की कृपा से शीघ्र फल देकर समाप्त हो जाते हैं। यही भजन का गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य है।

ध्यान की दृष्टि से यह भजन मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार — इन सातों चक्रों को क्रमशः जागृत करता है। "माँ" का उच्चारण हृदय-चक्र को सक्रिय करता है, "प्यारी" का भाव अनाहत में प्रेम-ऊर्जा भरता है, और "न्यारी" का बोध सहस्रार में अद्वैत-अनुभूति कराता है। नियमित स्मरण से साधक की चेतना उच्चतर स्तरों पर स्थिर होती है।

यह भजन साधक को यह भी सिखाता है कि ईश्वर-प्राप्ति के लिए कठोर तप, जटिल मंत्र या दुर्गम यात्रा आवश्यक नहीं; केवल निश्छल प्रेम और पूर्ण शरणागति पर्याप्त है। माँ का हृदय संतान के लिए सदैव खुला रहता है। जो भी सच्चे मन से "माँ" कहता है, वह माँ का हो जाता है। यही इस भजन का सार्वभौमिक संदेश है।

दैनिक जीवन में इस रचना की उपयोगिता

विद्यार्थियों के लिए

विद्यार्थियों के लिए यह भजन अत्यंत लाभकारी है। परीक्षा के समय उत्पन्न तनाव, भय और अस्थिरता को यह भजन शांत करता है। प्रातःकाल स्नान के बाद इसका पाठ करने से स्मरण-शक्ति, एकाग्रता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। "तेरी ममता की छाया में, जीवन सफल करे माँ" पंक्ति विद्यार्थी को यह सिखाती है कि सफलता केवल परिश्रम से नहीं, माँ की कृपा से भी मिलती है। इससे विनम्रता और कृतज्ञता का भाव विकसित होता है।

पेशेवरों के लिए

कार्यक्षेत्र में व्यस्त पेशेवरों के लिए यह भजन मानसिक संतुलन और निर्णय-क्षमता का स्रोत है। दिन की शुरुआत इस भजन से करने पर कार्य में स्थिरता, धैर्य और सहनशीलता आती है। "दुःख हर ले मेरा मैया" पंक्ति कार्य-सम्बंधी चिंताओं को हल्का करती है। "शरण तिहारी आया हूँ" का भाव अहंकार को घटाता है, जिससे सहकर्मियों के साथ सहयोग और सौहार्द बढ़ता है। यह भजन व्यावसायिक जीवन में नैतिकता और करुणा का संचार करता है।

मानसिक शांति के लिए

आज की दौड़-भाग भरी जीवनशैली में मानसिक अशांति, अवसाद और चिंता आम समस्या बन गई है। यह भजन ध्यान और मंत्र-जाप का सर्वोत्तम साधन है। इसे धीमे स्वर में गाने या सुनने से मन शांत होता है, हृदय-गति सामान्य होती है और तनाव-हार्मोन घटते हैं। "तेरे नाम की महिमा न्यारी" पंक्ति नाम-स्मरण की शक्ति को जागृत करती है। नियमित अभ्यास से अनिद्रा, भय और नकारात्मक विचारों में कमी आती है। यह भजन आत्म-चिकित्सा का सहज साधन है।

परिवार और समाज के लिए

परिवार में यदि यह भजन नियमित रूप से गाया जाए, तो घर में सुख, शांति और प्रेम का वातावरण बनता है। माँ की पूजा और भजन-कीर्तन से पारिवारिक कलह दूर होते हैं और सदस्यों में परस्पर स्नेह बढ़ता है। बच्चों में संस्कार और मातृ-भक्ति का भाव जागृत होता है। समाज में भी जहाँ यह भजन गाया जाता है, वहाँ सामूहिक चेतना ऊँची उठती है। सत्संग, नवरात्रि उत्सव और सामूहिक पूजा में इसका गायन समाज को जोड़ने का माध्यम बनता है।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

शुभ समय: इस भजन का पाठ प्रातःकाल ब्रह्म-मुहूर्त (लगभग 4 से 6 बजे) अथवा सायंकाल संध्या-काल (लगभग 6 से 8 बजे) में करना सर्वोत्तम माना गया है। नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी, नवमी, मंगलवार, शुक्रवार और पूर्णिमा के दिन इसका विशेष महत्व है।

पाठ विधि: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। माँ की मूर्ति या चित्र के सम्मुख दीपक, धूप, पुष्प और प्रसाद अर्पित करें। "ॐ दुं दुर्गायै नमः" अथवा "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" मंत्र का 108 बार जाप करें। तत्पश्चात् इस भजन का 11, 21 अथवा 108 बार पाठ करें।

माला एवं संख्या: स्फटिक, कमलगट्टा अथवा रुद्राक्ष की माला से जाप करना शुभ है। न्यूनतम 108 बार पाठ करने से विशेष फल प्राप्त होता है। नवरात्रि में प्रतिदिन 108 बार पाठ करने से माँ की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

नियम: पाठ के दिन सात्विक भोजन करें, मांस-मदिरा का त्याग करें, सत्य और ब्रह्मचर्य का पालन करें। मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें। माँ के प्रति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखें।

लाभ: नियमित पाठ से मानसिक शांति, रोग-नाश, धन-समृद्धि, संतान-सुख, वैवाहिक सुख, कार्य-सिद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। भय, ग्रह-दोष, नजर-दोष और पितृ-दोष का शमन होता है। आत्मविश्वास और आध्यात्मिक उन्नति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: यह भजन किस देवी को समर्पित है?
उत्तर: यह भजन मुख्यतः माँ दुर्गा, माँ पार्वती और जगदम्बा को समर्पित है। किंतु इसका भाव सार्वभौमिक है — यह किसी भी मातृ-स्वरूप देवी की स्तुति के रूप में गाया जा सकता है।

प्रश्न 2: इस भजन को कितनी बार पाठ करना चाहिए?
उत्तर: न्यूनतम 11 बार, सामान्यतः 21 बार और विशेष अवसरों पर 108 बार पाठ करना शुभ माना जाता है। नवरात्रि में प्रतिदिन 108 बार पाठ करने से विशेष फल मिलता है।

प्रश्न 3: क्या इस भजन का पाठ बिना दीक्षा के किया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, यह भजन भक्ति-भावना पर आधारित है, अतः किसी विशेष दीक्षा की आवश्यकता नहीं। केवल श्रद्धा, स्वच्छता और समर्पण आवश्यक है।

प्रश्न 4: इस भजन का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
उत्तर: मानसिक शांति, रोग-नाश, भय-मुक्ति, धन-समृद्धि, संतान-सुख, वैवाहिक सुख, कार्य-सिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति इसके प्रमुख लाभ हैं।

प्रश्न 5: क्या यह भजन पुरुष भी गा सकते हैं?
उत्तर: हाँ, भक्ति में लिंग-भेद नहीं होता। कोई भी व्यक्ति, किसी भी आयु में, किसी भी

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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