"दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए" (Daya Itani Si Ho Jaye Kripa Itni Si Ho Jaaye) माँ भगवती की आराधना में गाया जाने वाला एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी देवी भजन है। इस भजन को सुप्रसिद्ध गायिका कविता पौडवाल (Kavita Paudwal) ने अपनी मधुर और दिव्य आवाज से सजाया है। यह भजन भक्ति रस की पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहाँ एक भक्त अपनी आराध्या माँ जगदम्बा से किसी सांसारिक सुख, धन या वैभव की कामना नहीं करता, बल्कि केवल उनके चरणों में स्थान और उनकी निरंतर स्मृति की याचना करता है। इस भजन का मुख्य भाव पूर्ण समर्पण (शरणागति), विनय और करुणा है। जब कोई साधक सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर माँ के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित करना चाहता है, तब यह भजन उसके अंतर्मन की पुकार बन जाता है। नवरात्रि के पावन अवसर पर, देवी जागरणों में और दैनिक संध्या आरती के समय इस भजन का श्रवण और गायन भक्तों को एक अलौकिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए
दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए।
हो ओझल तुम माँ आँखों से कभी वो दिन नही आये॥
तुम्हारी याद चलती सांसो की तारो से जुड़ जाए।
तेरा दर हो मेरा सिर हो तमासा ये उमर भर हो।
तेरे कदमो में जग जननी उमर अपनी गुजर जाए।
दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए॥
जो करदे दूर तुम से माँ ना उस सुख की तमना है।
भुलादे तुम को ही जो माँ न उस धन की तमाना है।
तेरा दर हो मेरा सिर हो तमासा ये उमर भर हो।
तेरे कदमो में जग जननी उमर अपनी गुजर जाए।
दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए॥
ना शोहरत मांगता मैं वो बना दे जो एह्न्कारी।
ना ऐसा चाहता कुछ मैं जो छीने मुझसे माँ प्यारी।
तेरा दर हो मेरा सिर हो तमासा ये उमर भर हो।
तेरे कदमो में जग जननी उमर अपनी गुजर जाए।
दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए॥
बिछड़ के तुम से मैं मैया सिर्फ ठोकर ही खाऊ गा।
तुम्हे खो कर के मैं मैया पाउगा तो क्या पाउगा।
तेरा दर हो मेरा सिर हो तमासा ये उमर भर हो।
तेरे कदमो में जग जननी उमर अपनी गुजर जाए।
दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का केंद्रीय भाव निष्काम भक्ति और अनन्य प्रेम है। भक्त माँ से प्रार्थना करता है कि हे माँ! मुझ पर केवल इतनी सी दया और कृपा कर दो कि मेरी आँखों के सामने से तुम्हारी दिव्य छवि कभी ओझल न हो। यदि ऐसा कोई दिन आए जब मैं तुम्हें भूल जाऊँ, तो वह दिन मेरी जिंदगी में कभी न आए। मेरी हर एक सांस तुम्हारे नाम के स्मरण से जुड़ जाए। भक्त की केवल एक ही इच्छा है कि उसका सिर हमेशा माँ के चरणों में झुका रहे और वह जीवन भर माँ की लीलाओं का साक्षी बना रहे।
भजन के अगले भाग में भक्त सांसारिक सुखों और धन-दौलत की निरर्थकता को दर्शाता है। वह कहता है कि हे माँ, मुझे ऐसा कोई सुख नहीं चाहिए जो मुझे तुमसे दूर कर दे। मुझे उस धन की भी कोई लालसा नहीं है जिसके आने से मैं तुम्हें भूल जाऊँ। यह विचार श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों के उस प्रसंग की याद दिलाता है जहाँ कुंती देवी भगवान कृष्ण से विपत्ति का वरदान मांगती हैं, ताकि वे हमेशा भगवान को याद रख सकें। भक्त यहाँ सांसारिक ऐश्वर्य के स्थान पर आध्यात्मिक संसर्ग को प्राथमिकता दे रहा है।
आगे भक्त कहता है कि मुझे ऐसी प्रसिद्धि या शोहरत नहीं चाहिए जो मेरे भीतर अहंकार को जन्म दे। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो उसे ईश्वर से दूर ले जाता है। भक्त ऐसी किसी भी वस्तु या परिस्थिति से बचना चाहता है जो उसे उसकी प्यारी माँ से दूर कर दे। अंत में, भक्त अपनी लाचारी और माँ की महत्ता को स्वीकार करते हुए कहता है कि तुमसे अलग होकर मैं इस संसार में केवल ठोकरें ही खाऊँगा। तुम्हें खोने के बाद इस संसार में पाने के लिए कुछ भी शेष नहीं रह जाता। अतः मेरी पूरी उम्र तुम्हारे ही चरणों में बीत जाए।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह एक साधक की आध्यात्मिक यात्रा का दस्तावेज है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- निष्काम प्रार्थना: इस भजन में किसी भी प्रकार की भौतिक मांग (जैसे धन, संतान, यश) नहीं की गई है। इसमें केवल माँ के सानिध्य और भक्ति की मांग की गई है, जो इसे एक उच्च कोटि का देवी भजन बनाती है।
- अहंकार का निषेध: भजन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि वह शोहरत बेकार है जो मनुष्य को अहंकारी बना दे। यह साधक को विनम्रता का पाठ पढ़ाती है।
- अनन्य शरणागति: "तेरा दर हो मेरा सिर हो" यह पंक्ति पूर्ण आत्मसमर्पण को दर्शाती है। जब साधक अपना अहंकार और बुद्धि माँ के चरणों में समर्पित कर देता है, तब उसे परम शांति का अनुभव होता है।
- भावपूर्ण संगीत: कविता पौडवाल की सुरीली आवाज और शांत संगीत इस भजन को ध्यान और साधना के अनुकूल बनाते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन का गायन और श्रवण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु कुछ विशेष अवसरों पर इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है:
- प्रातःकाल की साधना: सुबह के समय शांत वातावरण में इस भजन को सुनने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और पूरा दिन शांतिपूर्ण बीतता है।
- नवरात्रि उत्सव: चैत्र और आश्विन नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा की पूजा के समय इस भजन का गायन विशेष फलदायी माना जाता है। साधक इस भजन के माध्यम से माँ के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं।
- संध्या आरती के बाद: शाम की पूजा और माँ दुर्गा की आरती के पश्चात शांत चित्त से बैठकर इस भजन का कीर्तन करने से मानसिक तनाव दूर होता है।
- गायन विधि: इस भजन को गाते समय आँखों को बंद करके माँ की दिव्य प्रतिमा का ध्यान करना चाहिए। प्रत्येक शब्द के अर्थ को महसूस करते हुए करुण भाव से इसका गायन करना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन आदि शक्ति, जग जननी माँ दुर्गा को समर्पित है। सनातन धर्म में माँ दुर्गा को ब्रह्मांड की सृजनकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता माना गया है। वे करुणा की सागर हैं और अपने भक्तों के सभी कष्टों को हरने वाली हैं। इस भजन में प्रयुक्त शब्द "जग जननी" माँ के ममतामयी और ब्रह्मांडीय स्वरूप को इंगित करता है।
यद्यपि यह एक आधुनिक रचना है, परंतु इसके भाव मध्यकालीन संत कवियों जैसे सूरदास, तुलसीदास और मीराबाई की भक्ति परंपरा से मेल खाते हैं। जिस प्रकार मीराबाई ने कृष्ण के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था, उसी प्रकार इस भजन का लेखक माँ दुर्गा के चरणों में अपने जीवन की सार्थकता देखता है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन आधुनिक भक्ति संगीत के स्वर्ण युग की देन है। इसे टी-सीरीज (T-Series) के बैनर तले प्रस्तुत किया गया था, जिसने भारत में भक्ति संगीत को घर-घर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कविता पौडवाल ने अपनी माता अनुराधा पौडवाल की समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाते हुए इस भजन को अपनी दिव्य आवाज दी। इस भजन के सरल लेकिन गहरे शब्द सीधे हृदय को छूते हैं और साधक को अंतर्मुखी होने के लिए प्रेरित करते हैं।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और प्रवाहमयी खड़ी बोली हिंदी है। इसमें कुछ उर्दू शब्दों जैसे "तमन्ना", "शोहरत", "ओझल" और "उम्र" का बहुत ही सुंदर और सहज प्रयोग किया गया है, जो इसकी गेयता और मिठास को बढ़ाता है।
काव्य शैली की दृष्टि से यह एक "प्रार्थना गीत" या "विनय पद" है। इसमें रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, जैसे "चलती सांसों की तारों से जुड़ जाए"। यहाँ सांसों की तुलना संगीत के वाद्य यंत्र के तारों से की गई है, जो यदि माँ की याद से जुड़ जाएं तो जीवन में अनहद नाद गूंजने लगता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें व्यावहारिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:
- सच्चे सुख की परिभाषा: वास्तविक सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि ईश्वर के सानिध्य में है। जो सुख हमें ईश्वर से दूर करे, वह वास्तव में दुख का कारण है।
- अहंकार से मुक्ति: धन और प्रसिद्धि अक्सर मनुष्य में अहंकार पैदा करते हैं। हमें हमेशा प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारे पास चाहे जितना भी वैभव आ जाए, हमारा सिर हमेशा ईश्वर के चरणों में झुका रहे।
- कृतज्ञता का भाव: हमारे जीवन की हर सांस माँ की कृपा से चल रही है। हमें हर क्षण उनके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए।
- संसार की असारता: ईश्वर के बिना यह संसार केवल ठोकरें खिलाने वाला है। वास्तविक आश्रय केवल भगवान का दर ही है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| ओझल (Ojhal) | गायब होना, दूर होना | माँ की स्मृति का मन से दूर हो जाना। |
| जग जननी (Jag Janani) | जगत की माता, आदि शक्ति | संपूर्ण ब्रह्मांड को जन्म देने वाली माँ दुर्गा। |
| तमन्ना (Tamanna) | इच्छा, अभिलाषा, लालसा | सांसारिक सुखों की व्यर्थ कामना। |
| शोहरत (Shohrat) | प्रसिद्धि, यश, नाम | वह सामाजिक प्रतिष्ठा जो अक्सर अहंकार को जन्म देती है। |
| दर (Dar) | चौखट, द्वार | माँ का पावन मंदिर या शरण। |
| तमाशा (Tamasha) | लीला, दृश्य | जीवन रूपी रंगमंच पर माँ की कृपा का निरंतर दर्शन। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए। हो ओझल तुम माँ आँखों से कभी वो दिन नही आये॥"
हे माँ! मेरी आपसे बस इतनी सी ही प्रार्थना है कि आपकी दया और कृपा मुझ पर बनी रहे। मेरी जिंदगी में ऐसा कोई भी बुरा दिन न आए जब आपकी याद मेरी आँखों और मेरे मन से दूर हो जाए।
"तुम्हारी याद चलती सांसो की तारो से जुड़ जाए। तेरा दर हो मेरा सिर हो तमासा ये उमर भर हो॥"
मेरी हर एक सांस आपके नाम का स्मरण करती रहे। मेरा सिर हमेशा आपके पावन द्वार पर झुका रहे और मैं जीवन भर आपकी इस अद्भुत सृष्टि और लीला का आनंद लेता रहूं।
"तेरे कदमो में जग जननी उमर अपनी गुजर जाए। दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए॥"
हे जगत माता! मेरी यह पूरी जिंदगी आपके चरणों की सेवा में ही व्यतीत हो जाए। बस इतनी सी कृपा मुझ पर कर दीजिए।
"जो करदे दूर तुम से माँ ना उस सुख की तमना है। भुलादे तुम को ही जो माँ न उस धन की तमाना है॥"
मुझे ऐसे किसी भी सुख की इच्छा नहीं है जो मुझे आपसे दूर कर दे। मुझे ऐसा धन भी नहीं चाहिए जिसके नशे में चूर होकर मैं आपको ही भूल जाऊँ।
"ना शोहरत मांगता मैं वो बना दे जो एह्न्कारी। ना ऐसा चाहता कुछ मैं जो छीने मुझसे माँ प्यारी॥"
मैं ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं मांगता जो मेरे भीतर घमंड पैदा कर दे। मैं इस संसार की ऐसी कोई भी वस्तु नहीं चाहता जो मुझे मेरी प्यारी माँ से अलग कर दे।
"बिछड़ के तुम से मैं मैया सिर्फ ठोकर ही खाऊ गा। तुम्हे खो कर के मैं मैया पाउगा तो क्या पाउगा॥"
हे मैया! यदि मैं आपसे दूर हो गया, तो इस संसार के थपेड़े और ठोकरें ही मुझे मिलेंगी। यदि मैंने आपको ही खो दिया, तो फिर इस जीवन में कुछ भी पाने योग्य नहीं बचेगा।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के समर्पण भाव को और सुदृढ़ करने के लिए साधक माँ दुर्गा के इस प्रसिद्ध शरणागति मंत्र का जप कर सकते हैं, जो श्री दुर्गा चालीसा और देवी महात्म्य का मुख्य हिस्सा है:
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥
अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हैं। आप कल्याणकारिणी और सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली हैं। आप ही शरण में लेने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं। आपको नमस्कार है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | दया इतनी सी हो जाए किरपा इतनी सी हो जाए |
|---|---|
| मुख्य देवी/देवता | माँ दुर्गा / जग जननी |
| गायिका | कविता पौडवाल (Kavita Paudwal) |
| भाषा | हिंदी (खड़ी बोली) |
| भक्ति का प्रकार | निष्काम भक्ति, शरणागति भाव |
| मुख्य रस | भक्ति रस, करुण रस |
| उपयुक्त अवसर | नवरात्रि, देवी जागरण, दैनिक सुबह-शाम की प्रार्थना |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को सनातन धर्म की समृद्ध शरणागति और भक्ति परंपरा के आलोक में विश्लेषित किया गया है। भजन के बोलों की शुद्धता सुनिश्चित की गई है ताकि साधक को गायन के समय सही उच्चारण में कोई कठिनाई न हो। यह सामग्री पूरी तरह से प्रामाणिक स्रोतों और पारंपरिक व्याख्याओं पर आधारित है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्देवीभागवत महापुराण - देवी स्तुति एवं शरणागति प्रसंग।
- पारंपरिक देवी भजन संग्रह एवं टी-सीरीज भक्ति संगीत रिकॉर्डिंग्स।
- कविता पौडवाल के आधिकारिक भक्ति एल्बम।
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