शिव सुवर्णमाला स्तुति: परिचय, लिरिक्स एवं संपूर्ण आध्यात्मिक व्याख्या
भगवान शिव की दिव्य स्तुतियों में 'शिव सुवर्णमाला स्तुति' (Shiv Suvarnamala Stuti) का स्थान अत्यंत विशिष्ट, पावन और प्रभावशाली माना जाता है। सनातन धर्म के महान दार्शनिक और अद्वैत वेदांत के प्रतिष्ठापक आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित यह अद्भुत स्तोत्र न केवल देवाधिदेव महादेव के निराकार और साकार दोनों रूपों का अत्यंत सुंदर वर्णन करता है, बल्कि साधक के अंतःकरण की शुद्धि, मानसिक शांति और मोक्ष प्राप्ति का सहज मार्ग भी प्रशस्त करता है। 'सुवर्णमाला' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'स्वर्ण या सोने की माला' है, और यह स्तुति वास्तव में दिव्य अक्षरों और भावों के ऐसे स्वर्णिम पुष्पों से गूंथी गई माला है जिसे अर्पित कर भक्त अपने आराध्य महाकाल भोलेनाथ को प्रसन्न करते हैं। महाशिवरात्रि, श्रावण मास, प्रदोष व्रत और सोमवार के पावन अवसरों पर इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक के जीवन में आ रही समस्त बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक ऊर्जा, आरोग्य तथा आध्यात्मिक उन्नति का संचार होता है। भक्तिलोक (Bhaktilok) के इस विस्तृत scholarly guide में हम शिव सुवर्णमाला स्तुति के शब्दार्थ, भावार्थ, पाठ विधि और इसके गहरे दार्शनिक महत्व का संपूर्ण अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण शिव सुवर्णमाला स्तुति | Complete Shiv Suvarnamala Stuti
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ईशगिरीश नरेश परेश महेश बिलेशय भूषण भो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
उमया दिव्य सुमङ्गल विग्रह यालिङ्गित वामाङ्गविभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ऊरी कुरु मामज्ञमनाथं दूरी कुरु मे दुरितं भो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ॠषिवर मानस हंस चराचर जनन स्थिति लय कारण भो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
अन्तः करण विशुद्धिं भक्तिं च त्वयि सतीं प्रदेहि विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
करुणा वरुणाल्य मयि दास्यं देहि सदार्चित पादयुगे।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
एहि सुरासुर मौलि मणिप्रभा रंजित पादारविन्द युग।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ऐश्वर्यमखिलं देहि दुरन्त विपद्गण मृत्योर्हर माम्।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ओम्कार वाच्य लिङ्ग प्रपञ्च भूतैक बीज रूप विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
औषधमभव रोगस्य तव पदारविन्द भजनमिह हि।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
अम्बुज भवादि वन्द्य त्रिदश मुनीन्द्र अर्चित चरणयुग।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
अस्त्रं मदनस्य हृतवानसि कलयसि कङ्काल मालिकां भवतः।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
कल्याण सुन्दरेश कमलनयन कमनीय कान्तिधर।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
खलु संसार तरोः खण्डन कुशलं तव पदारविन्द युगम्।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
गङ्गाधर गजासुर मथन गिरीश गणाधिप पूज्य विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
घण्टारव मुनिवृन्द वन्दित चरणयुगळ सुरवृन्द वन्द्य विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ङकाराद्यं ब्रह्म पदं तव पदारविन्दं शरणमहं प्रपद्ये।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
चन्द्रकला भरण चराचर गुरु चतुर्मुख नुति विषय चरणयुग।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
छन्दोमय छन्दोऽतीत सुरमुनि संसेवित चरणयुग।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
जगतः पालकमशेष देव मुनि वन्द्य चरणयुग।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
झणझणझणझण नूपुर नादं कुरु मे हृदये नटराज विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ञकार रूपिणी श्रीवाग्वादिनी वदन पंकज स्थिता नुतिषु।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
टङ्कार धन्विनां गर्व भंजन कार्मुक पाणये तुभ्यम्।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ठकाराक्षर रूप ब्रह्म पदं तव पदारविन्दं शरणमहं प्रपद्ये।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
डमरु वाद्य प्रिय ढक्का रणित प्रिय ढुण्ढिराज पूज्य विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
ढक्का वाद्य प्रिय ढुण्ढिराज पूज्य डमरुकादि प्रिय विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
णकार रूपान्तरादि रहितोऽसि प्रणवार्थ वाच्य त्वमेव विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
तपनादित्य प्रकाशक ताप त्रय हरण शरण चरणयुगम्।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
थकाराक्षर रूप ब्रह्म पदं तव पदारविन्दं शरणमहं प्रपद्ये।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
दरहास भूषित मुखकमल दर्शन दुरित विध्वंसक विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
धनदो मित्र प्रिय धरणीधर धनुष पाणि धरणीश विभो।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
नारायण प्रिय नटराजेश नरकार्ति हरण चरणयुगम्।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
परमेश पावन पालय मामज्ञमनाथं शरणगतम्।
साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्॥
श्लोक का उच्चारण एवं पदच्छेद | Pronunciation & Padaccheda
शिव सुवर्णमाला स्तुति संस्कृत के वर्णमाला क्रम (अ, आ, इ, ई... क, ख, ग...) के अनुसार रची गई है। यह आदिगुरु शंकराचार्य की अद्वितीय काव्य शैली का परिचायक है, जिसमें प्रत्येक श्लोक या चरण संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों के क्रमानुसार भगवान शिव की स्तुति करता है। इसके उच्चारण में शुद्धता और यति-तति का विशेष ध्यान रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, "साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्" पंक्ति प्रत्येक श्लोक के अंत में पुनरावृत्ति के रूप में आती है, जो साधक के मन में शिव चरणों के प्रति अनन्य समर्पण का भाव जगाती है। पदच्छेद करते समय 'साम्ब', 'सदाशिव', 'शम्भो', 'शङ्कर' शब्दों को अलग-अलग स्पष्ट उच्चारित करना चाहिए ताकि स्तोत्र का आंतरिक संगीत और लय बनी रहे।
पदच्छेद एवं अन्वय | Padaccheda & Anvaya
अन्वय की दृष्टि से इस स्तोत्र में साधक सीधे भगवान शिव के चरण कमलों को अपनी एकमात्र शरण मानता है। अन्वय: हे साम्ब! हे सदाशिव! हे शम्भो! हे शङ्कर! तव चरणयुगम् मे शरणम् (अस्ति)। यहाँ 'साम्ब' का अर्थ माता पार्वती (अम्बा) के साथ विराजमान शिव है, 'सदाशिव' का अर्थ कल्याणकारी और नित्य स्वरूप है, 'शम्भो' का अर्थ सुख या आनंद प्रदान करने वाले हैं, और 'शङ्कर' का अर्थ कल्याण करने वाले हैं। स्तोत्र के प्रत्येक चरण में आदिशंकराचार्य ने व्याकरण और भक्ति रस का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया है, जिससे यह स्तोत्र मात्र स्तुति न रहकर एक उच्च कोटि का दार्शनिक मंत्र बन जाता है। इसी शृंखला में साधक भगवान शिव से अपने अंतःकरण की शुद्धि और अज्ञान के नाश की प्रार्थना करता है। अधिक जानने के लिए आप शिव तांडव स्तोत्र का भी अध्ययन कर सकते हैं।
विस्तृत शब्दार्थ | Word-by-word Meaning
| संस्कृत शब्द | पदच्छेद | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भगत अर्थ |
|---|---|---|---|
| साम्ब | स + अम्बा | माता पार्वती के साथ | जो आदिशक्ति जगदम्बा के साथ संयुक्त हैं |
| सदाशिव | सदा + शिव | सदा कल्याणकारी | नित्य पवित्र और मंगलमय स्वरूप |
| शम्भो | शम्भो | सुख के दाता | परम आनंद प्रदाता |
| शङ्कर | शम् + कर | कल्याण करने वाले | भक्तों का अमंगल दूर करने वाले |
| चरणयुगम् | चरण + युगम् | दोनों चरण | भगवान के शरणदायक पावन चरण |
| ईशगिरीश | ईश + गिरीश | पर्वतों के स्वामी | कैलाश पर्वत के अधिपति भगवान शिव |
| बिलेशय भूषण | बिलेशय + भूषण | सर्पों को आभूषण बनाने वाले | जिनकी देह पर नाग सुशोभित हैं |
| दुरितं | दुरितम् | पाप और कष्ट | संसार के दुख और कर्मों के बंधन |
सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या | Hindi Meaning & Explanation
शिव सुवर्णमाला स्तुति का प्रत्येक श्लोक साधक की आंतरिक पुकार और भगवान शिव की असीम करुणा का सजीव चित्रण करता है। स्तोत्र का मुख्य टेक (Refrain) "साम्ब सदाशिव शम्भो शङ्कर शरणं मे तव चरणयुगम्" यह घोषणा करता है कि हे माता पार्वती के साथ विराजमान, सदा कल्याणकारी, सुख के प्रदाता और सबका अमंगल हरने वाले महादेव! मेरे लिए आपके दोनों चरण ही इस संसार में एकमात्र शरण स्थल हैं।
आदिगुरु शंकराचार्य आगे वर्णन करते हैं कि हे ईश, गिरीश, पर्वतों के राजा, नागों को आभूषण के रूप में धारण करने वाले भोलेनाथ! आप ही मेरे रक्षक हैं। जिनके वामांग में माता उमा (पार्वती) दिव्य और मंगलमय रूप में विराजमान हैं, ऐसे विभो! आप मुझ अज्ञानी और अनाथ को अपनी शरण में स्वीकार करें (ऊरी कुरु मामज्ञमनाथं) और मेरे समस्त पापों व दुखों को दूर कर दें। आप ही चराचर जगत के उत्पन्न होने, स्थिति बनाए रखने और प्रलय के कारण हैं। हे प्रभु! मेरे अंतःकरण को शुद्ध कीजिए और मुझमें अपनी अनन्य एवं सच्ची भक्ति प्रदान कीजिए।
स्तुति में आगे वर्णमाला के क्रम से भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण किया गया है। ओंकार वाच्य, प्रपंच के बीज रूप, संसार रूपी वृक्ष का छेदन करने वाले, गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने वाले, गजासुर का वध करने वाले और गणेशजी द्वारा पूजित भगवान शिव की स्तुति करते हुए साधक अपनी समस्त विनती उनके चरणों में अर्पित करता है। यह स्तोत्र केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भौतिकतापों से त्रस्त मानव आत्मा की परमात्मा से मिलने की छटपटाहट और समर्पण का पवित्र दस्तावेज है।
श्लोक का मुख्य भाव एवं आध्यात्मिक संदेश | Core Bhava & Spiritual Message
शिव सुवर्णमाला स्तुति का केंद्रीय भाव 'शरणागति' (Total Surrender) है। मानव जीवन विविध प्रकार की चिंताओं, दुखों, मोह-माया और कर्मबंधनों से घिरा हुआ है। आदिगुरु शंकराचार्य इस स्तोत्र के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि अहंकार और भौतिक उपलब्धियों के पीछे भागने के बजाय यदि मनुष्य अपने मन को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर दे, तो उसके जीवन के सभी कष्ट स्वतः समाप्त हो जाते हैं। स्तोत्र में अंतःकरण की शुद्धि (अन्तः करण विशुद्धिं भक्तिं च त्वयि सतीं प्रदेहि विभो) पर विशेष बल दिया गया है। यह इस बात का प्रतीक है कि सच्ची पूजा बाहर के आचरण से अधिक आंतरिक पवित्रता और प्रेम पर आधारित होती है। यदि साधक का मन शुद्ध है और हृदय में महादेव के प्रति अटूट विश्वास है, तो वह किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता और जीवन के असली उद्देश्य यानी मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। इसी मार्ग पर चलने के लिए आप महामृत्युंजय मंत्र का भी नित्य जप कर सकते हैं।
शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ | Scriptural & Mythological Context
इस अद्भुत स्तोत्र की रचना अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी। भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में शंकराचार्य जी को भगवान शिव का ही अंशावतार माना जाता है। उन्होंने देश के चारों कोनों में मठों की स्थापना करने के साथ-साथ अनेक दिव्य स्तोत्रों की रचना की, जिनमें शिव तांडव स्तोत्र, दक्षिणामृत स्तोत्र और शिव सुवर्णमाला स्तुति प्रमुख हैं। शिव पुराण, लिंग पुराण और स्कंद पुराण में भगवान शिव के विभिन्न नामों और उनके स्वरूपों का विस्तृत वर्णन मिलता है। 'सुवर्णमाला' स्तुति में आए हुए नाम जैसे 'गङ्गाधर', 'गिरीश', 'नटराज', 'मदनसुदक' आदि पुराणों में वर्णित शिव की कथाओं से सीधे जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, मदन (कामदेव) को भस्म करने की कथा शिव की योग साधना और इंद्रिय संयम के सर्वोच्च आदर्श को दर्शाती है। शंकराचार्य ने इन पौराणिक कथाओं और दार्शनिक सत्यों को इस स्तोत्र में अत्यंत सहज और काव्यात्मक रूप से पिरोया है, ताकि सामान्य जनमानस भी शिवतत्व को आसानी से समझ सके और उसका स्मरण कर सके।
दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व | Philosophical Significance
वेदांत दर्शन के अनुसार, भगवान शिव 'ब्रह्म' या 'परमात्मा' के ही साकार प्रतीक हैं। 'साम्ब सदाशिव' का अर्थ है कि शिव और शक्ति (प्रकृति और पुरुष) एक ही परम सत्य के दो पहलू हैं। जब तक चेतना (शिव) और ऊर्जा (शक्ति) का मिलन नहीं होता, तब तक सृष्टि का संचालन और मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। 'ओंकार वाच्य लिङ्ग' पंक्ति यह दर्शाती है कि संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति प्रणव (ॐ) से हुई है और शिव उसी ओंकार के निराकार लिंग रूप में प्रतिष्ठित हैं। स्तोत्र में संसार को एक भवसागर या 'संसार तरुण' (संसार रूपी वृक्ष) कहा गया है, जिसके मूल में अज्ञान और कर्मफल हैं। भगवान शिव के चरणकमल इस संसार रूपी वृक्ष का छेदन करने वाले यानी इसे जड़ से उखाड़ फेंकने में समर्थ हैं। इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि शिव की कृपा से साधक को माया के बंधनों से मुक्ति मिलती है और वह आत्मसाक्षात्कार (Self-realization) के मार्ग पर अग्रसर होता है। इस गहन आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ आप भगवान शिव के अनन्य भक्त श्री हनुमान चालीसा का पाठ भी अपनी दैनिक पूजा में शामिल कर सकते हैं, क्योंकि हनुमानजी को भी रुद्र (शिव) का ही अवतार माना गया है।
दैनिक जीवन में उपयोगिता एवं सीख | Daily Life Lessons
आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य मानसिक तनाव, डिप्रेशन, असुरक्षा और अनिश्चितता का सामना कर रहा है। शिव सुवर्णमाला स्तुति का पाठ या श्रवण न केवल आध्यात्मिक रूप से बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी अत्यंत लाभकारी है।
- विद्यार्थियों के लिए: एकाग्रता, बुद्धि की तीक्ष्णता और मानसिक स्थिरता प्राप्त करने में यह स्तोत्र सहायक है।
- व्यावसायिक जीवन: कार्यक्षेत्र की कठिनाइयों और असफलताओं के बीच धैर्य और संयम बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
- पारिवारिक शांति: घर के वातावरण को सकारात्मक और ऊर्जावान बनाता है, जिससे आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।
- आंतरिक शुद्धि: क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर कर मन को शांत करता है।
- आरोग्य लाभ: नियमित पाठ से मानसिक शांति मिलती है, जिसका सीधा सकारात्मक प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त | Sadhana & Recitation Vidhi
शिव सुवर्णमाला स्तुति की साधना अत्यंत सरल किंतु अत्यधिक प्रभावी है:
- शुभ मुहूर्त: महाशिवरात्रि, श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार, प्रदोष व्रत और प्रतिदिन ब्रह्म बेला (प्रातःकाल) या प्रदोष काल (संध्या समय) में इसका पाठ करना श्रेष्ठ फलदायी होता है।
- पूजा स्थान: घर के ईशान कोण में स्थित मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति, शिवलिंग या तस्वीर के सामने आसन बिछाकर बैठें।
- पूजन सामग्री: जल, दूध, दूर्वा, बेलपत्र, धतूरा, सफेद चंदन, धूप और दीप से शिवजी का पूजन करें।
- पाठ विधि: सुमित्र भाव से दीपक प्रज्वलित कर संकल्प लें और एकाग्रचित्त होकर इस स्तोत्र का 1, 3 या 11 बार पाठ करें। पाठ के अंत में भगवान शिव को अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगते हुए लोककल्याण की प्रार्थना करें।
Quick Information Table
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्तुति का नाम | शिव सुवर्णमाला स्तुति (Shiv Suvarnamala Stuti) |
| आराध्य देव | भगवान शिव (महादेव, साम्ब सदाशिव) |
| रचनाकार | आदिगुरु शंकराचार्य |
| भाषा | संस्कृत (देवनागरी लिपि) |
| मुख्य विषय | शरणागति, भक्ति, अंतःकरण शुद्धि और मोक्ष |
| पाठ का समय | प्रातःकाल, प्रदोष काल, सोमवार एवं महाशिवरात्रि |
| प्रमुख लाभ | मानसिक शांति, पापों का नाश और आध्यात्मिक उन्नति |
मुख्य सीख | Key Takeaways
- भगवान शिव के चरणकमल इस संसार रूपी भवसागर से पार लगाने वाले एकमात्र शरण स्थल हैं।
- आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र संस्कृत वर्णमाला के क्रम पर आधारित एक अद्वितीय साहित्यिक और आध्यात्मिक कृति है।
- सच्ची भक्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए बाह्य आडंबरों से अधिक अंतःकरण की पवित्रता आवश्यक है।
- नियमित रूप से इस स्तुति का पाठ करने से भय, रोग और मानसिक संताप दूर होते हैं।
- शिव और शक्ति का संयुक्त स्वरूप (साम्ब सदाशिव) संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना और ऊर्जा का प्रतीक है।
- शरणागति का भाव जीवन के समस्त संघर्षों को सहज बना देता है।
- महादेव की कृपा से साधक को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की शक्ति मिलती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस मार्गदर्शिका को सनातन धर्म के प्रमाणिक ग्रंथों, आदिगुरु शंकराचार्य की स्तोत्र परंपरा और पारंपरिक पंचांगीय पद्धतियों के आधार पर पाठकों की सुगमता के लिए तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों को सटीक और प्रामाणिक रूप में आप तक पहुंचाना है ताकि आपकी आध्यात्मिक यात्रा सुगम हो सके।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- शिव पुराण - कोटिरुद्र संहिता एवं विद्येश्वर संहिता
- शंकराचार्य ग्रन्थसंग्रह - स्तोत्र रत्नकर
- स्कंद पुराण - काशी खंड एवं महेश्वर खंड
- पारंपरिक सनातन स्तोत्र संग्रह एवं ज्योतिषीय संदर्भ ग्रंथ
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