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बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ लिरिक्स (Banke BihariTeri Aarti Gaau Lyrics in Hindi ) - Shaym Aarti Devendra Pathak Ji - Bhaktilok

142 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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श्री बांके बिहारी जी महाराज की यह पावन आरती "बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ" ब्रज मंडल और संपूर्ण भारतवर्ष के वैष्णव भक्तों के हृदय का हार है। यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संकलन नहीं, बल्कि भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य शरणागति, वात्सल्य और माधुर्य भाव का जीवंत प्रकटीकरण है। वृंदावन के सुप्रसिद्ध ठाकुर श्री बांके बिहारी जी के विग्रह की अलौकिक छवि, उनके मोर मुकुट, टेढ़ी बंसी और मंद मुस्कान का जो सजीव चित्रण इस आरती में मिलता है, वह भक्त के अंतःकरण में भक्ति रस का संचार कर देता है। पूज्य देवेंद पाठक जी महाराज और अन्य सिद्ध संतों द्वारा गाई गई यह आरती संध्या काल और प्रातः काल के समय मंदिरों एवं घरों में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाई जाती है। इस लेख में हम इस पावन आरती के संपूर्ण लिरिक्स, उसका गहरा आध्यात्मिक भावार्थ, कठिन शब्दों के अर्थ, गायन की विधि और इसके दार्शनिक महत्व का सविस्तार विवेचन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती पाठ | Complete Aarti Lyrics

॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ ॥

बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ।
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊँ।
आरती गाऊँ प्यारे आपको रिझाऊँ,
श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊँ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ...॥

मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे,
प्यारी बंसी मेरो मन मोहे।
देख छवि बलिहारी मैं जाऊँ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ...॥

चरणों से निकली गंगा प्यारी,
जिसने सारी दुनिया तारी।
मैं उन चरणों के दर्शन पाऊँ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ...॥

दास अनाथ के नाथ आप हो,
दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो।
हरी चरणों में शीश झुकाऊँ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ...॥

श्री हरीदास के प्यारे तुम हो,
मेरे मोहन जीवन धन हो।
देख युगल छवि बलि बलि जाऊँ।
॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ...॥

श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ,
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊँ।
आरती गाऊँ प्यारे आपको रिझाऊँ,
श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊँ।

आरती का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Meaning & Bhavarth

यह आरती भक्त और भगवान के बीच के अत्यंत घनिष्ठ और मधुर संबंध को दर्शाती है। इसके प्रत्येक अंतरे का भावार्थ इस प्रकार है:

मंगलाचरण एवं समर्पण (मुखड़ा)

"बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ..." - भक्त कहता है कि हे बांके बिहारी! हे टेढ़े नयनों और त्रिभंग ललित मुद्रा वाले प्रभु! मैं आपकी आरती गाकर आपको रिझाना चाहता हूँ। आरती के माध्यम से मैं अपने अहंकार को आपके चरणों में समर्पित कर रहा हूँ। हे गिरिधर (गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले), हे श्याम सुंदर! मेरी इस तुच्छ सेवा को स्वीकार करें।

रूप माधुरी का वर्णन (प्रथम अंतरा)

"मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे..." - प्रभु के अलौकिक सौंदर्य का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि आपके मस्तक पर सुशोभित मोर मुकुट और अधरों पर रखी प्यारी बंसी मेरे मन को पूरी तरह से मोह लेती है। आपकी इस त्रिभंगी और मनमोहक छवि को देखकर मैं स्वयं को न्योछावर (बलिहारी) करता हूँ।

चरण महिमा एवं गंगा की उत्पत्ति (द्वितीय अंतरा)

"चरणों से निकली गंगा प्यारी..." - भगवान विष्णु के वामन अवतार के समय उनके चरणों से पतितपावनी गंगा जी प्रकट हुईं, जिन्होंने संपूर्ण संसार का उद्धार किया। भक्त की अभिलाषा है कि वह उन्हीं परम पावन चरणों के निरंतर दर्शन प्राप्त करता रहे, जिससे उसका जीवन धन्य हो जाए।

शरणागति एवं सखा भाव (तृतीय अंतरा)

"दास अनाथ के नाथ आप हो..." - इस संसार में जिसका कोई रक्षक नहीं है, उसके रक्षक स्वयं बांके बिहारी जी हैं। जीवन के प्रत्येक सुख और दुःख में प्रभु ही सच्चे साथी हैं। भक्त पूर्ण विश्वास के साथ अपने शीश को हरि के चरणों में झुकाता है।

हरिदास संप्रदाय एवं युगल छवि (चतुर्थ अंतरा)

"श्री हरीदास के प्यारे तुम हो..." - स्वामी हरिदास जी महाराज की अनन्य साधना से प्रकट हुए ठाकुर जी महाराज भक्तों के जीवन धन हैं। यहाँ राधा-कृष्ण की सम्मिलित 'युगल छवि' का दर्शन होता है, जिस पर भक्त बार-बार बलिहारी जाता है।

कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Words

शब्द सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
बांके बिहारी त्रिभंग मुद्रा वाले कृष्ण जो तीन स्थानों (गर्दन, कमर, घुटने) से टेढ़े होकर खड़े होते हैं।
गिरिधर गिरि (पर्वत) को धारण करने वाले इंद्र का मानमर्दन कर गोवर्धन उठाने वाले रक्षक देव।
रिझाऊँ प्रसन्न करना / आकर्षित करना भक्ति भाव से भगवान के हृदय को जीतना।
बलिहारी स्वयं को न्योछावर करना अहंकार का पूर्ण विसर्जन और आत्मसमर्पण।
तारी उद्धार किया / भवसागर से पार उतारा गंगा जी द्वारा पतितों का उद्धार करने की शक्ति।
अनाथ जिसका कोई स्वामी या सहारा न हो संसार में असहाय जीव जो केवल ईश्वर के भरोसे है।
युगल छवि राधा-कृष्ण का सम्मिलित स्वरूप ब्रज रस की पराकाष्ठा जहाँ प्रिया-प्रियतम एक रूप हैं।

आरती में वर्णित देवता की महिमा | Glory of the Deity

ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज वृंदावन के प्राण हैं। उनकी महिमा अनंत है। वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत कृपालु और रसिक शिरोमणि हैं। इस आरती में उन्हें 'गिरिधर' और 'श्याम सुंदर' कहकर पुकारा गया है। बांके बिहारी जी का विग्रह कोई पाषाण प्रतिमा नहीं, बल्कि साक्षात रस स्वरूप ब्रह्म है। स्वामी हरिदास जी की संगीत साधना और सखी भाव की उपासना से प्रसन्न होकर निकुंज वन (नधिबन) से ठाकुर जी प्रकट हुए थे। उनकी महिमा यह है कि वे अपने भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर खिंचे चले आते हैं, इसीलिए मंदिर में उनके दर्शन के समय बार-बार पर्दा (पट) डाला जाता है ताकि कोई भक्त उनसे एकटक नैन न मिला ले, अन्यथा ठाकुर जी उसके साथ ही चल देंगे।

आरती का धार्मिक महत्व एवं फल | Religious Significance & Traditional Benefits

सनातन धर्म में आरती को 'नीराजन' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है विशेष रूप से प्रकाशित करना। "बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ" का नियमित गान करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति: इस आरती के मधुर स्वर और भावपूर्ण शब्द अशांत मन को तुरंत शांत करते हैं।
  • भक्ति का उदय: इसके नित्य गान से हृदय में 'रागानुगा भक्ति' और 'माधुर्य भाव' का विकास होता है।
  • पापों का नाश: भगवान के चरणों से निकली गंगा जी का स्मरण करने से संचित पापों का शमन होता है।
  • सुरक्षा और आश्रय: "दास अनाथ के नाथ आप हो" का भाव साधक में निर्भयता का संचार करता है।

आरती करने की सही विधि एवं थाली सज्जा | Aarti Vidhi & Thali Preparation

आरती की थाली सजाते समय पंचतत्वों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। विधि इस प्रकार है:

  1. थाली की तैयारी: तांबे, पीतल या चांदी की थाली में कुमकुम से अष्टदल कमल या स्वास्तिक बनाएं।
  2. दीपक: शुद्ध गाय के घी का पंचमुखी दीपक या कपूर रखें। कपूर की आरती को अत्यंत शुभ माना जाता है।
  3. पूजन सामग्री: थाली में अक्षत (साबुत चावल), पुष्प, चंदन, और नैवेद्य (मिश्री-माखन का भोग) रखें।
  4. आरती की प्रक्रिया: शांत चित्त होकर भगवान के विग्रह के सम्मुख खड़े हों और श्रद्धापूर्वक आरती का गायन प्रारंभ करें।

आरती करने का सही समय, दिशा एवं दीप घुमाने की विधि | Best Time & Movement

आरती करने के कुछ शास्त्रीय नियम हैं जिनका पालन करने से पूर्ण फल की प्राप्ति होती है:

  • समय: बांके बिहारी जी की आरती का सर्वोत्तम समय संध्याकाल (प्रदोष काल) और प्रातःकाल की पूजा का समय है।
  • दिशा: आरती करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
  • दीप घुमाने की विधि: शास्त्रों के अनुसार, आरती के दीपक को भगवान के चरणों के सम्मुख चार बार, नाभि के सम्मुख दो बार, मुखमंडल के सम्मुख एक बार और संपूर्ण विग्रह के सम्मुख सात बार गोलाकार घुमाना चाहिए। यह कुल सात बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए घुमाया जाता है।

आरती के दौरान घंटी, शंख एवं दीप का महत्व | Bell, Conch & Lamp Symbolism

आरती के समय बजने वाली घंटी और शंख केवल ध्वनि उत्पन्न नहीं करते, बल्कि इनका गहरा वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व है। घंटी की ध्वनि से वातावरण में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। शंख की ध्वनि विजय और मंगल का प्रतीक है। आरती का दीपक अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान के प्रकाश को फैलाने का प्रतीक है। जब हम आरती लेते हैं, तो हम उस दिव्य ज्योति की ऊर्जा को अपने मस्तक और नयनों में समाहित करते हैं।

घर में आरती कैसे करें एवं सावधानियां | Home Aarti & Rules

यदि आप अपने घर के मंदिर में बांके बिहारी जी की आरती कर रहे हैं, तो निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखें:

  • आरती करते समय तन और मन दोनों की शुद्धता अनिवार्य है। स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • आरती के दौरान स्वर में मधुरता और हृदय में आर्त भाव (पुकारने का भाव) होना चाहिए, न कि केवल औपचारिकता।
  • आरती समाप्त होने के बाद शंख से जल छिड़कें और सभी उपस्थित भक्तों को आरती एवं प्रसाद वितरित करें।
  • अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखें; दीपक या कपूर को बच्चों की पहुंच से दूर और सुरक्षित स्थान पर रखें।

आरती का आध्यात्मिक संदेश एवं दैनिक जीवन सीख | Spiritual Message & Daily Life

यह आरती हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी विषमताएं आएं, यदि हम भगवान के चरणों में समर्पित हैं, तो वे हमारे 'नाथ' बनकर हमारी रक्षा करेंगे। "दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो" की पंक्ति हमें सुख और दुःख दोनों स्थितियों में समभाव रहने की प्रेरणा देती है। यह हमें सिखाती है कि सांसारिक संबंध नश्वर हैं, केवल ईश्वर के साथ हमारा संबंध ही शाश्वत और सच्चा है।

Quick Information Table | एक नजर में आरती की जानकारी

आरती का नाम बांके बिहारी तेरी आरती गाऊँ (Banke Bihari Teri Aarti Gaau)
आराध्य देव श्री बांके बिहारी जी (भगवान श्री कृष्ण)
मुख्य गायक/प्रचारक पूज्य देवेंद्र पाठक जी महाराज एवं अन्य ब्रज के रसिक संत
भाषा ब्रजभाषा मिश्रित सरल हिंदी
मुख्य रस/भाव माधुर्य भाव, वात्सल्य एवं पूर्ण शरणागति
उत्पत्ति स्थल वृंदावन धाम (ब्रज मंडल)
उपयुक्त अवसर नित्य संध्या आरती, जन्माष्टमी, झूलन उत्सव, होली उत्सव

मुख्य आध्यात्मिक सीख | Key Takeaways

  • अनन्य भक्ति: भगवान को केवल बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि प्रेम और भाव से रिझाया जा सकता है।
  • समर्पण: अपने जीवन की बागडोर ठाकुर जी के हाथों में सौंप देना ही परम शांति का मार्ग है।
  • सत्संगति का महत्व: स्वामी हरिदास जी जैसे संतों के पद चिन्हों पर चलकर ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह आरती पारंपरिक ब्रज साहित्य से प्रेरित है और स्वामी हरिदास जी की शिष्य परंपरा के रसिक संतों द्वारा रची गई है। इसे वर्तमान में पूज्य देवेंद्र पाठक जी महाराज ने अपने मधुर कंठ से गाकर जन-जन में लोकप्रिय बनाया है।

'बांके' का अर्थ होता है टेढ़ा या त्रिभंगी। भगवान श्री कृष्ण जब बांसुरी बजाते हैं, तो वे तीन स्थानों से टेढ़े खड़े होते हैं। उनकी इस अति सुंदर और अनूठी त्रिभंग ललित मुद्रा के कारण ही उन्हें 'बांके बिहारी' कहा जाता है।

स्वामी हरिदास जी संगीत सम्राट और महान संत थे। उनकी अनन्य भक्ति और शास्त्रीय संगीत साधना से रीझकर ही ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज वृंदावन के निधिवन में प्रकट हुए थे। आरती में "श्री हरीदास के प्यारे तुम हो" पंक्ति इसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना को दर्शाती है।

इस आरती को आप नित्य प्रति संध्या वंदन के समय गा सकते हैं। इसके अतिरिक्त जन्माष्टमी, राधाष्टमी और अन्य वैष्णव उत्सवों पर इसका गायन विशेष फलदायी माना जाता है।

हाँ, आप घर के मंदिर में लड्डू गोपाल या बांके बिहारी जी का विग्रह रख सकते हैं, परंतु उनकी सेवा अत्यंत लाड-प्यार और वात्सल्य भाव से एक छोटे बच्चे की तरह की जानी चाहिए।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार में ब्रह्मांड को नापा था, तब उनके चरण के अंगूठे के स्पर्श से आकाशगंगा प्रवाहित हुई थी। वही गंगा जी पृथ्वी पर अवतरित हुईं। चूँकि बांके बिहारी जी साक्षात श्री कृष्ण (विष्णु अवतार) हैं, इसलिए उनके चरणों से गंगा की उत्पत्ति की बात कही गई है।

ताली बजाने से हमारे हाथों के एक्यूप्रेशर बिंदु सक्रिय होते हैं जिससे स्वास्थ्य लाभ होता है। आध्यात्मिक रूप से, ताली बजाकर हम अपने संचित पापों और मानसिक विकारों को दूर भगाते हैं और कीर्तन में लयबद्धता लाते हैं।

इस आरती के नियमित पाठ से साधक के भीतर अहंकार का शमन होता है, मानसिक तनाव दूर होता है और जीवन में सकारात्मकता, संतोष तथा भगवद-प्रेम का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस आरती के पाठ, भावार्थ और शास्त्रीय संदर्भों को ब्रज साहित्य, श्रीमद्भागवत महापुराण और स्वामी हरिदास संप्रदाय की प्रामाणिक परंपराओं के आलोक में संकलित और विश्लेषित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और भक्तिमय जानकारी पहुंचाना है ताकि वे अपनी दैनिक साधना को और अधिक समृद्ध बना सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - रासपंचाध्यायी एवं वेणुगीत संदर्भ)
  • स्वामी हरिदास जी की वाणी और अष्टछाप कवियों का साहित्य
  • वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर की आधिकारिक सेवा पद्धति और परंपराएं

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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