Kabir Das Ke Dohe मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

कबीर दास के दोहे (Kabir Das Ke Dohe Lyrics in Hindi ) - Kabir Doha

भक्ति भजन "कबीर दास के दोहे (Kabir Das Ke Dohe Lyrics in Hindi ) - Kabir Doha" के हिन्दी लिरिक्स, भावार्थ, माहात्म्य और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)। सनातन भक्ति परंपरा के अनुसार संकीर्तन के लाभ और विधि पढ़ें।

प्रस्तावना एवं परिचय

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा शुभ मुहूर्त">दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

Kabir Doha - Bhaktilok

दोहा 

तूँ तूँ करता तूँ भया मुझ मैं रही न हूँ। 

वारी फेरी बलि गई जित देखौं तित तूँ ॥ 

बेटा जाए क्या हुआ कहा बजावै थाल। 

आवन जावन ह्वै रहा ज्यौं कीड़ी का नाल॥ 

मुखि कड़ियाली कुमति की कहण न देई राम॥ 

जिस मरनै थै जग डरै सो मेरे आनंद। 

कब मरिहूँ कब देखिहूँ पूरन परमानंद॥ 

मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सो तेरा। 

तेरा तुझकौं सौंपता क्या लागै है मेरा॥ 

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा पंडित भया न कोइ। 

एकै आखर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होइ॥ 

काबा फिर कासी भया राम भया रहीम। 

मोट चून मैदा भया बैठ कबीर जीम॥ 

हम भी पांहन पूजते होते रन के रोझ। 

सतगुरु की कृपा भई डार्या सिर पैं बोझ॥ 

सब जग सूता नींद भरि संत न आवै नींद। 

काल खड़ा सिर ऊपरै ज्यौं तौरणि आया बींद॥ 

साँई मेरा बाँणियाँ सहजि करै व्यौपार। 

बिन डाँडी बिन पालड़ै तोलै सब संसार॥ 

बिरह जिलानी मैं जलौं जलती जलहर जाऊँ। 

मो देख्याँ जलहर जलै संतौ कहा बुझाऊँ॥ 

साँच बराबरि तप नहीं झूठ बराबर पाप। 

जाके हिरदै साँच है ताकै हृदय आप॥ 

जौं रोऊँ तौ बल घटै हँसौं तौ राम रिसाइ। 

मनहीं माँहि बिसूरणां ज्यूँ धुँण काठहिं खाइ॥ 

प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ प्रेमी मिलै न कोइ। 

प्रेमी कूँ प्रेमी मिलै तब सब विष अमृत होइ॥ 

सुखिया सब संसार है खाए अरु सोवै। 

दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै॥ 

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाँहिं। 

सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्या माँहि॥ 

हेरत हेरत हे सखी रह्या कबीर हिराई। 

बूँद समानी समुंद मैं सो कत हेरी जाइ॥ 

मन के हारे हार हैं मन के जीते जीति। 

कहै कबीर हरि पाइए मन ही की परतीति॥ 

पाणी ही तैं पातला धूवां हीं तैं झींण। 

पवनां बेगि उतावला सो दोस्त कबीरै कीन्ह॥ 

चकवी बिछुटी रैणि की आइ मिली परभाति। 

जे जन बिछूटे राम सूँ ते दिन मिले न राति॥ 

चाकी चलती देखि कै दिया कबीरा रोइ। 

दोइ पट भीतर आइकै सालिम बचा न कोई॥ 

सात समंद की मसि करौं लेखनि सब बनराइ। 

धरती सब कागद करौं तऊ हरि गुण लिख्या न जाइ॥ 

कबीर कुत्ता राम का मुतिया मेरा नाऊँ। 

गलै राम की जेवड़ी जित खैंचे तित जाऊँ॥ 

मन मथुरा दिल द्वारिका काया कासी जाणि। 

दसवाँ द्वारा देहुरा तामै जोति पिछांणि॥ 

माली आवत देखि के कलियाँ करैं पुकार। 

फूली-फूली चुनि गई कालि हमारी बार॥ 

हाड़ जलै ज्यूँ लाकड़ी केस जले ज्यूँ घास। 

सब तन जलता देखि करि भया कबीर उदास॥ 

कबीर यहु घर प्रेम का ख़ाला का घर नाँहि। 

सीस उतारै हाथि करि सो पैठे घर माँहि॥ 

नैनाँ अंतरि आव तूँ ज्यूँ हौं नैन झँपेऊँ। 

नाँ हौं देखौं और कूँ नाँ तुझ देखन देऊँ॥ 

सतगुरु हम सूँ रीझि करि एक कह्या प्रसंग। 

बरस्या बादल प्रेम का भीजि गया सब अंग॥ 

मुला मुनारै क्या चढ़हि अला न बहिरा होइ। 

जेहिं कारन तू बांग दे सो दिल ही भीतरि जोइ॥ 

कलि का बामण मसखरा ताहि न दीजै दान। 

सौ कुटुंब नरकै चला साथि लिए जजमान॥ 

प्रेम न खेतौं नीपजै प्रेम न दृष्टि बिकाइ। 

राजा परजा जिस रुचै सिर दे सो ले जाइ॥ 

कबीर मरनां तहं भला जहां आपनां न कोइ। 

आमिख भखै जनावरा नाउं न लेवै कोइ॥ 

हम घर जाल्या आपणाँ लिया मुराड़ा हाथि। 

अब घर जालौं तासका जे चले हमारे साथि॥ 

नर-नारी सब नरक है जब लग देह सकाम। 

कहै कबीर ते राम के जैं सुमिरैं निहकाम॥ 

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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "कबीर दास के दोहे (Kabir Das Ke Dohe Lyrics in Hindi ) - Kabir Doha - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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