भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं भजन इन हिंदी लिरिक्स

जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं भजन के हिंदी लिरिक्स और भावार्थ। श्री कृष्ण और खाटू श्याम जी की इस पावन पुकार को गाकर प्रभु की कृपा पाएं।

"जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं, साँवरे तुमको आना पड़ेगा" सनातन धर्म और विशेष रूप से कृष्ण-भक्ति परंपरा का एक अत्यंत भावपूर्ण, लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भजन है। यह भजन भक्त की अपने आराध्य श्री बांके बिहारी, खाटू श्याम या भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अटूट आस्था, पूर्ण शरणागति (Surrender) और आत्मीय पुकार को समर्पित है। भक्ति के मार्ग में जब साधक सांसारिक दुखों, संघर्षों और अकेलेपन से घिर जाता है, तब उसकी आत्मा से निकलने वाली यह करुण और दृढ़ पुकार परमात्मा को खींचकर लाने की सामर्थ्य रखती है। इस भजन का भाव (Bhava) विरह और मिलन के उस सूक्ष्म और पावन धरातल पर आधारित है, जहाँ भक्त को अपने इष्ट की उपस्थिति पर पूर्ण विश्वास होता है। कीर्तन मंडलियों, सत्संगों और एकांत साधना के समय इस भजन का गायन भक्तों के हृदय में भक्ति रस का संचार कर देता है और उन्हें यह अहसास कराता है कि भक्त की पुकार पर नारायण को दौड़े चले आना पड़ता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थायी (मखड़ा):

जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं, साँवरे तुमको आना पड़ेगा।
है क़सम तुमको हर पल में हाँ, साथ मेरा निभाना पड़ेगा।
जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं, साँवरे तुमको आना पड़ेगा।

पहला अंतरा:

तुझ को सौगंध है श्याम तेरी, लाज मेरी बचानी पड़ेगी।
खाके ठोकर अगर मैं गिरूं तो, आके मुझको उठाना पड़ेगा।
जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं, साँवरे तुमको आना पड़ेगा।

दूसरा अंतरा:

मैं तो हारा हूँ दुनिया से आकर, तेरी चौखट पे मैंने पुकारा।
अब तो माझी बनके कन्हैया, मेरी नैया को पार लगाना पड़ेगा।
जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं, साँवरे तुमको आना पड़ेगा।

तीसरा अंतरा:

लोग कहते हैं तुम हो दयालु, मैंने भी ये सुना है कन्हैया।
मेरी बारी में क्यों देर हो फिर, मुझको दर्शन दिखाना पड़ेगा।
जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं, साँवरे तुमको आना पड़ेगा।

अन्त में (समापन):

रूठ जाए जमाना भले ही, तुमको अपना बनाना पड़ेगा।
प्रेम की ये जो डोरी बंधी है, इसको ताउम्र निभाना पड़ेगा।
जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं, साँवरे तुमको आना पड़ेगा।
है क़सम तुमको हर पल में हाँ, साथ मेरा निभाना पड़ेगा।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन एक साधारण मनुष्य और उसके परम आराध्य के बीच के अगाध प्रेम और अधिकार भाव को प्रकट करता है। इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भक्त भगवान से केवल प्रार्थना नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें 'सौगंध' (कसम) देकर अपने पक्ष में खड़े होने का अधिकार मांग रहा है। भारतीय भक्ति साहित्य में सूरदास, मीराबाई और तुलसीदास जैसी महान परंपराओं में भक्त को भगवान पर ऐसा ही अनन्य अधिकार प्राप्त होता है।

भजन के मखड़े में भक्त कहता है कि हे साँवरे! जब भी मैं संकट में हूँ और तुम्हें पुकारूँ, तो तुम्हें हर हाल में मेरी सहायता के लिए आना ही होगा। यह कोई साधारण आग्रह नहीं, बल्कि एक बच्चे की अपने पिता के प्रति जिद और पुकार है। पहले अंतरे में भक्त कहता है कि यदि संसार के मार्ग में चलते हुए वह ठोकर खाकर गिर पड़े, तो उसके भगवान का यह कर्तव्य है कि वे उसे अपने हाथों से उठाएं। दूसरे अंतरे में दुनिया से थका-हारा भक्त भगवान की चौखट पर शरण लेता है और उन्हें अपने जीवन की नैया का 'माझी' (नाविक) बनाकर भंवर से पार लगाने की विनती करता है। सम्पूर्ण भावार्थ यह है कि भगवान और भक्त का संबंध किसी सौदेबाजी का नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और अटूट समर्पण का है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का सनातन धर्म और विशेषकर कृष्ण-भक्ति तथा खाटू श्याम भक्तों के बीच विशिष्ट स्थान है। इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • शरणागति का भाव: यह भजन जीव की ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति (Total Surrender) को दर्शाता है।
  • अधिकार भरी पुकार: इसमें भक्त और भगवान के बीच सेवक-स्वामी का संबंध न होकर सखा, प्रियतम या माता-संतान जैसा आत्मीय अधिकार झलकता है।
  • मानसिक संबल: जीवन की कठिन परिस्थितियों, निराशा और अकेलापन के समय इस भजन का श्रवण या गायन मन को असीम शांति और आत्मबल प्रदान करता है।
  • सार्वभौमिक लोकप्रियता: यह भजन किसी विशेष उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे एकांत साधना, सत्संग, जागरण और मंदिर के कार्यक्रमों में समान रूप से गाया जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भजन की दिव्यता और उसके आंतरिक प्रभाव को पूर्ण रूप से अनुभव करने के लिए इसे उचित विधि और भाव के साथ गाना या सुनना चाहिए:

  • उचित समय: ब्रह्म मुहूर्त, संध्या वंदन के समय, या एकांत में जब मन अशांत हो, तब इस भजन का श्रवण अत्यंत फलदायी होता है।
  • स्थान: घर के पूजा कक्ष में, मंदिर में, या किसी शांत स्थान पर बैठकर इसे गाया जा सकता है।
  • मानसिक स्थिति: भजन गाते समय आंखों में इष्ट की छवि और मन में पूर्ण विश्वास होना चाहिए कि प्रभु हमारी पुकार सुन रहे हैं।
  • साधना में उपयोग: नियमित श्री हनुमान चालीसा के पाठ या इष्ट आराधना के पश्चात इस प्रकार के भावपूर्ण भजनों का अभ्यास मन को केंद्रित करता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण, उनके बाल रूप, बांके बिहारी और कलयुग के अवतारी हारे के सहारे बाबा खाटू श्याम को समर्पित है। सनातन परंपरा में 'साँवरा' शब्द श्याम सुंदर श्रीकृष्ण का पर्याय है। जिन संतों और कवियों ने प्रेम लक्षणा भक्ति को बढ़ावा दिया, उनके काव्य में इसी प्रकार की विरह और मिलन की भाषा का प्रयोग मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं स्पष्ट किया है कि जो भक्त अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं बहन करता हूँ। यही वेदांत और भक्ति का सार इस भजन में प्रकट होता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

समकालीन लोक संगीत और संकीर्तन परंपरा में इस भजन की रचना आधुनिक भक्त कवियों द्वारा की गई है। इसे विभिन्न प्रसिद्ध भजन गायकों ने अपनी मधुर आवाज़ से सुसज्जित किया है। इसकी रचना का मुख्य उद्देश्य आम जनमानस को भक्ति के मार्ग से जोड़ना और भगवान के प्रति उनके अविश्वास या निराशा को दूर करना है। जब भक्त दुनिया के छल-छद्म से थक जाता है, तब ऐसे भजनों की पृष्ठभूमि उसे अपनी ओर आकर्षित करती है। यह भजन मौखिक परंपरा और आधुनिक ऑडियो-विजुअल माध्यमों के जरिए घर-घर तक पहुँचा है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सहज और आम बोलचाल की हिंदी तथा ब्रज-अवधि के निकट की लोकभाषा है। इसमें कठिन संस्कृत शब्दों के स्थान पर सीधे हृदय को छूने वाले शब्दों का प्रयोग किया गया है:

  • काव्य शैली: यह गेय शैली (Musical Metre) में रचित एक पद है, जिसे आसानी से ताल और धुन के साथ गाया जा सकता है।
  • अलंकार व प्रतीक: 'नैया पार लगाना', 'ठोकर खाकर गिरना', और 'साँवरे को सौगंध देना' जैसे लोक-प्रतीकों (Folk Symbols) का सुंदर प्रयोग किया गया है।
  • रस: इसमें मुख्य रूप से भक्ति रस, वात्सल्य रस और करुण रस का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है:

  1. निराशा से मुक्ति: जीवन में कितनी भी बड़ी बाधाएँ क्यों न आएँ, ईश्वर पर भरोसा कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
  2. अहंकार का त्याग: जब मनुष्य अपनी शक्ति पर अहंकार करना छोड़ देता है और ईश्वर को अपना सब कुछ मान लेता है, तब भगवान स्वयं उसकी डोर संभालते हैं।
  3. सच्चा प्रेम और निष्ठा: भगवान के साथ संबंध किसी स्वार्थ का नहीं, बल्कि अनन्य प्रेम का होना चाहिए।
  4. जैसे साधक शिव तांडव स्तोत्र के माध्यम से अपनी आंतरिक ऊर्जा को जाग्रत करते हैं, वैसे ही ऐसे भजनों से आंतरिक प्रेम भाव जागृत होता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
साँवरा श्यामवर्ण भगवान श्रीकृष्ण या खाटू श्याम भक्त के प्रियतम इष्टदेव
शरणागति / पुकार पूरी तरह समर्पित होकर मदद मांगना जीवात्मा की परमात्मा से मिलने की छटपटाहट
लाज बचाना सम्मान और मर्यादा की रक्षा करना द्रौपदी की चीरहरण कथा या भक्त प्रह्लाद की रक्षा जैसा संदर्भ
माझी नाव चलाने वाला / नाविक संसार रूपी भवसागर से पार लगाने वाले भगवान
चौखट दरवाजा या देहरी भगवान का धाम या शरण स्थल

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं, साँवरे तुमको आना पड़ेगा।"
भावार्थ: भक्त अपने इष्ट को याद दिला रहा है कि हमारा रिश्ता इतना गहरा है कि मेरे एक बार पुकारने भर से तुम्हें मेरी सहायता के लिए दौड़े चले आना ही होगा। यह भक्त का प्रभु के प्रति अधिकार है।

पंक्ति: "तुझ को सौगंध है श्याम तेरी, लाज मेरी बचानी पड़ेगी।"
भावार्थ: भक्त यहाँ भगवान को उनकी अपनी ही कसम (सौगंध) दे रहा है कि यदि मेरी इज्जत या मेरा धर्म संकट में पड़ा, तो मेरी प्रतिष्ठा बचाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है।

पंक्ति: "खाके ठोकर अगर मैं गिरूं तो, आके मुझको उठाना पड़ेगा।"
भावार्थ: संसार के रास्ते कठिन हैं, चलते-चलते यदि मैं निराश होकर गिर जाऊँ, तो मुझे अकेले नहीं छोड़ना है बल्कि अपने हाथों से उठाकर फिर से चलाना है।

पंक्ति: "अब तो माझी बनके कन्हैया, मेरी नैया को पार लगाना पड़ेगा।"
भावार्थ: संसार रूपी समुद्र में मेरा जीवन रूपी जहाज डगमगा रहा है। हे कन्हैया! अब तुम ही मेरे नाविक बनो और इसे सुरक्षित किनारे पर पहुँचाओ।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव से संबंधित सनातन शास्त्रों में कई श्लोक मिलते हैं। विशेष रूप से श्रीमद्भागवत गीता का यह प्रसिद्ध श्लोक इस भजन के मूल भाव को चरितार्थ करता है:

"अनन्याశ్चिन्तयन्तो मां యే জনাঃ পর্যুপਾਸতে।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥"

-- श्रीमद्भागवत गीता (अध्याय 9, श्लोक 22)

अर्थ: जो भक्तजन अन्य किसी का चिंतन न करते हुए निरंतर मेरे अनन्य प्रेम से मेरा स्मरण करते हैं, उन नित्य-युक्त पुरुषों का योग (आवश्यक वस्तु की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा) का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

श्रेणी / बिन्दु विवरण
भजन का नाम जब कभी तुमको आवाज दूँ मैं (Jab Kabhi Tumko Awaj Du Main)
आराध्य देव भगवान श्रीकृष्ण / खाटू श्याम / बांके बिहारी
मुख्य भाव (Bhava) प्रेम, विरह, शरणागति और अधिकार भाव
भाषा सरल हिंदी एवं लोक भाषा
उपयुक्त अवसर कीर्तन, जागरण, सत्संग, एकांत साधना
आध्यात्मिक फल मानसिक शांति, आत्मबल और ईश्वर पर अटूट विश्वास

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण, उनके बाल स्वरूप तथा कलयुग के अवतारी बाबा खाटू श्याम को समर्पित है।

इस भजन का मुख्य भाव भक्त की ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति और एक आत्मीय अधिकार है, जहाँ भक्त संकट के समय भगवान को आने के लिए बाध्य (सौगंध देकर) करता है।

हाँ, यह भजन एकांत में पूजा के समय या मानसिक अशांति होने पर ईश्वर से संवाद स्थापित करने का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है।

'साँवरे' शब्द का तात्पर्य श्याम वर्ण वाले भगवान श्रीकृष्ण अथवा खाटू श्याम जी से है, जिनका रूप अत्यंत मनमोहक माना गया है।

निश्चित रूप से। इस भजन का श्रवण और गायन भक्तों में अटूट विश्वास जगाता है कि संकट के समय ईश्वर उनकी रक्षा अवश्य करेंगे, जिससे मानसिक बल प्राप्त होता है।

इसे ढोलक, हारमोनियम और मंजीरे की थाप पर सामूहिक रूप से कोरस के साथ गाया जाता है, जहाँ मखड़े को सभी भक्त मिलकर दोहराते हैं।

हाँ, इसकी पंक्तियाँ बहुत लयबद्ध और सरल हिंदी में रचित हैं, जिससे इन्हें कोई भी बहुत कम समय में याद कर सकता है।

यद्यपि यह आधुनिक लोक-भजन परंपरा का हिस्सा हैं, परंतु इनका मूल भाव श्रीमद्भागवत गीता और पुराणों में वर्णित भगवान की शरणागति और भक्त-वात्सल्य की भावना पर पूरी तरह आधारित है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस लेख में प्रस्तुत भजन के लिरिक्स, अर्थ, भावार्थ और आध्यात्मिक संदर्भों को सनातन भक्ति परंपरा, श्री कृष्ण लीलाओं और आधुनिक संकीर्तन शैली को ध्यान में रखते हुए प्रामाणिक रूप से संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को उच्च कोटि की devotional सामग्री प्रदान करना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
  • सनातन भक्ति साहित्य एवं लोक कीर्तन परंपरा
  • भक्तिकालीन पद संग्रह एवं संकीर्तन ग्रंथ

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 08 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!