भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

देख लिया संसार हमने देख लिया भजन इन हिंदी लिरिक्स भजन - पूज्य श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज

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देख लिया संसार हमने देख लिया भजन इन हिंदी लिरिक्स - पूज्य श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज

अपडेटेड: मई 2026 स्वर: पूज्य श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज श्रेणी: वैराग्य और भक्ति भजन

सनातन भक्ति परंपरा में संकीर्तन और प्रभु नाम का स्मरण जीवात्मा के उद्धार का परम साधन माना गया है। पूज्य श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज की मधुर वाणी में गाया गया यह पावन भजन "देख लिया संसार हमने देख लिया" मनुष्य को माया मोह के आवरण से मुक्त कर आत्मिक जागृति का संदेश देता है। यह भजन केवल एक संगीत रचना नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि का दार्शनिक दर्शन है जो संसार की नश्वरता और भगवान के चरणों में अनन्य प्रेम की महत्ता को उजागर करता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस दिव्य भजन के संपूर्ण लिरिक्स, गूढ़ भावार्थ, गायन विधि और इसके आध्यात्मिक महत्व का रसास्वादन करेंगे।


सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

[ मुखड़ा ]

देख लिया संसार हमने देख लिया,
यहाँ सब मतलब का यार है,
देख लिया संसार हमने देख लिया।

[ अंतरा १ ]

रिश्ते नाते जितने देखे, सब निकले मतवाले,
सुख के साथी सब जग में हैं, दुःख में मुँह मोड़ने वाले।
मतलब का संसार है, मतलब का व्यवहार है,
देख लिया संसार हमने देख लिया...

[ अंतरा २ ]

माया के बंधन में फँसकर, मूरख जन क्यों डोलत है,
अंत समय में सांची कहिए, कौन सखा संग बोलत है?
बिन हरि नाम के बैरागी, जीवन बेकार है,
देख लिया संसार हमने देख लिया...

[ अंतरा ३ ]

राजेश्वर पद शीश झुकाकर, अब तो शरण तिहारी है,
इस भवसागर से प्रभुजी, अब नैया लगानी पार है।
चरणों की धूलि मिले, जीवन का सार है,
देख लिया संसार हमने देख लिया...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत करने वाला एक महान वैराग्य गीत है। इसके माध्यम से पूज्य श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज ने सांसारिक संबंधों की सच्चाई को अत्यंत ही सरल और मार्मिक भाषा में प्रस्तुत किया है। मनुष्य जीवन भर जिन भौतिक बंधनों और पारिवारिक-सामाजिक संबंधों को शाश्वत मानकर उनमें उलझा रहता है, विपत्ति के समय वे सभी मोह-माया के आवरण मात्र सिद्ध होते हैं।

भजन की शुरुआत इस कठोर किंतु परम सत्य से होती है कि इस संसार में अधिकांश संबंध स्वार्थ और मतलब पर टिके हुए हैं। सुख के दिनों में संग रहने वाले लोग संकट के समय दूरी बना लेते हैं। भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए भी मनुष्य को अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से अनुराग रखना चाहिए, क्योंकि अंत समय में केवल भगवान का पवित्र नाम और उनके चरणों की भक्ति ही जीव की सच्ची सहचर बनती है। साधक जब सांसारिक मोह से विरक्त होकर भगवान की शरण में जाता है, तभी उसे सच्ची शांति और भवसागर से मुक्ति मिलती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • भक्ति रस और वैराग्य का संगम: यह भजन साधक के मन में वैराग्य भाव जागृत कर उसे आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर करता है।
  • मानसिक शांति की प्राप्ति: सांसारिक दुखों और अपेक्षाओं से विरक्त होकर ईश्वर स्मरण करने से मानसिक तनाव दूर होता है।
  • सत्संग परंपरा का विस्तार: संतों की वाणी के माध्यम से सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को जन-जन तक पहुँचाना इस भजन का मुख्य उद्देश्य है।
  • शरणागति का मार्ग: भगवान के चरणों में पूर्ण समर्पण (शरणागति) के महत्व को यह भजन अत्यंत प्रभावशाली ढंग से रेखांकित करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस प्रकार के वैराग्य पूर्ण भजनों को एकांत में, प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्या बेला में सपरिवार सुनना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसे दैनिक पूजा, साधना सत्र, साप्ताहिक सत्संग या किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के दौरान गाया जा सकता है।

गायन से पूर्व आसन पर सुव्यवस्थित बैठकर दीप प्रज्वलित करें, मन को शांत करें और भगवान श्री हरि या अपने इष्टदेव का स्मरण करते हुए इस भजन के भावों को अपने हृदय में उतारें। इसे आप श्री हनुमान चालीसा के पाठ के उपरांत या संध्याकालीन आरती के समय भी सुन सकते हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन किसी एक विशिष्ट देवी या देवता तक सीमित न होकर संपूर्ण सनातन आराध्य शक्ति एवं परम ब्रह्म परमात्मा को समर्पित है। इसके रचयिता व प्रणेता पूज्य श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज हैं, जो अपनी ओजस्वी वाणी, सरल प्रवचन शैली और अनूठे संकीर्तन के लिए जाने जाते हैं। महाराज श्री ने अपने जीवन को भागवत कथा, संत वाणी और जन-कल्याण के कार्यों में समर्पित किया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

संतों और महात्माओं की वाणी अनुभव पर आधारित होती है। श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज ने समाज के व्यावहारिक अनुभवों, मानवीय संबंधों की नश्वरता और सांसारिक माया के प्रभावों को सूक्ष्मता से निहारते हुए इस भजन की रचना की। इसका उद्देश्य किसी की आलोचना करना नहीं, बल्कि मनुष्य को भ्रम से निकालकर उसके वास्तविक गंतव्य अर्थात भगवत प्राप्ति की ओर प्रेरित करना है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन सरल और सुबोध हिंदी (ब्रज एवं खड़ी बोली के संमिश्रण) में रचा गया है। इसकी शब्दावली इतनी सहज है कि सामान्य जनमानस भी इसके मर्म को तुरंत समझ सकता है। इसमें रूपक अलंकार और शांत रस का सुंदर प्रयोग हुआ है, जो श्रोता के मन को एक गहरी शांति और अंतर्मुखता प्रदान करता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • अपेक्षाएं त्यागें: मनुष्यों से अत्यधिक अपेक्षाएं दुख का कारण बनती हैं, अतः अपनी आसक्ति केवल ईश्वर से रखें।
  • नश्वरता का बोध: संसार की हर वस्तु परिवर्तनशील है, इसलिए अपनी आत्मा के उत्थान पर ध्यान दें।
  • नाम जाप की महत्ता: कलियुग में प्रभु का नाम ही एकमात्र तारणहार है।
  • नम्रता और सेवा: अहंकार को त्याग कर संतों और भगवान की शरण में रहना ही कल्याणकारी है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
संसार दुनिया / भौतिक जगत माया से आच्छादित नश्वर क्षेत्र
मतलब का यार स्वार्थी संबंध शर्तों और स्वार्थ पर आधारित रिश्ते
माया के बंधन मोह-माया की जंजीरें व्यक्ति को ईश्वर से दूर रखने वाले भ्रम
भवसागर जन्म-मृत्यु का चक्र कठिन सांसारिक जीवन जिसे पार करना है
शरण तिहारी आपकी शरण ईश्वर के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"देख लिया संसार हमने..." - इस प्रथम पंक्ति में साधक अपने जीवन के अनुभवों का निचोड प्रस्तुत करते हुए कहता है कि मैंने इस दुनिया के हर पहलू को भली-भांति परख लिया है।

"यहाँ सब मतलब का यार है..." - यहाँ अधिकांश लोग स्वार्थवश ही संबंध रखते हैं, जब तक आपका उपयोग है, तब तक अपनापन दिखाते हैं।

"इस भवसागर से प्रभुजी..." - अंत में साधक भगवान से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! अब आप ही मेरी नैया को इस अथाह और कष्टदायक संसार सागर से पार लगाइए।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस वैराग्य भाव को पुष्ट करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:

"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां యే जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥"

(गीता, अध्याय 9, श्लोक 22)

भावार्थ: जो भक्त अन्य किसी का चिंतन न करते हुए निरंतर अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनका योगक्षेम (आवश्यकताओं की पूर्ति और रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ। इसी प्रकार आप शिव तांडव स्तोत्र के पाठ से भी अपने भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम देख लिया संसार हमने देख लिया
स्वर / गायक पूज्य श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज
भाषा सरल हिंदी (ब्रज-खड़ी बोली प्रभाव)
विषय एवं थीम वैराग्य, भक्ति, संसार की नश्वरता, शरणागति
प्रमुख भाव आत्मनिरीक्षण, वैराग्य, ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम
उपयुक्त अवसर सत्संग, एकांत साधना, प्रातः/संध्या वंदन

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह पावन भजन प्रसिद्ध संत एवं वक्ता पूज्य श्री राजेश्वरानन्द जी महाराज की मधुर वाणी में गाया गया है।

इस भजन का मुख्य संदेश संसार की नश्वरता को पहचानकर अपनी आसक्ति भौतिक वस्तुओं के बजाय केवल परमेश्वर के चरणों में लगाना है।

हाँ, यह भजन किसी भी धार्मिक सत्संग, पारिवारिक अनुष्ठान या व्यक्तिगत साधना के दौरान सुनने और गाने के लिए अत्यंत उत्तम है।

वैराग्य पूर्ण भजन सुनने से मन का भटकाव कम होता है, अहंकार का नाश होता है और ईश्वर के प्रति भक्ति भाव प्रबल होता है।

जी हाँ, इस लेख में संपूर्ण भजन के बोल देवनागरी लिपि में और सरल अर्थ सहित उपलब्ध कराए गए हैं।

नियमित संत संग, ईश्वर का नाम जाप और कर्तव्य कर्म निष्काम भाव से करने से मोह-माया के बंधनों से सहज मुक्ति मिलती है।

प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) अथवा संध्या बेला का समय भजन और ध्यान के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

शरणागति का अर्थ अपने अहंकार और कर्तापन के भाव को त्यागकर पूर्ण रूप से भगवान की इच्छा पर निर्भर हो जाना है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री। इस आलेख को सनातन धर्म की संत वाणी, संकीर्तन परंपरा और प्रामाणिक दार्शनिक सिद्धांतों के आधार पर तैयार किया गया है ताकि पाठकों को शुद्ध भक्ति रस और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता (यथार्थ गीता प्रेस गोरखपुर)
  • संत वाणी एवं संकीर्तन परंपरा संग्रह
  • वैराग्य शतकम एवं भक्ति ग्रंथ

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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