भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

आँचल तो आँचल ही है नारी सिर का सृंगार भजन इन हिंदी

पढ़ें आँचल तो आँचल ही है नारी सिर का सृंगार भजन इन हिंदी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

भारतीय सनातन संस्कृति में नारी को शक्ति, श्रद्धा और मर्यादा का साक्षात स्वरूप माना गया है। "आँचल तो आँचल ही है नारी सिर का सृंगार" एक ऐसा ही अत्यंत भावपूर्ण, मर्मस्पर्शी और उपदेशात्मक भजन है जो नारी के गौरव, उसकी लज्जा, शील और समाज में उसके सर्वोच्च स्थान को रेखांकित करता है। इस भजन में 'आँचल' को केवल वस्त्र का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि नारी की गरिमा, मातृत्व, पतिव्रत धर्म और उसकी आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना गया है। यह गीत हमें महाभारत काल की द्रौपदी की पुकार, राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा और माता तारा रानी के त्याग जैसे महान पौराणिक प्रसंगों की याद दिलाता है। इस लेख के माध्यम से हम इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, उसका विस्तृत भावार्थ, पौराणिक संदर्भ और इसके गहरे आध्यात्मिक संदेशों का अनुशीलन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

आँचल तो आँचल ही है नारी सिर का सृंगार,
जो भी इसे सम्हाल के रक्खे वो है पतिव्रता नार।

सुनता हूं सुनो कहता जिसे संसार आँचल है,
पतिव्रता सती नारी का ये सृंगार आँचल है।
हमेसा साफ सच्चाई का सदा इजहार आँचल है,
दया और धर्म लज्जा का सदा रखवाला आँचल है।

इसी आँचल के पर्दे में जवानी मुस्कुराती है,
इसी आँचल में लज्जा गैर मर्दों से बचाती है।
इसी आँचल को दुल्हन ओढ़के ससुराल जाती है,
इसी आँचल के भीतर कुछ दिनों में लाल पाती है।

इसी आँचल की खातिर दुर्योधन तमाम जुल्म ढाया था,
इसी आँचल की खातिर दुस्सासन द्रोपदी को जंघेपर बिठाया था।
इसी आँचल को दुशासन ने जब सभा मे खिंचा था,
इसी आँचल को रोरो के द्रोपदी ने अंसुवो से सींचा था।

इसी आँचल की खातिर पांडवो ने मस्तक झुकाया था,
लगाई टेर जब द्रोपदी तो कृष्ण ने यही आँचल बढ़ाया था।
इसी आँचल की खातिर हरिश्चन्द्र ने मरघट पे दहाड़ा था,
इसी आँचल को तारा रानी ने मरघट पे फाड़ा था।

ये आँचल अगर नारी के सर से सरकता है,
तो कांटा बनके दुनिया की निगाहों में खटकता है।
ये आँचल जिस दिन नारी के सिर से उतर जाए,
वो नारी शर्म वाली डूब के पानी में मर जाये।

ये आँचल राधा रानी की है ये मैला हो नहीं सकता,
जरा सा दाग लग जाये तो कोई धो नहीं सकता।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का केंद्रीय भाव नारी की मर्यादा और उसके शील की रक्षा करना है। भारतीय वैदिक परंपरा में 'लज्जा' या 'मर्यादा' को नारी का सबसे बड़ा आभूषण माना गया है। भजन की शुरुआत में ही यह स्पष्ट किया गया है कि आँचल केवल एक भौतिक वस्त्र नहीं है, बल्कि यह नारी के मस्तक का मुकुट और उसका वास्तविक श्रृंगार है। जो स्त्री अपने इस शील और मर्यादा को संभालकर रखती है, वही समाज में पूजनीय और पतिव्रता कहलाती है।

भजनकार कहते हैं कि यह आँचल सत्य, दया, धर्म और लज्जा का रक्षक है। यह समाज की कुत्सित दृष्टि से नारी की रक्षा करता है। जब एक कन्या वधू बनकर ससुराल जाती है, तो वह इसी आँचल की ओट में अपनी नई गृहस्थी का आरंभ करती है। यही आँचल मातृत्व का प्रतीक बनता है, जिसके साये में वह अपनी संतान (लाल) का पालन-पोषण करती है।

आगे के छंदों में भजनकार ने इतिहास और पुराणों के उन प्रसंगों का उल्लेख किया है जहाँ नारी के आँचल (चीर) की रक्षा के लिए धर्मयुद्ध हुए। महाभारत का युद्ध द्रौपदी के चीरहरण और उसके आँचल के अपमान का ही परिणाम था। जब दुशासन ने भरी सभा में द्रौपदी के आँचल को खींचने का दुस्साहस किया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अनंत अवतार लेकर उस आँचल की लंबाई बढ़ा दी और धर्म की रक्षा की। इसी प्रकार, राजा हरिश्चंद्र और तारा रानी की कथा के माध्यम से सत्य और मर्यादा के कठिन संघर्ष को दर्शाया गया है। अंत में, राधा रानी के पावन चरित्र का स्मरण करते हुए कहा गया है कि यह आँचल अत्यंत पवित्र है, इस पर चरित्रहीनता का कोई दाग नहीं लगना चाहिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह समाज को नैतिक और चारित्रिक रूप से जाग्रत करने वाला एक सांस्कृतिक दस्तावेज है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • मर्यादा का संदेश: यह भजन आधुनिक समाज को अपनी जड़ों और नैतिक मूल्यों से जुड़ने की प्रेरणा देता है।
  • पौराणिक संदर्भों का समागम: इसमें द्रौपदी, पांडव, श्रीकृष्ण, राजा हरिश्चंद्र और तारा रानी जैसे महान चरित्रों का उदाहरण देकर बात को प्रामाणिक बनाया गया है।
  • मातृत्व और वात्सल्य की महिमा: आँचल को केवल लज्जा का ही नहीं, बल्कि मातृत्व की छांव का भी प्रतीक बताया गया है।
  • आध्यात्मिक शुद्धता: राधा रानी के नाम का उल्लेख करके भजन को लौकिक धरातल से उठाकर अलौकिक और दिव्य धरातल पर स्थापित किया गया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यह भजन अत्यंत गंभीर और उपदेशात्मक श्रेणी का है। इसे गाने और सुनने के लिए निम्नलिखित समय और विधि सर्वोत्तम मानी जाती है:

  • सत्संग और पारिवारिक समारोह: इस भजन को पारिवारिक सत्संगों, महिला संगीत, और धार्मिक उत्सवों के दौरान गाया जाता है ताकि युवा पीढ़ी को मर्यादा और संस्कारों की सीख दी जा सके।
  • गायन की शैली: इसे शास्त्रीय या सुगम संगीत के अंतर्गत करुण और शांत रस में गाया जाना चाहिए। हारमोनियम और ढोलक की धीमी थाप पर इसका प्रभाव अत्यंत गहरा होता है।
  • भावपूर्ण श्रवण: इस भजन को सुनते समय मन में नारी शक्ति के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव होना आवश्यक है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन किसी एक विशिष्ट देवी-देवता को समर्पित न होकर संपूर्ण नारी शक्ति और उनके संरक्षकों को समर्पित है। फिर भी, इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित दिव्य चरित्रों का स्मरण किया गया है:

  • भगवान श्रीकृष्ण: जिन्होंने द्रौपदी की करुण पुकार सुनकर उनके चीर (आँचल) को अनंत कर दिया और उनकी लाज बचाई।
  • माता द्रौपदी: जो धैर्य, आत्मसम्मान और अनन्य भक्ति की प्रतिमूर्ति हैं।
  • श्री राधा रानी: जो परम आह्लादिनी शक्ति हैं और जिनका चरित्र निष्कलंक और दिव्य प्रेम से परिपूर्ण है।
  • सती तारा रानी और राजा हरिश्चंद्र: जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाले आदर्श दंपत्ति हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन उत्तर भारत की लोक-भक्ति परंपरा से उपजा है। इसके रचयिता पारंपरिक लोक कवि रहे हैं जिन्होंने समाज में नैतिक मूल्यों के ह्रास को रोकने और नारी के प्रति आदर भाव जाग्रत करने के उद्देश्य से इसकी रचना की। ग्रामीण अंचलों में होने वाले कीर्तनों और भजनों में इसे 'नारी शिक्षा' और 'संस्कार गीत' के रूप में बहुत चाव से गाया जाता है। यह गीत इस बात का प्रमाण है कि लोक संगीत किस प्रकार समाज को दिशा देने का कार्य करता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें लोकभाषा के शब्दों का सुंदर समन्वय है। इसकी काव्य शैली में निम्नलिखित विशेषताएं देखी जा सकती हैं:

  • अनुप्रास और रूपक अलंकार: 'आँचल' को दया, धर्म और लज्जा का रखवाला बताकर रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है।
  • गेयता (Musicality): इसके अंतरे और मुखड़े का तुकबंदी संयोजन ऐसा है कि इसे कोई भी साधारण श्रोता आसानी से गुनगुना सकता है।
  • वीर और करुण रस का मिश्रण: जहाँ द्रौपदी के चीरहरण का वर्णन है वहाँ करुण रस प्रधान है, और जहाँ पांडवों तथा श्रीकृष्ण के धर्म की बात आती है वहाँ वीर और शांत रस का संचार होता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें दैनिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. नारी का सम्मान ही राष्ट्र का सम्मान है: जिस समाज में नारी की मर्यादा सुरक्षित नहीं रहती, उसका पतन निश्चित है, जैसा कि दुर्योधन और उसके साम्राज्य का हुआ।
  2. शरणगति की शक्ति: द्रौपदी की कथा हमें सिखाती है कि जब संसार के सारे सहारे टूट जाते हैं, तब ईश्वर पर पूर्ण विश्वास और समर्पण ही हमारी रक्षा करता है।
  3. सत्य पर अडिग रहना: राजा हरिश्चंद्र और तारा रानी का प्रसंग सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने धर्म और सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए।
  4. चरित्र की पवित्रता: राधा रानी के आँचल का उदाहरण देकर यह समझाया गया है कि मनुष्य को अपने चरित्र को निष्कलंक रखना चाहिए, क्योंकि चरित्र पर लगा दाग आसानी से नहीं धुलता।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ भजन के संदर्भ में महत्व
आँचल साड़ी का पल्लू या घूंघट नारी की मर्यादा, शील और मातृत्व का प्रतीक।
पतिव्रता पति के प्रति निष्ठावान स्त्री उच्च नैतिक चरित्र वाली नारी।
लज्जा शर्म या संकोच नारी का आंतरिक गुण जो उसकी रक्षा करता है।
लाल पुत्र या संतान मातृत्व की प्राप्ति और वंश का विस्तार।
टेर पुकार या प्रार्थना द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण को संकट के समय दी गई आवाज।
मरघट शमशान घाट राजा हरिश्चंद्र और तारा रानी के कठिन संघर्ष का स्थल।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"आँचल तो आँचल ही है नारी सिर का सृंगार..."
नारी के सिर पर सुशोभित आँचल उसका सबसे बड़ा आभूषण है। जो स्त्री अपनी इस मर्यादा को सहेज कर रखती है, वह समाज में अत्यंत आदरणीय होती है।

"इसी आँचल के पर्दे में जवानी मुस्कुराती है..."
यह आँचल नारी की युवावस्था को शालीनता प्रदान करता है और उसे समाज की बुरी नजरों से सुरक्षित रखता है। विवाह के समय वधू इसी आँचल को ओढ़कर नए जीवन में प्रवेश करती है और बाद में इसी आँचल की छांव में अपनी संतान को ममता प्रदान करती है।

"इसी आँचल की खातिर दुर्योधन तमाम जुल्म ढाया था..."
इतिहास गवाह है कि जब-जब इस आँचल का अपमान हुआ, तब-तब विनाशकारी युद्ध हुए। दुर्योधन और दुशासन ने द्रौपदी के आँचल को खींचकर जो पाप किया था, उसी के कारण कुरुवंश का समूल नाश हो गया।

"लगाई टेर जब द्रोपदी तो कृष्ण ने यही आँचल बढ़ाया था..."
जब द्रौपदी ने असहाय होकर भगवान द्वारकाधीश को पुकारा, तो प्रभु ने चीर बढ़ाकर उनके आँचल की लाज रखी। यह ईश्वर की भक्तवत्सलता का अनुपम उदाहरण है।

"ये आँचल राधा रानी की है ये मैला हो नहीं सकता..."
यह आँचल साक्षात राधा रानी की भक्ति और पवित्रता का स्वरूप है। इस पर चरित्रहीनता का कोई भी दाग नहीं लगना चाहिए, क्योंकि चरित्र की शुद्धता ही जीवन की वास्तविक पूंजी है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

नारी की महिमा और मर्यादा को दर्शाने वाले शास्त्रों के कुछ पावन श्लोक निम्नलिखित हैं, जो इस भजन के भाव को और अधिक पुष्ट करते हैं:

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

अर्थ: जहाँ नारियों की पूजा (सम्मान) होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। और जहाँ इनका सम्मान नहीं होता, वहाँ किए गए सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं।

या देवी सर्वभूतेषु लज्जा-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में लज्जा (मर्यादा) के रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण बिंदु महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम आँचल तो आँचल ही है नारी सिर का सृंगार
मुख्य विषय नारी मर्यादा, शील, मातृत्व और पौराणिक गौरव
प्रमुख पात्र संदर्भ द्रौपदी, श्रीकृष्ण, हरिश्चंद्र, तारा रानी, राधा रानी
काव्य भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
मुख्य रस करुण रस, शांत रस और भक्ति रस
उपयुक्त अवसर सत्संग, महिला संगीत, पारिवारिक भजन संध्या

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश नारी की गरिमा, शील, मर्यादा और चरित्र की पवित्रता की रक्षा करना है। यह समाज को नारी शक्ति के प्रति आदर भाव रखने की सीख देता है।

द्रौपदी और दुशासन का प्रसंग यह दर्शाता है कि जब भी किसी समाज में नारी के आँचल (सम्मान) पर हाथ डाला जाता है, तो उसका परिणाम विनाशकारी होता है। यह प्रसंग अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है।

राजा हरिश्चंद्र और तारा रानी ने सत्य की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व दान कर दिया था। शमशान (मरघट) में भी तारा रानी ने अपनी मर्यादा और आँचल की रक्षा की, जो उनके अडिग पतिव्रत धर्म को दर्शाता है।

इस पंक्ति का अर्थ है कि नारी का चरित्र राधा रानी की तरह निष्कलंक और दिव्य होना चाहिए। जिस प्रकार राधा जी का प्रेम और चरित्र परम पावन है, उसी प्रकार हर नारी को अपने चरित्र को बेदाग रखना चाहिए।

नहीं, यह भजन संपूर्ण समाज के लिए है। यह पुरुषों को नारी के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण रखने और महिलाओं को अपनी सांस्कृतिक मर्यादाओं को अक्षुण्ण रखने की प्रेरणा देता है।

इसे आमतौर पर पारंपरिक लोक धुनों या राग भैरवी के शांत और करुण स्वर में गाया जाता है, जिससे इसके शब्दों की गंभीरता श्रोताओं के हृदय तक पहुँच सके।

'लाल पाती है' का अर्थ है संतान की प्राप्ति होना। आँचल के भीतर ही माँ अपनी संतान को दूध पिलाती है और उसे सुरक्षा प्रदान करती है, जो मातृत्व की पराकाष्ठा है।

यह भजन आधुनिकता की चकाचौंध में खो रहे पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों और नैतिक आचरण को पुनर्जीवित करने का प्रयास करता है। यह समाज को सुसंस्कृत बनाने में सहायक है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को तैयार करने के लिए पारंपरिक लोक साहित्यों, महाभारत के सभा पर्व के प्रसंगों और श्रीमद्भागवत महापुराण के संदर्भों का बारीकी से अध्ययन किया गया है। संपादकीय टीम ने यह सुनिश्चित किया है कि भजन के मूल शब्दों की प्रामाणिकता बनी रहे और इसका भावार्थ पाठकों को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध करे।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • महाभारत (सभा पर्व): द्रौपदी चीरहरण प्रसंग और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा चीर बढ़ाने की कथा।
  • श्रीमद्भागवत महापुराण: गोपी गीत और राधा रानी के दिव्य चरित्र का वर्णन।
  • मनुस्मृति: नारी के सामाजिक और धार्मिक स्थान से जुड़े श्लोक।
  • पारंपरिक लोक भजन संग्रह: उत्तर भारतीय सत्संग परंपरा के मौखिक और लिखित संकलन।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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