Hanuman Bhajan मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

आ लौट के आजा हनुमान भजन इन हिंदी

पढ़ें आ लौट के आजा हनुमान भजन इन हिंदी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

"आ लौट के आजा हनुमान" एक अत्यंत भावुक, हृदयस्पर्शी और करुणा रस से ओत-प्रोत हनुमान भजन है। यह भजन रामायण के उस अत्यंत संवेदनशील और संकटपूर्ण प्रसंग पर आधारित है, जब युद्ध भूमि में मेघनाद की वीरघातिनी शक्ति के प्रहार से लक्ष्मण जी मूर्छित हो जाते हैं। उस समय मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम एक साधारण मनुष्य की भांति विलाप करते हुए अपने परम भक्त और संकटमोचन पवनपुत्र हनुमान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के अनन्य संबंध, विरह, व्याकुलता और अटूट विश्वास को दर्शाता है। जब जीवन में घोर संकट छा जाए और चारों ओर अंधकार दिखाई दे, तब इस भजन का गायन और श्रवण मन को असीम शांति, संबल और संकटों से उबरने का मार्ग प्रदान करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

आ लौट के आजा हनुमान भजन

आ लौट के आजा हनुमान, आ लौट के आजा हनुमान,
आ लौट के आजा हनुमान, तुझे श्री राम बुलाते हैं।
ऊ लक्ष्मण के बचाले प्राण, ऊ लक्ष्मण के बचाले प्राण,
तुझे श्री राम बुलाते हैं।
आ लौट के आजा हनुमान, तुझे श्री राम बुलाते हैं।

गये संजीवन लाने पवंसुत, अब तक क्यूँ नहीं आए,
सेनापति सुग्रीव पुकारे नर वानर कुम्हलाए,
गये संजीवन लाने पवंसुत, अब तक क्यूँ नहीं आए,
सेनापति सुग्रीव पुकारे नर वानर कुम्हलाए,
सब लोग भाए सुनसान, सब लोग भाए सुनसान,
तुझे श्री राम बुलाते हैं।
आ लौट के आजा हनुमान, तुझे श्री राम बुलाते हैं।

बीत गयी सब रैन, घड़ी भर अब तो रह गयी बाकी,
देख- देख कर राह तुम्हारी, बैरन अंखिया ताकि,
बीत गयी सब रैन, घड़ी भर अब तो रह गयी बाकी,
देख- देख कर राह तुम्हारी, बैरन अंखिया ताकि,
कही उदय ना हो जाए भान, कही उदय ना हो जाए भान,
तुझे श्री राम बुलाते हैं।
ऊ लक्ष्मण के बचाले प्राण, ऊ लक्ष्मण के बचाले प्राण,
तुझे श्री राम बुलाते हैं।
आ लौट के आजा हनुमान, तुझे श्री राम बुलाते हैं।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का भावार्थ अत्यंत मर्मस्पर्शी है। यह उस समय की स्थिति का वर्णन करता है जब लक्ष्मण जी रणभूमि में मूर्छित पड़े हैं और लंका के प्रसिद्ध वैद्य सुषेण के कथनानुसार, सूर्योदय से पूर्व द्रोणागिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाना अनिवार्य है। हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए प्रस्थान कर चुके हैं, परंतु मार्ग में अनेक बाधाओं के कारण उन्हें आने में विलंब हो रहा है।

श्री राम व्याकुल होकर पुकार रहे हैं कि हे हनुमान! तुम शीघ्र लौट आओ, क्योंकि तुम्हारे बिना लक्ष्मण के प्राण संकट में हैं। पूरी वानर सेना, सुग्रीव, अंगद और सभी भालू-वानर हताश और निराश हो चुके हैं। रात धीरे-धीरे बीत रही है और अब केवल कुछ ही क्षण शेष बचे हैं। यदि सूर्योदय हो गया, तो लक्ष्मण के प्राण पखेरू उड़ जाएंगे। श्री राम की आंखें मार्ग की ओर टकटकी लगाए देख रही हैं। यह भजन भगवान राम के मानवीय रूप की व्याकुलता और हनुमान जी के प्रति उनके अनन्य विश्वास को प्रकट करता है कि केवल हनुमान ही इस असंभव कार्य को संभव बना सकते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह शरणागति और संकटकाल में ईश्वर की पुकार का जीवंत प्रतीक है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • करुण रस की प्रधानता: भजन में करुण रस का ऐसा प्रवाह है जो किसी भी सहृदय भक्त की आंखों में आंसू ला देता है।
  • भक्त और भगवान का संबंध: यहाँ भगवान स्वयं अपने भक्त की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो यह सिद्ध करता है कि संकट के समय भगवान भी अपने अनन्य सेवक को याद करते हैं।
  • संकटमोचन स्वरूप का स्मरण: यह भजन स्मरण कराता है कि जब सभी मार्ग बंद हो जाते हैं, तब हनुमान जी ही संकटमोचन बनकर आते हैं।
  • सांस्कृतिक धरोहर: यह भजन रामलीलाओं, सुंदरकांड के पाठ और हनुमान जन्मोत्सव के अवसरों पर अत्यंत श्रद्धा के साथ गाया जाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के भजन के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं है, परंतु इस विशिष्ट भजन को गाने और सुनने की विशेष परंपराएं हैं:

  • मंगलवार और शनिवार: ये दोनों दिन हनुमान जी की आराधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। इन दिनों संध्याकाल में इस भजन का गायन विशेष फलदायी होता है।
  • सुंदरकांड पाठ के उपरांत: जब भी घर में सुंदरकांड पाठ का आयोजन हो, उसके समापन पर इस भजन को गाने से वातावरण अत्यंत भक्तिमय हो जाता है।
  • संकट के समय: यदि जीवन में कोई अत्यंत कठिन परिस्थिति या स्वास्थ्य संबंधी गंभीर संकट आ जाए, तो हनुमान जी के सम्मुख चमेली के तेल का दीपक जलाकर इस भजन का पाठ करने से मानसिक शांति और संबल मिलता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री राम और उनके परम भक्त श्री हनुमान जी को समर्पित है। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के लंकाकांड में वर्णित लक्ष्मण मूर्छा के प्रसंग से प्रेरित होकर आधुनिक कवियों और संतों ने इस भजन की रचना की है। इस भजन के माध्यम से भक्त हनुमान जी की उस अतुलनीय सेवा भावना को नमन करते हैं, जिसके कारण उन्हें श्री राम के प्राणों से भी प्रिय अनुज लक्ष्मण के प्राण बचाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज द्वारा रचित 'रामचरितमानस' के लंकाकांड से ली गई है। जब मेघनाद ने लक्ष्मण पर वीरघातिनी शक्ति का प्रयोग किया, तब लक्ष्मण अचेत हो गए। भगवान राम ने विलाप करते हुए कहा था कि यदि मैं जानता कि वन में मुझे भाई का वियोग सहना पड़ेगा, तो मैं पिता के वचनों को भी टाल देता। हनुमान जी जब संजीवनी बूटी लेने गए, तो कालनेमि राक्षस की बाधा और भरत जी द्वारा अनजाने में चलाए गए बाण के कारण उन्हें लौटने में विलंब हो गया। इसी व्याकुलता को इस भजन में आधुनिक सरल हिंदी काव्य शैली में पिरोया गया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें अवधी और लोकभाषा के शब्दों का सुंदर मिश्रण है।

  • 'बैरन अंखिया ताकि': यहाँ 'बैरन' (शत्रु) शब्द का प्रयोग आंखों के लिए किया गया है, जो प्रतीक्षा करते-करते थक चुकी हैं और अब पीड़ा का कारण बन रही हैं।
  • 'भान': यहाँ भान शब्द का अर्थ सूर्य से है। सूर्योदय को लक्ष्मण के जीवन के अंत के रूप में देखा जा रहा है, इसलिए सूर्य को उदित न होने की प्रार्थना परोक्ष रूप से की जा रही है।
  • लयबद्धता: भजन की लय अत्यंत धीमी और करुणा से भरी है, जो श्रोता को सीधे उस कालखंड में ले जाती है जहाँ श्री राम व्याकुल बैठे हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

  • अटूट विश्वास: घोर संकट में भी श्री राम का हनुमान जी पर विश्वास अडिग है। हमें भी ईश्वर पर ऐसा ही विश्वास रखना चाहिए।
  • कर्तव्यनिष्ठा: हनुमान जी मार्ग की बाधाओं से घबराए बिना अपना कर्तव्य पूरा करते हैं।
  • समय का महत्व: भजन में समय की महत्ता को दर्शाया गया है। 'घड़ी भर अब तो रह गयी बाकी' हमें याद दिलाता है कि जीवन में सही समय पर सही निर्णय लेना कितना आवश्यक है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द/वाक्यांश सरल अर्थ संदर्भ एवं महत्व
पवंसुत पवन देव के पुत्र (हनुमान जी) हनुमान जी की तीव्र गति और शक्ति को दर्शाता है।
संजीवन संजीवनी बूटी (प्राणदायिनी औषधि) लक्ष्मण जी के प्राण बचाने वाली दिव्य जड़ी-बूटी।
कुम्हलाए मुरझा जाना, उदास होना वानर सेना की हताशा और निराशा को व्यक्त करता है।
रैन रात्रि (रात) समय के बीतने और संकट के बढ़ने का प्रतीक।
बैरन अंखिया शत्रु के समान प्रतीत होने वाली आंखें प्रतीक्षा की पराकाष्ठा और व्याकुलता को दर्शाता है।
भान भानु (सूर्य) सूर्योदय होने पर लक्ष्मण के जीवन पर आने वाले संकट का सूचक।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"आ लौट के आजा हनुमान, तुझे श्री राम बुलाते हैं..."
हे पवनपुत्र हनुमान! तुम शीघ्र लौट आओ। स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम तुम्हें अत्यंत व्याकुलता से पुकार रहे हैं।

"गये संजीवन लाने पवंसुत, अब तक क्यूँ नहीं आए..."
तुम संजीवनी बूटी लाने गए थे, परंतु बहुत समय बीत जाने पर भी तुम्हारा आगमन नहीं हुआ है। सेनापति सुग्रीव और समस्त वानर सेना भय और चिंता से मुरझा गई है।

"बीत गयी सब रैन, घड़ी भर अब तो रह गयी बाकी..."
पूरी रात बीत चुकी है, अब सूर्योदय होने में केवल कुछ ही क्षण शेष बचे हैं। मेरी आंखें मार्ग की ओर देखते-देखते थक चुकी हैं और अब शत्रु के समान कष्ट दे रही हैं।

"कही उदय ना हो जाए भान, तुझे श्री राम बुलाते हैं..."
हे हनुमान! कहीं सूर्य उदित न हो जाए, क्योंकि सूर्योदय होते ही लक्ष्मण के प्राण संकट में पड़ जाएंगे। इसलिए तुम अविलंब लौट आओ।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के साथ हनुमान जी के इस प्रसिद्ध श्लोक का स्मरण करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जो उनकी तीव्र गति और संकट हरने की क्षमता को दर्शाता है:

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

अर्थ: जो मन के समान तीव्र गति वाले हैं, वायु के समान वेगवान हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र, वानर सेना के नायक श्रीरामदूत हनुमान की मैं शरण लेता हूँ।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण बिंदु महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम आ लौट के आजा हनुमान मुख्य आराध्य देव श्री हनुमान एवं भगवान श्री राम
प्रसंग लक्ष्मण मूर्छा और संजीवनी लाना
मुख्य रस/भाव करुण रस, विरह भाव, अनन्य भक्ति
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
गायन का उत्तम समय मंगलवार, शनिवार, सुंदरकांड पाठ के बाद
जीवन सीख संकट के समय धैर्य और अटूट विश्वास बनाए रखना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन रामायण के लंकाकांड के उस प्रसंग पर आधारित है जब मेघनाद के बाण से लक्ष्मण जी मूर्छित हो जाते हैं और हनुमान जी उनके प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लेने द्रोणागिरि पर्वत जाते हैं।

यह भजन मन में करुणा, भक्ति और समर्पण का भाव जगाता है। घोर संकट के समय इस भजन को सुनने या गाने से मानसिक तनाव दूर होता है और हनुमान जी की कृपा का अनुभव होता है।

'बैरन अंखिया' का अर्थ है वे आंखें जो प्रतीक्षा करते-करते इतनी थक चुकी हैं कि अब वे स्वयं के लिए ही शत्रु (बैरन) के समान पीड़ादायक प्रतीत हो रही हैं।

मार्ग में रावण द्वारा भेजे गए कालनेमि राक्षस की मायावी बाधाओं और अयोध्या के ऊपर से गुजरते समय भरत जी द्वारा अनजाने में चलाए गए बाण के कारण हनुमान जी को लौटने में विलंब हुआ था।

इस भजन का मुख्य रस 'करुण रस' है, जो भगवान श्री राम के मानवीय विलाप और व्याकुलता को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत करता है।

हाँ, सुंदरकांड के पाठ के समापन पर या हनुमान जी की आरती से पूर्व इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी और वातावरण को भक्तिमय बनाने वाला माना जाता है।

'भान' शब्द का तात्पर्य 'भानु' अर्थात सूर्य से है। यहाँ सूर्योदय होने से पहले हनुमान जी के लौटने की प्रार्थना की जा रही है।

हनुमान जी का जन्म पवन देव के आशीर्वाद और उनके अंश से हुआ था, इसलिए उन्हें 'पवनसुत' या 'पवनपुत्र' कहा जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों जैसे वाल्मीकि रामायण और श्री रामचरितमानस के लंकाकांड के संदर्भों के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध और भक्तिमय जानकारी पहुँचाना है ताकि वे इस पावन प्रसंग के आध्यात्मिक महत्व को गहराई से समझ सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण: युद्धकाण्ड (लक्ष्मण-मूर्च्छा प्रसंग)।
  • श्रीरामचरितमानस: गोस्वामी तुलसीदास कृत, लंकाकाण्ड (दोहा ६१ से आगे)।
  • पारंपरिक भजन संग्रह: सनातन धर्म सभा एवं संकीर्तन मंडलियां।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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