भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए भजन इन हिंदी

कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए भजन का संपूर्ण हिंदी बोल, भावार्थ और संदर्भ सहित विवरण पढ़ें केवल Bhaktilok पर।

"कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए" एक अत्यंत भावपूर्ण और विरह रस से ओतप्रोत प्रसिद्ध कृष्ण भजन है। यह भजन वैष्णव भक्ति परंपरा के 'मधुर भाव' और 'विरह वेदना' को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें एक अनन्य भक्त के हृदय की व्याकुलता, उलाहना और समर्पण का अनूठा संगम देखने को मिलता है। जब जीवात्मा परमात्मा के वियोग में तड़पती है, तब उसके मुख से ऐसे ही करुण और आर्त स्वर प्रस्फुटित होते हैं। इस भजन के माध्यम से भक्त अपने आराध्य श्री कृष्ण से प्रश्न करता है कि जब उन्होंने इतिहास में अनेक पतितों और भक्तों का उद्धार किया है, तो फिर उसे दर्शन देने में इतनी देरी क्यों हो रही है? यह भजन सत्संगों, संकीर्तन सभाओं और विशेष रूप से जन्माष्टमी, राधाष्टमी तथा कार्तिक मास के पावन अवसरों पर भक्तों द्वारा अत्यंत श्रद्धा और अश्रुपूर्ण नेत्रों से गाया जाता है। इसकी सरल भाषा और मर्मस्पर्शी संगीत शैली सीधे हृदय को स्पर्श करती है और साधक को ध्यान की गहराइयों में ले जाती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए

कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए ||
कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए ||

कर्मा ध्रुव तूने नरसी तारे, भगत अजामिल पार उतारे
तेरे दर्श को तरसे नैना क्यों न दर्श दिखाए ||
कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए ||

तेरी खातिर सब कुछ छोड़ा अपनों से मैंने नाता तोड़ा
गली गली बस तुम्हे पुकारू तू और बता क्या चाहे ||
कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए ||

ताने सुने मैं सही रुसवाई तू क्या जाने ओ रे कन्हाई
कहा छुपा सब देख रहा क्या रास तुझे यही आये ||
कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए ||

प्रीत बुला बैठी दुनिया की तुम संग प्रीत लगा के
छोड़ दे पर्दा सामने आजा पल पल क्यों अजमाए ||
कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए ||

इक झलक दिखला दे संवारे नैनं प्यास बुझा दे संवारे
आजाओ अब देर करो न ये जीवन बीता जाए ||
कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए ||

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मूल भाव विरह और अनन्य शरणागति है। भक्त अपने आराध्य श्री कृष्ण से अत्यंत आत्मीयता और अधिकार भाव से शिकायत कर रहा है। वैष्णव दर्शन के अनुसार, भगवान और भक्त का संबंध केवल पूज्य और पूजक का नहीं होता, बल्कि सखा, पुत्र या प्रियतम का भी होता है। यहाँ भक्त 'मधुर भाव' में भगवान को उलाहना दे रहा है।

भजन के प्रथम अंतरे में भक्त भगवान को उनके पूर्व के परोपकारों और लीलाओं की याद दिलाता है। वह कहता है कि हे कान्हा! आपने कर्मा बाई की खिचड़ी खाई, बालक ध्रुव को अचल पद दिया, भक्त नरसी मेहता की हुंडी स्वीकारी और पापी अजामिल का भी उद्धार कर दिया। जब आपने इन सब पर इतनी कृपा की, तो फिर मुझ दीन-हीन पर आपकी दृष्टि क्यों नहीं पड़ रही? मेरे नेत्र आपके दर्शन के लिए दिन-रात अश्रु बहा रहे हैं, फिर भी आप छिपे हुए हैं।

आगे भक्त अपने त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है। वह कहता है कि आपके प्रेम के मार्ग पर चलने के लिए मैंने इस संसार के सारे झूठे नाते-रिश्ते तोड़ दिए हैं। समाज की लोक-लाज और मर्यादाओं को छोड़कर मैं गली-गली केवल आपका नाम पुकार रहा हूँ। इस मार्ग में मुझे अपनों के ताने सुनने पड़े, समाज में अपमानित होना पड़ा, लेकिन मैंने आपकी प्रीत के आगे सब कुछ सह लिया। अब आप ही बताइए कि इस समर्पण के बाद भी आप मुझे क्यों तरसा रहे हैं? क्या आपको भक्त की यह तड़प देखने में आनंद आता है? अंत में भक्त प्रार्थना करता है कि यह मानव जीवन क्षणभंगुर है और धीरे-धीरे बीत रहा है, इसलिए अब और परीक्षा न लें और अपनी एक झलक दिखाकर इन प्यासे नयनों को तृप्त करें।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह जीवात्मा की परमात्मा से मिलन की छटपटाहट का संगीतमय दस्तावेज है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • विरह भक्ति (Pain of Separation): हिंदू दर्शन में विरह को भक्ति की सर्वोच्च अवस्था माना गया है। जब तक भगवान के लिए हृदय में तीव्र तड़प पैदा नहीं होती, तब तक वास्तविक भक्ति का उदय नहीं होता। यह भजन उसी तड़प को जगाता है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ: इसमें कर्मा बाई, ध्रुव, नरसी मेहता और अजामिल जैसे महान भक्तों के प्रसंगों का उल्लेख है, जो यह सिद्ध करते हैं कि भगवान जाति, कुल या कर्म नहीं देखते, वे केवल निष्कपट प्रेम देखते हैं।
  • समर्पण की भावना: "तेरी खातिर सब कुछ छोड़ा" पंक्ति दर्शाती है कि पूर्ण शरणागति के बिना ईश्वर की प्राप्ति असंभव है। जब साधक सांसारिक आसक्तियों से मुक्त होता है, तभी वह परमात्मा के निकट पहुंच पाता है।
  • सरलता और सुगमता: इस भजन की शब्दावली इतनी सरल है कि कोई भी सामान्य भक्त इसे आसानी से गा सकता है और इसके भावों को आत्मसात कर सकता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि भगवान के स्मरण के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं है, तथापि इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और समय अत्यधिक फलदायी माने गए हैं:

  • संध्या काल की प्रार्थना: दिनभर के सांसारिक कार्यों से निवृत्त होकर संध्या के समय जब मन शांत होता है, तब इस भजन को गाने से मन में वैराग्य और भक्ति का संचार होता है।
  • सत्संग और संकीर्तन: सामूहिक संकीर्तन में जब सभी भक्त एक सुर में इस भजन को गाते हैं, तो वहां का वातावरण अत्यंत दिव्य और स्पंदनशील हो जाता है।
  • एकांत साधना: रात्रि के समय एकांत में बैठकर, दीपक जलाकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से इस भजन का मानसिक गान करने से भगवान श्री कृष्ण की उपस्थिति का अनुभव होता है।
  • विशेष पर्व: जन्माष्टमी, राधाष्टमी, होली और कार्तिक मास के दौरान इस भजन का श्रवण और कीर्तन विशेष रूप से कल्याणकारी माना जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण (कान्हा) को समर्पित है। श्री कृष्ण हिंदू धर्म में पूर्ण पुरुषोत्तम अवतार माने गए हैं। वे प्रेम, आनंद और करुणा के सागर हैं। इस भजन में जिन संतों और भक्तों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं:

  • भक्त कर्मा बाई: जगन्नाथ पुरी की रहने वाली कर्मा बाई का भगवान के प्रति ऐसा निश्छल प्रेम था कि स्वयं भगवान जगन्नाथ उनके हाथ की बनी खिचड़ी खाने रोज आते थे।
  • भक्त ध्रुव: मात्र पांच वर्ष की आयु में अपनी सौतेली मां के वचनों से आहत होकर वन में जाकर कठोर तपस्या करने वाले ध्रुव, जिन्हें भगवान विष्णु ने दर्शन देकर ब्रह्मांड में अचल स्थान दिया।
  • भक्त नरसी मेहता: गुजरात के महान संत, जिनकी पुत्री के विवाह (मायरा) और अन्य संकटों में स्वयं श्री कृष्ण ने आकर सहायता की थी।
  • अजामिल: एक पापी ब्राह्मण जिसने मृत्यु के समय अनजाने में अपने पुत्र 'नारायण' का नाम पुकारा और भगवान के दूतों ने उसे यमदूतों से बचाकर मोक्ष प्रदान किया।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन आधुनिक काल के लोक-भक्ति साहित्य का हिस्सा है। इसकी रचना पारंपरिक वैष्णव पदों की शैली में की गई है। भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में फैले कीर्तन मंडलों द्वारा इसे पीढ़ियों से गाया जा रहा है। इस भजन की पृष्ठभूमि श्रीमद्भागवत महापुराण के 'गोपी गीत' और 'भ्रमर गीत' से प्रेरित लगती है, जहां गोपियां श्री कृष्ण के अंतर्ध्यान होने पर इसी प्रकार की विरह वेदना और उलाहना व्यक्त करती हैं। यह भजन दर्शाता है कि कलयुग में केवल नाम संकीर्तन और आर्त पुकार ही ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे सुलभ मार्ग है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर पुट है। इसकी काव्य शैली अत्यंत प्रवाहमयी और संगीतात्मक है।

  • रस: इसमें मुख्य रूप से 'करुण रस' और 'भक्ति रस' (विशेषकर विप्रलंभ शृंगार या विरह भक्ति) का परिपाक हुआ है।
  • अलंकार: "गली गली बस तुम्हे पुकारू" में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है। "नैनं प्यास बुझा दे" में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, जहां नेत्रों की दर्शन की इच्छा को प्यास के रूप में दर्शाया गया है।
  • लय और ताल: यह भजन सामान्यतः कहरवा ताल (८ मात्रा) में गाया जाता है, जो इसकी करुण और गंभीर प्रकृति के अनुकूल है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक सीख देता है:

  1. धैर्य और विश्वास: साधना के मार्ग में कई बार ऐसा समय आता है जब लगता है कि भगवान हमारी नहीं सुन रहे हैं। ऐसे समय में निराश होने के बजाय भक्त को अपने विश्वास पर अडिग रहना चाहिए।
  2. सांसारिक आसक्ति का त्याग: जब तक हम संसार के झूठे संबंधों और मान-प्रतिष्ठा में उलझे रहेंगे, तब तक हम परमात्मा के सच्चे प्रेम का अनुभव नहीं कर सकते।
  3. समानता का संदेश: भगवान किसी ऊंच-नीच या पापी-पुण्यात्मा का भेद नहीं करते। यदि अजामिल जैसा पापी तर सकता है, तो कोई भी सच्चा साधक भगवान की कृपा का पात्र बन सकता है।
  4. समय का सदुपयोग: "ये जीवन बीता जाए" पंक्ति हमें स्मरण कराती है कि समय तेजी से निकल रहा है। मृत्यु से पूर्व हमें अपने जीवन के वास्तविक लक्ष्य (भगवद प्राप्ति) को प्राप्त कर लेना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
तरसाए वंचित रखना, तड़पाना दर्शन न देकर भक्त की व्याकुलता बढ़ाना।
तारे उद्धार किया, पार लगाया भवसागर से मुक्ति प्रदान करना।
हुंडी / नाता संबंध, ऋण पत्र नरसी मेहता के प्रसंग में भगवान द्वारा धन की व्यवस्था करना।
रुसवाई अपमान, बदनामी संसार द्वारा भक्त की भक्ति का उपहास उड़ाना।
प्रीत प्रेम, अनुराग ईश्वर के प्रति अनन्य और निस्वार्थ प्रेम।
पर्दा आवरण, माया अज्ञान और माया का पर्दा जो ईश्वर को देखने नहीं देता।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए..."
हे कृष्ण! मैं आपसे केवल एक सीधा प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि आप मुझे अपने दर्शनों से वंचित रखकर इस प्रकार क्यों तड़पा रहे हैं? मेरी इस व्याकुलता का क्या कारण है?

"कर्मा ध्रुव तूने नरसी तारे, भगत अजामिल पार उतारे..."
आपने इतिहास में कर्मा बाई, बालक ध्रुव और नरसी मेहता जैसे भक्तों का उद्धार किया। यहाँ तक कि महापापी अजामिल को भी मोक्ष प्रदान किया। फिर मेरे प्रति आपकी यह उदासीनता क्यों है?

"तेरी खातिर सब कुछ छोड़ा अपनों से मैंने नाता तोड़ा..."
मैंने आपके प्रेम की प्राप्ति के लिए इस भौतिक संसार के सभी सुखों और अपने सगे-संबंधियों का परित्याग कर दिया है। अब मेरा आपके सिवा इस संसार में कोई नहीं है।

"ताने सुने मैं सही रुसवाई तू क्या जाने ओ रे कन्हाई..."
आपकी भक्ति करने के कारण मुझे समाज के ताने और अपमान सहने पड़े हैं। हे कन्हाई! आप तो अंतर्यामी हैं, क्या आप मेरी इस पीड़ा और रुसवाई को नहीं जानते?

"प्रीत बुला बैठी दुनिया की तुम संग प्रीत लगा के..."
मैंने इस नश्वर संसार के झूठे प्रेम को भुलाकर आपसे सच्चा और शाश्वत संबंध जोड़ा है। अब इस प्रीत की लाज रखना आपका दायित्व है।

"इक झलक दिखला दे संवारे नैनं प्यास बुझा दे संवारे..."
हे सांवरे! मेरे ये नेत्र आपके दर्शन के लिए अत्यंत प्यासे हैं। कृपा करके अपनी एक दिव्य झलक दिखाकर मेरी इस जनम-जनम की प्यास को शांत करें, क्योंकि यह अमूल्य मानव जीवन समाप्त होने की कगार पर है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के विरह और शरणागति के भाव को पुष्ट करने वाले कुछ महत्वपूर्ण श्लोक और मंत्र निम्नलिखित हैं:

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं:

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥

(श्रीमद्भगवद्गीता १८.६६ - सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा।)

इसी प्रकार, भगवान के प्रति अनन्य प्रेम को दर्शाने वाला प्रसिद्ध मंत्र:

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण जानकारी
भजन का नाम कान्हा बस इतना बता दे क्यों मुझको तरसाए
मुख्य आराध्य भगवान श्री कृष्ण (कान्हा / सांवरिया)
भक्ति का भाव विरह भाव, मधुर भाव, शरणागति
मुख्य संदर्भ भक्त कर्मा बाई, ध्रुव, नरसी मेहता, अजामिल
उपयुक्त अवसर जन्माष्टमी, सत्संग, संध्या आरती, एकांत साधना
काव्य भाषा सरल हिंदी (ब्रज मिश्रित)
मुख्य संदेश सांसारिक मोह का त्याग और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य भाव 'विरह' और 'अनन्य शरणागति' है। इसमें जीवात्मा परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल है और उन्हें अपने पूर्व के भक्तों के उद्धार की याद दिलाकर दर्शन देने की गुहार लगा रही है।

इस भजन में चार प्रमुख भक्तों का उल्लेख है: कर्मा बाई (जिन्होंने भगवान को खिचड़ी खिलाई), ध्रुव (जिन्होंने बाल्यकाल में तपस्या की), नरसी मेहता (जिनकी हुंडी भगवान ने स्वीकारी), और अजामिल (जिसका अंत समय में नारायण नाम लेने से उद्धार हुआ)।

यह भजन संध्या काल की प्रार्थना के समय, रात्रि के एकांत में या किसी भी सत्संग और संकीर्तन सभा के दौरान गाना अत्यंत प्रभावशाली होता है, क्योंकि यह मन को शांत कर अंतर्मुखी बनाता है।

इसका अर्थ है कि जब तक साधक सांसारिक मोह-माया, कंचन-कामिनी और मान-प्रतिष्ठा के प्रति आसक्ति का त्याग नहीं करता, तब तक उसे परमात्मा के विशुद्ध प्रेम का अनुभव नहीं हो सकता। यह पूर्ण वैराग्य को दर्शाता है।

हाँ, यह भजन शुरुआती साधकों के लिए अत्यंत उपयुक्त है। इसकी सरल भाषा और हृदयस्पर्शी भाव साधक के मन में भगवान के प्रति प्रेम और तड़प जगाने में बहुत सहायक सिद्ध होते हैं।

इसका तात्पर्य भगवान के सगुण-साकार रूप के दर्शन की तीव्र इच्छा से है। भक्त के नेत्र केवल भगवान की दिव्य छवि को देखने के प्यासे हैं, सांसारिक दृश्यों से उनकी तृप्ति नहीं होती।

वैष्णव संप्रदाय (विशेषकर गौड़ीय वैष्णव मत) में विरह (विप्रलंभ भाव) को मिलन (संभोग भाव) से भी ऊंचा स्थान दिया गया है, क्योंकि विरह में भक्त का रोम-रोम हर क्षण केवल भगवान के ही चिंतन में लीन रहता है।

इस भजन को गाते समय साधक को स्वयं को एक असहाय, दीन और भगवान के आश्रित भक्त के रूप में महसूस करना चाहिए। मन में यह भाव होना चाहिए कि भगवान के बिना हमारा अस्तित्व अधूरा है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन की व्याख्या और समीक्षा वैष्णव भक्ति ग्रंथों, जैसे श्रीमद्भागवत महापुराण और नारद भक्ति सूत्र के सिद्धांतों के आलोक में की गई है। भजन के बोल पारंपरिक संकीर्तन पद्धतियों से लिए गए हैं ताकि पाठकों को शुद्ध और प्रामाणिक पाठ प्राप्त हो सके। यह सामग्री पाठकों के आध्यात्मिक उत्थान और भजन के अंतर्निहित दार्शनिक अर्थ को समझाने के उद्देश्य से तैयार की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध १० - रासपंचाध्यायी एवं गोपी गीत)
  • नारद भक्ति सूत्र (सूत्र - पराभक्ति और अनन्यता)
  • भक्तमाल (नाभादास जी कृत - संतों के चरित्र का संदर्भ)
  • पारंपरिक वैष्णव कीर्तन संग्रह

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

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