सनातन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक और भक्ति परंपरा में 'तू ही दाता तू ही विधाता' एक अत्यंत लोकप्रिय, भावपूर्ण और मानसिक शांति प्रदान करने वाला भजन है। यह भजन केवल शब्दों का एक समूह नहीं है, बल्कि यह उस परम शक्ति के प्रति जीवात्मा की संपूर्ण शरणागति (Surrender) और अटूट विश्वास का जीवंत प्रतीक है। जब-जब मानव मन सांसारिक चिंताओं, दुखों और कलयुग के प्रपंचों से विचलित होता है, तब-तब ऐसे दिव्य भजन साधक को यह याद दिलाते हैं कि इस सृष्टि का संचालन करने वाला कोई अदृश्य और सर्वशक्तिमान हाथ मौजूद है जो हर परिस्थिति में हमारी रक्षा करता है। इस भजन का मुख्य भाव विनय, समर्पण, करुणा और असीम ईश्वर-प्रेम (Bhakti Bhava) से ओत-प्रोत है। इसे प्रातःकाल की बेला में, संध्या वंदन के समय, अथवा किसी भी सामूहिक सत्संग और धार्मिक अनुष्ठान के दौरान गाया जा सकता है। इसके गायन से न केवल घर का वातावरण पवित्र होता है, बल्कि मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
तू ही दाता, तू ही विधाता, तू ही पालनहारा,
तेरे भरोसे छोड़ा मैंने, अपना ये जग सारा।
तू ही दाता, तू ही विधाता...
जब-जब विपदा आन पड़ी है, तूने ही राह दिखाई,
अंधियारे में दीप जलाकर, तूने विपत्ति मिटाई।
तेरे सिवा कोई और न मेरा, तू ही तो है सहारा,
तेरे भरोसे छोड़ा मैंने, अपना ये जग सारा।
तू ही दाता, तू ही विधाता...
सुख-दुख के इस चक्रव्यूह में, मन मेरा घबराए,
माया के इस झूठे जग में, कोई राह न पाए।
हाथ पकड़कर पार लगा दे, हे नैया के खेवनहारा,
तेरे भरोसे छोड़ा मैंने, अपना ये जग सारा।
तू ही दाता, तू ही विधाता...
तेरी कृपा से ही खिलती हैं, बगिया की सब कलियां,
तेरी दया से ही सजती हैं, खुशियों की ये गलियां।
चरण शरण में रख लो मुझको, हे प्रभु दीनदयाला,
तेरे भरोसे छोड़ा मैंने, अपना ये जग सारा।
तू ही दाता, तू ही विधाता...
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का मूल भाव पूर्ण आत्मसमर्पण (शरणागति) है। भक्त अपने आराध्य को संबोधित करते हुए कहता है कि हे ईश्वर! आप ही इस संसार के समस्त जीवों को जीवन देने वाले 'दाता' हैं और आप ही सबके भाग्य का निर्माण करने वाले 'विधाता' हैं। इस संपूर्ण सृष्टि का भरण-पोषण करने वाले भी आप ही हैं। इसलिए मैंने अपने जीवन की बागडोर और इस संसार के प्रति अपनी सभी चिंताओं को आपके चरणों में सौंप दिया है।
भजन के प्रथम अंतरे में भक्त अपनी विपत्तियों और संकटों का स्मरण करता है। वह स्वीकार करता है कि जब भी उसके जीवन में अंधकार या संकट आया है, तब ईश्वर ने ही उसे सही मार्ग दिखाया है। जब चारों ओर निराशा का अंधकार था, तब ईश्वर ने आशा का दीपक जलाकर उसकी रक्षा की। इस संसार में ईश्वर के अतिरिक्त जीव का कोई सच्चा हितैषी या सहारा नहीं है।
द्वितीय अंतरे में सांसारिक मोह-माया और सुख-दुख के द्वंद्व का चित्रण है। भक्त कहता है कि यह संसार एक चक्रव्यूह की भांति है, जहां मन निरंतर विचलित और भयभीत रहता है। इस मायावी संसार में जीव स्वयं को असहाय पाता है। ऐसे में केवल ईश्वर ही वह खेवनहार (नाव चलाने वाला) है जो जीवन रूपी नैया को इस भवसागर से पार लगा सकता है।
अंतिम अंतरे में ईश्वर की सर्वव्यापकता और उनकी असीम करुणा का वर्णन है। प्रकृति का कण-कण ईश्वर की इच्छा से ही संचालित होता है। बगीचे की कलियों का खिलना और जीवन में खुशियों का आगमन केवल उनकी कृपा से ही संभव है। भक्त अंत में ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वे उसे अपने चरणों में स्थान दें, क्योंकि वही दीनों पर दया करने वाले 'दीनदयाल' हैं।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन साधक के भीतर कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक परिवर्तनों को जन्म देता है:
- पूर्ण शरणागति (Sharanagati): यह भजन श्रीमद्भगवद्गीता के 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' के संदेश को चरितार्थ करता है, जहां भक्त अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण रूप से ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है।
- मानसिक शांति और तनावमुक्ति: जब साधक इस भजन को गाता है, तो उसे यह अनुभव होता है कि उसके जीवन की चिंताएं उसकी अपनी नहीं, बल्कि ईश्वर की हैं। इससे मानसिक तनाव और भय का नाश होता है।
- सकारात्मक ऊर्जा का संचार: भजन के शब्द और लय मन में सकारात्मक विचारों को जागृत करते हैं, जिससे निराशावादी दृष्टिकोण दूर होता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि ईश्वर की आराधना के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं है, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:
- प्रातःकाल की बेला (ब्रह्ममुहूर्त): सुबह के समय शांत वातावरण में इस भजन को सुनने या गाने से दिन की शुरुआत सकारात्मकता और शांति के साथ होती है।
- संध्या आरती के समय: शाम की पूजा के बाद परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर सामूहिक रूप से इस भजन का संकीर्तन किया जा सकता है।
- गायन की विधि: इस भजन को गाते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और समर्पण का भाव होना चाहिए। आंखें बंद करके, शांत चित्त से, और शब्दों के अर्थ को महसूस करते हुए इसका गायन करना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन किसी एक विशिष्ट देवी या देवता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'परमेश्वर' या 'सच्चिदानंद' के निराकार और साकार दोनों रूपों को समर्पित है। इसे भगवान विष्णु, भगवान कृष्ण, भगवान राम, या शिव के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए गाया जा सकता है। यह भजन कबीरदास, तुलसीदास और सूरदास जैसे संतों की उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें ईश्वर को ही एकमात्र रक्षक और पालनकर्ता माना गया है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन पारंपरिक लोक-भक्ति शैली में रचा गया है। इसकी रचना के पीछे किसी विशिष्ट ऐतिहासिक घटना का उल्लेख नहीं मिलता, परंतु यह सदियों से चली आ रही भारतीय संत-परंपरा और लोक-चेतना का हिस्सा रहा है। भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में होने वाले सत्संगों में इस भजन को अत्यंत आदर के साथ गाया जाता है। यह सरल शब्दों में गहन वेदांत दर्शन को समाहित किए हुए है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल और सुबोध खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें कुछ शब्द अवधी और ब्रजभाषा के प्रभाव को दर्शाते हैं। इसकी काव्य शैली 'प्रार्थना गीत' या 'विनय के पद' जैसी है। इसमें रूपक अलंकार (जैसे 'जीवन रूपी नैया', 'सुख-दुख का चक्रव्यूह') का सुंदर प्रयोग किया गया है। इसकी लयबद्धता और गेयता इतनी सरल है कि कोई भी सामान्य व्यक्ति इसे आसानी से सीख और गा सकता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें व्यावहारिक जीवन के लिए कई महत्वपूर्ण सीख देता है:
- धैर्य और विश्वास: जीवन में जब भी कठिन परिस्थितियां आएं, हमें विचलित होने के बजाय ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
- अहंकार का त्याग: 'मैं' और 'मेरा' के भाव को छोड़कर यह स्वीकार करना कि सब कुछ ईश्वर का ही है, वास्तविक ज्ञान है।
- प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: यह समझना कि जीवन की हर छोटी-बड़ी खुशी और प्रकृति का हर उपहार ईश्वर की ही देन है, हमारे भीतर कृतज्ञता का भाव जगाता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| दाता | देने वाला / दानी | ईश्वर, जो समस्त सृष्टि को जीवन और संसाधन प्रदान करते हैं। |
| विधाता | सृष्टि का रचयिता / भाग्य विधाता | ब्रह्मा या परमेश्वर, जो कर्मों के अनुसार जीवों का भाग्य तय करते हैं। |
| पालनहारा | भरण-पोषण करने वाला | भगवान विष्णु, जो संपूर्ण जगत का पालन करते हैं। |
| विपदा | संकट / कठिनाई | सांसारिक जीवन में आने वाले दुख और परीक्षाएं। |
| खेवनहारा | नाव चलाने वाला (मल्लाह) | ईश्वर, जो जीव की नैया को भवसागर से पार लगाते हैं। |
| दीनदयाला | गरीबों और असहायों पर दया करने वाले | ईश्वर का वह रूप जो अपने शरणागत भक्तों पर करुणा करता है। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
१. "तू ही दाता, तू ही विधाता, तू ही पालनहारा..."
हे प्रभु! आप ही सब कुछ देने वाले हैं, आप ही भाग्य के निर्माता हैं और आप ही हमारा भरण-पोषण करने वाले हैं। मैंने अपना यह पूरा संसार और जीवन आपके ही भरोसे छोड़ दिया है।
२. "जब-जब विपदा आन पड़ी है, तूने ही राह दिखाई..."
जब भी मेरे जीवन में कोई संकट आया है, तब आपने ही मुझे सही मार्ग दिखाया है। जब अज्ञान और निराशा का अंधकार था, तब आपने ज्ञान का दीपक जलाकर मेरी रक्षा की है।
३. "सुख-दुख के इस चक्रव्यूह में, मन मेरा घबराए..."
यह संसार सुख और दुख का एक जटिल चक्रव्यूह है, जिसमें मेरा मन अशांत और भयभीत रहता है। इस मायावी संसार में मुझे कोई मार्ग नहीं सूझता, इसलिए हे प्रभु! आप मेरा हाथ पकड़कर मुझे पार लगा दीजिए।
४. "तेरी कृपा से ही खिलती हैं, बगिया की सब कलियां..."
इस सृष्टि में जो भी सुंदरता और खुशियां हैं, वे सब आपकी ही कृपा का परिणाम हैं। हे दीनदयाल! मुझे अपने चरणों की शरण में रख लीजिए।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के समर्पण भाव को दर्शाने वाला श्रीमद्भगवद्गीता का यह प्रसिद्ध श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता - १८.६६)
अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों) को मुझमें समर्पित करके केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों और दुखों से मुक्त कर दूंगा, शोक मत करो।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | तू ही दाता तू ही विधाता |
| मुख्य विषय | पूर्ण समर्पण, शरणागति, ईश्वर विश्वास |
| भाषा | सरल हिंदी (खड़ी बोली) |
| भक्ति का प्रकार | शांत और विनय भाव (Shant & Vinay Bhava) |
| उपयुक्त अवसर | प्रातःकालीन प्रार्थना, संध्या आरती, सत्संग, पारिवारिक पूजा |
| आध्यात्मिक लाभ | मानसिक शांति, भयमुक्ति, सकारात्मक ऊर्जा का विकास |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "तू ही दाता तू ही विधाता" भजन के आध्यात्मिक और व्यावहारिक पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस भजन के माध्यम से भक्त और भगवान के बीच के अटूट संबंध को दर्शाया गया है। यह सामग्री पूरी तरह से संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जिसका उद्देश्य पाठकों को शुद्ध और प्रामाणिक भक्ति रस प्रदान करना है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १८, श्लोक ६६)
- सनातन भक्ति परंपरा और पारंपरिक सत्संग संग्रह
- भक्ति रसामृत सिंधु - श्री रूप गोस्वामी
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