भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

अब तो झूठा लगता है सब संसार भजन इन हिंदी

पढ़ें अब तो झूठा लगता है सब संसार भजन इन हिंदी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

सनातन धर्म, वेद, उपनिषद और भारतीय भक्ति परंपरा में संकीर्तन और प्रभु नाम का स्मरण कलयुग का परम साधन माना गया है। "अब तो झूठा लगता है सब संसार भजन इन हिंदी" एक अत्यंत पावन, भावपूर्ण और वैराग्य रस से परिपूर्ण भजन है, जो साधक के अंतर्मन को संसार की नश्वरता का बोध कराते हुए पूर्णतः परमेश्वर के चरणों में समर्पित होने की प्रेरणा देता है। इस भजन का मुख्य भाव यह है कि भौतिक जगत के सारे रिश्ते, सुख-सुविधाएं, मोह-माया और प्रपंच क्षणिक और असत्य हैं; केवल और केवल गोविंद का नाम, उनकी भक्ति और उनके चरणों की शरण ही शाश्वत और परम सत्य है। जब मनुष्य का चित्त सांसारिक दुखों, छलयुक्त प्रपंचों और स्वार्थी संबंधों से विरक्त होकर भगवान की अहैतुर्जी कृपा की ओर उन्मुख होता है, तब उसे इस भजन की गहराई और उसके वास्तविक आंतरिक सौंदर्य का अनुभव होता है। यह रचना साधक को माया के बंधनों से मुक्त कर भक्ति और प्रेम के दिव्य मार्ग पर अग्रसर करती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

अस्थायी (मुखड़ा)

अब तो झूठा लगता है सब संसार,
मेरा मन रम गया चरणों में मेरे करतार।

अंतरा १

रिश्ते-नाते झूठे सारे, झूठी माया की छाया,
किसने यहाँ पर साथ निभाया, किसने यहाँ सुख पाया?
पल दो पल का मेला है यह, झूठा है यह व्यवहार,
मेरा मन रम गया चरणों में मेरे करतार।

अंतरा २

धन और वैभव, मान और बड़ाई, सब कुछ माटी होना,
खाली हाथ ही यहाँ से जाना, क्यों इसमें मन को खोना?
जिसने तेरा नाम पुकारा, उतरा भव से पार,
मेरा मन रम गया चरणों में मेरे करतार।

अंतरा ३

कष्ट सहे जब जग के मैंने, तूने ही आके संभाला,
अंधियारे जीवन में मेरे, तूने ही प्रगट किया उजाला।
तेरे सिवा ना कोई मेरा, हे मेरे पालनहार,
मेरा मन रम गया चरणों में मेरे करतार।

समापन

अब तो झूठा लगता है सब संसार,
मेरा मन रम गया चरणों में मेरे करतार।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन जीव और परमात्मा के बीच के उस पवित्र प्रेम का गान है जहाँ संसार की असारता (नश्वरता) का अनुभव होने के बाद साधक का मन केवल ईश्वर के चरणों में विश्राम पाता है। 'अब तो झूठा लगता है सब संसार' पंक्ति में सांसारिक मोह-माया के प्रति तीव्र वैराग्य का भाव छिपा हुआ है। श्रीमद्भगवद्गीता और वेदान्त दर्शन में संसार को 'असत्यम् अप्रतिष्ठम्' यानी अनित्य और बिना किसी वास्तविक आधार के कहा गया है। जब तक मनुष्य अज्ञानता में जीता है, तब तक उसे धन, पद, परिवार और प्रतिष्ठा ही सब कुछ प्रतीत होते हैं। परंतु जैसे ही आध्यात्मिक ज्ञान का उदय होता है या भगवान की कृपा बरसती है, उसे समझ आ जाता है कि यह भौतिक जगत केवल एक स्वप्न या नाटक के समान है।

भजन के अंतरा में यह स्पष्ट किया गया है कि संसार के सभी रिश्ते और स्वार्थ के नाते क्षणभंगुर हैं। सुख के समय सभी साथ होते हैं, परंतु संकट के क्षणों में केवल भगवान का नाम ही सच्चा संबल बनता है। 'धन और वैभव, मान और बड़ाई, सब कुछ माटी होना' यह संदेश देता है कि अंततः शरीर को पंचतत्व में हीलीन होना है, इसलिए अहंकार और संग्रह की वृत्ति छोड़कर परमेश्वर के चरणों में शरणागति प्राप्त करना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। इस प्रकार यह भजन साधक के हृदय में वैराग्य, भक्ति और संतोष के त्रिवेणी का संचार करता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस पावन भजन की अनेक विशेषताएं हैं जो इसे साधकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाती हैं:

  • वैराग्य प्रधान रचना: यह भजन मनुष्य को भौतिकता की अंधी दौड़ से निकालकर आत्मचिंतन और भगवद्भक्ति की ओर मोड़ता है।
  • तुलसीदासजी और मीराबाई की परंपरा: इसमें मीराबाई और सूरदास जैसे संतों के उस विरह और वैराग्य के भाव की झलक मिलती है, जिसमें संसार को त्यागकर गिरधर गोपाल को ही सर्वस्व मान लिया गया था।
  • मानसिक शांति का स्रोत: तनावपूर्ण आधुनिक जीवन शैली में इस भजन का श्रवण या गायन मन को अगाध शांति और स्थिरता प्रदान करता है।
  • भक्ति रस का संवर्धन: यह भजन सुनने वाले के भीतर अहंकार को गलाकर नम्रता और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का भाव जागृत करता है।

अधिक जानकारी के लिए आप श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र के पावन पाठ का भी स्मरण कर सकते हैं, जो मन को एकाग्र करने में सहायक हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भजन की सार्थकता उसकी पवित्रता और उचित भाव के साथ स्मरण करने में है। इस भजन को गाने या सुनने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन किया जा सकता है:

  • ब्रह्ममुहूर्त या संध्याकाल: प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर अथवा संध्या के समय दीपक प्रज्वलित करने के पश्चात इस भजन का गायन अत्यंत फलदायी होता है।
  • सत्संग और पूजा स्थल: घर के मंदिर में संध्या वंदन के समय, एकांत साधना में अथवा साप्ताहिक सत्संग के दौरान इसे प्रेमपूर्वक गाया जा सकता है।
  • मानसिक अवस्था: गाते समय नेत्र बंद करके सांसारिक चिंताओं को त्यागकर पूर्णतः भगवान के श्रीचरणों में ध्यान लगाना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन किसी एक विशेष देवता तक सीमित न होकर संपूर्ण सनातन आराध्य—चाहे वह भगवान श्री कृष्ण हों, श्रीराम हों या निराकार परम ब्रह्म—के चरणों में समर्पित है। भारतीय संत परंपरा में कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास और मीराबाई जैसे महापुरुषों ने संसार की असारता पर बल देते हुए केवल हरि-नाम को ही सत्य बताया है। संत कबीर ने भी कहा है—"झूठा तन कागद की पुड़िया, बूंद पड़े घुल जावे।" यह भजन उसी दार्शनिक परंपरा का आधुनिक और अत्यंत मधुर संकीर्तन रूप है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-भक्ति और संतवाणी से प्रेरित है। लोक गायकों और संकीर्तन प्रेमियों ने इसे पीढ़ियों से संजोकर रखा है। इसकी पंक्तियाँ इतनी सरल और हृदयस्पर्शी हैं कि बिना किसी कठिन व्याकरण या शास्त्रीय ज्ञान के भी सामान्य जनमानस इसे आसानी से गुनगुना सकता है। यह भजन संकट के समय धैर्य और एकांत में ईश्वर से संवाद स्थापित करने का एक सशक्त माध्यम है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और प्रवाहमयी हिंदी (खड़ी बोली मिश्रित ब्रज-अवधि के भाव) है। इसमें रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है जैसे 'माया की छाया', 'पल दो पल का मेला' आदि। काव्य शैली आत्मकथनात्मक और भावुक है, जो सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करती है। शब्दों का चयन इतना सुंदर है कि हर आयु वर्ग के लोग इसे आसानी से समझ और गा सकते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस भजन से हमें निम्नलिखित अमूल्य जीवन सीख मिलती हैं:

  • मोह का त्याग: संसार की नश्वरता को समझकर अत्यधिक मोह और आशक्ति से बचना चाहिए।
  • शरणागति: जीवन के हर सुख-दुःख में परमेश्वर को ही अपना सच्चा साथी मानना चाहिए।
  • अहंकार शून्यता: धन, बल और पद का अभिमान नहीं करना चाहिए क्योंकि अंततः सब यही छूट जाना है।
  • नाम स्मरण: कलयुग में ईश्वर का नाम ही एकमात्र तारणहार है, अतः निरंतर भगवान का स्मरण करना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
संसार यह भौतिक जगत मोह और माया का क्षेत्र
करतार रचनेवाला, ईश्वर परमात्मा, जो इस सृष्टि के विधाता हैं
माया भ्रम या छलावा वह शक्ति जो जीव को परमात्मा से दूर रखती है
भव संसार सागर जन्म-मृत्यु का चक्र
पालनहार पोषण करने वाला ईश्वर, जो सबका रक्षक है

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"अब तो झूठा लगता है सब संसार, मेरा मन रम गया चरणों में मेरे करतार।"
अर्थात, हे प्रभु! अब मुझे यह भौतिक संसार पूरी तरह मिथ्या और मोह-माया का जाल प्रतीत होने लगा है। मेरा चंचल मन अब अन्यत्र कहीं न भटक कर केवल आपके पावन चरणों में रम गया है और आपको ही अपना सर्वस्व मान चुका है।

"रिश्ते-नाते झूठे सारे, झूठी माया की छाया..."
अर्थात, इस संसार के जितने भी पारिवारिक और सामाजिक संबंध हैं, वे सब स्वार्थ पर आधारित और क्षणिक हैं। यह सब माया का एक आवरण मात्र है, जो वास्तविकता से परे है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को पुष्ट करने वाला श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक अत्यंत प्रसिद्ध है:

"अनिमेशमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।"

तथा श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ८, श्लोक १५ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:

"मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवान्हि महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥"

अर्थात, मुझे प्राप्त करके महापुरुषों को दुखों के घर और क्षणभंगुर इस पुनर्जन्म को फिर प्राप्त नहीं करना पड़ता, क्योंकि वे परम सिद्धि को प्राप्त हो चुके होते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

बिंदु विवरण
भजन का नाम अब तो झूठा लगता है सब संसार
प्रमुख विषय वैराग्य, शरणागति और भक्ति
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-अवधि प्रभाव
भाव (Bhava) वैराग्य, प्रेम और समर्पण
गाने का उपयुक्त समय ब्रह्ममुहूर्त, संध्या वंदन या सत्संग
मुख्य उद्देश्य मन को सांसारिक मोह से मुक्त कर ईश्वर में लगाना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि भौतिक संसार और इसके सभी रिश्ते-नाते क्षणिक और नश्वर हैं। मनुष्य को मोह-माया का त्याग कर अपना मन केवल भगवान के चरणों में लगाना चाहिए।

यह भजन मुख्य रूप से 'वैराग्य रस' और 'भक्ति रस' से परिपूर्ण है, जो साधक के मन में संसार के प्रति अनास्था और ईश्वर के प्रतिगामी प्रेम को जागृत करता है।

इस भजन को प्रातःकाल पूजा के समय, संध्या वंदन के दौरान अथवा किसी शांत एकांत वातावरण में पूर्ण भक्ति भाव और तालीनता के साथ गाना चाहिए।

हाँ, यह भजन अत्यंत सरल शब्दों में है और इसके माध्यम से युवा, वृद्ध सभी लोग जीवन के वास्तविक आध्यात्मिक सत्यों को आसानी से समझ सकते हैं।

जब हम संसार की चिंताओं और अपेक्षाओं को छोड़कर ईश्वर के स्मरण में लीन होते हैं, तो मन का तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है और अगाध आंतरिक शांति की अनुभूति होती है।

पूर्णतः। यह भजन वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के उस मूल सिद्धांत पर आधारित है जो संसार को अनित्य और केवल ईश्वर को शाश्वत मानता है।

इससे साधक की 'परा भक्ति' और 'शरणागति भक्ति' पुष्ट होती है, जिसमें वह भगवान को ही अपना एकमात्र रक्षक और शरणदाता स्वीकार करता है।

निश्चित रूप से। सत्संग और संकीर्तन समारोहों में ऐसे भजन सभी भक्तों को सामूहिक रूप से मंत्रमुग्ध और भक्तिमय कर देते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तितत्त्व, सनातन दर्शन और संकीर्तन परंपरा के उच्च मानकों को ध्यान में रखते हुए यह मार्गदर्शिका तैयार की गई है। इसमें प्रयुक्त शब्द, भावार्थ और व्याख्याएं पारंपरिक ग्रंथों एवं संतों के वचनों पर आधारित हैं। यह सामग्री पाठकों के आध्यात्मिक संवर्धन के लिए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत की गई है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता - गीताप्रेस गोरखपुर
  • सनातन भक्ति साहित्य एवं संत वाणी संकलन
  • भारतीय संगीत और संकीर्तन परंपरा के पारंपरिक लोक स्रोत
  • वेदान्त दर्शन के नश्वरता और वैराग्य संबंधी ग्रंथ

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 14 Oct 2026

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