भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

प्राथना सुनिए श्री भगवान भजन इन हिंदी

पढ़ें प्राथना सुनिए श्री भगवान भजन इन हिंदी का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्तिलोक पर।

प्राथना सुनिए श्री भगवान भजन का परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

"प्राथना सुनिए श्री भगवान, कीजिये जन जन का कल्याण" एक अत्यंत भावपूर्ण, हृदयस्पर्शी एवं गूंजता हुआ भजन है जो जीवात्मा की परमात्मा के प्रति अनन्य पुकार, समर्पण और करुणा की विनती को अभिव्यक्त करता है। भक्ति साहित्य और सनातन परंपरा में प्रार्थना का विशेष स्थान रहा है, जहाँ भक्त अपने अहंकार को त्यागकर सीधे अपने आराध्य श्री हरि, भगवान विष्णु या सम्पूर्ण ब्रह्मांड के संचालक श्री भगवान के चरणों में शरण लेता है। यह भजन न केवल शब्दों का एक समुच्चय है, बल्कि यह कलयुग के प्रपंच, दुखों और अज्ञानता के अंधकार में डूबे मानव मन के लिए आत्मिक शांति, प्रकाश और चेतना की एक जागृत किरण के समान है। इसमें साधक अपने लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण वसुधैव कुटुंबकम् की भावना के साथ लोक-कल्याण, धर्म की पुनः स्थापना, विद्या की देवी माँ सरस्वती की कृपा और समाज में शांति की कामना करता है। प्रातःकालीन मंगलाचरण, संध्याकालीन आरती, मंदिरों में सामूहिक संकीर्तन, एकांत साधना अथवा सत्संग के पवित्र अवसरों पर इस भजन का गायन भक्तों के अंतःकरण को पावन कर देता है और मन को एकाग्र करके परमेश्वर के चरणों में स्थिर करने का अद्भुत माध्यम बनता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

स्थाई (Mukhda):

प्राथना सुनिए श्री भगवान,
कीजिये जन जन का कल्याण।
|| प्राथना सुनिए श्री भगवान ||

प्रथम अंतरा (First Antara):

आज भूमि जन भूमि दुखारी,
वाणी वीणा शरण तुम्हारी,
वीणा को झंकार दीजिये,
वाणी को वरदान।
|| प्राथना सुनिए श्री भगवान ||

द्वितीय अंतरा (Second Antara):

भारत में फिर गूंजे गीता,
भूमि भाग बन जागे सीता,
भारत को फिर धन्ये कीजिये,
प्राथना सुनिए श्री भगवान,
श्री धर किरपा निधान।
|| प्राथना सुनिए श्री भगवान ||

तृतीया अंतरा (Third Antara):

सत्य अहिंसा का पाठ पढ़ाओ,
घर घर अलख जगाओ,
मन के सारे अंधियारे को,
ज्ञान दीप से दूर भगाओ।
|| प्राथना सुनिए श्री भगवान ||

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन अत्यंत ही गहन दार्शनिक और देशभक्ति से ओत-प्रोत आध्यात्मिक भावनाओं का संगम है। इसके माध्यम से भक्त भगवान से करबद्ध प्रार्थना करता है कि वे हे प्रभु! हमारी इस करुण पुकार को सुनिए और इस धरा पर निवास करने वाले समस्त जन-जन का कल्याण कीजिए। लोक-कल्याण की यह भावना भारतीय संस्कृति के मूल मंत्र 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' को चरितार्थ करती है।

प्रथम अंतरे में भक्त कहता है कि आज यह पावन भूमि और यहाँ के निवासी दुखों से संतप्त हैं। हे माँ वाग्देवी वीणावादिनी! हम आपकी शरण में आए हैं। हमारी इस मूक वाणी और जीवन रूपी वीणा को अपने स्पर्श से झंकृत कर दीजिए, ताकि हमारे मुख से केवल सत्य, प्रेम और धर्म के स्वर निकलें। वाणी को ऐसा वरदान दीजिए कि वह दूसरों के दुखों को हरने वाली और प्रेरणा देने वाली बन सके।

द्वितीय अंतरे में राष्ट्र और संस्कृति के पुनरुत्थान की बात की गई है। भक्त कामना करता है कि इस महान भारत भूमि पर पुनः भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से गायी गई भगवद्गीता का ज्ञान गूंजे, जिससे मनुष्य अपने कर्म पथ से विचलित न हो। त्याग, पवित्रता और सहिष्णुता की प्रतीक माता सीता के आदर्श इस भूमि पर पुनः जागृत हों। हे श्रीधर (लक्ष्मीपति भगवान विष्णु) और कृपा के निधान! इस भारत देश को पुनः धन्य और पवित्र बना दीजिए।

अंतिम चरणों में भक्त मानसिक शुद्धि और ज्ञान के प्रकाश की मांग करता है। वह प्रार्थना करता है कि हे भगवान! हमारे जीवन में सत्य और अहिंसा के मार्ग को प्रशस्त कीजिए, घर-घर में भक्ति की अलख जगाइए तथा हमारे अंतःकरण में बैठे अज्ञान और मोह के अंधकार को अपने ज्ञान रूपी दीपक से सदा के लिए दूर कर दीजिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सर्वसमावेशी (Inclusive) और लोक-कल्याणकारी भावना है। इसमें व्यक्तिगत मोक्ष के साथ-साथ सामाजिक उत्थान, राष्ट्रप्रेम और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना पर बल दिया गया है। संगीत की दृष्टि से यह भजन सरल ताल और सुरों में गाया जाता है, जिससे आम से लेकर खास तक हर भक्त इसे आसानी से गुनगुना सकता है। यह भजन भक्तों के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और निराशा के बादलों को हटाकर आत्मबल को मजबूत करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पावन भजन को गाने और सुनने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म बेला (सूर्योदय से पूर्व) और संध्याकालीन वेला का समय सर्वोत्तम माना जाता है। दैनिक पूजा के समय दीप प्रज्वलित करके, मंदिर में आरती के उपरांत अथवा सामूहिक सत्संग और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान इस भजन का सामूहिक गायन विशेष फलदायी होता है। इसे गाते समय शरीर की मुद्रा सीधी, मन शांत और भाव पूर्ण रूप से भगवान के चरणों में समर्पित होना चाहिए।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु, उनके अवतारों (विशेषकर श्रीकृष्ण और राम) तथा ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती को समर्पित है। इसमें 'श्रीधर किरपा निधान' और 'गीता' के स्मरण के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के विराट स्वरूप का आह्वान किया गया है, जो संकट के समय अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

आधुनिक भक्ति साहित्य और पारंपरिक लोक भजनों की परंपरा से निकला यह गीत मौखिक और लिखित दोनों रूपों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा है। इसके रचनाकार ने कलयुग के बढ़ते प्रभाव, मानसिक अशांति और नैतिक पतन को देखते हुए ईश्वर से सीधे संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से इन पंक्तियों की रचना की। यह भजन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के बाद के सांस्कृतिक पुनर्जागरण काल के मूल्यों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा अत्यंत सहज, सरल और प्रवाहमयी खड़ी हिंदी एवं ब्रज-अवधि के प्रभाव वाली लोकभाषा है। इसमें अनुप्रास और उपमा अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया गया है। 'वाणी वीणा', 'भूमि भाग बन जागे सीता' जैसी पंक्तियों में वर्णों की आवृत्ति से काव्य सौंदर्य स्वतः निखर उठता है। यह भाषा आम जनमानस के हृदय को सीधे स्पर्श करती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

इस भजन से हमें यह मुख्य आध्यात्मिक सीख मिलती है कि हमें केवल अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की कामना नहीं करनी चाहिए, बल्कि संपूर्ण समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। यह हमें अहंकार का त्याग कर परमपिता परमात्मा की शरण में जाने की प्रेरणा देता है। इसके साथ ही, यह जीवन में सत्य, अहिंसा, ज्ञान और सदाचार के मार्ग पर चलने का चिरंतन संदेश देता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पदावली सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / भाव
प्राथना प्रार्थना, विनय, विनती भगवान के समक्ष अपनी भावना रखना
किरपा निधान कृपा के भंडार, दयालु भगवान विष्णु या ईश्वर का विशेष संबोधन
दुखारी दुःखी, संतप्त संसार के दुखों से पीड़ित लोग
झंकार मधुर स्वर, कंपन वाणी और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार
अलख जगाना जागृति फैलाना, चेतना जगाना भक्ति और ज्ञान का संदेश घर-घर पहुंचाना

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"प्राथना सुनिए श्री भगवान, कीजिये जन-जन का कल्याण।" - हे प्रभु, मेरी इस विनती को स्वीकार करें और इस संसार के प्रत्येक प्राणी का मंगल करें।

"आज भूमि जन भूमि दुखारी, वाणी वीणा शरण तुम्हारी।" - आज यह धरती और इसके निवासी दुखों से घिरे हैं, हे माता सरस्वती हम अपनी वाणी रूपी वीणा को लेकर आपकी शरण में आए हैं।

"भारत में फिर गूंजे गीता, भूमि भाग बन जागे सीता।" - इस देश में पुनः धर्म और कर्म का वह पावन संदेश गूंजे जो गीता में है, और त्याग-पवित्रता के आदर्श पुनः जीवंत हों।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भावों को और अधिक प्रगाढ़ करने के लिए निम्नलिखित वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों का स्मरण करना अत्यंतलाभकारी है:

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विशेषता विवरण
भजन का नाम प्राथना सुनिए श्री भगवान (Prathana Suniye Shri Bhagawan)
आराध्य देवता श्री भगवान (भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण एवं माँ सरस्वती)
भाषा सरल हिंदी / लोकभाषा
मुख्य भाव (Bhava) विनय, शरणागति, लोक-कल्याण एवं राष्ट्रप्रेम
गायन अवसर प्रातःकालीन पूजा, संध्या आरती, सत्संग एवं प्रार्थना सभा
श्रेणी भक्ति भजन एवं प्रार्थना गीत

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन मुख्य रूप से लोक-कल्याण, शरणागति, आत्मिक शांति और राष्ट्र में धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों के पुनरुत्थान की भावना पर आधारित है।

इस भजन को प्रातः काल की पूजा के समय या संध्या बेला में आरती के उपरांत गाना सबसे उत्तम माना जाता है। इससे मन को शांति मिलती है।

हाँ, यह एक ऐसा सार्वभौमिक प्रार्थना भजन है जिसे सत्संग, मंदिरों, स्कूलों की प्रार्थना सभाओं और धार्मिक आयोजनों में सामूहिक रूप से बड़े आनंद के साथ गाया जा सकता है।

'श्रीधर' और 'कृपा निधान' भगवान विष्णु या श्री कृष्ण के संबोधन हैं, जो लक्ष्मी को धारण करने वाले और अकारण करुणा बरसाने वाले हैं।

यह भजन सिखाता है कि हमें अपनी व्यक्तिगत प्रार्थनाओं के साथ-साथ संपूर्ण समाज, राष्ट्र और मानवता के कल्याण की कामना करनी चाहिए तथा सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

इस लेख में प्रस्तुत 'प्राथना सुनिए श्री भगवान' भजन के बोल, अर्थ, भावार्थ और सांस्कृतिक महत्व को भक्ति संगीत एवं प्रार्थना संग्रह के पारंपरिक मानदंडों के अनुसार अत्यंत सावधानीपूर्वक संकलित किया गया है। पाठकों की प्रामाणिक जानकारी और सुगमता को ध्यान में रखते हुए यह सामग्री तैयार की गई है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

सनातन भक्ति परंपरा, पारंपरिक लोक-भजन संकलन, श्रीमद्भगवद्गीता और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के स्रोतों पर आधारित।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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