भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

शिव तांडव की ध्वनि (shiv taandav kee dhvani lyrics in hindi)

शिव तांडव की ध्वनि का गान करें और विश्वनाथ की कृपा प्राप्त करें। यह अद्वितीय स्तोत्र शक्ति और भक्ति का प्रतीक है।

प्रस्तावना एवं परिचय

शिव तांडव: शिव की शक्ति और भक्ति का प्रतीक

इस अद्वितीय स्तोत्र का गान करने से भक्ति और शक्ति की अनुभूति होती है।

शिव तांडव की ध्वनि यहाँ "शिव तांडव स्तोत्र" के संपूर्ण श्लोक हिंदी में प्रस्तुत किए गए हैं। यह भगवान शिव की स्तुति में रावण द्वारा रचित एक प्रसिद्ध स्तोत्र है।( शिव तांडव स्तोत्र )जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले।गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्॥डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं।चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥ 1॥जटा कटा हसंभ्रम भ्रमANNnilिंपनिर्झरी।विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि॥धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके।किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥ 2॥धराधरेंद्र नंदिनी विलास बंधुबंधुर।स्फुरद्दिगंत संतति प्रमोद मानमानसे॥कृपाकटाक्ष धारिणी निरुद्ध दुर्धरापदि।क्वचिद्विगамбरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥ 3॥जटा भुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा।कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्त दिग्वधूमुखे॥मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीय मेदुरे।मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥ 4॥सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर।प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः॥भुजंगराज मालया निबद्ध जाटजूटकः।श्रियै चिराय जायतां चकोरबंधुशेखरः॥ 5॥ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिंगभा।निपीतपंचसायकं नमन्निलिंपनायकम्॥सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं।महाकपालिसंपदेशिरोजटालमस्तु नः॥ 6॥करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल।द्धनंजयाहुतीकृतप्रचंडपंचसायके॥धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक।प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥ 7॥नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्।कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः॥निलिंपनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः।कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥ 8॥प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा।वलम्बिकण्ठकंधली रुचिप्रबद्धकंधरम्।स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं।गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे॥ 9॥अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमंजरी।रसप्रवाहमाधुरी विजृंभणामधुव्रतम्॥स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं।गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥ 10॥जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमश्वस।द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगल।ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः॥ 11॥दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकस्रजोर्।गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः।समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे॥ 12॥कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन्।विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः।शिवेति मंत्रमुच्चरन् सदा सुखी भवाम्यहम्॥ 13॥इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं।पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम्।हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिम्।विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम्॥ 14॥
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

शिव तांडव की ध्वनि एक महाकाव्यात्मक स्तोत्र है जो भगवान शिव के तांडव नृत्य की महिमा का बखान करता है। इस गीत में रावण ने शिव की दिव्य शक्तियों और प्रकृति के सभी तत्वों का वर्णन किया है। 'जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले' से सिद्ध होता है कि शिव की जटाएँ कैसे जलधाराओं को अपने में समेटे हैं। 'धगद्धगद्धगज्ज्वल' शब्दों से शिव के तांडव में उपस्थित ऊर्जा और सामर्थ्य का अनुभव होता है। स्तोत्र का संपूर्ण स्वरूप शिव की वैभवता, तांडव की गरिमा और उनके प्रति भक्ति को प्रकट करता है। यहां भगवान शिव का नृत्य केवल एक साधारण नर्तक की तरह नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार और उसकी सृष्टि व संहार का प्रतीक है। इस प्रकार के यथार्थवादी एवं तेजस्विता से भरपूर वर्णन हमें शिव के व्यक्तित्व की गहराई में समझने में मदद करता है।

शिव तांडव स्तोत्र में भक्ति की गहराई के साथ-साथ भक्ति की तीव्रता का भी दर्शन होता है। 'दराधरेंद्र नंदिनी विलास बंधुबंधुर' और 'कृपा काठाक्ष धारिणी निरुद्ध दुर्धरापदि' जैसे पंक्तियों में भक्त की मनोवृत्ति का संकेत मिलता है। भक्त शिव को अपने संकटों से मुक्ति देने वाले, अभय देने वाले और करुणा के सागर के रूप में मानता है। शिव के प्रति यह भक्ति भाव केवल कठिनाइयों में ही नहीं, बल्कि हर घड़ी स्वयं शिव के माध्यम से परमात्मा के सन्निधि की अनुभूति के लिए होती है। इन पंक्तियों का मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक अर्थ भक्त के मन में शिव की अनन्त कृपा की आकांक्षा को उभरता है।

इस स्तोत्र में जो प्रमुख धार्मिक तत्व शामिल हैं, वह भगवान शिव का अद्वितीय स्वरूप, उनके तांडव नृत्य के माध्यम से जीवन की गहन गुत्थियों को अभिव्यक्त करना है। शिव, जो समस्त सृष्टि के कारक और विनाशक हैं, उनके प्रति भक्ति का मार्ग ही कल्याणकारी है। यहाँ 'स्मरान्तकं पुरान्तकं' जैसे वाक्यांश के माध्यम से हम समझ सकते हैं कि शिव भक्ति मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र को समाप्त करने का स्त्रोत भी हैं। भक्त भगवान शिव को सर्वशक्तिमान मानते हैं और उनकी उपासना से आत्मविकास और जीवन की सच्ची समझ की प्राप्ति होती है। भक्ति मार्ग का सच्चा अनुसरण करने से मोक्ष की संभावना प्रबल होती है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह स्तोत्र पौराणिक साहित्य में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। शिव तांडव स्तोत्र का रचनाकार रावण, जो स्वयं एक बड़ा भक्त और ज्ञानी था, ने इसे भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए रचा था। यह स्तोत्र शास्त्रों में शिव की महिमा और उनके तांडव नृत्य के महत्व को दर्शाता है। कई पुराणों में शिव की तांडव के प्रभावों का वर्णन है, जो जीवन के आरंभ, विकास और समाप्ति के चक्र को दर्शाता है। यह स्तोत्र भक्तों के लिए शिव से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण साधन है। तांडव नृत्य शakti, शक्ति और विनाश की विशेषताओं को समेटे हुए है, जिससे भगवान शिव का निराकार रूप प्रकट होता है।

भगवान शिव की महिमा, लिंगोत्पत्ति और पवित्र तीर्थों के विवरण के लिए शिव पुराण का संपूर्ण अध्ययन करें। शिव तांडव का जप करने से चित्त की शांति, मानसिक संबंधों का सुधार, स्वास्थ्य में सुधार और आध्यात्मिक उन्नति होती है। इसे नियमित रूप से गाने से व्यक्ति में सकारात्मकता आती है, क्रोध और चिंता कम होती है। यह साधना भक्तों को ध्यान और समर्पण की पूर्णता में सहायता करती है, जिससे आत्मा की शुद्धि होती है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

शिव तांडव का पाठ सुबह के समय या शाम के समय करना सबसे उपयुक्त होता है। पूजा स्थान को साफ करके वहां एक दीपक जलाना, फूलों और फलों का चढ़ावा अर्पित करना चाहिए। भक्त को ध्यान की मुद्रा में बैठकर एकाग्रता से गाना होना चाहिए। मानसिक रूप से भगवान शिव के प्रति समर्पण होना चाहिए ताकि पाठ का प्रभाव अधिकतम हो।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शिव तांडव स्तोत्र का महत्व क्या है?

यह स्तोत्र भगवान शिव के तांडव नृत्य की महिमा का वर्णन करता है और भक्तों के लिए शिव से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण साधन है।

क्या शिव तांडव का पाठ करने से लाभ होता है?

हाँ, शिव तांडव का पाठ मानसिक शांति लाता है, आध्यात्मिक उन्नति करता है और जीवन के विभिन्न संकटों से मुक्ति दिलाता है।

इस स्तोत्र के रचनाकार कौन हैं?

शिव तांडव स्तोत्र के रचनाकार रावण हैं, जो भगवान शिव के परम भक्त और एक महान ज्ञानी माने जाते हैं।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 09 Oct 2026

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