भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

शंकर का डमरू बाजे रे कैलाशपति शिव नाचे रे लिरिक्स

शंकर का डमरू बाजे रे कैलाशपति शिव नाचे रे भजन के लिरिक्स, संदर्भ एवं व्याख्या सहित पढ़ें। सावन और महाशिवरात्रि पर विशेष शिव भक्ति।

शंकर का डमरू बाजे रे कैलाशपति शिव नाचे रे - परिचय एवं भक्ति भाव

देवादिदेव महादेव भगवान शिव को समर्पित लोकप्रिय भजन "शंकर का डमरू बाजे रे कैलाशपति शिव नाचे रे" सनातन धर्म की अनन्य शिव भक्ति परंपरा का एक अत्यंत मनमोहक और ऊर्जावान संकीर्तन गीत है। यह भजन भगवान शिव के वैराग्य, ब्रह्मांडीय नृत्य (तांडव), उनकी असीम करुणा और कैलाशाधिपति स्वरूप का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। जब साधक इस पावन भजन का स्मरण या गायन करता है, तो उसके मन में शिव के डमरू की गूंज 'डम डम डम' और उनके अलौकिक सौंदर्य की छवि साकार हो जाती है। हिंदू धर्म में भगवान शिव को 'संहार के देवता' के साथ-साथ 'कल्याणकारी' और 'भोलेनाथ' के रूप में पूजा जाता है। इस भजन के माध्यम से भक्त शिव के उस स्वरूप का दर्शन करते हैं जहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड उनकी गति और डमरू की ताल पर नृत्य करता है। विशेषकर महाशिवरात्रि, सावन मास के सोमवार, प्रदोष व्रत और शिव सत्संग के अवसरों पर इस भजन का गायन भक्तों को परमानंद और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन - शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

शंकर का डमरू बाजे रे।
कैलाशपति शिव नाचे रे॥

जटाजूट में नाचे गंगा,
शिव मस्तक पर नाथे चंदा।
नाचे वासुकी नीलकंठ पर,
नागेश्वर गल साजे रे,
शंकर का डमरू बाजे रे...॥

सीस मुकुट सोहे अति सुंदर,
नाच रहे कानन में कुंडल।
कंगन नूपुर चर्म-ओढ़नी,
भस्म दिगम्बर राजे रे,
शंकर का डमरू बाजे रे...॥

कर त्रिशूल कमंडल साजे,
धनुष-बाण कंधे पै नाचे।
बजे 'मधुप' मृदंग ढोल डफ,
शंख नगारा बाजे रे,
शंकर का डमरू बाजे रे...॥

तीनलौक डमरू जब बाजे,
म डम,डम डम,की ध्यनि गाजे।
ब्रह्म नाचे, विष्णु नाचे,
अनहद का स्वर गाजे रे,
शंकर का डमरू बाजे रे...॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन केवल शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि भगवान शिव की विराट चेतना और उनके विभिन्न आभूषणों व प्रतीकों का एक आध्यात्मिक दस्तावेज है। भजन की पहली पंक्ति 'शंकर का डमरू बाजे रे, कैलाशपति शिव नाचे रे' में यह दर्शाया गया है कि जब महादेव कैलाशाश्रम में डमरू बजाते हैं, तो उनकी डमरू की ध्वनि से संपूर्ण सृष्टि में स्पंदन और चेतना जागृत होती है। शिव का नृत्य (आनंद तांडव) सृजन, स्थिति और संहार का प्रतीक है।

भजन के दूसरे चरण में उनके शरीर पर सुशोभित दिव्य शक्तियों का वर्णन है। जटाजूट में बहने वाली माँ गंगा पवित्रता और मुक्ति का प्रतीक हैं, मस्तक पर चंद्रमा शीतलता और मन के नियंत्रण का संदेश देता है, तथा नीलकंठ पर लिपटे वासुकी नाग और गले में नागेश्वर का सुसज्जित होना यह बताता है कि शिव ने विष और भय दोनों को अपने वश में कर रखा है। उनके शरीर पर लगी भस्म (विभूति) इस नश्वर संसार की सच्चाई और वैराग्य का सर्वोच्च संदेश देती है।

अंतिम चरणों में रचयिता 'मधुप' ने महादेव के हाथों में सुशोभित त्रिशूल, कमंडल और उनके वाद्य यंत्रों का अद्भुत वर्णन किया है। जब डमरू की 'डम डम' ध्वनि गूंजती है, तो केवल शिव ही नहीं, बल्कि त्रिदेवों में ब्रह्मा और विष्णु भी उस अनहद स्वर में समाहित हो जाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि शिव ही संपूर्ण ब्रह्मांड के आदि और अंत हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • आध्यात्मिक ऊर्जा: इस भजन के गायन से साधকের भीतर सकारात्मक ऊर्जा, उत्साह और भक्ति भाव का संचार होता है।
  • शिव तत्व की पहचान: यह भजन शिव के वैराग्य और ऐश्वर्य दोनों रूपों का सुंदर सामंजस्य प्रस्तुत करता है।
  • मानसिक शांति: डमरू की गूंज और शिव के नाम का स्मरण तनाव, भय और चिंता को दूर कर मन को शांत करता है।
  • सामूहिक संकीर्तन: सत्संग और मंदिरों में ताली बजाकर गाने के लिए यह एक अत्यंत लोकप्रिय और आनंददायक भजन है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को किसी भी समय गाया जा सकता है, परंतु इसके श्रवण और गायन के लिए कुछ विशेष समय और तिथियां अत्यंत फलदायी मानी जाती हैं:

  • ब्रह्म मुहूर्त एवं प्रातः काल: सुबह स्नान के बाद शिव मंदिर में या घर के पूजा स्थल पर दीप प्रज्वलित करके इस भजन का स्मरण करना मन को पूरे दिन ऊर्जावान रखता है।
  • प्रदोष काल एवं सोमवार: प्रदोष काल (संध्या के समय) और सावन मास के प्रत्येक सोमवार को शिव साधना के दौरान इसका विशेष रूप से संकीर्तन किया जाता है।
  • महाशिवरात्रि पर्व: महाशिवरात्रि की रात्रि के चारों प्रहर की पूजा और जागरण के दौरान इस भजन को गाने से विशेष आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के मुख्य आराध्य देवादिदेव महादेव भगवान शिव हैं, जिन्हें रुद्रावतार, नीलकंठ, महाकाल और कैलाशाधिपति के रूप में पूजा जाता है। इस भजन की रचना प्रसिद्ध भक्त कवि 'मधुप' जी द्वारा की गई है, जिन्होंने अपनी सरल और प्रभावपूर्ण भाषा शैली के माध्यम से शिव भक्तों के लिए एक अमूल्य रचना भेंट की है। शिव भक्ति की यह परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है, जिसमें आदिशंकराचार्य से लेकर अनगिनत संतों ने शिव महिमा का गुणगान किया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भजन के रचनाकार 'मधुप' जी ने भारतीय लोक संगीत और शास्त्रीय भक्ति परंपरा का सुंदर समन्वय किया है। लोक धुनों पर आधारित यह भजन सरलता से हर उम्र के व्यक्ति की जुबान पर चढ़ जाता है। इसकी लय और ताल (डमरू की ध्वनि पर आधारित ताल) श्रोता को झूमने पर विवश कर देती है। रचना की पृष्ठभूमि विशुद्ध रूप से पौराणिक और आध्यात्मिक है, जहाँ शिव के कैलाश निवास और उनके तांडव स्वरूप को काव्यात्मक रूप दिया गया है। इसी प्रकार के अन्य प्रेरणादायक पाठ के लिए आप शिव तांडव स्तोत्र का भी अध्ययन कर सकते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

यह भजन सरल हिंदी और ब्रज-अवधि मिश्रित लोकभाषा में रचित है। इसमें अनुप्रास और रूपक अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है। डमरू की आवाज को दर्शाने वाले शब्द जैसे 'म डम, डम डम' (ओंकार नाद का प्रतीक) इस भजन को ध्वन्यात्मक रूप से अत्यंत प्रभावी बनाते हैं। भाषा की यह सरलता इसे जन-जन तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध हुई है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • वैराग्य और सादगी: भगवान शिव सोने-चांदी के मोह से परे भस्म रमाने वाले दिगंबर हैं, जो हमें बाहरी दिखावे से दूर रहने की सीख देते हैं।
  • भय का निवारण: गले में नाग धारण करने वाले शिव यह सिखाते हैं कि जो व्यक्ति भगवान की शरण में है, उसे मृत्यु या भय से डरने की आवश्यकता नहीं है।
  • समरसता: शिव की बारात और उनके परिवार में विरोधी स्वभाव वाले जीव (जैसे सांप और मयूर, नंदी और सिंह) एक साथ रहते हैं, जो समाज में आपसी प्रेम और समरसता का संदेश देता है।
  • अधिक जानकारी के लिए आप श्री हनुमान चालीसा और अन्य स्तोत्रों का पाठ भी कर सकते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
जटाजूट बिखरे हुए या बंधे हुए लंबे बाल गंगा के प्रवाह को थामने वाला शिव का केश रूप
वासुकी भगवान शिव के गले का सर्प कुंडलिनी शक्ति और नियंत्रण का प्रतीक
दिगंबर दिशाएं ही जिनके वस्त्र हैं (नग्न रूप) माया और सांसारिक बंधनों से मुक्त वैराग्य
अनहद वह नाद जो बिना आघात के गूंजे ब्रह्मांड की मूल ध्वनि (ओंकार)
भस्म राख संसार की नश्वरता और अमर सत्य का बोध

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: जटाजूट में नाचे गंगा, शिव मस्तक पर नाथे चंदा।
भावार्थ: भगवान शिव की जटाओं में माँ गंगा प्रवाहित होती हैं और उनके मस्तक पर द्वितीया का चंद्रमा सुशोभित है। यह दृश्य जल और शीतलता के संतुलन का प्रतीक है।

पंक्ति: नाचे वासुकी नीलकंठ पर, नागेश्वर गल साजे रे।
भावार्थ: समुद्र मंथन के समय विषपान करने के कारण जिनका कंठ नीला पड़ गया, उस नीलकंठ पर वासुकी नाग नृत्य कर रहा है और गले में नागेश्वर विराजमान हैं।

पंक्ति: तीनलौक डमरू जब बाजे, म डम, डम डम की ध्वनि गाजे।
भावार्थ: जब महादेव तीनों लोकों में अपना डमरू बजाते हैं, तो उसकी 'डम डम' ध्वनि से संपूर्ण ब्रह्मांड गूंज उठता है और उस नाद पर ब्रह्मा-विष्णु भी आनंदित होते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

शिव साधना को पूर्ण करने के लिए निम्नलिखित महामृत्युंजय मंत्र और पंचाक्षर मंत्र का स्मरण अवश्य करना चाहिए:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

ॐ नमः शिवाय॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम शंकर का डमरू बाजे रे कैलाशपति शिव नाचे रे (Shankar Ka Damroo Baaje Re)
आराध्य देवता भगवान शिव (महादेव / कैलाशाधिपति)
रचियता / कवि भक्त कवि 'मधुप' जी
भाषा सरल हिंदी एवं लोक भाषा
भक्ति भाव आनंद, वैराग्य, उत्सव और समर्पण
उचित अवसर महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, प्रदोष व्रत एवं सत्संग

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस लोकप्रिय भजन के रचनाकार प्रसिद्ध भक्त कवि 'मधुप' जी हैं, जिन्होंने अपनी रचना में भगवान शिव के श्रृंगार और तांडव का बहुत सुंदर वर्णन किया है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शिव के डमरू से निकलने वाली 'डम डम' ध्वनि से ही संस्कृत के व्याकरण (महेश्वर सूत्र) और ब्रह्मांड की रचना हुई है। यह चेतना और स्पंदन का प्रतीक है।

यह भजन महाशिवरात्रि, सावन मास के सोमवार, शिव विवाह उत्सव, जागरण और विशेष शिव सत्संग के दौरान बहुत उत्साह के साथ गाया जाता है।

'कैलाशपति' भगवान शिव को कहा जाता है क्योंकि उनका मुख्य निवास हिमालय का कैलाश पर्वत है, जहाँ वे सदा ध्यानमग्न रहते हैं।

भस्म (राख) इस संसार की नश्वरता का प्रतीक है। यह संदेश देती है कि शरीर अंततः मिट्टी में मिलना है, इसलिए मनुष्य को अहंकार त्यागकर ईश्वर भक्ति में लीन रहना चाहिए।

हाँ, इस भजन को सुबह या संध्या आरती के समय अपने परिवार के साथ घर पर गाना अत्यंत शुभ और मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना गया है।

दोनों ही भगवान शिव के ऊर्जावान नृत्य और उनके विराट स्वरूप का बखान करते हैं। जहाँ शिव तांडव स्तोत्र संस्कृत में है, वहीं यह भजन हिंदी लोक शैली में है।

शिव भक्ति से साधक को मानसिक स्थिरता, भय से मुक्ति, संकटों से लड़ने की शक्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है क्योंकि शिव 'आशुतोष' (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री पारंपरिक सनातन ग्रंथों, लोक भजन संकलनों और शिव पुराण के दार्शनिक सिद्धांतों पर आधारित है। इसे पाठकों की सुगमता और भक्ति भाव को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है ताकि भक्तजन शुद्ध उच्चारण के साथ इस भजन का लाभ उठा सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • शिव महापुराण - गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशन।
  • भारतीय लोक संगीत एवं संकीर्तन परंपरा।
  • पारंपरिक शिव भजन संग्रह एवं संत साहित्य।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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