भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

कन्हैया ले चल परली पार (kanhaiya le chal parli paar lyrics in hindi)

कन्हैया ले चल परली पार भजन भक्ति और प्रेम की अद्भुत विशेषता को दर्शाता है, जो भक्तों को असंख्य लाभ और आनंद की प्राप्ति कराता है।

प्रस्तावना एवं परिचय

कन्हैया की उपासना: प्रेम और भक्ति की सच्ची पहचान

यह भजन प्रेम और भक्ति का अनूठा मिश्रण है, जो भक्तों को कन्हैया की कृपा की ओर प्रेरित करता है।

कन्हैया ले चल परली पार (कीर्तन)कन्हैया ले चल परली पार, सांवरिया ले चल परली पार, जहां बिराजे राधा रानी अलबेली सरकार। सांवरिया ले चल..गुन अवगुन सब तेरे अर्पण, पाप पुण्य सब तेरे अर्पण। बुद्धि सहित मन तेरे अर्पण, ये जीवन भी तेरे अर्पण। मैं तेरे चरनों की दासी, तुम मेरे प्राण आधार। सांवरिया ले चल..तेरी आस लगा बैठी हूं, लज्जा शील गंवा बैठी हूं। आंखे खूब पका बैठी हूं, अपना आप लुटा बैठी हूं। सांवरिया मैं तेरी रागनी, तू मेरा मल्हार। सांवरिया ले चल..जग की कुछ परवाह नहीं है, अब कोई बाकी चाह नहीं है। चारों तरफ छाया अंधेरा, सूझती कोई राह नहीं है। मेरे प्रीतम मेरे माझी कर दो बेड़ा पार। सांवरिया ले चल..आनन्दघन जहां बरस रहा है, पत्ता पत्ता हर्ष रहा है। पी पी कर कोई करस रहा। ‘हरि’ बेचारा तरस रहा है। बहुत हुई अब हार चुकी मैं, मत छोड़ो मंझधार। सांवरिया ले चल..
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन का मुख्य विषय कन्हैया यानी श्री कृष्ण की कृपा की प्राप्ति है। भक्त प्रेमपूर्वक श्री कृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि वे उन्हें 'परली पार' यानी मोक्ष या सुख के पार लेकर चलें। भजन के आरंभ में कहा गया है, 'सांवरिया ले चल परली पार', जो इस असीम प्रेम व समर्पण को व्यक्त करता है। भक्त कन्हैया को केवल अपनी आस्था का आधार नहीं मानती, बल्कि उन्हें अपने अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा मानती हैं। वह हर एक गुण और अवगुण को श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित करने का संकल्प लेती हैं, यह दर्शाता है कि वे आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर हैं। इसके साथ ही, यह प्रार्थना उनके जीवन के सभी पहलुओं को श्री कृष्ण को समर्पित करने का प्रतीक है।

भावार्थ में भक्त की भावनाएं पूरी तरह से समर्पण में डूबी हुई हैं। 'तेरी आस लगा बैठी हूं, लज्जा शील गंवा बैठी हूं' जैसे वाक्य न केवल भक्त के प्रेम को दर्शाते हैं, बल्कि उनकी हृदय की गहराइयों से जुड़ी लज्जा और शील की चर्चा करते हैं। यहाँ भक्त अपनी कमजोरी को स्वीकार करती हैं और श्री कृष्ण से कृपा की अपेक्षा करती हैं। 'जग की कुछ परवाह नहीं है', यह दर्शाता है कि वे संसारिक वस्तुओं को तिरस्कृत करके केवल भक्ति के मार्ग पर चलना चाहती हैं। भक्त का यह निवेदन 'कर दो बेड़ा पार' जीवन के संकटों से मुक्ति की तीव्र इच्छा को प्रकट करता है।

इस भजन में भक्ति मार्ग की गहराई का वर्णन किया गया है। भक्त की व्यक्तिगत पवित्रता और आस्था, श्री कृष्ण में उनकी पूर्ण विश्वास को दर्शाती है। यहाँ 'आनन्दघन जहां बरस रहा है' वाक्य दिव्यता के उस अनुभव को बताता है, जब व्यक्ति भगवान की कृपा से स्थायी शांति और आनंद की अनुभूति करता है। भक्ति का यह मार्ग निरंतर साधना और आत्म-समर्पण की आवश्यकता को दर्शाता है। इस तरीके से भक्त का कन्हैया के प्रति अनुराग और विश्वास उन्हें आत्मिक गहराई में ले जाकर जीवन के अंतिम लक्ष्य की ओर अग्रसर करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह भजन वैष्णव परंपरा में अति महत्वपूर्ण है जिसमें श्री कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति का गहन संवाद है। भगवत गीता और भागवत पुराण में श्री कृष्ण के महान कार्य और उनके प्रति भक्ति का वर्णन मिलता है। यह भजन भक्तों को उस समय की याद दिलाता है जब श्री कृष्ण ने गोकुल में लीलाएं की थीं और राधा-कृष्ण के प्रेम की अद्भुत कथाएं अनुभव कराई थीं। इससे भक्तों में भक्ति और आत्म-समर्पण की भावना को और मजबूत बनाने की प्रेरणा मिलती है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का जाप मानसिक शांति, सुकून, और आत्मिक उन्नति का साधन है। यह भक्ति भावनाओं को जगाता है और भक्त का आत्मविश्वास बढ़ाता है। इसके नियमित जाप से मानसिक तनाव कम होता है और व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनता है। साथ ही, यह भजन भक्त का जीवन उद्देश्य की ओर प्रेरित करता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन की साधना के लिए सुबह या शाम का समय सर्वोत्तम होता है। पूजा स्थली पर एक दीया जलाना, फूल चढ़ाना और चरणामृत लेना इस साधना की नियमों में शामिल हैं। भजन chant करते समय ध्यान आरामदायक मुद्रा में बैठकर रखना चाहिए, जिससे मन एकाग्रता में स्थित रहे। मन में भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति का भाव होना चाहिए।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

कन्हैया ले चल परली पार भजन का अर्थ क्या है?

इस भजन का अर्थ है भक्त की प्रार्थना कि कन्हैया उन्हें सुख और मुक्ति के पार ले चलें, यह उनकी गहरी भक्ति और कन्हैया के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

इस भजन का सामर्थ्य क्या है?

यह भजन भक्त की आत्मा को शांति और आनंद की अनुभूति कराता है, साथ ही भक्त के भीतर भक्ति मार्ग की प्रेरणा जागृत करता है।

भजन की साधना करने का सही समय कब है?

यह भजन सुबह या शाम को करना उत्तम होता है, जब मन शांत और सजग रहता है, जिससे भक्ति भाव अधिक गहराई से अनुभव किया जा सके।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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