"जिसने राग-द्वेष कामादिक" एक अत्यंत प्रभावशाली और दार्शनिक भजन है, जो मनुष्य के अंतर्मन की शुद्धि और आध्यात्मिक जागृति का आह्वान करता है। यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है। भक्ति परंपरा में इस गीत का विशेष स्थान है क्योंकि यह भक्त को बाहरी आडंबरों से हटाकर आंतरिक शत्रुओं—राग (मोह), द्वेष (घृणा), और काम (वासना)—पर विजय पाने की प्रेरणा देता है। इस भजन की गूँज मन को शांति प्रदान करती है और साधक को उस परम तत्व की ओर ले जाती है जिसने समस्त संसार के मायाजाल को जीत लिया है। चाहे वह श्री राम की स्तुति हो, गणेश वंदना हो या मां सरस्वती का आह्वान, यह भजन उस 'वीतराग' भाव को समर्पित है जो सभी दिव्य शक्तियों का मूल आधार है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया।
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया॥
बुद्ध, वीर, जिन, हरि, हर, ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो।
भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह, चित्त उसी में लीन रहो॥
विषयों की आशा नहिं जिनके, साम्य भाव धन रखते हैं।
निज पर के हित साधन में जो, निशदिन तत्पर रहते हैं॥
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं।
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुःख समूह को हरते हैं॥
रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं का नित्य रहे।
उन जैसी ही चर्या में यह, चित्त सदा अनुरक्त रहे॥
नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहिं कहा करूँ।
पर-धन-वनिता पर न कभी मैं, भूल कर भी मन रहा करूँ॥
अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ।
देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईर्ष्या भाव धरूँ॥
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूँ।
बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूँ॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और वैराग्य प्रधान है। प्रथम पंक्तियों में उस महापुरुष या परमात्मा की वंदना की गई है, जिसने अपने भीतर के विकारों—राग, द्वेष और काम—पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। 'राग' का अर्थ है किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अत्यधिक आसक्ति, और 'द्वेष' का अर्थ है घृणा। जब तक मनुष्य इन दोनों के बीच झूलता रहता है, वह अशांत रहता है। जिसने इन्हें जीत लिया, वही वास्तव में 'जग' को जान सकता है।
भजन का दूसरा भाग 'निस्पृह उपदेश' की बात करता है। सच्चा गुरु या ईश्वर वही है जो बिना किसी स्वार्थ के जीवों को मोक्ष का मार्ग दिखाए। यहाँ उदारता का परिचय देते हुए कहा गया है कि उस परम तत्व को आप चाहे बुद्ध कहें, महावीर कहें, जिन कहें, हरि (विष्णु), हर (शिव) या ब्रह्मा कहें—नाम से कोई भेद नहीं पड़ता। मुख्य उद्देश्य यह है कि हमारा चित्त उस वीतराग भाव में लीन रहे।
आगे के छंदों में 'साम्य भाव' पर बल दिया गया है। जो साधु या ज्ञानी विषयों (इंद्रिय सुखों) की आशा नहीं रखते और समता को ही अपना धन मानते हैं, वे ही संसार के दुखों को दूर करने में सक्षम हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि परोपकार और स्वार्थ का त्याग ही सच्ची तपस्या है। अंतिम पंक्तियों में एक भक्त की प्रार्थना है कि वह कभी किसी जीव को न सताए, सत्य बोले और दूसरों की प्रगति देखकर ईर्ष्या न करे। यह आत्म-सुधार का एक संपूर्ण घोषणापत्र है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन आध्यात्मिक साधना के कई महत्वपूर्ण स्तंभों को समाहित करता है:
- वीतरागता का आदर्श: यह भजन किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित न रहकर उस अवस्था की पूजा करता है जहाँ मन विकारों से मुक्त हो जाता है।
- सर्वधर्म समभाव: इसमें बुद्ध, महावीर, विष्णु और शिव को एक ही परम सत्य के विभिन्न नाम बताया गया है, जो भारतीय दर्शन की उदारता को दर्शाता है।
- नैतिक आचरण: यह केवल स्तुति नहीं है, बल्कि एक प्रतिज्ञा है—झूठ न बोलने की, चोरी न करने की और ब्रह्मचर्य व संतोष का पालन करने की।
- मानसिक शांति: राग-द्वेष के त्याग से ही मानसिक क्लेशों का अंत होता है, यह मनोवैज्ञानिक सत्य इस भजन का केंद्र है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने और सुनने के लिए कोई कठोर नियम नहीं हैं, परंतु इसकी प्रकृति चिंतनशील है, इसलिए निम्नलिखित समय और विधि सर्वोत्तम मानी जाती है:
प्रातः काल: सुबह के समय जब मन शांत होता है, इस भजन का पाठ करने से दिन भर के लिए सकारात्मक और नैतिक ऊर्जा प्राप्त होती है। इसे सरस्वती वंदना के साथ जोड़कर पढ़ने से बुद्धि निर्मल होती है।
संध्या वंदना: दिन भर की भागदौड़ और मानसिक तनाव के बाद, आत्म-निरीक्षण के लिए शाम को इसका गायन अत्यंत लाभकारी है।
सत्संग और स्वाध्याय: धार्मिक सभाओं में सामूहिक रूप से इसे गाने से सामाजिक समरसता बढ़ती है। इसे शांत चित्त होकर, प्रत्येक शब्द के अर्थ पर ध्यान देते हुए गाना चाहिए।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यद्यपि यह भजन 'मेरी भावना' के रूप में प्रसिद्ध है और जैन विद्वान जुगलकिशोर मुख्तार द्वारा रचित माना जाता है, लेकिन इसकी व्यापकता इसे सनातन धर्म के श्री राम स्तुति और गणेश वंदना के समकक्ष खड़ा करती है।
इसमें वर्णित 'हरि' भगवान विष्णु के प्रतीक हैं, 'हर' भगवान शिव के, और 'ब्रह्मा' सृष्टि के रचयिता के। 'बुद्ध' और 'वीर' (महावीर) ज्ञान और अहिंसा के प्रतीक हैं। यह भजन उस 'परमात्मा' को संबोधित है जो इन सभी रूपों में व्याप्त है। विशेष रूप से गणेश वंदना के संदर्भ में, भगवान गणेश को 'विघ्नहर्ता' कहा जाता है, और राग-द्वेष ही जीवन के सबसे बड़े विघ्न हैं, जिन्हें दूर करने की प्रार्थना यहाँ की गई है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का सुंदर प्रयोग किया गया है। इसकी काव्य शैली 'पद' और 'प्रार्थना' का मिश्रण है।
- छंद: यह एक गेय पद है जिसे लयबद्ध तरीके से गाया जा सकता है।
- अलंकार: इसमें 'अनुप्रास' और 'रूपक' अलंकारों का सहज प्रयोग मिलता है। 'साम्य भाव धन' में रूपक अलंकार है, जहाँ समता को ही धन बताया गया है।
- रस: मुख्य रूप से इसमें 'शांत रस' की प्रधानता है, जो श्रोता के मन में वैराग्य और शांति का संचार करता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द | सरल अर्थ | संदर्भ |
|---|---|---|
| राग-द्वेष | आसक्ति और घृणा | मन के दो मुख्य विकार |
| कामादिक | काम, क्रोध, लोभ आदि | इंद्रिय जनित वासनाएं |
| निस्पृह | इच्छा रहित / निस्वार्थ | बिना किसी स्वार्थ के उपदेश देना |
| वीतराग | जिसका मोह समाप्त हो गया हो | परमात्मा की एक अवस्था |
| साम्य भाव | समानता का भाव | सुख-दुख में एक जैसा रहना |
| वनिता | स्त्री | शुद्ध आचरण के संदर्भ में |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया" - यहाँ उस महापुरुष की महिमा है जिसने प्रेम-घृणा और वासनाओं को जीतकर ब्रह्मांड के वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया है।
"सब जीवों को मोक्ष मार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया" - उन्होंने बिना किसी बदले की भावना के सभी प्राणियों को मुक्ति का मार्ग दिखाया है।
"अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूँ" - यह साधक की स्वयं से प्रतिज्ञा है कि वह अपने भीतर के 'मैं' (अहंकार) को समाप्त करेगा और क्रोध पर नियंत्रण रखेगा।
"देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईर्ष्या भाव धरूँ" - दूसरों की सफलता और प्रगति को देखकर जलने के बजाय प्रसन्न होना ही सच्ची धार्मिकता है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भावों की पुष्टि श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक से होती है:
"रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥"
(गीता 2.64: राग और द्वेष से मुक्त होकर इंद्रियों को वश में करने वाला साधक ही परम शांति प्राप्त करता है।)
इसी प्रकार गणेश वंदना मंत्र भी बुद्धि की शुद्धि के लिए अनिवार्य है, जो इस भजन के संदेश को पूर्ण करता है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | जिसने राग-द्वेष कामादिक (मेरी भावना) |
| मुख्य विषय | आत्म-सुधार, वैराग्य, नैतिकता |
| रचनाकार | जुगलकिशोर मुख्तार (पारंपरिक रूप से) |
| भाषा | हिंदी (तत्सम प्रधान) |
| उपयुक्त अवसर | दैनिक प्रार्थना, सत्संग, विद्यालय प्रार्थना |
| मुख्य संदेश | आंतरिक शत्रुओं पर विजय और परोपकार |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह सामग्री भक्तिलोक के विद्वानों द्वारा आध्यात्मिक ग्रंथों और पारंपरिक भजनों के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। "जिसने राग-द्वेष कामादिक" भजन मानवीय मूल्यों का एक उत्कृष्ट दस्तावेज है। यह भजन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर जाने में नहीं, बल्कि अपने व्यवहार को शुद्ध करने में है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2: सांख्य योग)
- जैन दर्शन: 'मेरी भावना' (पंडित जुगलकिशोर मुख्तार)
- भक्ति परंपरा के प्रमुख पद और स्तुतियां
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