Parvati Stotram

तन को जोगी सब करें मन को बिरला कोई दोहे का अर्थ(Tan Ko Jogi Sab Kare Man Ko Birala Koi Dohe Ka Arth in Hindi)

87 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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संत कबीरदास जी की यह कालजयी साखी 'तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई' न केवल एक दोहा है, बल्कि यह आत्म-साधना और भक्ति मार्ग का एक गहरा दर्शन है। इस साखी में कबीर साहेब ने बाह्य आडंबरों और आंतरिक शुद्धि के बीच के सूक्ष्म अंतर को अत्यंत सरलता से स्पष्ट किया है। अक्सर साधक बाहरी वेशभूषा, तिलक, माला और जटाओं को ही योग मान लेते हैं, किंतु कबीर का स्पष्ट मत है कि असली योग मन का निग्रह है। यह लेख इस साखी के गूढ़ अर्थ, इसके आध्यात्मिक महत्व और दैनिक जीवन में मन की एकाग्रता की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डालता है।

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई।
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ॥

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

इस साखी का विश्लेषण करने पर हमें इसके दो मुख्य भाग प्राप्त होते हैं:

  • तन को जोगी सब करें: संसार में अधिकांश लोग शरीर पर भस्म लगाना, गेरुआ वस्त्र धारण करना या जटाएं बढ़ाना जैसे बाहरी कर्मों को योग मान लेते हैं। यह तन का योग है, जिसे कोई भी कर सकता है।
  • मन को बिरला कोई: मन को वश में करना, उसे विकारों से मुक्त करना और ईश्वर के ध्यान में स्थिर करना अत्यंत कठिन है। इसे करने वाला कोई विरला ही होता है।
  • सब सिद्धि सहजे पाइए: जब मन स्थिर और शुद्ध हो जाता है, तो समस्त सिद्धियां और आत्मिक आनंद सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।
  • जे मन जोगी होइ: यदि व्यक्ति का मन वास्तव में योगी हो जाए, तो उसे बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं रहती।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ

कबीरदास जी कहते हैं कि शरीर को योगी बनाना बहुत सरल है। लोग शरीर पर राख मल लेते हैं, लंबी जटाएं रख लेते हैं और साधुओं जैसा वेश धारण कर लेते हैं। यह सब बाहरी दिखावा है, जिसे कोई भी व्यक्ति आसानी से कर सकता है। परंतु, अपने मन को योगी बनाना—अर्थात मन की चंचलता को समाप्त कर उसे परमात्मा के चरणों में लीन कर देना—यह कार्य बहुत कठिन है। इसे कोई विरला ही कर पाता है।

साधना का वास्तविक अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन को विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) से मुक्त करना है। जब साधक का मन योगी हो जाता है, तो उसे किसी बाहरी सिद्धि की कामना नहीं रहती, क्योंकि ईश्वर की प्राप्ति ही सबसे बड़ी सिद्धि है। मन की एकाग्रता ही वह कुंजी है जिससे आत्म-साक्षात्कार का द्वार खुलता है।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश

यह साखी हमें सिखाती है कि भक्ति मार्ग में 'बाह्य' से अधिक 'आंतरिक' शुद्धि का महत्व है। यदि मन में कपट है, तो शरीर पर चंदन का लेप लगाने से कोई लाभ नहीं। मन का योगी होना ही 'चित्त की वृत्तियों का निरोध' है, जैसा कि पतंजलि योगसूत्र में वर्णित है। यह साखी हमें आत्म-चिंतन की प्रेरणा देती है कि क्या हम केवल दिखावे के लिए पूजा-पाठ कर रहे हैं या हमारा मन वास्तव में प्रभु के ध्यान में लगा है?

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख

आज के भागदौड़ भरे जीवन में, जहाँ तनाव और मानसिक अशांति चरम पर है, कबीर का यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है:

  • एकाग्रता: अपने कार्यों को पूरी निष्ठा और एकाग्रता से करना ही मन का योग है।
  • आडंबर से मुक्ति: दिखावे की भक्ति से बचें और हृदय की शुद्धता पर ध्यान दें।
  • आत्म-नियंत्रण: क्रोध और नकारात्मक विचारों पर विजय प्राप्त करना ही आधुनिक युग की सबसे बड़ी सिद्धि है।
  • निरंतर अभ्यास: मन को वश में करना एक दिन का कार्य नहीं, यह निरंतर अभ्यास (अभ्यास और वैराग्य) से संभव है।

एक नजर में: साखी की जानकारी

विषय विवरण
रचनाकारसंत कबीरदास
भाषासधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी)
मुख्य भावआत्म-साधना एवं मन का निग्रह
दर्शनभक्ति एवं योग का समन्वय
स्रोतकबीर बीजक / कबीर ग्रंथावली

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इसका अर्थ है बाहरी वेशभूषा धारण करना, जैसे गेरुआ वस्त्र पहनना, भस्म लगाना या जटाएं रखना।

नियमित ध्यान, सत्संग, आत्म-चिंतन और विकारों को त्यागकर मन को ईश्वर के चिंतन में लगाने से मन योगी बनता है।

नहीं, यह साखी हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपने जीवन में शांति और आत्मिक उन्नति चाहता है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ

यह सामग्री कबीर ग्रंथावली और संत साहित्य के पारंपरिक व्याख्यानों पर आधारित है।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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