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ना रुसी पौणाहारिया लिरिक्स (Na Russi Paunahariya Lyrics in Hindi) - Baba Balak Nath bhajan

ना रुसी पौणाहारिया लिरिक्स (Na Russi Paunahariya Lyrics in Hindi) पढ़ें। बाबा बालक नाथ जी का यह प्रसिद्ध भजन संदर्भ एवं व्याख्या सहित यहाँ उपलब्ध है।

बाबा बालक नाथ भजन भक्ति संगीत पौणाहारिया

बाबा बालक नाथ भजन

प्रस्तुति: भक्तिलोक (Bhaktilok.in) | संकलित एवं संपादित पाठ

सनातन धर्म और उत्तर भारत की समृद्ध लोक-आध्यात्मिक परंपरा में श्री बाबा बालक नाथ जी की महिमा अपरंपार है। हिमाचल प्रदेश के सिद्ध पीठ दियोटसिद्ध (ग्रिफ) में विराजे योगी शिरोमणि बाबा बालक नाथ जी को 'पौणाहार' (दूध-रोटी का आहार करने वाले अथवा प्राणों के रक्षक) के रूप में पूजा जाता है। यह अत्यंत पावन भजन "ना रुसी पौणाहारिया लिरिक्स (Na Russi Paunahariya Lyrics in Hindi)" बाबा के चरणों में अनन्य प्रेम, श्रद्धा और पूर्ण शरणागति का अनूठा प्रतीक है। जब एक साधक या भक्त अपने इष्टदेव, जिन्हें वह 'बाबा' या 'बालकनाथ' कहकर पुकारता है, से विनय करता है कि हे पौणाहार! तू मुझसे कभी रुष्ट (नाराज) मत होना, तो यह भाव सीधे अंतरात्मा को झकझोर देता है। इस भजन का गायन विशेषकर रोट महोत्सव, चौदस, रविवार के मेलों और जागरण के पावन अवसरों पर किया जाता है। इसके स्मरण मात्र से ही भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और दियोटसिद्ध की गुफा के दर्शन की अनुभूति प्राप्त होती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

(मुखड़ा) ना रुसी पौणाहारिया, तेनू दिल दा हाल सुणाईए, तेरा दर छड्ड के बाबा, कित्थे जाइरखिये? ना रुसी पौणाहारिया, तेनू दिल दा हाल सुणाईए... (अंतरा १) दुनिया दे विच रुल गए हां, तेरे दर ते आ के झुके हां, तू ही बेड़ा पार लगावीं, चरणीं मैनू लावीं बाबा! ना रुसी पौणाहारिया, तेनू दिल दा हाल सुणाईए... (अंतरा २) दूध मलाई दा भोग चढ़ाईए, रोट प्रसाद मनाइए जी, तेरा ध्यान लगा के बाबा, ज्योत जगाइए जी! ना रुसी पौणाहारिया, तेनू दिल दा हाल सुणाईए... (अंतरा ३) कलयुग विच महिमा तेरी भारी, संगत आउंदी वारो-वारी, झंडे वाले बाबा तेरी जय जयकारा, गूंजे दरबारां विच सारा! ना रुसी पौणाहारिया, तेनू दिल दा हाल सुणाईए... (समापन) बालक नाथ दया कर दाता, तू ही अम्मां तू ही बाप्पा, चरण कमलों विच ध्यान लगाए, 'भक्तिलोक' शीश झुकाए! ना रुसी पौणाहारिया, तेनू दिल दा हाल सुणाईए...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मूल भाव एक भक्त और उसके आराध्य (श्री बाबा बालक नाथ जी) के बीच के पवित्र और निश्चल प्रेम को दर्शाता है। भक्त अपने इष्ट से प्रार्थना करता है कि हे पौणाहार (दूध का आहार करने वाले बाबा)! आप मुझसे कभी भी रुष्ट या क्रोधित मत होना। इस संसार रूपी सागर में मैं अपना दिल का हाल केवल आपको ही सुना सकता हूँ। यदि मैं आपको छोड़कर कहीं और जाऊँगा, तो मुझे ऐसा कोई अन्य आत्मीय और रक्षक प्राप्त नहीं होगा जो मेरे दुखों को हर सके।

भजन के अगले चरणों में भक्त अपनी लाचारी और दुनिया की बाधाओं का वर्णन करते हुए कहता है कि इस भौतिक संसार में भटकते-भटकते जब मैं थक गया, तब केवल आपके ही दरबार में आकर मुझे शांति और शरण मिली है। अब इस भवसागर से मेरे जीवन की नाव को पार लगाने की जिम्मेदारी आपकी ही है। यहाँ 'रोट प्रसाद' और 'दूध-मलाई के भोग' का उल्लेख बाबा की उस पारंपरिक पूजा पद्धति को उजागर करता है जो दियोटसिद्ध में श्रद्धा के साथ अर्पित की जाती है। अंततः भक्त यह स्वीकार करता है कि कलयुग के इस कालखंड में बाबा बालक नाथ की महिमा ही एकमात्र ऐसा संबल है जो मनुष्य को सत्य और भक्ति के मार्ग पर चलाती है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • आराध्य देवता: यह भजन नाथ परंपरा के महान सिद्ध पुरुष श्री बाबा बालक नाथ जी को समर्पित है।
  • भक्ति भाव: इसमें विरह, विनय, करुणा और अनन्य शरणागति (Surrender) का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
  • सांस्कृतिक महत्व: हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के संतों व भक्तों में यह भजन अत्यंत लोकप्रिय है।
  • मानसिक शांति: इस भजन के नियमित स्मरण से साधक के मन का अहंकार मिटता है और चित्त में एकाग्रता आती है।
  • अन्य संबंधित पावन स्तोत्रों और पाठों के लिए आप हरि भजन संग्रह और श्री हरि स्तोत्र का अवलोकन कर सकते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को प्रातः काल स्नान के पश्चात ध्यान करते समय अथवा संध्याकालीन आरती के समय पूरी तन्मयता के साथ गाया जा सकता है। रविवार का दिन बाबा बालक नाथ जी की आराधना के लिए विशेष रूप से समर्पित माना जाता है, इसलिए रविवार को या शुक्ल पक्ष की चौदस के दिन घर में धूप, दीप जलाकर इस भजन का संकीर्तन करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। सत्संग, जागरण और बाबा बालक नाथ के चौगान में होने वाले मेलों के दौरान इस भजन को सामूहिक रूप से गाने से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

श्री बाबा बालक नाथ जी को भगवान शिव के अंशाअवतार और शिव-भक्त गुरु गोरखनाथ की नाथ परंपरा से संबद्ध माना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार, उनका प्रकटोत्सव सतयुग में बावा बालक के रूप में हुआ था और वे दियोटसिद्ध (शाहतलाई, जिला हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश) की गुफा में बाल रूप में तपस्यारत रहे। वे पशु-पक्षियों के रक्षक, विशेषकर बकरियों को चराने वाले ग्वाल के रूप में अपनी लीलाओं के लिए प्रसिद्ध हुए। उनकी शरण में आने वाले प्रत्येक भक्त की मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत में रचे-बसे इस भजन की रचना किसी एक निश्चित रचनाकार के नाम से नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक-भक्ति परंपरा से जुड़ी है। लोक गायकों और बाबा के अनन्य भक्तों ने समय-समय पर इसके शब्दों को संजोकर इसे और अधिक मधुर व भावपूर्ण बनाया है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि उत्तर भारत के लोक-मानस में रची-बसी एक आत्मीय पुकार है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होती रही है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल हिंदी, पंजाबी और पहाड़ी लोक बोलियों के सुंदर मिश्रण से बनी है। इसमें 'पौणाहारिया', 'सुणाईए', 'दिला दा हाल' जैसे शब्दों का प्रयोग इसकी माटी की खुशबू और सहजता को बढ़ाता है। काव्य शैली के अंतर्गत इसमें अतुकांत एवं तुकबंदियों (Rhyming scheme) का बहुत ही सहज प्रयोग किया गया है जो संगीतबद्ध करने पर श्रोताओं को तुरंत मंत्रमुग्ध कर लेता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • अहंकार का त्याग: जीवन में कितनी भी कठिनाइयां आएं, मनुष्य को अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर के चरणों में शरण लेनी चाहिए।
  • विश्वास की दृढ़ता: संकट के समय भगवान या गुरु पर अटूट विश्वास रखना ही असली साधना है।
  • निसंकोच पुकार: भक्त को अपने मन की पीड़ा अपने इष्ट के सामने बिना किसी संकोच के रखनी चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / पद सरल अर्थ संदर्भ / भाव
पौणाहारिया दूध का आहार करने वाले बाबा बालक नाथ जी का विशेष संबोधन
रुसी नाराज होना / रुष्ट होना भक्त की इष्ट से विनय कि वे कभी क्रोधित न हों
रोट प्रसाद मीठी रोटी का विशेष प्रसाद बाबा को चढ़ाया जाने वाला पारंपरिक भोग
दरबार पावन पवित्र स्थान / गुफा दियोटसिद्ध धाम का पवित्र प्रांगण

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"ना रुसी पौणाहारिया, तेनू दिल दा हाल सुणाईए..." - इस प्रारंभिक पंक्ति में साधक अपने आराध्य से गिड़गिड़ाकर कह रहा है कि हे बाबा! आप हमसे कभी रुष्ट मत होना, हम अपने हृदय की समस्त व्यथा आपके श्रीचरणों में रख रहे हैं।
"तेरा दर छड्ड के बाबा, कित्थे जाइरखिये?" - भक्त पूछता है कि आपके इस पावन दरबार को छोड़कर मैं इस विशाल संसार में और कहाँ जाऊँगा, मुझे आपके सिवाय कोई अन्य आसरा नहीं दिखाई देता।
"दूध मलाई दा भोग चढ़ाईए, रोट प्रसाद मनाइए जी..." - यह पंक्ति बाबा की पूजा में अर्पित होने वाले पारंपरिक व्यंजनों का स्मरण कराती है, जो श्रद्धा और उल्लास के साथ अर्पित किए जाते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

"ॐ ह्रीं बालकनाथाय नमः"
"जय बाबा बालक नाथ जी की! अलख निरंजन!"

इस मंत्र के स्मरण से मानसिक शांति और बाबा की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम ना रुसी पौणाहारिया लिरिक्स (Na Russi Paunahariya Lyrics)
आराध्य देव श्री बाबा बालक नाथ जी (सिद्ध बाबा)
संगीत परंपरा लोक भक्ति संगीत एवं भजन
भाषा हिंदी, पंजाबी एवं पहाड़ी लोक बोली
मुख्य भाव विनय, प्रेम, शरणागति और विरह
उपयुक्त अवसर रविवार पूजा, चौदस मेला, जागरण, रोट महोत्सव

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

'पौणाहार' उस संत या महापुरुष को कहा जाता है जो अपने जीवन में केवल दूध या अल्प आहार ग्रहण करते हैं। श्री बाबा बालक नाथ जी को दूध और रोट का भोग अति प्रिय है, इसलिए उन्हें 'पौणाहार' या 'दूध-रोट वाले बाबा' भी कहा जाता है।

श्री बाबा बालक नाथ जी का मुख्य और ऐतिहासिक मंदिर हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर के अंतर्गत शाहतलाई के पास 'दियोटसिद्ध' की पहाड़ियों में एक प्राकृतिक गुफा में स्थित है।

यह भजन किसी भी दिन गाया जा सकता है, परंतु रविवार का दिन बाबा बालक नाथ जी को समर्पित है। अतः रविवार के दिन इस भजन का पाठ या श्रवण करने से विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा और बाबा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

बाबा बालक नाथ जी को मुख्य रूप से 'रोट प्रसाद' (आटे और गुड़/चीनी से बना विशेष मीठा व्यंजन) तथा दूध और मलाई का भोग अर्पित किया जाता है।

हाँ, इस भजन को घर पर प्रातः या संध्या वंदना के समय पूरी पवित्रता और भक्ति भाव के साथ गाया जा सकता है। इससे घर का वातावरण शुद्ध और सकारात्मक बनता है।

चैत और आश्विन मास के नवरात्रों के दौरान तथा प्रत्येक रविवार को दियोटसिद्ध में भारी मेला लगता है। वर्ष भर यहाँ मौसम सुहावना रहता है, विशेषकर मार्च से अक्टूबर के बीच यात्रा करना सबसे उत्तम माना जाता है।

पौराणिक कथाओं और लोक मान्यताओं के अनुसार उन्हें भगवान शिव का अंश और योगियों के सिद्ध पुरुष के रूप में पूजा जाता है, जो बाल रूप में हमेशा अमर हैं।

इस भजन का मुख्य संदेश ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम, अपने गुरु या इष्ट पर पूर्ण भरोसा रखना और जीवन की हर परिस्थिति में उनके चरणों में समर्पित रहना है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह आलेख सनातन भक्ति परंपरा, लोक संस्कृति और श्री बाबा बालक नाथ जी के दियोटसिद्ध धाम की मान्यताओं के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक भजन लिरिक्स और उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ से परिचित कराना है। किसी भी प्रकार के सुझाव या सुधार के लिए आप भक्तिलोक से संपर्क कर सकते हैं।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • उत्तर भारतीय लोक-साहित्य एवं सिद्ध बाबा बालक नाथ परंपरा
  • दियोटसिद्ध क्षेत्र की स्थानीय धार्मिक कथाएं एवं भजन संकलन
  • सनातन धर्म ग्रंथ एवं लोक संकीर्तन परंपरा

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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