Parvati Stotram

करता था तो क्यूं रहया जब करि क्यूं पछिताय दोहे का अर्थ(Karata Tha To Kyu Rahaya jab Kari Kyu Pachhitay Dohe Ka Arth in Hindi)

95 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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करता था तो क्यूं रहया जब करि क्यूं पछिताय दोहे का अर्थ — परिचय एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि

संत कबीर दास जी की यह पावन साखी (दोहा) भारतीय संत परंपरा, भक्ति साहित्य और आध्यात्मिक दर्शन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह दोहा—"करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय, बोये पेड़ बबूल का, आम कहां ते खाय"—मानव जीवन के कर्म सिद्धांत (Law of Karma), उत्तरदायित्व, और पश्चाताप की भावना पर गहरा प्रकाश डालता है। सनातन संस्कृति और भक्ति मार्ग में यह माना जाता है कि मनुष्य अपने प्रत्येक अच्छे और बुरे कर्म का निर्माता स्वयं है। जब कोई व्यक्ति अज्ञानतावश या स्वार्थवश ऐसे कर्म करता है, जिनका परिणाम अंततः दुःख और संताप लेकर आता है, तब बाद में पछताने से कुछ प्राप्त नहीं होता। इस दोहे के माध्यम से संत कबीर हमें सचेत करते हैं कि जीवन में जो भी बीज हम आज बोएंगे, भविष्य में फसल भी उसी रूप में काटनी होगी। यह दार्शनिक रचना साधक के अंतर्मन को जागृत कर उसे सत्कर्म, विवेक और भगवद-स्मरण की ओर प्रेरित करती है।

मूल दोहा / साखी

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय।

बोये पेड़ बबूल का, आम कहां ते खाय॥

उच्चारण, पाठ एवं संरचना

कबीर दास जी की यह साखी संत भाषा (सधुक्कड़ी भाषा) में रचित है, जिसमें ब्रज, अवधी, राजस्थानी और खड़ी बोली के शब्दों का सहज समन्वय देखने को मिलता है। इस दोहे का उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द पर उचित बल दिया जाना चाहिए ताकि इसका मूल भाव स्पष्ट हो सके। "करता था तो क्यूं रहया" का तात्पर्य है कि जब तुम अहितकर या निंदनीय कार्य कर रहे थे, तब तुमने अपने विवेक का उपयोग क्यों नहीं किया? और जब तुमने वैसा कर्म कर ही लिया है, तो अब भविष्य के परिणामों को देखकर रोने या पछताने से क्या लाभ? 'बबूल का पेड़' और 'आम का फल' इस दोहे के दो सबसे सशक्त प्रतीक (Metaphors) हैं, जो कर्म और उसके परिणाम की अटूट श्रंखला को दर्शाते हैं।

कठिन शब्दार्थ

शब्द / पद सरल हिंदी अर्थ संदर्भ एवं निहितार्थ
करता था कर्म करना, बुरा कार्य करना अज्ञानता या स्वार्थवश किए जाने वाले अनाधर्मिक या हानिकारक कार्य
क्यूं रहया क्यों नहीं रुके / क्यों विवेक नहीं जगाया कर्म करते समय आत्म-निरीक्षण न करने की स्थिति
करि कर्म करने के पश्चात / करने के बाद कार्यों को अंजाम देने की क्रिया
पछिताय पछताना, शोक करना, विलाप करना कर्म का फल मिलने पर होने वाला मानसिक संताप
बबूल कंटीला वृक्ष, कांटेदार पेड़ दुष्कर्म, पाप, कठोरता और कष्टप्रद प्रवृत्तियों का प्रतीक
अम्ब (आम) मीठा और रसीला फल सुख, शांति, संतोष और सकारात्मक परिणामों का प्रतीक
कहां ते खाय कहाँ से प्राप्त होगा / कैसे मिलेगा बुरे कर्मों से अच्छे फल की असंभवता

पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

इस साखी का विश्लेषण करने पर इसकी दो पंक्तियाँ जीवन के दो सबसे बड़े सत्यों—कर्म की स्वतंत्रता और परिणाम की अनिवार्यता—को उजागर करती हैं:

  • प्रथम पंक्ति: "करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय।" — इसका अर्थ है कि हे मनुष्य! जब तू अपने जीवन में अनैतिक, स्वार्थी या हानिकारक कार्य कर रहा था, तब तूने अपने अंतःकरण की आवाज क्यों नहीं सुनी? तू उन बुरे कामों को करने से क्यों नहीं रुका? और अब जब तूने वे कर्म कर लिए हैं और उनका संकट तेरे सामने आ खड़ा हुआ है, तो अब व्यर्थ में हाथ मलकर पछताने से क्या फायदा?
  • द्वितीय पंक्ति: "बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय।" — इसका अर्थ अत्यंत स्पष्ट और तर्कसंगत है। यदि कोई किसान खेत में कांटेदार बबूल के बीज बोएगा, तो वह उससे मीठे और स्वादिष्ट आम (अम्ब) खाने की उम्मीद कैसे कर सकता है? बबूल बोने पर कांटे ही मिलेंगे, आम नहीं। ठीक इसी प्रकार, यदि जीवन में बुरे कर्मों का रोपण किया गया है, तो सुख और शांति रूपी फलों की प्राप्ति असंभव है।

सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ

संत कबीर दास जी की यह साखी मानव मात्र को कर्म प्रधान जीवन जीने की प्रेरणा देती है। संसार में अधिकांश लोग यह चाहते हैं कि उनके जीवन में केवल सुख, सम्मान, शांति और आनंद की वर्षा हो, परंतु वे अपने दैनिक आचरण में ऐसे कार्य करते हैं जो दूसरों को पीड़ा पहुँचाते हैं, समाज में अशांति फैलाते हैं और उनके स्वयं के नैतिक पतन का कारण बनते हैं। कबीर जी स्पष्ट रूप से समझाते हैं कि प्रकृति का नियम अटल है—'जैसा बोओगे, वैसा काटोगे' (As you sow, so shall you reap)।

जब मनुष्य क्रोध, अहंकार, लोभ या मोह के वशीभूत होकर कोई अनुचित कार्य करता है, तब उसे उस समय तात्कालिक लाभ या आनंद तो प्रतीत होता है, परंतु कर्म का चक्र जब घूमता है और उसका प्रतिफल सामने आता है, तब वह व्यक्ति भाग्य को या ईश्वर को दोष देने लगता है और पछताने लगता है। कबीर दास जी कहते हैं कि यह पछतावा पूरी तरह व्यर्थ है। समय रहते विवेक का प्रयोग न करना ही मनुष्य के दुखों का सबसे बड़ा कारण है। यदि हम अपने जीवन में शांति, प्रेम और सद्भाव चाहते हैं, तो हमारे विचार, वाणी और कर्म भी उसी सुगंध और मिठास से परिपूर्ण होने चाहिए। यह दोहा हमें आत्म-चिंतन (Introspection) करने का अवसर देता है कि हम अपने दैनिक जीवन में किस प्रकार के 'बीज' बो रहे हैं।

मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार

इस साखी का केंद्रीय विचार कर्म की अनिवार्यता और नैतिक उत्तरदायित्व है। भक्ति और आध्यात्मिकता में केवल भगवान का नाम लेना ही पर्याप्त नहीं माना गया है, बल्कि आचरण की पवित्रता को भी उतना ही महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। कबीर जी का यह कथन हमें सिखाता है कि:

  1. मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है।
  2. कर्म करने से पहले उसके परिणामों पर विचार करना बुद्धिमत्ता है।
  3. बीते हुए समय में किए गए गलत कार्यों पर रोने के बजाय वर्तमान को सुधारना आवश्यक है।
  4. प्रकृति के शाश्वत नियमों के विरुद्ध जाकर सुख की कामना करना मूर्खता है।

आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश

भारतीय दर्शन में 'कर्म फल सिद्धांत' (Karma Doctrine) को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म करने का उपदेश देते हुए उसके परिणामों में आसक्ति न रखने और धर्मसम्मत कर्म करने पर बल दिया है। कबीर दास जी की यह साखी इसी दार्शनिक पृष्ठभूमि पर आधारित है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, बबूल और आम केवल पेड़ नहीं हैं, बल्कि वे दो प्रकार की वृत्तियों के प्रतीक हैं—एक है आसुरी वृत्ति (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) और दूसरी है दैवी वृत्ति (दया, क्षमा, प्रेम, संतोष, सेवा)। यदि साधक अपने अंतःकरण में स्वार्थ और द्वेष के कांटे बोएगा, तो वह कभी भी मोह और आनंद रूपी अमृत का पान नहीं कर पाएगा। आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि उसका प्रत्येक कदम विवेक और धर्म से निर्देशित हो। इसी संदर्भ में आप श्री हनुमान चालीसा के पाठ और शिव तांडव स्तोत्र के स्मरण से भी मानसिक शुद्धि और सत्कर्म की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं।

भक्ति परंपरा में महत्व

संत कबीर दास जी निर्गुण भक्ति धारा के महान संत थे, जिन्होंने किसी बाहरी पाखंड या दिखावे के बजाय सीधे सच्चे आचरण और आंतरिक शुद्धि पर जोर दिया। उनकी साखियां और दोहे भारत के घर-घर में गाए और सुनाए जाते हैं। भक्ति परंपरा में गुरु और संत हमें बार-बार यह चेतावनी देते हैं कि हमारा जीवन क्षणभंगुर है और प्रत्येक कर्म का लेखा-जोखा प्रकृति के विधान में सुरक्षित है। जब कोई भक्त इस दोहे को अपने जीवन में उतार लेता है, तो वह किसी भी परिस्थिति में दूसरों को दोष देने के बजाय अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो जाता है, जो कि सच्ची भक्ति की पहली सीढ़ी है।

दैनिक जीवन में प्रासंगिकता एवं सीख

आधुनिक युग में जहाँ प्रतिस्पर्धा, तनाव और स्वार्थ की भावना बढ़ती जा रही है, कबीर दास जी का यह दोहा और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। आज का मनुष्य शॉर्टकट अपनाने के चक्कर में कई बार ऐसे अनैतिक मार्ग चुन लेता है जिसके परिणाम स्वरूप उसे बाद में मानसिक तनाव, कानूनी समस्याओं और सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ता है।

  • विद्यार्थियों के लिए: यदि विद्यार्थी वर्ष भर अध्ययन न करके परीक्षा के समय चिंता करे और फेल होने पर पछताए, तो यह वही स्थिति है जो कबीर जी ने बबूल और आम के उदाहरण से समझाई है।
  • पेशेवरों और व्यापारियों के लिए: व्यवसाय में बेईमान तरीकों से धन कमाने वाले लोग जब बाद में संकट में आते हैं, तो उनका पछतावा व्यर्थ होता है।
  • पारिवारिक और सामाजिक जीवन में: रिश्तों में कड़वी बातें बोलने और अहंकार रखने वाले लोग जब अकेले पड़ जाते हैं, तो वे बबूल बोकर आम की फसल खोजने जैसे ही भ्रम में जीते हैं।

प्रतीक, रूपक एवं साहित्यिक शैली

कबीर दास जी की काव्य शैली अत्यंत प्रभावशाली और लोक-भाषा के निकट है। उन्होंने गूढ़ दार्शनिक सत्यों को समझाने के लिए अत्यंत साधारण ग्रामीण जीवन के प्रतीकों का प्रयोग किया है। 'बबूल का पेड़' और 'आम का फल' ऐसे दृश्य प्रतीक हैं जिन्हें एक साधारण किसान से लेकर पढ़ा-लिखा विद्वान भी तुरंत समझ सकता है। यह रूपक अलंकार (Metaphor) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ अप्रस्तुत (बबूल और आम) के माध्यम से प्रस्तुत (दुष्कर्म और उसके परिणाम) को अत्यंत सहजता से स्पष्ट किया गया है।

दोहा/साखी से मिलने वाली प्रमुख सीख

  • प्रत्येक कर्म का परिणाम निश्चित रूप से भोगना पड़ता है, इसलिए कर्म करने से पूर्व सोच-विचार अवश्य करें।
  • अज्ञानता या आवेश में किए गए गलत कार्यों के बाद पछताने से समय और ऊर्जा दोनों नष्ट होती हैं।
  • सुखद भविष्य की कामना करने वाले को वर्तमान में सत्कर्मों के बीज बोने चाहिए।
  • दूसरों को कष्ट देकर स्वयं के सुख की आशा करना व्यर्थ है।
  • आत्म-निरीक्षण (Self-reflection) और विवेकपूर्ण आचरण ही सफल और शांतिपूर्ण जीवन की कुंजी है।

एक नजर में | Quick Summary

घटक विवरण
रचना का प्रकार संत कबीर दास जी की साखी / दोहा
रचनाकार संत कबीर दास
भाषा सधुक्कड़ी (संत भाषा / हिंदी की विभिन्न बोलियों का मिश्रण)
भक्ति परंपरा निर्गुण भक्ति धारा / ज्ञानमार्ग शाखा
मुख्य विषय कर्म सिद्धांत, उत्तरदायित्व, विवेक और परिणाम
केंद्रीय संदेश जैसा कर्म करोगे, वैसा ही फल मिलेगा; कर्म करने के बाद पछताना व्यर्थ है।
प्रमुख प्रतीक बबूल का पेड़ (दुष्कर्म) और आम का फल (सुखद परिणाम)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस प्रसिद्ध साखी के रचयिता महान संत और समाज सुधारक संत कबीर दास जी हैं।

इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य अपने कर्मों का फल स्वयं भोगता है। बुरे कर्म करने के बाद पछताने से कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि जैसे बीज बोएंगे वैसे ही फल मिलेंगे।

बबूल का पेड़ बुरे कर्मों, पाप और कष्ट का प्रतीक है, जबकि आम का मीठा फल सुख, शांति और अच्छे परिणामों का प्रतीक है। कांटेदार पेड़ बोकर मीठे फल की उम्मीद नहीं की जा सकती।

संत कबीर की वाणी में कर्म सिद्धांत को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। उनके अनुसार बाहरी दिखावे या पूजा-पाठ से अधिक महत्वपूर्ण मनुष्य का नैतिक आचरण और उसके शुद्ध कर्म हैं।

हाँ, यह दोहा आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक है क्योंकि आधुनिक जीवनशैली में शॉर्टकट और अनैतिक तरीकों से सफलता पाने की होड़ में लोग अक्सर बुरे परिणाम भुगतते हैं।

सधुक्कड़ी भाषा वह भाषा है जिसमें संत कबीर जैसे महात्मा अपने उपदेश देते थे। इसमें हिंदी की विभिन्न बोलियों जैसे राजस्थानी, ब्रज, अवधी और खड़ी बोली के शब्द सहज रूप से सम्मिलित होते हैं।

कर्म करते समय हमेशा यह विचार करना चाहिए कि हमारे इस कार्य से किसी को अनावश्यक कष्ट न पहुँचे और भविष्य में इसका क्या परिणाम सामने आएगा। विवेकपूर्ण निर्णय ही उत्तम कर्म का आधार है।

अपने दैनिक जीवन में क्रोध, ईर्ष्या, और स्वार्थ का त्याग करके तथा दूसरों के प्रति दया, सहयोग और सत्कर्मों का आचरण करके इस साखी के मर्म को उतारा जा सकता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिकाल की संत परंपरा और कबीर वाणी पर आधारित यह लेख प्रामाणिक ग्रंथों, दार्शनिक व्याख्याओं और पारंपरिक विश्लेषण के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों और कर्म सिद्धांत से अवगत कराना है। यह सामग्री पूरी तरह से जनहित और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए प्रस्तुत की गई है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।

स्रोत एवं संदर्भ

  • कबीर ग्रಂಥवली - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी / श्यामसुंदर दास
  • भारतीय भक्ति साहित्य और संत परंपरा - सांस्कृतिक अध्ययन ग्रंथ
  • श्रीमद्भगवद्गीता - कर्मयोग अध्याय
  • सनातन धर्म के दार्शनिक मूल्य एवं नीतिशास्त्र

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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