महान समाज सुधारक, क्रांतिकारी कवि और रहस्यवादी संत कबीरदास जी के दोहे न केवल साहित्यिक दृष्टि से अमूल्य हैं, बल्कि वे मानव जीवन को सही दिशा दिखाने वाले आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ भी हैं। कबीरदास जी का यह प्रसिद्ध दोहा 'गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह' मनुष्य को संचय की प्रवृत्ति से मुक्त होकर परोपकार, दान और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इस दोहे के माध्यम से कबीर जी ने जीवन की नश्वरता और धन-संपत्ति की क्षणभंगुरता को अत्यंत सरल किंतु मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया है। यह दोहा हमें सिखाता है कि जो कुछ भी हमारे पास है, उसका सदुपयोग दूसरों की भलाई के लिए किया जाना चाहिए, क्योंकि अंततः यह भौतिक शरीर और सांसारिक वैभव यहीं छूट जाने वाले हैं। इस विस्तृत लेख में हम इस पावन दोहे के गहरे आध्यात्मिक, दार्शनिक और व्यावहारिक अर्थों को समझेंगे।
मूल दोहा / साखी | Original Text
गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह।
साझा होय सो बाँट दे, फिर नहिं पावै देह॥
उच्चारण, पाठ एवं संरचना | Pronunciation & Structure
यह दोहा संत कबीर की 'साखी' विधा के अंतर्गत आता है। साखी शब्द संस्कृत के 'साक्षी' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है - प्रत्यक्ष अनुभव या गवाही। कबीरदास जी ने अपने जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों को इन साखियों के माध्यम से समाज के सामने रखा है। इस दोहे की भाषा 'सधुक्कड़ी' या 'खड़ी बोली' मिश्रित ब्रजभाषा है, जिसे जनमानस आसानी से समझ सकता है।
इस दोहे का छंद 'दोहा छंद' है, जो एक अर्धसम मात्रिक छंद होता है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में 13-13 मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसका सस्वर पाठ अत्यंत लयबद्ध और मन को शांति प्रदान करने वाला होता है।
कठिन शब्दार्थ | Word Meanings
| शब्द (Word) | सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning) | संदर्भगत अर्थ (Contextual Meaning) |
|---|---|---|
| गाँठी (Ganthi) | गाँठ, तिजोरी या संचित धन | मनुष्य द्वारा संचित की गई संपत्ति या अहंकार रूपी संचय। |
| हाथ कर (Haath Kar) | हाथ में लेना, मुक्त करना | संचित धन को उपयोग के लिए बाहर निकालना, संचय की प्रवृत्ति को छोड़ना। |
| हाथ होय (Haath Hoy) | जो हाथ में आ चुका हो | वह धन या साधन जो वर्तमान में आपके पास उपयोग के लिए उपलब्ध है। |
| देह (Deh) | दे देना, दान करना या शरीर | दूसरों की भलाई के लिए समर्पित कर देना; परोपकार में लगाना। |
| साझा (Saajha) | साझेदारी, हिस्सा या जो कुछ भी आपके पास है | समाज और प्रकृति से प्राप्त संसाधन, जिसमें सबका अधिकार है। |
| बाँट दे (Baant De) | वितरित करना, दान करना | जरूरतमंदों की सहायता करना, परोपकार करना। |
| फिर नहिं पावै देह (Phir Nahin Paavai Deh) | यह मानव शरीर दोबारा नहीं मिलेगा | मानव जन्म की दुर्लभता और जीवन की क्षणभंगुरता का बोध। |
पदच्छेद एवं पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ | Line-by-Line Explanation
कबीरदास जी के इस दोहे को दो मुख्य पंक्तियों में विभाजित कर समझा जा सकता है:
प्रथम पंक्ति: "गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह।"
इस पंक्ति में कबीरदास जी कहते हैं कि यदि तुम्हारे पास कोई धन या संपत्ति गाँठ में बंधी हुई है (अर्थात तिजोरी या संचय में सुरक्षित रखी है), तो उसे अपने हाथ में लाओ। हाथ में लाने का अर्थ है कि उसे संचय की संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकालो। और जब वह धन तुम्हारे हाथ में आ जाए, तो उसे दूसरों को दे दो (अर्थात परोपकार और दान में लगा दो)। कबीर जी का मानना है कि संचित धन का कोई मूल्य नहीं है जब तक कि वह किसी भूखे, निर्धन या असहाय के काम न आए।
द्वितीय पंक्ति: "साझा होय सो बाँट दे, फिर नहिं पावै देह।"
इस पंक्ति में कबीर जी कहते हैं कि जो कुछ भी तुम्हारे पास है, उसे अपना व्यक्तिगत न मानकर 'साझा' (साझा संपत्ति या ईश्वर की देन) समझो और उसे समाज में बाँट दो। इस संसार में जो कुछ भी हमें मिला है, वह प्रकृति और समाज का ही अंश है। अंत में कबीर जी चेतावनी देते हुए कहते हैं कि यह मानव शरीर बार-बार नहीं मिलने वाला है। यह जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए इस दुर्लभ मानव जन्म का सदुपयोग परोपकार और भगवद-भक्ति में कर लो, इससे पहले कि यह शरीर नष्ट हो जाए।
सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ | Hindi Meaning & Bhavarth
संत कबीरदास जी का यह दोहा मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी - 'संग्रह वृत्ति' या 'लोभ' पर सीधा प्रहार करता है। कबीर जी कहते हैं कि हे मनुष्य! जो धन तूने अपनी गाँठ में बाँधकर, तिजोरियों में बंद करके रखा है, वह व्यर्थ है। जब तक वह संचित है, तब तक उसका कोई आध्यात्मिक या सामाजिक मूल्य नहीं है। इसलिए, सबसे पहले उस संचित धन को अपने हाथ में ले, अर्थात उस पर से अपना मोह कम कर। और जब वह हाथ में आ जाए, तो उसे परोपकार के कार्यों में लगा दे, क्योंकि हाथ में आया हुआ धन यदि दान न किया जाए, तो वह पुनः संचय या विनाश की ओर चला जाता है।
कबीर जी आगे कहते हैं कि इस सृष्टि में सब कुछ ईश्वर का है, यहाँ कुछ भी केवल तुम्हारा नहीं है। जो कुछ भी तुम्हारे पास है, वह समाज और प्रकृति के साथ एक 'साझा' संबंध रखता है। इसलिए, अपने हिस्से को दूसरों के साथ साझा करो, भूखों को अन्न दो, प्यासों को पानी दो और असहायों की मदद करो। कबीर जी हमें याद दिलाते हैं कि यह मानव देह अत्यंत दुर्लभ है। हिंदू दर्शन के अनुसार, 84 लाख योनियों के बाद यह मानव तन प्राप्त होता है। यदि इस जन्म में भी मनुष्य ने केवल धन बटोरने में ही अपना समय गंवा दिया और परोपकार नहीं किया, तो यह जीवन व्यर्थ चला जाएगा। मृत्यु के पश्चात कोई भी धन-दौलत साथ नहीं जाएगी, केवल हमारे द्वारा किए गए सत्कर्म और दान ही हमारे साथ जाएंगे।
मुख्य भाव एवं केंद्रीय विचार | Core Theme
इस दोहे का केंद्रीय विचार निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आधारित है:
- अपरिग्रह (Non-possessiveness): कबीर जी जैन और हिंदू दर्शन के 'अपरिग्रह' के सिद्धांत का समर्थन करते हैं, जहाँ आवश्यकता से अधिक संचय को पाप माना गया है।
- परोपकार और दान (Charity): दूसरों की सेवा और दान को मानव जीवन का सर्वोच्च कर्तव्य बताया गया है।
- जीवन की नश्वरता (Impermanence of Life): यह शरीर क्षणभंगुर है और मृत्यु निश्चित है, इसलिए सत्कर्म करने में देरी नहीं करनी चाहिए।
- मानव जन्म की दुर्लभता (Preciousness of Human Birth): इस जन्म का उपयोग केवल भौतिक सुखों के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया जाना चाहिए।
आध्यात्मिक व दार्शनिक संदेश | Spiritual & Philosophical Message
दार्शनिक दृष्टिकोण से, कबीरदास जी का यह दोहा वेदांत और उपनिषदों के 'ईशावास्य उपनिषद' के प्रथम श्लोक "तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्" (त्यागपूर्वक उपभोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो) के अत्यंत निकट है। कबीर जी कहते हैं कि धन का संचय मनुष्य
पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें