"वृन्दावन जाऊँगी सखी री वृन्दावन जाऊँगी" सनातन धर्म की समृद्ध संकीर्तन परंपरा का एक अत्यंत लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भजन है। यह भजन जीवात्मा की उस परम व्याकुलता और तीव्र उत्कंठा को दर्शाता है, जिसमें वह सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा (श्री कृष्ण) के पावन धाम 'वृन्दावन' की शरण में जाने के लिए लालायित है। इस भजन में माधुर्य भाव, विरह, और पूर्ण समर्पण का अनूठा संगम देखने को मिलता है। वैष्णव भक्ति परंपरा में वृन्दावन केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम और नित्य रास की चिन्मय भूमि है। जब एक भक्त या गोपी अपनी सखी से कहती है कि वह वृन्दावन जाएगी, तो यह वास्तव में सांसारिक मोह-माया से विरक्ति और ईश्वर के प्रति अनन्य अनुराग की घोषणा है। इस भजन का गायन विशेष रूप से श्री कृष्ण जन्माष्टमी, राधाष्टमी, कार्तिक मास, और विभिन्न सत्संगों व संकीर्तन उत्सवों में अत्यंत भावपूर्ण तरीके से किया जाता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
वृन्दावन जाऊँगी सखी री वृन्दावन जाऊँगी
॥ कोरस / मुखड़ा ॥
वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी।
मेरे बांके बिहारी को मनाऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी।
मेरे बांके बिहारी को मनाऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
॥ अंतरा - १ ॥
सास को मनाऊँगी, ससुर को मनाऊँगी।
गोदी में ललना खिलाऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी...
॥ अंतरा - २ ॥
जेठ को मनाऊँगी, जेठानी को मनाऊँगी।
घर में मैं खुशियां लाऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी...
॥ अंतरा - ३ ॥
देवर को मनाऊँगी, देवरानी को मनाऊँगी।
घर का मैं काम निपटाऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी...
॥ अंतरा - ४ ॥
गंगा भी जाऊँगी, यमुना भी जाऊँगी।
वहां डुबकी लगा के आऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी...
॥ अंतरा - ५ ॥
माखन भी लाऊँगी, मिश्री भी लाऊँगी।
अपने कान्हा को भोग लगाऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी...
॥ अंतरा - ६ ॥
राधे राधे गाऊँगी, श्याम श्याम गाऊँगी।
वहां हरि की दासी बन जाऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी...
मेरे बांके बिहारी को मनाऊँगी, सखी री वृन्दावन जाऊँगी॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस पावन भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और आध्यात्मिक है। यहाँ 'सखी' जीवात्मा की अंतःचेतना या गुरु का प्रतीक है, जिससे वह अपने मन की बात साझा कर रही है। 'वृन्दावन' वह परम धाम है जहाँ भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी नित्य निवास करते हैं।
भजन के प्रारंभ में भक्त कहता है कि हे सखी! मैं सब कुछ छोड़कर वृन्दावन जाऊँगी और वहाँ जाकर अपने आराध्य देव 'बांके बिहारी' को मनाऊँगी। यहाँ 'मनाने' का अर्थ है भगवान को अपने प्रेम और भक्ति से रिझाना।
भजन के विभिन्न अंतरों में सांसारिक रिश्तों (सास, ससुर, जेठ, जेठानी, देवर, देवरानी) का उल्लेख है। आध्यात्मिक दृष्टि से ये रिश्ते हमारे सांसारिक कर्तव्यों, सामाजिक दायित्वों और मोह-माया के बंधनों को दर्शाते हैं। भक्त इन सभी को 'मनाने' और अपने कर्तव्यों को पूर्ण करने की बात करता है, ताकि उसके मार्ग में कोई बाधा न आए। वह अपने पारिवारिक जीवन में खुशियाँ लाते हुए और अपने सभी कर्तव्यों को निभाते हुए भी अपना मन भगवान के चरणों में लगाना चाहता है।
अंत में, भक्त गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों में स्नान कर अपने अंतःकरण को शुद्ध करने की बात करता है। वह भगवान के प्रिय भोग 'माखन और मिश्री' को अर्पित कर स्वयं को 'हरि की दासी' (परम सेवक) के रूप में समर्पित कर देता है। यह पूर्ण शरणागति की पराकाष्ठा है, जहाँ भक्त का अहंकार पूरी तरह समाप्त हो जाता है और वह केवल भगवान का होकर रह जाता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- गृहस्थ और वैराग्य का संतुलन: यह भजन सिखाता है कि भक्ति के लिए संसार का त्याग करना आवश्यक नहीं है। परिवार के सभी सदस्यों को आदर देकर और अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।
- बांके बिहारी के प्रति अनन्य प्रेम: भजन का केंद्र बिंदु श्री बांके बिहारी जी हैं, जो वृन्दावन के अधिष्ठाता देव हैं। उनके प्रति समर्पण ही इस भजन की आत्मा है।
- पवित्र नदियों का महत्व: गंगा और यमुना में स्नान का उल्लेख अंतःकरण की शुद्धि और पापों के नाश का प्रतीक है।
- मधुर संकीर्तन शैली: इसकी लय और धुन इतनी सरल और कर्णप्रिय है कि इसे गाते ही मन में आनंद और शांति का संचार होने लगता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि भगवान के नाम का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए निम्नलिखित समय और विधि अत्यंत फलदायी मानी गई है:
- प्रातःकाल और संध्या आरती: सुबह या शाम की पूजा के समय इस भजन को गाने से घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक बनता है।
- विशेष उत्सव: श्री कृष्ण जन्माष्टमी, राधाष्टमी, होली, और कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसरों पर सामूहिक रूप से इस भजन का संकीर्तन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- गायन की विधि: इस भजन को गाते समय हाथ में करताल या मंजीरा लेकर, बंद आँखों से श्री बांके बिहारी जी के सुंदर स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। मन में यह भाव होना चाहिए कि हम वास्तव में वृन्दावन की गलियों में विचरण कर रहे हैं।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण के बाल और किशोर स्वरूप 'श्री बांके बिहारी जी' और उनकी आह्लादिनी शक्ति 'श्री राधा रानी' को समर्पित है। वृन्दावन धाम इन दोनों की लीला भूमि है।
वैष्णव संतों जैसे स्वामी हरिदास जी (जिन्होंने बांके बिहारी जी के विग्रह को प्रकट किया था) और मीराबाई की भक्ति परंपरा का प्रभाव इस भजन में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मीराबाई ने भी अपने पदों में इसी प्रकार सांसारिक बंधनों को पार कर गिरधर गोपाल की शरण में जाने की बात कही है।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन पारंपरिक लोक-भक्ति शैली में रचा गया है। इसकी रचना किसी एक विशिष्ट कवि द्वारा नहीं, बल्कि ब्रज मंडल की लोक संस्कृति और संकीर्तन परंपरा से विकसित हुई है। सदियों से ब्रज के भक्त और संत इस प्रकार के पदों को गाते आए हैं। समय के साथ यह भजन पूरे भारत में लोकप्रिय हो गया और आज यह हर मंदिर और गृहस्थ के घर में गूंजता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और मिठास से भरी 'ब्रजभाषा' मिश्रित खड़ी बोली है। इसमें प्रयुक्त शब्द जैसे 'सखी', 'ललना', 'कान्हा', 'बांके बिहारी' ब्रज की मधुर संस्कृति को दर्शाते हैं।
काव्य शैली की बात करें तो इसमें 'पुनरावृत्ति' (Refrain) का सुंदर प्रयोग किया गया है, जिससे भजन गाते समय एक लयबद्ध प्रवाह बना रहता है। प्रत्येक अंतरे के बाद "सखी री वृन्दावन जाऊँगी" की टेक मन को बार-बार मुख्य भाव से जोड़ती है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
- कर्तव्य और भक्ति का समन्वय: जीवन में अपने सामाजिक और पारिवारिक कर्तव्यों (धर्म) को निभाते हुए भी ईश्वर की ओर अग्रसर होना चाहिए।
- समर्पण भाव: ईश्वर को पाने के लिए किसी बाहरी आडंबर की आवश्यकता नहीं है, केवल सच्चे और निश्छल प्रेम की आवश्यकता है।
- पवित्रता का महत्व: यमुना स्नान और माखन-मिश्री का भोग हमारे विचारों और कर्मों की शुद्धता को दर्शाता है।
- अहंकार का त्याग: "हरि की दासी बन जाऊँगी" पंक्ति हमें सिखाती है कि जब तक हम अपने 'मैं' (अहंकार) को नहीं छोड़ते, तब तक हम परमात्मा से एकाकार नहीं हो सकते।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| सखी (Sakhi) | सहेली / सखी | जीवात्मा की अंतःचेतना या गुरु जो सही मार्ग दिखाते हैं। |
| बांके बिहारी (Banke Bihari) | टेढ़े-मेढ़े त्रिभंग ललित मुद्रा वाले श्री कृष्ण | सौंदर्य और माधुर्य के साक्षात विग्रह। |
| ललना (Lalna) | छोटा बच्चा / पुत्र | बाल कृष्ण का स्वरूप या परिवार में खुशहाली। |
| मनाऊँगी (Manaungi) | प्रसन्न करूँगी / रिझाऊँगी | भक्ति और सेवा द्वारा भगवान की कृपा प्राप्त करना। |
| हरि की दासी (Hari ki Dasi) | भगवान की सेविका | पूर्ण शरणागति और अहंकार का विसर्जन। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
१. "वृन्दावन जाऊँगी सखी री, वृन्दावन जाऊँगी। मेरे बांके बिहारी को मनाऊँगी..."
भक्त अपनी सखी से कहता है कि मेरा मन अब इस संसार में नहीं लगता, मैं तो केवल वृन्दावन जाऊँगी और वहाँ अपने प्यारे बांके बिहारी जी को अपनी भक्ति से प्रसन्न करूँगी।
२. "सास को मनाऊँगी, ससुर को मनाऊँगी। गोदी में ललना खिलाऊँगी..."
मैं अपने परिवार के बड़ों (सास-ससुर) की सेवा कर उन्हें प्रसन्न रखूँगी और अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए घर में बाल-गोपाल स्वरूप बच्चे को दुलारूँगी।
३. "जेठ को मनाऊँगी, जेठानी को मनाऊँगी। घर में मैं खुशियां लाऊँगी..."
मैं परिवार के सभी सदस्यों के साथ सामंजस्य बिठाकर घर में सुख-शांति और खुशहाली का वातावरण बनाऊँगी।
४. "गंगा भी जाऊँगी, यमुना भी जाऊँगी। वहां डुबकी लगा के आऊँगी..."
मैं पवित्र गंगा और यमुना नदियों के जल में स्नान कर अपने तन और मन को पवित्र करूँगी, जिससे मेरी भक्ति और अधिक निर्मल हो सके।
५. "माखन भी लाऊँगी, मिश्री भी लाऊँगी। अपने कान्हा को भोग लगाऊँगी..."
मैं अपने आराध्य के लिए उनका सबसे प्रिय भोग माखन और मिश्री लेकर जाऊँगी और उन्हें अत्यंत प्रेमपूर्वक अर्पित करूँगी।
६. "राधे राधे गाऊँगी, श्याम श्याम गाऊँगी। वहां हरि की दासी बन जाऊँगी..."
मैं दिन-रात केवल राधा-कृष्ण के नाम का संकीर्तन करूँगी और अंततः अपने अस्तित्व को उनके चरणों में समर्पित कर उनकी दासी बन जाऊँगी।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भाव को और अधिक गहराई से समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ भगवान अर्जुन से पूर्ण शरणागति की बात कहते हैं:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामी मा शुचः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता - १८.६६)
अर्थ: सभी धर्मों (कर्तव्यों और आश्रयों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | वृन्दावन जाऊँगी सखी री वृन्दावन जाऊँगी |
| मुख्य आराध्य देव | भगवान श्री कृष्ण (श्री बांके बिहारी जी) एवं श्री राधा रानी |
| भजन की भाषा | सरल ब्रजभाषा एवं हिंदी |
| भक्ति का भाव | माधुर्य भाव, समर्पण, और विरह भाव |
| मुख्य विषय | सांसारिक कर्तव्यों को निभाते हुए ईश्वर की शरण में जाना |
| उपयुक्त अवसर | जन्माष्टमी, राधाष्टमी, कार्तिक मास, दैनिक संध्या आरती, सत्संग |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख भक्तीलोग के विद्वान संपादकों और संस्कृत विद्वानों द्वारा तैयार किया गया है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों और ब्रज की समृद्ध संकीर्तन परंपरा के आलोक में विश्लेषित किया गया है। यह "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" पाठकों को न केवल भजन के शब्द प्रदान करती है, बल्कि उन्हें इसके अंतर्निहित गहरे आध्यात्मिक संदेश से भी जोड़ती है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भगवद्गीता (गीताप्रेस, गोरखपुर)
- श्रीमद्भागवत महापुराण (ब्रज की लीलाएं और गोपी भाव)
- ब्रज लोक साहित्य एवं संकीर्तन संग्रह
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