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भज गोविन्दम् लिरिक्स (Bhaj govindam Lyrics in Hindi) - न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे | Mohamudgara Stotram - Bhaktilok


भज गोविन्दम् लिरिक्स (Bhaj govindam Lyrics in Hindi) -


भज गोविन्दं भज गोविन्दं

गोविन्दं भज मूढ़मते।

संप्राप्ते सन्निहिते काले

न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥१॥


अर्थ - हे मोह से ग्रसित बुद्धि वाले मित्र 

गोविंद को भजो गोविन्द का नाम लो 

गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि मृत्यु के 

समय व्याकरण के नियम याद रखने से 

आपकी रक्षा नहीं हो सकती है॥१॥


मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णाम्

कुरु सद्बुद्धिमं मनसि वितृष्णाम्।

यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्

वित्तं तेन विनोदय चित्तं॥२॥


अर्थ - हे मोहित बुद्धि! धन एकत्र करने के 

लोभ को त्यागो अपने मन से इन समस्त

कामनाओं का त्याग करो। सत्यता के पथ

का अनुसरण करो अपने परिश्रम से

जो धन प्राप्त हो उससे ही 

अपने मन को प्रसन्न रखो॥२॥


नारीस्तनभरनाभीदेशम्

दृष्ट्वा मागा मोहावेशम्।

एतन्मान्सवसादिविकारम्

मनसि विचिन्तय वारं वारम्॥३॥


अर्थ - स्त्री शरीर पर मोहित होकर 

आसक्त मत हो। अपने मन में 

निरंतर स्मरण करो कि ये मांस-वसा 

आदि के विकार के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं॥३॥


नलिनीदलगतजलमतितरलम् 

तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।

विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं

लोक शोकहतं च समस्तम्॥४॥


अर्थ - जीवन कमल-पत्र पर पड़ी हुई 

पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं 

अल्प (क्षणभंगुर) है। यह समझ लो

कि समस्त विश्व रोग अहंकार 

और दु:ख में डूबा हुआ है॥४॥


यावद्वित्तोपार्जनसक्त:

तावन्निजपरिवारो रक्तः।

पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे

वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥५॥


अर्थ - जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है 

तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह 

प्रदर्शित करते हैं परन्तु अशक्त हो जाने 

पर उसे सामान्य बातचीत में 

भी नहीं पूछा जाता है॥५॥


यावत्पवनो निवसति देहे

तावत् पृच्छति कुशलं गेहे।

गतवति वायौ देहापाये

भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥६॥


अर्थ - जब तक शरीर में प्राण रहते हैं तब 

तक ही लोग कुशल पूछते हैं। शरीर से 

प्राण वायु के निकलते ही पत्नी 

भी उस शरीर से डरती है॥६॥


बालस्तावत् क्रीडासक्तः

तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः।

वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः

परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥७॥


अर्थ - बचपन में खेल में रूचि होती है  

युवावस्था में युवा स्त्री के प्रति 

आकर्षण होता है वृद्धावस्था में 

चिंताओं से घिरे रहते हैं पर प्रभु से 

कोई प्रेम नहीं करता है॥७॥


का ते कांता कस्ते पुत्रः

संसारोऽयमतीव विचित्रः।

कस्य त्वं वा कुत अयातः

तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥८॥


अर्थ - कौन तुम्हारी पत्नी है 

कौन तुम्हारा पुत्र है 

ये संसार अत्यंत विचित्र है

तुम कौन हो कहाँ से आये हो बन्धु  

इस बात पर तो पहले विचार कर लो॥८॥


सत्संगत्वे निस्संगत्वं

निस्संगत्वे निर्मोहत्वं।

निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं

निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥९॥


अर्थ - सत्संग से वैराग्य वैराग्य से विवेक 

विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और 

तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है॥९॥


वयसि गते कः कामविकारः

शुष्के नीरे कः कासारः।

क्षीणे वित्ते कः परिवारः

ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥१०॥


अर्थ - आयु बीत जाने के बाद काम भाव नहीं रहता 

पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता 

धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता और 

तत्त्व ज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता॥१०॥


मा कुरु धनजनयौवनगर्वं

हरति निमेषात्कालः सर्वं।

मायामयमिदमखिलम् हित्वा

ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा॥११॥


अर्थ - धन शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो 

समय क्षण भर में इनको नष्ट कर देता है| 

इस विश्व को माया से घिरा हुआ जान कर 

तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो॥११॥


दिनयामिन्यौ सायं प्रातः

शिशिरवसन्तौ पुनरायातः।

कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि

न मुन्च्त्याशावायुः॥१२॥


अर्थ - दिन और रात शाम और सुबह सर्दी 

और बसंत बार-बार आते-जाते रहते है 

काल की इस क्रीडा के साथ जीवन नष्ट 

होता रहता है पर इच्छाओ 

का अंत कभी नहींहोता है॥१२॥


द्वादशमंजरिकाभिरशेषः

कथितो वैयाकरणस्यैषः।

उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः 

श्रीमच्छंकरभगवच्चरणैः॥१२अ॥


अर्थ - बारह गीतों का ये पुष्पहार 

सर्वज्ञ प्रभुपाद श्री शंकराचार्य 

द्वारा एक वैयाकरण को प्रदान किया गया॥१२अ॥


काते कान्ता धन गतचिन्ता

वातुल किं तव नास्ति नियन्ता।

त्रिजगति सज्जनसं गतिरैका

भवति भवार्णवतरणे नौका॥१३॥


अर्थ - तुम्हें पत्नी और धन की इतनी चिंता क्यों है 

क्या उनका कोई नियंत्रक नहीं है| 

तीनों लोकों में केवल सज्जनों का साथ 

ही इस भवसागर से पार जाने की नौका है॥१३॥


जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः 

काषायाम्बरबहुकृतवेषः।

पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः

उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः॥१४॥


अर्थ - बड़ी जटाएं केश रहित सिर बिखरे बाल  

काषाय (भगवा) वस्त्र और भांति 

भांति के वेश ये सब अपना पेट भरने 

के लिए ही धारण किये जाते हैं अरे 

मोहित मनुष्य तुम इसको देख कर भी 

क्यों नहीं देख पाते हो॥१४॥


अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं

दशनविहीनं जतं तुण्डम्।

वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं

तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥१५॥


अर्थ - क्षीण अंगों पके हुए बालों 

दांतों से रहित मुख और हाथ में 

दंड लेकर चलने वाला वृद्ध भी 

आशा-पाश से बंधा रहता है॥१५॥


अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः

रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः।

करतलभिक्षस्तरुतलवासः

तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥१६॥


अर्थ - सूर्यास्त के बाद रात्रि में आग जला 

कर और घुटनों में सर छिपाकर सर्दी 

बचाने वाला हाथ में भिक्षा का अन्न 

खाने वाला पेड़ के नीचे रहने वाला भी 

अपनी इच्छाओं के बंधन को छोड़ नहीं पाता है॥१६॥


कुरुते गङ्गासागरगमनं

व्रतपरिपालनमथवा दानम्।

ज्ञानविहिनः सर्वमतेन

मुक्तिं न भजति जन्मशतेन॥१७॥


अर्थ - किसी भी धर्म के अनुसार ज्ञान रहित 

रह कर गंगासागर जाने से व्रत रखने से 

और दान देने से सौ जन्मों में भी मुक्ति 

नहीं प्राप्त हो सकती है॥१७॥


सुर मंदिर तरु मूल निवासः

शय्या भूतल मजिनं वासः।

सर्व परिग्रह भोग त्यागः

कस्य सुखं न करोति विरागः॥१८॥


अर्थ - देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास 

पृथ्वी जैसी शय्या अकेले ही रहने वाले 

सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने 

वाले वैराग्य से किसको आनंद 

की प्राप्ति नहीं होगी॥१८॥


योगरतो वाभोगरतोवा

सङ्गरतो वा सङ्गवीहिनः।

यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं

नन्दति नन्दति नन्दत्येव॥१९॥


अर्थ - कोई योग में लगा हो या भोग में संग में 

आसक्त हो या निसंग हो पर जिसका 

मन ब्रह्म में लगा है वो ही आनंद करता है 

आनंद ही करता है॥१९॥


भगवद् गीता किञ्चिदधीता

गङ्गा जललव कणिकापीता।

सकृदपि येन मुरारि समर्चा

क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥२०॥


अर्थ - जिन्होंने भगवदगीता का थोडा सा भी 

अध्ययन किया है भक्ति रूपी गंगा 

जल का कण भर भी पिया है भगवान 

कृष्ण की एक बार भी समुचित प्रकार 

से पूजा की है यम के द्वारा 

उनकी चर्चा नहीं की जाती है॥२०॥


पुनरपि जननं पुनरपि मरणं

पुनरपि जननी जठरे शयनम्।

इह संसारे बहुदुस्तारे

कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥२१॥


अर्थ - बार-बार जन्म बार-बार मृत्यु 

बार-बार माँ के गर्भ में शयन 

इस संसार से पार जा पाना बहुत 

कठिन है हे कृष्ण कृपा करके 

मेरी इससे रक्षा करें॥२१॥


रथ्या चर्पट विरचित कन्थः

पुण्यापुण्य विवर्जित पन्थः।

योगी योगनियोजित चित्तो

रमते बालोन्मत्तवदेव॥२२॥


अर्थ - रथ के नीचे आने से फटे हुए 

कपडे पहनने वाले पुण्य और 

पाप से रहित पथ पर चलने वाले 

योग में अपने चित्त को लगाने वाले योगी 

बालक के समान आनंद में रहते हैं॥२२॥


कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः

का मे जननी को मे तातः।

इति परिभावय सर्वमसारम्

विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम्॥२३॥


अर्थ - तुम कौन हो मैं कौन हूँ कहाँ से आया हूँ 

मेरी माँ कौन है मेरा पिता कौन है? 

सब प्रकार से इस विश्व को असार 

समझ कर इसको एक 

स्वप्न के समान त्याग दो॥२३॥


त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः

व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः।

भव समचित्तः सर्वत्र त्वं

वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्॥२४॥


अर्थ - तुममें मुझमें और अन्यत्र भी 

सर्वव्यापक विष्णु ही हैं तुम 

व्यर्थ ही क्रोध करते हो यदि 

तुम शाश्वत विष्णु पद को प्राप्त 

करना चाहते हो तो सर्वत्र 

समान चित्त वाले हो जाओ॥२४॥


शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ

मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ।

सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं

सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्॥२५॥


अर्थ - शत्रु मित्र पुत्र बन्धु-बांधवों से 

प्रेम और द्वेष मत करो सबमें 

अपने आप को ही देखो इस 

प्रकार सर्वत्र ही भेद रूपी 

अज्ञान को त्याग दो॥२५॥


कामं क्रोधं लोभं मोहं

त्यक्त्वाऽत्मानं भावय कोऽहम्।

आत्मज्ञान विहीना मूढाः

ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः॥२६॥


अर्थ - काम क्रोध लोभ मोह को छोड़ कर 

स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं 

कौन हूँ जो आत्म- ज्ञान से रहित 

मोहित व्यक्ति हैं वो बार-बार छिपे 

हुए इस संसार रूपी नरक में पड़ते हैं॥२६॥


गेयं गीता नाम सहस्रं

ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्।

नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं

देयं दीनजनाय च वित्तम्॥२७॥


अर्थ - भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों को 

गाते हुए उनके सुन्दर रूप का अनवरत 

ध्यान करो सज्जनों के संग में 

अपने मन को लगाओ और गरीबों 

की अपने धन से सेवा करो॥२७॥


सुखतः क्रियते रामाभोगः

पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।

यद्यपि लोके मरणं शरणं

तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥२८॥


अर्थ - सुख के लिए लोग आनंद-भोग करते हैं 

जिसके बाद इस शरीर में रोग हो जाते हैं। 

यद्यपि इस पृथ्वी पर सबका मरण 

सुनिश्चित है फिर भी लोग पापमय 

आचरण को नहीं छोड़ते हैं॥२८॥


अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं

नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।

पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः

सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥२९॥


अर्थ - धन अकल्याणकारी है और इससे 

जरा सा भी सुख नहीं मिल सकता है 

ऐसा विचार प्रतिदिन करना चाहिए | 

धनवान व्यक्ति तो अपने पुत्रों से भी 

डरते हैं ऐसा सबको पता ही है॥२९॥


प्राणायामं प्रत्याहारं

नित्यानित्य विवेकविचारम्।

जाप्यसमेत समाधिविधानं

कुर्ववधानं महदवधानम्॥३०॥


अर्थ - प्राणायाम उचित आहार नित्य 

इस संसार की अनित्यता का विवेक 

पूर्वक विचार करो प्रेम से प्रभु-नाम 

का जाप करते हुए समाधि में 

ध्यान दो बहुत ध्यान दो॥३०॥


गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः 

संसारादचिराद्भव मुक्तः।

सेन्द्रियमानस नियमादेवं

द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम्॥३१॥


अर्थ - गुरु के चरण कमलों का ही 

आश्रय मानने वाले भक्त बनकर 

सदैव के लिए इस संसार में आवागमन 

से मुक्त हो जाओ इस प्रकार 

मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर 

अपने हृदय में विराजमान 

प्रभु के दर्शन करो॥३१॥


मूढः कश्चन वैयाकरणो

डुकृञ्करणाध्ययन धुरिणः।

श्रीमच्छम्कर भगवच्छिष्यै

बोधित आसिच्छोधितकरणः॥३२॥


अर्थ - इस प्रकार व्याकरण के नियमों 

को कंठस्थ करते हुए किसी मोहित 

वैयाकरण के माध्यम से बुद्धिमान 

श्री भगवान शंकर के शिष्य बोध 

प्राप्त करने के लिए प्रेरित किये गए॥३२॥


भजगोविन्दं भजगोविन्दं

गोविन्दं भजमूढमते।

नामस्मरणादन्यमुपायं

नहि पश्यामो भवतरणे॥३३॥


अर्थ - गोविंद को भजो गोविन्द का नाम लो 

गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान 

के नाम जप के अतिरिक्त इस भव-सागर 

से पार जाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है॥३३


भज गोविन्दम् लिरिक्स (Bhaj govindam Lyrics in English) -


bhaj govind bhaj govind

govindan bhaj moodhamate.

sampraapte sannihite kaale

na hi na hi rakshati dukrn karane.1.


Arth - he moh se grasit buddhi vaale mitr

govind ko bhajo govind ka naam lo

govind se prem karo kyonki mrtyu ke

samay vyaakaran ke niyam yaad rakhane se

aapaka bachaav nahin ho sakata hai.1.


moo jaheehi dhanagamatrshnaam

kuru sadbuddhiman manasi vitrshnaam.

yallabhase nijakarmopaattam

vittan ten vinoday chittan.2.


Arth -  he mohit buddhi! dhan samekan karane ke

lobh ko tyaago apane man se in sabhee

shubhakaamanaon ka balidaan karo. satyata ka path

ka peechha karo apane parishram se

jo dhan praapt ho usase hee

apane man ko vachan do.2.


naareestanabharanaabheedesham

drshtva maaga mohaavesham.

etanmaanasvasaadivikaaram

manasi vichintay vaaran vaaram.3.


Arth -  stree shareer par mohit

aasakt mat ho. apane man mein

nirantar smaran karo ki ye maans-vasa

aadi ke vikaar ke atirikt kuchh aur nahin hain.3.


nalineedalagatajalamateeralam

tadvajjeevitamatishayachapalam.

viddhi vyaadhyabhimaanasikan

lok shokahatan ch samastam.4.


Arth -  jeevan kamal-patr par huee

paanee kee boondon ke samaan sakriy evan

alp (kshanabhangur) hai. yah samajh lo

ki samast vishv ahankaaree rog

aur du:kh mein doob gaya hai.4.


yaavadvittopaarjanasakt:

taavannijaphero raktah.

pashchaajjeevati jarjaradehe

vaartaan kopi na prchchhati gehe.5.


Arth -  jab tak vyakti dhanopaarjan mein samarth hai

tab tak parivaar mein sabhee usake prati sneh

chitr karate hain parantu ashakt ho jaane

usake saath saamaany baatacheet mein

bhee nahin poochha jaata hai.5.


yaavatpavano nivasati dehe

taavat prchchhati kushalan gehe.

gatavati vaayau dehaapaaye

bhaarya bibhyati tasminkaaye.6.


Arth -  jab tak shareer mein praan rahate hain tab

tak hee log kushal poochhen. shareer se

praan vaayu kee prateeti hee patnee

vah bhee shareer se daratee hai.6.


baalastaavat kreedaasaktah

tarunastaavat taruneesaktah.

vrddhavachchintaasaktah

pare brahmani kopi na saktah.7.


Arth -  bachapan mein khel mein dikhaava hota hai

yuvaavastha mein yuva mahilaon ke prati

vrddhaavastha mein aakarshan hota hai

pharjee se pharjee rahate hain par prabhu se

koee prem nahin karata hai.7.


ka te kaanta kaste putrah

sansaaroyamateev vichitrah.

kasy tvan va kut ayaatah

tattvan chintay tadih bhraatah.8.


Arth - aapakee patnee kaun hai

kaun beta hai

ye sansaar atyant vichitr hai

tum ho kahaan se aaen ho bandhu

is baat par to pahale vichaar kar lo.8.


satsangatve nissatvan

nissammat nirmohatvan.

nirmohatve nishchalatattvan

nishchalatattve jeevanamuktih.9.


Arth - satsang se vairaagy vairaagy se vivek

vivek se sthir tattvagyaan aur

tattvagyaan se moksh kee praapti hotee hai9.


vayasi gate kah kaamavikaarah

shushke neere kah kaasaarah.

ksheene vitte kah parivaarah

gyaate tattve kah sansaarah. 10.


Arth - vrddhaavastha mein jaane ke baad kaam ka bhaav nahin rahata hai

paanee sookhane par taalaab nahin rahata

dhan jaane par parivaar nahin rahata aur

tattv gyaan hone ke baad sansaar nahin rahata. das.


ma kuru dhanajanayauvanagarvan

harati nimeshaatkaalah sarvan.

maayaamayamidamakhilam hitva

brahmapadam tvan pravish viditva.11


Arth -dhan shakti aur yauvan par garv mat karo

 samay bhar mein unhen nasht kar deta hai|

is duniya ko maaya se ghera jaan gaya

tum brahm pad mein pravesh karo.11


dinayaaminyau saayan praatah

shishiravasantau punaraayaatah.

kaalah kreedati gachchhatyaayustadapi

na munchchhatyaashaavaayuh.12.


Arth - din aur raat shaam aur subah sardee

aur basant baar-baar aate-jaate rahate hain

kaal kee is kreeda ke saath jeevan nasht

ichchha par rahata hai

ka ant kabhee naheenhota hai.12.


dvaadashamanjarikaabhirasheshah

kathito vaiyaakaranasyaishah.

upadeshobhoovidyaanipunaih

shreemachchhankarabhagavachcharanaih.12a.


Arth - baarah ank ka ye pushpahaar

sarvagy prabhupaad shree shankaraachaary

ek vaiyaakaran ko pradaan kiya gaya.12a.


kaate kaanta dhan gatachinta

vaatul kin tav naasti niyanta.

trijagati sajja gatiraika

bhavati bhavarnavatare nauka.13.


Arth - devee patnee aur dhan kee itanee chinta kyon hai

unaka koee niyantrak nahin hai|

teenon logon mein keval sajjanon ka saath

hee is bhavasaagar se paar jaane kee nauka hai.13.


jatilo mundee lunchhitakeshah

kaashaayaambarabahukrtaveshah.

pashyannapi ch na pashyati moodhah

udaranimittan bahukrtaveshah.14.


Arth - bade jataen kesh anupayogee sir beemaaree baal

kaashaay (bhagava) vastr aur dikhaavat

aam logon ke vesh ye sab apana pet bharate hain

ke lie hee bane rahate hain

mohit tum ise dekh kar bhee

kyon nahin dekh rahe ho.14.


angan galitan palitan mundan

dashanaviheenan jatan tundam.

vrddho yaati grheetva dandan

tadapi na munchatyaashaapindam.15.


ksheen apavyay baalon

Arth - daanton se anupayogee mukh aur haath mein

dand lekar chalane vaala vrddh bhee

aasha-paash se bandha rahata hai.15.


agre vahnih prshthebhaanuh

raatarau chubukasamarpitajaanuh.

karatalabhikshastarutalavaasah

tadapi na munchatyaashaapaashah.16.


Arth - sooryaast ke baad raat mein aag jalaen

kar aur ghutane mein sar chhupa kar sardee

bachaane vaala haath mein bhiksha ka ann

khaane vaala ped ke neeche rahane vaala bhee

apana vartamaan ke bandhan ko chhodana nahin paata hai.16.


kurute gangaasaagaragamanan

vrataparipaalanamathava daanam.

gyaanavihinah sarvamaten

muktin na bhajati janmashaten.17.


Arth - kisee bhee dharm ke anusaar gyaan anupayogee

rah kar gangaasaagar jaane se vrat rakhane se

aur daan dene se sau janmon mein bhee mukti

praapt nahin ho sakata hai.17.


sur mandir taru mool nivaasah

shayya bhootal majinan vaasah.

sarv parigrah bhog tyaagah

kasy sukhan na karoti viraagah.18.


Arth - dev mandir ya ped ke neeche nivaas

prthvee jaisa soshayya akele hee rahane vaale

sabhee sangrahon aur sukhon ka tyaag karane

vaale vairaagy se kisako aanand

kee dhaarana nahin hogee.18.


yogarato vaabhogaratova

sanagarato va sangaveehinah.

yasy brahmani ramate chittan

nandati nandati nandatyev.19.


Arth - koee yog mein laga ho ya bhog mein sang mein

aasakt ho ya nisang ho par jisaka

man brahm mein laga hai vo hee aanand karata hai

aanand hee hai.19.


bhagavad geeta kinchidadheeta

ganga jalalav kanikaapeeta.

sakrdapi yen muraaree samarcha

kriyaate tasy yamen na charcha.20.


Arth - jinhonne bhagavadageeta ka thoda sa bhee

bhakti roopee ganga ka vishleshan kiya gaya hai

jal ke kan bhar bhee piya hai bhagavaan

krshn kee ek baar bhee prakaar

se pooja kee hai yam ke dvaara

unakee charcha nahin kee jaatee hai.20.


punarapi jananan punarapi maranan

punarapi jananee jathare shayanam.

eh sansaare bahudustaare

krpayaapaare paahi muraare.21.


Arth - baar-baar janm baar-baar mrtyu

baar-baar maan ke garbh mein shayan

is sansaar se paar ja paana bahut

kathin hai he krshn krpa karake

meree isase bachaav karen.21.


rathya charpat vichit kanthah

punyapuny vivarjit pantah.

yogee yog nirmit chitto

ramate baalonmattavadev.22.


Arth - rath ke neeche aane se phat gae

kapade padhane vaale puny aur

paap se anupayogee path par jaane vaale

yog mein apane chitt ko lagaane vaale yogee

baalak ke samaan aanand mein rahate hain.22.


kastavan kohan kut aayaatah

ka me jananee ko me taatah.

iti paribhaavay sarvamasaaram

vishvan tyaktva svapn vichaaram.23.


Arth - tum kaun ho main kaun hoon nazar se aaya hoon

meree maan kaun hai mera pita kaun hai?

sab prakaar se is vishv ko asaar

samajh kar ise ek

svapn ke dharm tyaag do.23.


tvayi mayi chaanyatraiko vishnuh

krtyan kupyasi mayyasahishnuh.

bhav samachittah sarvatr tvan

vaanchhasyachiraad ghatana vishnutv.24.


Arth - tumamen mujhamen aur anyatr bhee

sarvavyaapak vishnu hee hain tum

aparaadh hee krodh karate ho

tum dharata vishnu pad ko praapt

karana chaahate ho to sarvatr

samaan chitt vaale ho jao.24.


shatrau mitre putre bandhau

ma kuru yatnan vigrahasandhau.

sarvasminpi pashyaatmaanan

sarvatrotsrj bhedaagyaanam.25.


Arth - shatru mitr bandhu-baandhavon se

prem aur dvesh mat karo sabamen

aap ise hee dekhen

prakaar sarvatr hee bhed roopee

agyaan ko tyaag do.25.


kaaman krodhan lobhan mohan

tyaktvaatmaanan bhaavay koham.

aatmagyaan viheena moodhaah

te pachyante narakanigoodhaah.26.


Arth - kaam krodh lobh moh ko chhod kar

svayan mein sthit hone ke baare mein vichaar karo ki main

kaun hoon jo aatm-gyaan se anupayogee

mohit vyakti hain vo baar-baar eksakloosiv

hue is sansaar roopee narak mein aise hain.26.


geyan geeta naam sahasran

dhyeyan shreepati roopamajasram.

neyan sajja sange chittan

dukhan deenjanaay ch vittam.27.


Arth - bhagavaan vishnu ke sahastr naamon ko

gaate hue unake sundar roop ka anavarat

sajjanon ke sang mein dhyaan den

apane man ko lagao aur bhatakao

kee apane dhan se seva karo.27.


sukhatah kriyaate raamaabhogah

pashchaaddhant shareere rogah.

haalaanki loke maranan sharanan

tadapi na munchati paapacharanam.28.


Arth - sukh ke lie log aanand-bhog karate hain

jisake baad yah shareer mein rog ho jaata hai.

haalaanki yah prthvee par sabaka maran hai

sunishchit hai phir bhee log paapamay hain

aacharan ko koee pahachaan nahin hain.28.


arthammanartham bhaavay nityan

naasti tatah sukhaleshah satyam.

putraadapi dhanabhajaam bheetih

sarvatraisha vihita rtikah.29.


Arth - dhan akalyaanakaaree hai aur isase

jara sa bhee sukh nahin mil sakata hai

aisa vichaar pratidin karana chaahie |

dhanavaan vyakti to apane putron se bhee

soket hain aisa rikord pata hee hai.29.


praanaayaaman pratyaahaaran

nityaanity vivekavichaaram.

jaapyasamet samaadhividhaanan

kurvavadhaanan mahadavadhaanam.30.


Arth - praanaayaam uchit aahaar nity

is sansaar kee anityata ka vivek

poorvak vichaar karo prem se prabhu-naam

samaadhi mein jaap karata hai

dhyaan do bahut dhyaan do.30.


gurucharanaambuj nirantar bhaktah

sansaaraadachiraadbhav muktah.

sendriyamaanas niyamaadevan

drakshyasi nij hrdayasthan devam.31.


Arth - guru ke charan kamalon ka hee

sharanaagat vaale bhakt banen

is sansaar mein sada ke lie is sansaar mein

is prakaar se mukt ho jao

man evan indriyon ka nigrah kar

apane hrday mein viraajamaan

prabhu ke darshan karo.31.


 moodhah kashchan vaiyaakarano

dukrnjanaadhyan dhurinah.

shreemachchhamkar bhagavachchhishyai

bodhit aasichchhodhitakaranah.32.


Arth - is prakaar vyaakaran ke baare mein

ko kanthasth karate hue kisee mohit

vaiyaakaran ke maadhyam se buddhimaan

shree bhagavaan shankar ke shishy bodh

praapt karane ke lie prerit hue.32.


bhajagovindan bhajagovindan

govindan bhajamoodhamate.

naamasmaranaadanyamupaayan

nahi pashyaamo bhavatarane.33.


Arth - govind ko bhajo govind ka naam lo

govind se prem karo kyonki bhagavaan

ke naam jaap ke atirikt is bhav-saagar

paar jaane ka any koee maarg nahin hai.33.


** Singer :  Madhvi Madhukar Jha **




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