"एसो चटक मटक सो ठाकुर तीनो लोकन हूं मै नाए" एक अत्यंत लोकप्रिय और मधुर राधा-कृष्ण भजन है, जो विशेष रूप से ब्रज की भक्ति परंपरा और माधुर्य भाव को समर्पित है। सुप्रसिद्ध भजन गायिका उपासना मेहता द्वारा स्वरबद्ध यह भजन भगवान श्री कृष्ण के मनमोहक स्वरूप, उनकी नटखट अदाओं और उनके अद्वितीय सौंदर्य का वर्णन करता है। वैष्णव भक्ति साहित्य में भगवान के 'चटक-मटक' स्वरूप का अर्थ उनकी वह त्रिभंग ललित मुद्रा है, जो कामदेव के गर्व को भी चूर कर देती है। यह भजन न केवल कानों को प्रिय लगता है, बल्कि साधक के हृदय में साक्षात वृंदावन की कुंज गलियों का दृश्य जीवंत कर देता है। इस लेख में हम इस भजन के पूर्ण लिरिक्स, गहरे आध्यात्मिक भावार्थ और इसके गायन के महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
॥ ध्रुवपद ॥
एसो चटक मटक सो ठाकुर,
तीनो लोकन हूं मै नाए।
एसो चटक मटक सो ठाकुर,
तीनो लोकन हूं मै नाए।
॥ अंतरा - 1 ॥
शीश पे मुकुट कान में कुंडल,
मुख पर मुरली सोहे।
मंद मंद मुस्काए कन्हैया,
सबके मन को मोहे।
ऐसी सुंदर छवि निराली,
देखत ही बन जाए।
एसो चटक मटक सो ठाकुर,
तीनो लोकन हूं मै नाए।
॥ अंतरा - 2 ॥
टेढ़ी चाल चले मतवारी,
टेढ़ी पाग सुहाए।
टेढ़ी नजरिया जब वो मारे,
घायल कर कर जाए।
बांकी अदा पे वारी जाऊं,
मन मे अति सुख पाए।
एसो चटक मटक सो ठाकुर,
तीनो लोकन हूं मै नाए।
॥ अंतरा - 3 ॥
राधे रानी के संग सोहे,
अद्भुत जोड़ी लागे।
देख के युगल छवि को प्यारे,
सोया भाग्य भी जागे।
भक्तन के हितकारी ठाकुर,
सबकी विपदा मिटाए।
एसो चटक मटक सो ठाकुर,
तीनो लोकन हूं मै नाए।
॥ अंतरा - 4 ॥
वृंदावन की कुंज गलिन में,
रास रचावे गिरधारी।
गोप ग्वाल सब संग में नाचे,
बलिहारी बलिहारी।
उपासना भी शरण में आई,
चरण कमल चित लाए।
एसो चटक मटक सो ठाकुर,
तीनो लोकन हूं मै नाए।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का मुख्य भाव भगवान श्री कृष्ण के 'बांके' स्वरूप की महिमा गाना है। 'चटक मटक' शब्द यहाँ केवल शारीरिक गति के लिए नहीं, बल्कि भगवान की उस दिव्य चपलता और आकर्षण के लिए प्रयुक्त हुआ है जो भक्त के चित्त को अपनी ओर खींच लेता है। भक्त कहता है कि मेरे ठाकुर (स्वामी) इतने छबीले और सजीले हैं कि उनके जैसा सौंदर्य तीनों लोकों (आकाश, पाताल और पृथ्वी) में कहीं भी उपलब्ध नहीं है।
भजन के प्रथम भाग में उनके श्रृंगार का वर्णन है। मोर मुकुट, मकराकृत कुंडल और अधरों पर सजी मुरली—यह वह स्वरूप है जिसे देखकर स्वयं कामदेव भी मोहित हो जाते हैं। जब कन्हैया मंद-मंद मुस्कुराते हैं, तो वह मुस्कान भक्त के समस्त दुखों को हर लेती है। द्वितीय भाग में उनकी 'टेढ़ी' चाल और 'बांकी' अदा का वर्णन है। ब्रज में भगवान को 'बांके बिहारी' कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो तीन जगह से टेढ़े (त्रिभंग) हैं। उनकी यह टेढ़ी नजर जब किसी भक्त पर पड़ती है, तो वह संसार से विरक्त होकर केवल कृष्ण का होकर रह जाता है।
अंतिम पदों में राधा-कृष्ण की युगल छवि की महत्ता बताई गई है। वैष्णव दर्शन के अनुसार, कृष्ण तब तक पूर्ण नहीं हैं जब तक उनके साथ राधा रानी न हों। उनकी युगल छवि का दर्शन सोए हुए भाग्य को जगाने वाला है। यह भजन अंततः शरणागति का संदेश देता है, जहाँ भक्त अपनी समस्त चिंताओं को त्यागकर भगवान के चरण कमलों में अपना चित्त लगा देता है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
- माधुर्य भक्ति: यह भजन 'सख्य' और 'माधुर्य' भाव का मिश्रण है, जहाँ भक्त अपने भगवान को एक सखा और प्रियतम के रूप में देखता है।
- ब्रज संस्कृति का प्रतिबिंब: भजन की शब्दावली जैसे 'ठाकुर', 'लोकन', 'नाए' सीधे तौर पर ब्रजभाषा और वहां की लोक संस्कृति से जुड़ी है।
- त्रिभंग मुद्रा का वर्णन: भगवान कृष्ण की प्रसिद्ध त्रिभंग मुद्रा (गर्दन, कमर और घुटनों से मुड़ी हुई स्थिति) को 'चटक मटक' के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।
- शरणागति का भाव: भजन का समापन पूर्ण समर्पण के साथ होता है, जो भक्ति मार्ग का अंतिम लक्ष्य है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
इस भजन को गाने या सुनने के लिए कोई कठोर नियम नहीं हैं, परंतु भक्ति परंपरा के अनुसार निम्नलिखित समय और स्थितियां विशेष फलदायी मानी जाती हैं:
- प्रातः काल: भगवान के श्रृंगार दर्शन के समय इस भजन का गायन मन को प्रसन्नता से भर देता है।
- संध्या सत्संग: सामूहिक संकीर्तन या सत्संग के दौरान ढोलक और मंजीरों की थाप पर इस भजन को गाना अत्यंत आनंददायक होता है।
- राधाष्टमी और जन्माष्टमी: इन विशेष उत्सवों पर भगवान के बाल और किशोर स्वरूप की महिमा गाने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ भजन है।
- मानसिक शांति हेतु: जब मन अशांत हो, तब इस भजन के श्रवण से भगवान की छवि का ध्यान करने पर मानसिक शांति प्राप्त होती है।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी को समर्पित है। इसमें कृष्ण को 'ठाकुर' कहकर संबोधित किया गया है, जो ब्रज और राजस्थान में भगवान के प्रति सम्मानजनक और आत्मीय संबोधन है। इस भजन को आधुनिक समय में उपासना मेहता ने अपनी दिव्य आवाज से घर-घर तक पहुँचाया है। उनकी गायकी में एक विशेष प्रकार का 'भाव' है जो श्रोता को सीधे वृंदावन की भक्ति धारा से जोड़ देता है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
भजन की भाषा सरल ब्रज मिश्रित हिंदी है। इसमें 'चटक मटक', 'नजरिया', 'भक्तन' जैसे शब्दों का प्रयोग इसे लोकगीत की श्रेणी में भी रखता है। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें 'अनुप्रास' और 'रूपक' अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है। भगवान की छवि को 'निराली' और 'बांकी' बताकर उनके अलौकिक व्यक्तित्व को रेखांकित किया गया है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द/पद | सरल हिंदी अर्थ | संदर्भ/महत्व |
|---|---|---|
| चटक मटक | चमकदार और मनमोहक चाल | भगवान की दिव्य और चंचल मुद्रा। |
| ठाकुर | स्वामी या भगवान | ब्रज में कृष्ण को प्यार से ठाकुर जी कहा जाता है। |
| तीनो लोकन | तीनों लोक (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) | संपूर्ण ब्रह्मांड की व्यापकता। |
| नाए | नहीं है | ब्रजभाषा का शब्द। |
| पाग | पगड़ी | भगवान कृष्ण का राजसी श्रृंगार। |
| विपदा | संकट या दुख | भक्तों के कष्टों का निवारण। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"एसो चटक मटक सो ठाकुर, तीनो लोकन हूं मै नाए" - मेरे भगवान इतने सुंदर और आकर्षक हैं कि उनके जैसा कोई दूसरा पूरे ब्रह्मांड में नहीं है।
"शीश पे मुकुट कान में कुंडल, मुख पर मुरली सोहे" - उनके सिर पर मोरपंख का मुकुट है, कानों में मछली के आकार के कुंडल हैं और उनके होंठों पर बांसुरी सुशोभित है।
"टेढ़ी चाल चले मतवारी, टेढ़ी पाग सुहाए" - उनकी चाल में एक मदहोश करने वाला आकर्षण है और उनकी पगड़ी भी उनके व्यक्तित्व की तरह ही अनोखी और टेढ़ी है।
"राधे रानी के संग सोहे, अद्भुत जोड़ी लागे" - जब वे राधा जी के साथ खड़े होते हैं, तो वह दृश्य इतना दिव्य होता है कि उसे देखकर मनुष्य का भाग्य चमक उठता है।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
भगवान कृष्ण के इस मनमोहक स्वरूप का ध्यान करते समय निम्नलिखित श्लोक का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है:
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं,
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्।
सर्वाङ्गं हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलि,
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | एसो चटक मटक सो ठाकुर |
| मुख्य देवता | श्री कृष्ण (ठाकुर जी) |
| गायिका | उपासना मेहता |
| भाषा | ब्रज मिश्रित हिंदी |
| भक्ति भाव | माधुर्य और सख्य भाव |
| मुख्य विषय | कृष्ण का सौंदर्य और श्रृंगार |
| उपयुक्त अवसर | सत्संग, जन्माष्टमी, दैनिक पूजा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख भक्तिलोक की संपादकीय टीम द्वारा धार्मिक ग्रंथों और प्रचलित भजन परंपराओं के गहन अध्ययन के बाद तैयार किया गया है। "एसो चटक मटक सो ठाकुर" केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह भक्त के हृदय की वह पुकार है जो भगवान के सौंदर्य में पूरी तरह खो जाना चाहता है। उपासना मेहता की प्रस्तुति ने इसे आधुनिक पीढ़ी के बीच भी लोकप्रिय बना दिया है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - रास पंचाध्यायी)
- ब्रज भक्ति साहित्य एवं लोकगीत परंपरा
- उपासना मेहता आधिकारिक भजन संग्रह
- भक्तिलोक आध्यात्मिक पुस्तकालय
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