"तू प्रभ दाता, दान मत पूरा" सुखविंदर सिंह द्वारा स्वरबद्ध एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी गुरु भजन है। यह भजन कलयुग के साधकों के लिए एक प्रकाश स्तंभ के समान है, जो जीव को उसके सतगुरु के प्रति पूर्ण समर्पण और शरणागति का मार्ग दिखाता है। सनातन धर्म में गुरु को साक्षात परब्रह्म का स्वरूप माना गया है, और यह भजन उसी गुरु-तत्व की महिमा का गुणगान करता है। जब भक्त संसार के मायाजाल, दुखों और अज्ञानता से थककर अपने गुरु के चरणों में आता है, तब यह भजन उसके अंतर्मन में शांति, विश्वास और भक्ति का संचार करता है। यह भजन केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि एक साधक की अपने गुरु से की गई वह याचना है जिसमें वह अपने अधूरे कर्मों को पूर्ण करने और भवसागर से पार लगाने की विनती करता है। सत्संग, गुरु पूर्णिमा, ध्यान सत्रों और दैनिक साधना में इस भजन का गायन भक्त के हृदय में गुरु के प्रति अटूट निष्ठा को जागृत करता है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
तू प्रभ दाता, दान मत पूरा,
मेरे सतगुरु, कर दो काम अधूरा।
मैं हूँ अज्ञानी, तुम हो ज्ञानी,
मेरी नैया, कर दो पार भवानी॥
तू प्रभ दाता, दान मत पूरा...
भटक रहा हूँ, मैं इस जग में,
आस लगी है, तेरे चरणन में।
दीन दयालु, सुन लो पुकार,
भव सागर से, कर दो पार॥
तू प्रभ दाता, दान मत पूरा...
माया के बंधन बड़े भारी,
शरण पड़ा हूँ शरण तिहारी।
कृपा दृष्टि अब कर दो दाता,
तुम ही मेरे भाग्य विधाता॥
तू प्रभ दाता, दान मत पूरा...
अंधकार से मुझे निकालो,
ज्ञान का दीपक मन में उजालो।
चरण कमल की सेवा पाऊँ,
निशदिन तेरे ही गुण गाऊँ॥
तू प्रभ दाता, दान मत पूरा,
मेरे सतगुरु, कर दो काम अधूरा।
मैं हूँ अज्ञानी, तुम हो ज्ञानी,
मेरी नैया, कर दो पार भवानी॥
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस भजन का मूल भाव पूर्ण आत्मसमर्पण और गुरु-कृपा की याचना है। भक्त अपने आराध्य गुरुदेव से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! आप ही समस्त सृष्टि के परम दाता हैं। आपकी कृपा और दान कभी अपूर्ण नहीं होते, वे सदैव पूर्ण और असीम होते हैं। मेरे जीवन में जो भी कमियां हैं, जो भी आध्यात्मिक साधना अधूरी रह गई है, उसे आप अपनी असीम अनुकंपा से पूर्ण कर दीजिए।
भक्त अपनी अज्ञानता को स्वीकार करते हुए कहता है कि मैं सांसारिक मायाजाल में फंसा हुआ एक साधारण जीव हूँ, जबकि आप ज्ञान के असीम सागर हैं। इस संसार रूपी भवसागर में मेरी जीवन-नैया डगमगा रही है, इसे पार लगाने का सामर्थ्य केवल आपके पास है। यहाँ 'भवानी' शब्द का प्रयोग परम शक्ति, आदिमाया या गुरु की तारक शक्ति के रूप में किया गया है जो भक्त को संसार के बंधनों से मुक्त करती है।
भजन के अगले भाग में भक्त अपनी विवशता और संसार की असारता को प्रकट करता है। वह कहता है कि मैं इस भौतिक संसार की गलियों में भटक चुका हूँ और अब मुझे केवल आपके पावन चरणों का ही सहारा है। हे दीनदयालु! मेरी पुकार सुनिए और मुझे इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्रदान कीजिए। यह भावार्थ हमें सिखाता है कि जब तक मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर गुरु के चरणों में समर्पित नहीं होता, तब तक उसे वास्तविक शांति और मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
यह भजन आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर चल रहे प्रत्येक साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- शरणागति का भाव: भजन की प्रत्येक पंक्ति में अनन्य शरणागति (पूर्ण समर्पण) का भाव निहित है, जो भक्ति मार्ग का सबसे सरल और उत्तम मार्ग माना गया है।
- अहंकार का विसर्जन: "मैं हूँ अज्ञानी, तुम हो ज्ञानी" कहकर भक्त अपने सूक्ष्म अहंकार का त्याग करता है, जिससे गुरु-कृपा का मार्ग प्रशस्त होता है।
- सुखविंदर सिंह की दिव्य आवाज: इस भजन को अपनी जादुई और ऊर्जावान आवाज से सजाकर सुखविंदर सिंह ने इसे एक नया आयाम दिया है, जो सीधे सुनने वाले के हृदय को छूता है।
- सार्वभौमिक प्रार्थना: यह भजन किसी संकीर्ण संप्रदाय से परे जाकर एक सार्वभौमिक गुरु-तत्व की आराधना करता है, जिसे कोई भी साधक गा सकता है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
यद्यपि ईश्वर और गुरु की आराधना के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं है, फिर भी इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और समय अत्यंत फलदायी माने गए हैं:
- ब्रह्ममुहूर्त या प्रातःकाल: सुबह के समय शांत वातावरण में इस भजन को सुनने या गाने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और दिन की शुरुआत आध्यात्मिक विचारों के साथ होती है।
- संध्या आरती व सत्संग: शाम के समय सामूहिक सत्संग भजन के दौरान इस भजन का गायन वातावरण को भक्तिमय बना देता है।
- गुरु पूर्णिमा एवं विशेष उत्सव: गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर अपने गुरुदेव के पूजन के समय इस भजन का गायन गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सर्वोत्तम माध्यम है।
- गायन की विधि: इस भजन को गाते समय आंखें बंद करके अपना ध्यान गुरु के चरणों में केंद्रित करना चाहिए। मन में यह विश्वास होना चाहिए कि गुरुदेव हमारी पुकार सुन रहे हैं।
भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint
यह भजन मुख्य रूप से सतगुरु (परम गुरु) को समर्पित है। सनातन परंपरा में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश से भी उच्च स्थान दिया गया है क्योंकि गुरु ही वह माध्यम है जो हमें ईश्वर तक पहुंचाता है। कबीरदास जी ने भी कहा है:
सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)
"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय ॥
"
इस भजन में गुरु को ही 'प्रभ दाता' यानी ईश्वर का स्वरूप माना गया है। इसके अतिरिक्त, भजन में 'भवानी' शब्द का उल्लेख है, जो शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा को इंगित करता है, जो अज्ञानता का नाश कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं।
भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background
यह भजन पारंपरिक गुरु-महिमा के पदों से प्रेरित है। आधुनिक समय में इसे प्रसिद्ध पार्श्व गायक सुखविंदर सिंह ने अपनी अनूठी शैली में गाकर जन-जन तक पहुंचाया है। इस भजन की पृष्ठभूमि गुरु-शिष्य परंपरा की उस प्राचीन नींव पर टिकी है जहाँ शिष्य अपने समस्त कर्मों, इच्छाओं और जीवन को गुरु के चरणों में सौंप देता है। सुखविंदर सिंह की गायकी में जो तड़प और पुकार है, वह एक सच्चे विरही और साधक के हृदय की वास्तविक स्थिति को दर्शाती है।
भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style
इस भजन की भाषा अत्यंत सरल, सुबोध और प्रवाहमयी हिंदी है, जिसमें पंजाबी और ब्रजभाषा के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।
- सरलता: भाषा इतनी सहज है कि एक साधारण व्यक्ति भी इसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ को आसानी से समझ सकता है।
- काव्य शैली: यह एक प्रार्थना गीत (विनय के पद) की शैली में लिखा गया है। इसमें अंत्यानुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है (जैसे पूरा-अधूरा, ज्ञानी-भवानी), जो इसे गेय और कर्णप्रिय बनाता है।
- प्रतीकात्मकता: 'नैया' को मानव जीवन का और 'भवसागर' को इस संसार का प्रतीक माना गया है, जो भारतीय रहस्यवादी काव्य की एक प्रमुख विशेषता है।
भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons
यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख और आध्यात्मिक संदेश देता है:
- विनम्रता का महत्व: जीवन में प्रगति के लिए विनम्रता अनिवार्य है। जब हम स्वीकार करते हैं कि हम अज्ञानी हैं, तभी हमारे भीतर नया ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता पैदा होती है।
- अधूरे कार्यों की पूर्णता: मनुष्य अपने बलबूते सब कुछ पूर्ण नहीं कर सकता। उसे उस परम शक्ति (गुरु) की सहायता की आवश्यकता होती है जो उसके अधूरे कर्मों को पूर्णता प्रदान करे।
- माया से मुक्ति: यह संसार माया का जाल है। इससे मुक्त होने का एकमात्र उपाय गुरु की शरण में जाना और उनके बताए मार्ग पर चलना है।
- धैर्य और विश्वास: विपरीत परिस्थितियों में भी यह विश्वास बनाए रखना कि "मेरा गुरु मेरे साथ है और वह मेरी नैया पार लगाएगा", साधक को मानसिक संबल प्रदान करता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| प्रभ दाता | प्रभु, देने वाला | परमात्मा या गुरु जो सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी दाता हैं। |
| दान मत पूरा | पूर्ण और अखंड दान | गुरु का वह ज्ञान रूपी दान जो जीव को पूर्णता प्रदान करता है। |
| सतगुरु | सच्चे गुरु | वह गुरु जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए। |
| भवानी | मां दुर्गा / परम शक्ति | संसार रूपी सागर से पार उतारने वाली आदि शक्ति। |
| भव सागर | संसार रूपी समुद्र | जन्म और मृत्यु का चक्र जिसमें जीव फंसा रहता है। |
| नैया | नाव | मनुष्य का जीवन या उसका शरीर। |
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation
"तू प्रभ दाता, दान मत पूरा, मेरे सतगुरु, कर दो काम अधूरा।"
हे सतगुरुदेव! आप ही मेरे प्रभु और परम दाता हैं। आपका दिया हुआ ज्ञान और कृपा का दान सदैव पूर्ण होता है। मेरे जीवन की साधना, मेरे कर्म और मेरी भक्ति जो अभी अधूरी है, उसे अपनी दया से पूर्ण कर दीजिए।
"मैं हूँ अज्ञानी, तुम हो ज्ञानी, मेरी नैया, कर दो पार भवानी॥"
मैं सांसारिक विषयों में उलझा हुआ एक अज्ञानी जीव हूँ और आप ज्ञान के साक्षात पुंज हैं। हे आदि शक्ति स्वरूपा गुरुदेव! मेरी इस जीवन रूपी नैया को इस संसार सागर से पार लगा दीजिए।
"भटक रहा हूँ, मैं इस जग में, आस लगी है, तेरे चरणन में।"
मैं इस भौतिक संसार के सुख-दुखों और माया-मोह के चक्र में भटक रहा हूँ। अब मुझे संसार के किसी भी साधन से कोई आशा नहीं है, मेरी एकमात्र आशा आपके पावन चरणों में टिकी है।
"दीन दयालु, सुन लो पुकार, भव सागर से, कर दो पार॥"
हे दीनों पर दया करने वाले कृपालु देव! मेरी इस आर्त पुकार को सुन लीजिए और मुझे इस जन्म-मरण के कष्टदायी चक्र से मुक्त कर दीजिए।
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
इस भजन के भावों को और अधिक गहराई से समझने के लिए हमें शास्त्रों में वर्णित गुरु मंत्र और श्लोकों का आश्रय लेना चाहिए। स्कंद पुराण के अंतर्गत गुरु गीता में कहा गया है:
सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)
"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
"
अर्थात, गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शंकर हैं। गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं, ऐसे परम आदरणीय गुरुदेव को मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ।
इसके अतिरिक्त, उपनिषदों का यह पावन मंत्र भी इसी प्रार्थना को दर्शाता है:
सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)
"असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥
"
हे गुरुदेव! मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलिए, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलिए। यही प्रार्थना इस भजन के मूल में भी निहित है।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| विवरण का क्षेत्र | महत्वपूर्ण जानकारी |
|---|---|
| भजन का नाम | तू प्रभ दाता, दान मत पूरा (Tu prabhu data daan mat pura) |
| मुख्य गायक | सुखविंदर सिंह (Sukhwinder Singh) |
| श्रेणी / शैली | गुरु भजन / सतगुरु देव भजन |
| मुख्य विषय | पूर्ण समर्पण, शरणागति, गुरु महिमा, ज्ञान की याचना |
| भाषा | सरल हिंदी (मिश्रित पंजाबी शब्दावली) |
| उपयुक्त अवसर | गुरु पूर्णिमा, दैनिक पूजा, सत्संग, ध्यान सत्र |
| मुख्य संदेश | अहंकार का त्याग कर गुरु की शरण में जाना ही मोक्ष का मार्ग है। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख "तू प्रभ दाता, दान मत पूरा" भजन के आध्यात्मिक, साहित्यिक और व्यावहारिक पहलुओं का एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। हमारी संपादकीय टीम ने इस भजन के लिरिक्स की शुद्धता और इसके भावार्थ की प्रामाणिकता को सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक गुरु-महिमा ग्रंथों और उपनिषदों के संदर्भों का उपयोग किया है। यह सामग्री पूरी तरह से "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" है, जो पाठकों को न केवल भजन के बोल प्रदान करती है, बल्कि उनके भीतर गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और भक्ति का भाव भी जागृत करती है।
स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References
- स्कंद पुराण: गुरु गीता खंड (गुरु महिमा और श्लोक)।
- श्रीमद भगवद गीता: अध्याय 4, श्लोक 34 (ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु की शरण में जाने का उपदेश)।
- पारंपरिक भजन संग्रह: सुखविंदर सिंह द्वारा गाए गए गुरु भजनों की आधिकारिक ऑडियो प्रस्तुति।
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