Parvati Stotram

ये तो प्रेम की बात है उधो बंदगी तेरे बस की नहीं है लिरिक्स (Yeh Toh Prem Ki Baat Hai Udho Lyrics in Hindi) - Jaya Kishori Bhajan - Bhaktilok

107 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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ये तो प्रेम की बात है उधो बंदगी तेरे बस की नहीं है - परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

"ये तो प्रेम की बात है उधो बंदगी तेरे बस की नहीं है" भजन भारतीय भक्ति साहित्य, विशेषकर ब्रज की प्रेम-लक्षणा भक्ति और श्रीमद्भागवत महापुराण के उस प्रसंग पर आधारित है जहाँ ज्ञान और योग के प्रतीक उद्धव जी ब्रजवासियों को ज्ञान और योग का उपदेश देने आते हैं। सुप्रसिद्ध लोक गायिका व कथा व्यास जया किशori (Jaya Kishori) जी की मधुर वाणी में गाया गया यह भजन आत्मा और परमात्मा के मिलन के उस रहस्य को उजागर करता है, जहाँ शुष्क ज्ञान, कर्मकांड या यांत्रिक पूजा (बंदगी) गौण हो जाती है और केवल विशुद्ध, अहैतुक और निस्वार्थ प्रेम (प्रेमाभक्ति) ही सर्वोपरि रहता है। इस भजन का मुख्य भाव (Bhava) विरह, अनन्य समर्पण और उस आध्यात्मिक मस्ती का है जो गोकुल की गोपियों और राधा रानी के हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति विद्यमान थी। यह रचना साधकों को यह समझाती है कि ईश्वर को पाने का मार्ग तर्क या पांडित्य का नहीं, बल्कि हृदय की सच्ची पुकार और आंसुओं का मार्ग है। इस लेख में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ, दार्शनिक संदर्भ और दैनिक जीवन में इसके महत्व का गहन अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूर्धन्य कथा व्यास एवं भजन गायिका जया किशोरी जी द्वारा गाए गए इस लोकप्रिय भजन के संपूर्ण बोल नीचे दिए गए हैं:


स्थाई (मukhda):
ये तो प्रेम की बात है उधो, बंदगी तेरे बस की नहीं है!
ये तो प्रेम की बात है उधो, बंदगी तेरे बस की नहीं है!
यहाँ सर देके होते सौदे, आशकी इतनी सस्ती नहीं है॥

अंतरा 1:
प्रेम वालों ने कब वक्त पूछा, उनकी पूजा में सुन ले ए उधो!
यहाँ दम दम में होती है पूजा, सर झुकाने की फुर्सत नहीं है॥
ये तो प्रेम की बात है उधो, बंदगी तेरे बस की नहीं है!

अंतरा 2:
जो असल में हैं मस्ती में डूबे, उन्हें क्या परवाह ज़िन्दगी की!
जो उतरती है चढ़ती है मस्ती, वो हकीकत में मस्ती नहीं है॥
ये तो प्रेम की बात है उधो, बंदगी तेरे बस की नहीं है!

अंतरा 3:
जिसकी नजरो में है वो तो रहते हैं, जग से न्यारे।
जिसकी नज़रों में मोहन समाये, वो नज़र फिर तरसती नहीं है॥
ये तो प्रेम की बात है उधो, बंदगी तेरे बस की नहीं है!
यहाँ सर देके होते सौदे, आशकी इतनी सस्ती नहीं है॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन उद्धव और गोपियों के उस महान संवाद का काव्यात्मक रूप है जो श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वर्णित है। उद्धव जी, जो भगवान श्रीकृष्ण के परम सखा और योग-साधना के प्रकांड विद्वान थे, अपने ज्ञान के अहंकार में चूर होकर ब्रजवासियों को योग और ब्रह्मज्ञान का संदेश देने आए थे। उन्हें लगता था कि वे गोपियों के विरह को अपने ज्ञान के उपदेश से शांत कर देंगे। परंतु, गोपियों का प्रेम किसी साधारण मोह या विरह तक सीमित नहीं था; वह पराभक्ति की पराकाष्ठा थी।

भजन की पहली पंक्ति "ये तो प्रेम की बात है उधो, बंदगी तेरे बस की नहीं है" स्पष्ट करती है कि ईश्वर से मिलन का साधन केवल पूजा-पाठ या यांत्रिक अनुष्ठान (बंदगी) नहीं है। बंदगी एक नियम है, एक कर्तव्य है, जिसमें विधि-विधान की औपचारिकता होती है। किंतु प्रेम इन सभी बंधनों से परे है। "यहाँ सर देके होते सौदे, आशकी इतनी सस्ती नहीं है" का अर्थ है कि भगवान को पाने के लिए अपने अहंकार, अपनी बुद्धि और अपने 'अमित मैं' (Ego) का पूर्ण समर्पण करना पड़ता है। सिर देने का तात्पर्य अपना सर्वस्व भगवान के चरणों में न्योछावर कर देना है।

आगे की पंक्तियों में गोपियाँ उद्धव को समझाती हैं कि प्रेमियों के लिए समय या मुहूर्त का कोई बंधन नहीं होता। सांसारिक लोग पूजा के लिए एक निश्चित समय और स्थान निर्धारित करते हैं, किंतु सच्ची प्रेमाभक्ति तो साधक के प्रत्येक श्वास (दम-दम) में होती है। जिसे अपने प्रियतम की याद में हर पल जीना हो, उसे अलग से सिर झुकाने या कर्मकांड करने की फुर्सत कहाँ मिलती है? प्रेमियों की मस्ती सांसारिक सुख-दुखों से परे होती है। यह कोई क्षणिक आवेश नहीं है, बल्कि चित्त की वह निरंतर स्थिति है जहाँ सांसारिक मोह-माया का कोई प्रभाव नहीं रहता।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का मुख्य स्वर माधुर्य भक्ति और अद्वैत प्रेम का है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • ज्ञान और प्रेम का समन्वय: यह भजन उद्धव के शुष्क ज्ञान और गोपियों के जीवंत प्रेम के बीच के अंतर को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है।
  • अहंकार का त्याग: भजन सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में पांडित्य और अहंकार सबसे बड़ी बाधा हैं।
  • समर्पण की भावना: इसमें सच्ची भक्ति का आधार 'पाना' नहीं, बल्कि 'मिट जाना' बताया गया है।
  • लोकप्रियता: जया किशोरी जी की भावपूर्ण प्रस्तुति ने इस भजन को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया है, जिससे यह सत्संग और मानसिक शांति के लिए अत्यंत प्रिय बन गया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को श्रवण या गान करने के लिए किसी विशेष कठोर नियम की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह शुद्ध भाव का गीत है। फिर भी, इसे निम्नलिखित अवसरों पर पूरी तल्लीनता के साथ गाया जा सकता है:

  • दैनिक सत्संग एवं ध्यान के समय: सुबह या संध्या बेला में जब मन शांत हो, इसे सुनने से आंतरिक शांति मिलती है।
  • श्रीकृष्ण जन्मात्सव एवं रासलीला के अवसर: जन्माष्टमी, गोपाष्टमी या अन्य वैष्णव उत्सवों पर इस भजन का गान भक्ति रस में सराबोर कर देता है।
  • एकांत साधना और चिंतन के समय: जब साधक अपने भीतर के अहंकार को त्यागना चाहे, तब यह भजन अत्यंत प्रेरणादायी सिद्ध होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में ब्रज के आराध्य भगवान श्रीकृष्ण, उनकी प्रिय गोपियाँ और ज्ञानी शिरोमणि श्री उद्धव जी हैं। श्रीमद्भागवत पुराण और सूरदास जी के भ्रमरगीत परंपरा से उपजे इस प्रसंग को संतों और कवियों ने हमेशा से भारतीय आध्यात्मिक चेतना का सर्वोच्च शिखर माना है। जया किशोरी जी जैसी आधुनिक कथा वाचिकाओं ने इसे सुगम संगीत के माध्यम से आज की पीढ़ी तक पहुँचाया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

भ्रमरगीत प्रसंग भारतीय साहित्य की अनमोल धरोहर है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के 46वें और 47वें अध्याय में उद्धवसंदेश का विस्तार से वर्णन है। जब उद्धव जी ने गोपियों को योग साधना का उपदेश दिया, तब गोपियों ने एक भौंरे (भ्रमर) को माध्यम बनाकर उद्धव के ज्ञान का खंडन किया और अपने अनन्य प्रेम को सिद्ध किया। इसी दार्शनिक और काव्यात्मक पृष्ठभूमि पर समकालीन गीतकारों और संगीतकारों ने इस लोक-प्रिय भजन की रचना की है, जिसे जया किशोरी जी ने अपनी स्वर लहरियों से अमर बना दिया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और प्रभावमयी हिंदी/ब्रज-प्रभावित लोकभाषा है। इसमें काव्यात्मक अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया गया है:

  • रूपक और प्रतीक: 'उधो' को ज्ञान का प्रतीक और 'गोपियों/प्रेमियों' को भक्ति का प्रतीक बनाया गया है।
  • मुहावरों का प्रयोग: 'सर देके सौदे होना', 'मस्ती में डूबना' जैसे प्रयोग भजन को जीवंत बनाते हैं।
  • लयात्मकता: इसकी तुकबंदी (Rhyme Scheme) श्रोताओं के मन पर सीधा प्रभाव डालती है और इसे आसानी से याद किया जा सकता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल मनोरंजन या संगीत का साधन नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है:

  1. अहंकार का विसर्जन: जीवन में चाहे कितनी भी विद्या या बुद्धि आ जाए, ईश्वर के समक्ष झुकने के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है।
  2. प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म: सभी धार्मिक अनुष्ठान और ज्ञान तब तक अधूरे हैं जब तक हृदय में प्रेम और करुणा का भाव जागृत नहीं होता।
  3. निरंतरता: सच्ची भक्ति कोई पार्ट-टाइम गतिविधि नहीं है, बल्कि जीवन के हर श्वास में ईश्वर का स्मरण है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
उधो (उद्धव) श्रीकृष्ण के सखा एवं ज्ञानी मंत्री शुष्क ज्ञान, योग और पांडित्य के प्रतीक
बंदगी पूजा, इबादत या अनुष्ठान विधि-विधान से की जाने वाली औपचारिक साधना
सर देके अपना सिर (अहंकार) समर्पित करके पूर्ण आत्मसमर्पण और बलिदान
मस्ती दिव्य आनंद, बेफिक्री परमात्मा के प्रेम में डूबने से प्राप्त होने वाली आंतरिक तृप्ति
जग से न्यारे संसार से अलग या अलौकिक जो माया के बंधनों से मुक्त होते हैं

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: ये तो प्रेम की बात है उधो, बंदगी तेरे बस की नहीं है!
भावार्थ: उद्धव जी को संबोधित करते हुए कहा गया है कि हे उधो! भगवान को पाना कोई कागजी या कर्मकांडी प्रक्रिया नहीं है, यह विशुद्ध प्रेम का मार्ग है जो तुम्हारे योग और ज्ञान के नियमों से परे है।

पंक्ति: यहाँ सर देके होते सौदे, आशकी इतनी सस्ती नहीं है॥
भावार्थ: इस प्रेम-बाज़ार में भगवान रूपी सौदा पाने के लिए अपने 'अहंकार' (सिर) को भेंट चढ़ाना पड़ता है। यह मार्ग उन लोगों के लिए नहीं है जो बिना कुछ त्याग किए सब कुछ पा लेना चाहते हैं।

पंक्ति: प्रेम वालों ने कब वक्त पूछा, उनकी पूजा में सुन ले ए उधो। यहाँ दम दम में होती है पूजा, सर झुकाने की फुर्सत नहीं है॥
भावार्थ: सच्चे प्रेमी भगवान की उपासना के लिए किसी विशेष मुहूर्त या समय की प्रतीक्षा नहीं करते। उनका हर श्वास ही भगवान की पूजा बन जाता है, इसलिए उन्हें अलग से मंदिर में बैठकर समय बिताने की आवश्यकता नहीं रहती।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के मूल भाव को समझने के लिए श्रीमद्भागवत महापुराण और श्री भगवद्गीता के निम्नलिखित श्लोकों का स्मरण किया जा सकता है:

"मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥"

श्री श्रीमद्भागवतगीता (अध्याय 10, श्लोक 9) - जिसका अर्थ है कि अनन्य भक्त हमेशा मुझमें ही चित्त लगाकर आपस में मेरी चर्चा करते हुए संतुष्ट और आनंदित रहते हैं।

इसके अतिरिक्त, उद्धव गीता के प्रसंग में भक्त और भगवान के प्रेम का संबंध सर्वविदित है, जहाँ भगवान स्वयं स्वीकार करते हैं कि भक्त का प्रेम उनके सभी योगों से बढ़कर है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण तथ्य / जानकारी
भजन का नाम ये तो प्रेम की बात है उधो बंदगी तेरे बस की नहीं है (Yeh Toh Prem Ki Baat Hai Udho Lyrics)
गायक / कलाकार जया किशोरी (Jaya Kishori)
मुख्य आराध्य भगवान श्रीकृष्ण एवं गोपियाँ
प्रेरणा स्रोत प्रसंग श्रीमद्भागवत पुराण - उद्धव गोपी संवाद (भ्रमरगीत)
भाषा सरल हिंदी / ब्रज लोकभाषा शैली
भक्ति रस / भाव प्रेमाभक्ति, माधुर्य भाव, विरह और समर्पण
उपयुक्त अवसर सत्संग, एकांत साधना, जन्माष्टमी, और दैनिक स्मरण

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह प्रसिद्ध भजन आध्यात्मिक कथा वाचिका और गायिका जया किशोरी (Jaya Kishori) जी द्वारा अपनी मधुर और भावपूर्ण वाणी में गाया गया है, जिसे श्रोता बहुत पसंद करते हैं।

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर की प्राप्ति या सच्ची भक्ति केवल बाह्य कर्मकांड या ज्ञान (बंदगी) से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए हृदय का निस्वार्थ प्रेम, पूर्ण समर्पण और अहंकार का त्याग आवश्यक है।

'उधो' शब्द उद्धव जी के लिए प्रयोग हुआ है, जो भगवान श्रीकृष्ण के परम मित्र और ज्ञानी सलाहकार थे। श्रीमद्भागवत में वे ब्रजवासियों को योग और ज्ञान का संदेश देने गए थे।

इस पंक्ति का अर्थ है कि भगवान के प्रेम का सौदा करने के लिए व्यक्ति को अपने अहंकार, घमंड और अपने 'मैं' (Ego) का पूर्ण बलिदान करना पड़ता है। सच्चे प्रेम में समर्पण ही सब कुछ है।

हाँ, इसकी धुन बहुत सरल, मधुर और लोक-संगीत पर आधारित है। इसे हारमोनियम या ढोलक की सामान्य थाप के साथ आसानी से गाया जा सकता है।

इसे शांत मन से सुबह के समय ध्यान के बाद या शाम को विश्राम के समय सुनने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

भ्रमरगीत प्रसंग का मुख्य संबंध श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध से है, जहाँ उद्धव और गोपियों के बीच संवाद का वर्णन मिलता है।

निश्चित रूप से, आप इसे अपने दैनिक पूजा पाठ, सत्संग या भगवान श्रीकृष्ण के स्मरण के समय गा सकते हैं। यह मन को भक्तिमय बनाने में अत्यंत सहायक है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह मार्गदर्शिका और भजन विवरण Bhaktilok.in के उच्च संपादकीय मानकों के अनुसार तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक धार्मिक साहित्य, दार्शनिक दृष्टिकोण और मधुर भक्ति संगीत से जोड़ना है। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस लेख में पारंपरिक कथाओं, श्रीमद्भागवत के प्रसंगों और आधुनिक लोक-संस्कृति का संतुलित समावेश किया गया है ताकि पाठक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध - उद्धव गोपी संवाद प्रसंग)
  • सूरसागर - सूरदास रचित भ्रमरगीत सार
  • जया किशोरी जी के सत्संग एवं भजन संग्रह
  • भारतीय भक्ति साहित्य और लोकगीत परंपरा

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समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 27 Sep 2026

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