भक्ति काव्य व भजन बुधवार विशेष (भगवान श्री गणेश व बुध देव)

आँख्यां रो काजळ थारै (Aankhya Ro Kajal Thare Lyrics in Hindi ) - Bhakti lok

राजस्थानी कृष्ण भजन 'आँख्यां रो काजळ थारै' के लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। भगवान श्री कृष्ण के अलौकिक श्रृंगार और भक्ति भाव से भरे इस भजन का आनंद लें।

आँख्यां रो काजळ थारै (Aankhya Ro Kajal Thare) - सम्पूर्ण परिचय एवं भक्ति भाव

भक्तलोकिन् के पावन प्रांगण में आपका स्वागत है। 'आँख्यां रो काजळ थारै' राजस्थानी लोक संस्कृति और कृष्ण भक्ति की अनमोल धरोहर है, जो भगवान श्री कृष्ण के मनमोहक स्वरूप, उनके श्रृंगार और परम आराध्य रूप का सजीव वर्णन करती है। राजस्थानी लोक संगीत और लोक गाथाओं में भगवान श्री कृष्ण को 'साँवरिया', 'नाथ', और 'वनमाली' के रूप में पूजा जाता है। यह भजन और पद न केवल कानों को सुरीला आनंद देता है, बल्कि साधक के मन में भगवान के अलौकिक सौंदर्य की एक दिव्य छवि अंकित कर देता है। भगवान श्रीकृष्ण की आँखों का काजल, उनके होठों की लाली, मस्तक पर सुशोभित मोर मुकुट और केसर का टीको—इन सबका अत्यंत मनभावन चित्रण इस रचना में किया गया है। राजस्थानी और मारवाड़ी संस्कृति में रचे-बसे इस भजन का गायन विशेष रूप से सत्संग, एकादशी जागरण, फागोत्सव, और जन्माष्टमी के पावन अवसरों पर किया जाता है। जब भक्त इस भजन को श्रद्धा और भावुकता के साथ गाते हैं, तो उनका चित्त सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर पूरी तरह श्याम सुंदर के चरणों में लीन हो जाता है। यह भजन केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि एक प्रेमाभक्ति की गाथा है जो भक्तों को भगवान के साथ आत्मिक संबंध का अनुभव कराती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन:

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:


आँख्यां रो काजळ थारै, आंख्या रो काजल थारो,
होठा री लाली जी, तो अईया की लटक ना,
पेल्या देखि भाली जी,
आँख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी।।

मोर मुकुट की थारे, शोभा घनेरी जी,
तो केसर को टीको नख, बेसर मतवाली जी,
आँख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी।।

काना में कुण्डल थारे, गले में गलपटियो जी,
तो कुण्डल के निचे झूमे, चम चम करती बाली जी,
आँख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी।।

हीरो और पन्ना जडियो, हार जड़ाऊ जी,
तो कटी पर लटके लट, नागण जैसी काली जी,
आँख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी।।

दुलरी तिलरी भी झूले, बाजूबंद पूची जी,
तो फेंटो गुलनारी जापे, झीनी झीनी जाली जी,
आँख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी।।

पिले पीताम्बर की या, लहर अनूठी जी,
तो रुनक झुनक पग, नूपुर नखराली जी,
आँख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी।।

‘श्याम बहादुर’ थारा, शिव यश गावे जी,
तो उजड़ये दिला का दाता, थे ही हो वनमाली जी,
आँख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी।।

आंख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी,
तो अईया की लटक ना, पेल्या देखि भाली जी,
आँख्या रो काजल थारो, होठा री लाली जी।।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य और अलौकिक सौंदर्य का अत्यंत जीवंत वर्णन करता है। राजस्थानी लोक भाषा में रचित इन पंक्तियों का भाव अत्यंत गहरा और हृदयस्पर्शी है। रचनाकार भगवान के श्री अंगों के श्रृंगार का बखान करते हुए कहता है कि हे प्रभु! आपकी आँखों में सजा हुआ काजल और आपके होठों पर विराजमान मुस्कान या लाली इतनी मोहक है कि देखने वाले का मन मोह लेती है। आपकी अलौकिक चितवन और आँखों की लटक देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि इससे सुंदर और प्यारा इस संसार में कुछ भी नहीं है।

आगे कवि वर्णन करता है कि आपके मस्तक पर सजा मोर मुकुट आपकी शोभा को कई गुना बढ़ा देता है। आपके माथे पर लगा केसर का तिलक और आपकी नाक की बेसर (नथ) आपकी मतवाली चाल और रूप पर चार चांद लगाती है। आपके कानों में झलकाते कुण्डल और गले में पहना हुआ गलपटिया (गले का आभूषण) तथा कुण्डलों के नीचे झूमती चमचमाती बालियाँ आपके रूप को और अधिक दिव्य बनाती हैं। आपके गले में पड़े हुए हीरे-पन्ने जड़े हुए हार और आपकी कमर पर लटकती हुई नागिन जैसी काली लटें भक्तों के चित्त को आकर्षित कर लेती हैं।

दुलरी, तिलरी, बाजूबंद और पूची जैसे पारंपरिक राजस्थानी आभूषण आपके सुंदर शरीर पर ऐसे सजते हैं मानो साक्षात श्रृंगार और सौंदर्य आपके आगे नतमस्तक हों। आपके सिर पर बंधा हुआ गुलनारी रंग का फेंटा (साफा) और उस पर पड़ी झीनी-झीनी जाली आपकी राजाधिराज छवि को प्रकट करती है। आपके शरीर पर पहना हुआ पीले रंग का पीताम्बर वस्त्र और आपके चरणों में बंधी रुनक-झुनक करती पैजनिया (नूपुर) जब बजती है, तो संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो जाता है। अंत में रचनाकार 'श्याम बहादुर जी' कहते हैं कि हे उजड़े हुए दिलों के दाता, हे सभी के दुखों को हरने वाले वनमाली! आप ही हमारे सब कुछ हैं, और हम आपके ही यश का गान करते हैं। यह भाव दर्शाता है कि भक्त अपने इष्ट के प्रति पूरी तरह समर्पित है और उनके रूप-सौंदर्य में ही अपनी संपूर्ण दुनिया देखता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

राजस्थानी संस्कृति में रचे गए इस भजन की कई विशेषताएं हैं जो इसे अन्य भजनों से अलग और विशिष्ट बनाती हैं:

  • लोक संस्कृति का अनूठा संगम: इसमें मारवाड़ी और राजस्थानी शब्दावली का प्रयोग किया गया है जो ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के भक्तों को तुरंत अपनी ओर आकर्षित करता है।
  • सर्वांग श्रृंगार वर्णन: भगवान श्रीकृष्ण के केश से लेकर चरणों तक के आभूषणों (मोर मुकुट, कुण्डल, हार, बाजूबंद, पीताम्बर और नूपुर) का अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर चित्रण किया गया है।
  • भक्ति और प्रेम का समन्वय: इसमें दास्य और सख्य भाव के साथ-साथ माधुर्य भक्ति की झलक भी मिलती है जहाँ भक्त अपने प्रभु को अत्यंत लाड़-प्यार से निहारता है।
  • मानसिक शांति और एकाग्रता: इस भजन के निरंतर श्रवण और गायन से मन को असीम शांति मिलती है और मानसिक उद्वेग शांत होते हैं।
  • अधिक जानकारी के लिए आप हमारे पावन श्री हनुमान चालीसा और शिव तांडव स्तोत्र के लेखों का भी अवलोकन कर सकते हैं, जो आपकी साधना को और समृद्ध करेंगे।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति संगीत और संकीर्तन के लिए भाव की शुद्धता सबसे अधिक आवश्यक होती है। इस भजन को गाने और सुनने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  • शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त में, प्रातःकाल की पूजा के समय, अथवा संध्याकालीन बेला में जब घर का वातावरण शांत हो, तब इस भजन का पाठ या गायन करना अत्यंत फलदायी होता है।
  • विशेष अवसर: जन्माष्टमी, राधारानी जन्मोत्सव, एकादशी, गोवर्धन पूजा, या किसी भी मांगलिक उत्सव एवं पारिवारिक सत्संग के दौरान इसे समूह में गाया जा सकता है।
  • गायने की विधि: इसे ढोलक, मंजीरा या हारमोनियम की हल्की संगत के साथ सुरीले स्वर में गाया जा सकता है। यदि संगीत यंत्र उपलब्ध न हों, तो ताली बजाकर सामूहिक रूप से भी इसे पूरी तन्मयता से गाया जा सकता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में भगवान श्री कृष्ण (साँवरिया सेठ, वनमाली, बांकेबिहारी) हैं, जो संपूर्ण सृष्टि के पालनहार और प्रेम के सागर हैं। राजस्थानी संप्रदायों और लोक परंपराओं में कृष्ण भक्ति की एक अनूठी धारा प्रवाहित होती है जहाँ भक्त अपने भगवान को सखा, प्रियतम और पालक के रूप में देखता है। इस भजन की रचना पारंपरिक लोक शैली में हुई है जिसमें बाद में संत और लोक कवियों जैसे 'श्याम बहादुर' जी ने अपने काव्य कौशल से इसे और अधिक समृद्ध किया। यह रचना लोकगीतों की शैली में होते हुए भी उच्च कोटि के आध्यात्मिक अनुभव कराती है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

राजस्व भूमि राजस्थान की धरा संतों, भक्तों और वीरों की भूमि रही है। यहाँ की लोक संस्कृति में भगवान कृष्ण को 'साँवरिया', 'नाथ जी' और 'गिरधारी' कहकर पुकारा जाता है। इस भजन की रचना लोक परंपरा की मौखिक शैली से शुरू होकर लिखित रूप में आई है। इसमें मारवाड़ी और मेवाती बोलियों के शब्दों का सुंदर प्रयोग हुआ है जैसे 'आँख्यां', 'काजळ', 'होठा', 'बेसर', 'गलपटियो' और 'फेंटो'। यह रचना इस बात का प्रमाण है कि लोक कलाकारों और संतों ने अपनी सरल भाषा के माध्यम से कठिन दार्शनिक सत्यों और भगवान के रूप-सौंदर्य को आम जनमानस तक कितनी सहजता से पहुँचाया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा मुख्य रूप से राजस्थानी, मारवाड़ी और ब्रजभाषा मिश्रित लोक शैली है। इसकी काव्य शैली में रूपक, अनुप्रास और उपमा अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है जैसे 'नागण जैसी काली' लटों की तुलना नागिन से करना। शब्दों का चयन इतना सजीव है कि गायक के साथ-साथ श्रोता के मन में भी भगवान का पूरा स्वरूप एक चलचित्र की भांति उभर जाता है। लय और ताल का यह अनूठा संयोजन इसे लोक संगीत की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनाता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें सिखाता है कि:

  • ईश्वर के रूप में पूर्ण रूप से तल्लीन होना ही सच्ची भक्ति है।
  • संसार के अलंकारों से अधिक महत्वपूर्ण भगवान के चरणों का श्रृंगार और उनकी शरण है।
  • कठिन समय में भी भगवान को 'उजड़ये दिला का दाता' मानकर उन पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
  • कला, संगीत और साहित्य के माध्यम से भी ईश्वर को रिझाया जा सकता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ संदर्भ
आँख्यां रो काजळ आँखों का काजल प्रभु की सुंदर और आकर्षक आँखें
बेसर मतवाली नाक का आभूषण (नथ) जो मतवाला लगे श्रीकृष्ण का मुखौटा श्रृंगार
गलपटियो गले में पहनने का आभूषण (चोकर) प्रभु का कंठ श्रृंगार
फेंटो गुलनारी गुलाबी रंग का साफा या पगड़ी सिर पर बंधा राजसी वस्त्र
पीताम्बर पीले रंग के वस्त्र श्रीकृष्ण के पारंपरिक वस्त्र
नूपुर पायजेब / पैजनिया चरणों में बजने वाले आभूषण

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: आँख्यों रो काजळ थारै, होठा री लाली जी...
भावार्थ: हे प्रभु! आपकी आँखों में सजे काजल और आपके होठों की लालिमा का कोई मुकाबला नहीं है। आपकी यह मोहक छवि पहली बार देखने पर ही मन को मोह लेती है।

पंक्ति: मोर मुकुट की थारे, शोभा घनेरी जी, केसर को टीको नख...
भावार्थ: आपके मस्तक पर सजा मोर मुकुट और माथे पर चमकता केसर का तिलक आपकी शोभा को कई गुना बढ़ा देता है, और नाक की बेसर आपकी अदाओं में मतवालापन लाती है।

पंक्ति: पिले पीताम्बर की या, लहर अनूठी जी, रुनक झुनक पग नूपुर...
भावार्थ: आपके पीले वस्त्रों की छटा अनोखी है और जब आपके चरणों में बँधे घुंघरू या नूपुर रुनक-झुनक करते हैं, तो संपूर्ण ब्रह्मांड आनंदित हो जाता है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस पावन भजन के स्मरण के साथ निम्नलिखित महामंत्र का स्मरण अत्यंत फलदायी है:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण तथ्य
भजन का नाम आँख्यां रो काजळ थारै (Aankhya Ro Kajal Thare)
आराध्य देवता भगवान श्री कृष्ण (साँवरिया सेठ / वनमाली)
रचनाकार / संत पारंपरिक राजस्थानी लोक परंपरा ('श्याम बहादुर' जी द्वारा संवर्धित)
भाषा राजस्थानी, मारवाड़ी एवं ब्रजभाषा मिश्रित लोक भाषा
भक्ति भाव माधुर्य भाव, सख्य एवं प्रेमाभक्ति
उपयुक्त अवसर जन्माष्टमी, एकादशी, सत्संग, जागरण एवं फागोत्सव

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन भगवान श्री कृष्ण (साँवरिया सेठ और वनमाली) के अलौकिक सौंदर्य और श्रृंगार को समर्पित है।

इस भजन की मुख्य भाषा राजस्थानी, मारवाड़ी और ब्रजभाषा का सुंदर मिश्रण है जो लोक शैली में रची गई है।

इसे प्रातःकाल पूजा के समय, संध्या वंदना, या किसी भी सत्संग व रात्रि जागरण के दौरान अत्यंत भाव के साथ गाया जा सकता है।

इसमें भगवान श्रीकृष्ण के सर्वांग श्रृंगार—जैसे आँखों का काजल, होठों की लाली, मोर मुकुट, कुण्डल, हार, पीताम्बर और चरणों के नूपुर—का सजीव वर्णन है।

हाँ, इसकी लय बहुत ही सरल और कर्णप्रिय है, जिसके कारण इसे आसानी से सीखा और गाया जा सकता है।

राजस्थानी लोक संगीत और कृष्ण भक्ति की परंपरा में यह भजन अत्यंत लोकप्रिय है, जो विशेष अवसरों और मेलों में चाव से गाया जाता है।

इसके निरंतर स्मरण और गायन से मन को शांति मिलती है, हृदय में भक्ति भाव जागृत होता है और भगवान के प्रति प्रेम प्रगाढ़ होता है।

निश्चित रूप से, आप इसे अपने व्यक्तिगत पूजा कक्ष में ध्यान और श्रद्धा के साथ अकेले या परिवार के साथ गा सकते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) पर प्रस्तुत यह सामग्री पारंपरिक लोक साहित्य, प्रामाणिक संकीर्तन ग्रंथों और विद्वानों के मार्गदर्शन के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, प्रेरणादायक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध devotional content पहुँचाना है ताकि सनातन संस्कृति और कृष्ण भक्ति की यह अनमोल धारा निरंतर प्रवाहित होती रहे।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पारंपरिक राजस्थानी लोक गीत एवं कृष्ण भक्ति संकलन
  • श्रीकृष्ण लीला और श्रृंगार रस आधारित लोक साहित्य
  • सनातन धर्म एवं भक्ति आंदोलन की लोक संगीत परंपरा

संबंधित भजन एवं लेख

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 12 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!