भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का लिरिक्स भजन ( Pi Le Amrit Tu Radhe Ji Ke Naam Ka Lyrics in Hindi )

पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का भजन लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। संदर्भ एवं व्याख्या सहित भक्तिमय रचना का आनंद लें।

सनातन धर्म की पावन भक्ति परंपरा में भगवन्नाम संकीर्तन को कलयुग में भवसागर से पार उतरने का सबसे सुगम और अचूक साधन माना गया है। "पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का" एक ऐसा ही परम रसमय और भावपूर्ण भजन है, जो भक्त के हृदय में श्री राधा-कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण का संचार करता है। यह भजन ब्रज रस की मधुर उपासना पद्धति, विशेषकर माधुर्य भाव और शरणागति को समर्पित है। इस भजन के माध्यम से साधक को सांसारिक मोह-माया और चिंताओं को त्यागकर श्री राधा रानी के नाम रूपी दिव्य अमृत का पान करने की प्रेरणा दी गई है। जब कोई भक्त पूर्ण श्रद्धा और तन्मयता के साथ इस भजन का गायन या श्रवण करता है, तो उसका अंतःकरण शुद्ध होता है और उसे साक्षात श्री श्याम सुंदर (भगवान श्री कृष्ण) का आश्रय प्राप्त होता है। यह भजन सत्संगों, संकीर्तन सभाओं और दैनिक संध्या आरती के समय भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

॥ मूंछ/मुखड़ा ॥

पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का,
मिलेगा सहारा तुझे श्याम का।
पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का,
मिलेगा सहारा तुझे श्याम का।

॥ अंतरा - १ ॥

राधे राधे गाए जा, श्याम को रिझाए जा,
जीवन सफल बना ले तू इस धाम का।
पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का,
मिलेगा सहारा तुझे श्याम का।

॥ अंतरा - २ ॥

राधे जी की कृपा से ही श्याम सुंदर मिलते हैं,
राधे नाम जपने से ही हृदय कमल खिलते हैं।
राधे नाम रस है बड़ा ही काम का,
पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का,
मिलेगा सहारा तुझे श्याम का।

॥ अंतरा - ३ ॥

छोड़ दे तू फिक्र बंदे कल की बात की,
शरण में आजा तू किशोरी जी के हाथ की।
राधे नाम जपना ही बस सुबह-शाम का,
पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का,
मिलेगा सहारा तुझे श्याम का।

॥ अंतरा - ४ ॥

जिसने भी पिया है यह प्याला इस नाम का,
वह तो दीवाना हुआ ब्रज के इस धाम का।
बन जा तू भी चाकर श्री राधे के नाम का,
पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का,
मिलेगा सहारा तुझे श्याम का।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन अत्यंत सरल शब्दों में गहन वेदांत और भक्ति मार्ग के गूढ़ रहस्यों को प्रकट करता है। भजन का मुख्य संदेश यह है कि इस नश्वर संसार में केवल भगवान का नाम ही शाश्वत और सत्य है। "अमृत" शब्द का प्रयोग यहाँ श्री राधा नाम की दिव्यता और अमरता को दर्शाने के लिए किया गया है। जिस प्रकार अमृत का पान करने से मनुष्य अमर हो जाता है, उसी प्रकार श्री राधा नाम रूपी अमृत का मानसिक पान करने से जीवात्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परम आनंद (मोक्ष) को प्राप्त कर लेती है।

भजन के प्रथम भाग में कहा गया है कि जो मनुष्य श्री राधा रानी के नाम का आश्रय लेता है, उसे भगवान श्री कृष्ण (श्याम सुंदर) का सहारा स्वतः ही प्राप्त हो जाता है। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के अनुसार, श्री राधा जी भगवान श्री कृष्ण की ह्लादिनी शक्ति हैं। बिना राधा रानी की कृपा के श्री कृष्ण को प्राप्त करना असंभव है। इसलिए, यदि कोई कृष्ण की कृपा चाहता है, तो उसे सर्वप्रथम राधा रानी की शरण में जाना होगा।

आगे के अंतरों में साधक को यह समझाया गया है कि उसे भविष्य की व्यर्थ चिंताओं को छोड़कर वर्तमान में प्रभु नाम संकीर्तन में लीन हो जाना चाहिए। श्री वृषभानु नंदिनी (किशोरी जी) अत्यंत करुणामयी हैं। उनकी शरण में आने वाले किसी भी जीव को वे कभी निराश नहीं करतीं। इस भजन का प्रत्येक शब्द भक्त को सांसारिक प्रपंचों से हटाकर भगवद-चरणों की ओर उन्मुख करने का दिव्य प्रयास है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन की कई ऐसी विशेषताएं हैं जो इसे सामान्य भजनों से अलग और विशिष्ट बनाती हैं:

  • शरणागति का संदेश: यह भजन पूरी तरह से 'अनन्य शरणागति' पर आधारित है। इसमें भक्त को अपनी समस्त चिंताओं को किशोरी जी के चरणों में सौंप देने की सीख दी गई है।
  • राधा-तत्व की प्रधानता: सनातन दर्शन में राधा रानी को करुणा की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। यह भजन राधा-तत्व की महिमा को अत्यंत सरल रूप में प्रस्तुत करता है।
  • सुलभ साधना: कलयुग में कठिन तपस्या या यज्ञ करना प्रत्येक मनुष्य के लिए संभव नहीं है। यह भजन सिद्ध करता है कि केवल नाम जप से ही परम पद की प्राप्ति हो सकती है।
  • मानसिक शांति का प्रदाता: इस भजन की लय और धुन मन को शांत करने वाली और तनाव को दूर करने वाली है। इसके नियमित श्रवण से साधक के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि ईश्वर की आराधना और नाम जप के लिए कोई भी समय अनुचित नहीं होता, परंतु शास्त्रों के अनुसार कुछ विशेष समय पर किया गया संकीर्तन बहुगुणित फल प्रदान करता है:

  • ब्राह्म मुहूर्त एवं प्रातः काल: सुबह सूर्योदय से पूर्व या प्रातः काल की पूजा के समय इस भजन का गायन करने से दिन की शुरुआत अत्यंत पवित्र और ऊर्जावान होती है।
  • संध्या काल एवं सत्संग: शाम के समय मंदिर या घर के पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाकर परिवार के साथ सामूहिक रूप से इस भजन को गाना चाहिए।
  • विशेष अवसर: श्री राधाष्टमी, कृष्ण जन्माष्टमी, कार्तिक मास, और प्रत्येक एकादशी के पावन अवसर पर इस भजन का संकीर्तन विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
  • गायन की विधि: इस भजन को गाते समय मन में श्री राधा-कृष्ण की छवि का ध्यान करना चाहिए। हाथों से ताली बजाकर या मंजीरे के साथ सामूहिक रूप से संकीर्तन करने से वातावरण में दिव्य स्पंदन उत्पन्न होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से श्री राधा रानी और भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। ब्रज मंडल की अधिष्ठात्री देवी श्री राधा जी को साक्षात प्रेम और करुणा की मूर्ति माना गया है। ब्रज के रसिक संतों, जैसे स्वामी हरिदास, श्री हित हरिवंश महाप्रभु, और चैतन्य महाप्रभु ने हमेशा राधा नाम की महिमा को सर्वोपरि माना है। संतों का मानना है कि श्री कृष्ण स्वयं राधा नाम के ऋणी रहते हैं और जो जीव 'राधे' पुकारता है, कृष्ण उसके पीछे-पीछे दौड़े चले आते हैं। इस भजन में उसी रसिक परंपरा की झलक मिलती है, जहाँ राधा नाम को ही जीवन का एकमात्र संबल स्वीकार किया गया है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

यह भजन पारंपरिक ब्रज लोक-संस्कृति और रसिक संतों की वाणी से प्रेरित है। यद्यपि इसके मूल आधुनिक रचयिता के विषय में विभिन्न मत हैं, परंतु इसकी आत्मा सदियों पुरानी अष्टछाप कवियों की परंपरा से जुड़ी हुई है। ब्रजभूमि (वृंदावन, बरसाना) में सदियों से यह मान्यता रही है कि राधा नाम का आश्रय लिए बिना कोई भी जीव कृष्ण की लीलाओं में प्रवेश नहीं पा सकता। इसी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर इस रसमय भजन की रचना की गई है, ताकि आधुनिक काल के व्यस्त मनुष्य भी नाम-महिमा के इस अमृत को सहजता से ग्रहण कर सकें।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें ब्रजभाषा के मधुर शब्दों का सुंदर सम्मिश्रण है। इसकी काव्य शैली अत्यंत प्रवाहमयी और गेय (गाने योग्य) है। भजन में 'अमृत', 'हृदय कमल', 'चाकर' और 'प्याला' जैसे रूपकों और प्रतीकों का प्रयोग किया गया है। ये प्रतीक साधक के मन में भक्ति के रस को सघन करते हैं। इसकी सरल शब्दावली के कारण बच्चे, युवा और वृद्ध सभी इसे आसानी से कंठस्थ कर गा सकते हैं।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक उत्कृष्ट कला सिखाता है:

  1. चिंताओं से मुक्ति (Anxiety-Free Life): भजन की पंक्ति "छोड़ दे तू फिक्र बंदे कल की बात की" हमें यह सिखाती है कि भविष्य की चिंता करना व्यर्थ है। हमें अपना कर्म करना चाहिए और फल ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए।
  2. अहंकार का त्याग: स्वयं को श्री राधे का 'चाकर' (सेवक) मानना हमारे भीतर के अहंकार को नष्ट करता है और विनम्रता का विकास करता है।
  3. सच्चा सुख ईश्वर के नाम में है: भौतिक वस्तुएं क्षणिक सुख दे सकती हैं, परंतु वास्तविक और स्थाई आनंद केवल भगवद-भक्ति में ही निहित है।
  4. सकारात्मक दृष्टिकोण: विपरीत परिस्थितियों में भी यह विश्वास रखना कि "मिलेगा सहारा तुझे श्याम का", मनुष्य को मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ एवं महत्व
अमृत (Amrit) अमर करने वाला पेय / दिव्य रस श्री राधा नाम की साधना जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करती है।
श्याम (Shyam) भगवान श्री कृष्ण परम ब्रह्म, जो अपने भक्तों के दुखों को हर लेते हैं।
रिझाए जा (Rijhaye Ja) प्रसन्न करना / रिझाना निःस्वार्थ प्रेम और सेवा द्वारा भगवान को प्रसन्न करना।
किशोरी जी (Kishori Ji) श्री राधा रानी का एक नाम वृंदावन की स्वामिनी, जो सदैव युवा और करुणामयी हैं।
चाकर (Chakar) सेवक / दास दास्य भाव की भक्ति, जहाँ भक्त स्वयं को भगवान का सेवक मानता है।
धाम (Dham) पवित्र तीर्थ स्थल / ब्रजभूमि वह दिव्य स्थान जहाँ भगवान की लीलाएं सदैव जीवंत रहती हैं।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का, मिलेगा सहारा तुझे श्याम का।"
भावार्थ: हे मानव! तू इस संसार के नश्वर विषयों में सुख ढूंढना बंद कर और श्री राधा रानी के नाम रूपी दिव्य अमृत का रसपान कर। जब तू राधा नाम की शरण लेगा, तो भगवान श्री कृष्ण स्वयं आगे बढ़कर तेरा हाथ थाम लेंगे और तुझे जीवन की हर कठिनाई में सहारा देंगे।

पंक्ति: "राधे राधे गाए जा, श्याम को रिझाए जा, जीवन सफल बना ले तू इस धाम का।"
भावार्थ: तू निरंतर 'राधे-राधे' का संकीर्तन करता रह। इस मधुर नाम संकीर्तन से श्याम सुंदर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। इस मानव जन्म और इस पवित्र पृथ्वी (या ब्रज धाम) पर आने के अवसर को व्यर्थ मत गंवा, बल्कि नाम जप कर अपने जीवन को सफल बना।

पंक्ति: "राधे जी की कृपा से ही श्याम सुंदर मिलते हैं, राधे नाम जपने से ही हृदय कमल खिलते हैं।"
भावार्थ: बिना राधा रानी की अनुकंपा के साक्षात पुरुषोत्तम श्री कृष्ण की प्राप्ति असंभव है। जब भक्त राधा नाम का निरंतर जप करता है, तो उसका अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है और उसका हृदय कमल की भांति खिल उठता है, अर्थात उसे आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।

पंक्ति: "छोड़ दे तू फिक्र बंदे कल की बात की, शरण में आजा तू किशोरी जी के हाथ की।"
भावार्थ: हे मनुष्य! तू कल क्या होगा, इस चिंता में अपना आज व्यर्थ मत कर। तू स्वयं को किशोरी जी (राधा रानी) के सुरक्षित और करुणामय हाथों में सौंप दे। उनकी शरण में आने के बाद जीव का कल्याण निश्चित है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

श्री राधा नाम की महिमा को दर्शाने वाले कई दिव्य मंत्र और श्लोक शास्त्रों में वर्णित हैं। इस भजन के साथ निम्नलिखित श्लोक का स्मरण करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

"देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता।
सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा॥"

(पद्म पुराण)

अर्थ: श्री राधिका जी साक्षात कृष्णमयी हैं। वे ही परम देवता हैं। वे समस्त लक्ष्मियों की उद्गम स्थल, परम कांतिमान और भगवान श्री कृष्ण को भी मोहित करने वाली उनकी परा-शक्ति हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण का क्षेत्र महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम पी ले अमृत तू राधे जी के नाम का
मुख्य आराध्य श्री राधा रानी एवं भगवान श्री कृष्ण (श्याम सुंदर)
भक्ति का भाव माधुर्य भाव, शरणागति, दास्य भाव
मुख्य भाषा सरल हिंदी (ब्रजभाषा के प्रभाव सहित)
उपयुक्त अवसर राधाष्टमी, जन्माष्टमी, सत्संग, दैनिक संध्या आरती, कार्तिक मास
मुख्य संदेश नाम जप की महिमा, चिंताओं का त्याग और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास
संबंधित लेख श्री राधा चालीसा, श्री कृष्ण आरती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि सांसारिक चिंताओं और भौतिक सुखों के पीछे भागने के बजाय मनुष्य को श्री राधा रानी के नाम का आश्रय लेना चाहिए। राधा नाम का जप करने से भगवान श्री कृष्ण की कृपा और सहारा स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।

शास्त्रों में अमृत को अमरता प्रदान करने वाला माना गया है। इसी प्रकार, श्री राधा का नाम आध्यात्मिक अमृत है। इसका निरंतर जप करने से जीवात्मा सांसारिक दुखों, चिंताओं और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर शाश्वत आनंद को प्राप्त करती है।

हाँ, इस भजन को प्रतिदिन सुबह या शाम की पूजा के समय गाया जा सकता है। यह मन को शांत करने और घर के वातावरण में सकारात्मकता लाने में अत्यंत सहायक है।

यद्यपि इसका गायन कभी भी किया जा सकता है, परंतु ब्राह्म मुहूर्त (प्रातः काल) और संध्या काल का समय इसके गायन और श्रवण के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

"किशोरी जी" श्री राधा रानी का ही एक अत्यंत प्रिय और आदरणीय नाम है। ब्रज में भक्त उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं, जिसका अर्थ है सदैव युवा और करुणामयी स्वामिनी।

वैष्णव ग्रंथों के अनुसार, श्री राधा जी भगवान श्री कृष्ण की आल्हादिनी शक्ति हैं। श्री कृष्ण को प्रसन्न करने का सबसे सरल मार्ग राधा रानी की शरण में जाना है। इसलिए माना जाता है कि राधा जी की कृपा के बिना कृष्ण की पूर्ण प्राप्ति असंभव है।

इस भजन को गाते समय मन में पूर्ण समर्पण (शरणागति), दीनता और निष्कपट प्रेम का भाव होना चाहिए। स्वयं को भगवान का सेवक मानकर गाने से इसका प्रभाव शीघ्र होता है।

हाँ, इसकी सरल भाषा और मधुर लय के कारण बच्चे इसे बहुत आसानी से सीख सकते हैं। इससे उनमें बचपन से ही अच्छे संस्कार और ईश्वर के प्रति श्रद्धा का विकास होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ, अर्थ और आध्यात्मिक विश्लेषण को तैयार करने के लिए सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, जैसे श्रीमद्भागवत महापुराण, पद्म पुराण और ब्रज के रसिक संतों की वाणी का संदर्भ लिया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, त्रुटिहीन और उच्च गुणवत्ता वाली आध्यात्मिक सामग्री पहुंचाना है ताकि वे अपनी साधना को सुदृढ़ कर सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • पद्म पुराण: श्री राधा-कृष्ण तत्व और नाम महिमा का शास्त्रीय संदर्भ।
  • श्रीमद्भागवत महापुराण: भक्ति मार्ग, शरणागति और संकीर्तन का महत्व।
  • ब्रज रसिक वाणी: स्वामी हरिदास और श्री हित हरिवंश महाप्रभु के संकीर्तन सिद्धांत।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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