Bhaktilok
प्रकाशित तिथि: 2026 | श्रेणी: भजन एवं स्तुति | संकलन: शिव महिमा संकीर्तन
सनातन संस्कृति और देवाधिदेव महादेव भगवान शिव के प्रति अगाध प्रेम, अनन्य भक्ति और परम समर्पण को समर्पित यह पावन भजन "जान से प्यारी शिव शंकर की मूर्ति" शिव भक्तों के हृदय में आत्मीय आनंद और दिव्यता का संचार करता है। देवाधिदेव महादेव केवल एक देवता नहीं हैं, बल्कि वे चराचर जगत के प्राण, साधकों के आश्रय और हर संकट के निवारण हैं। इस भजन की प्रत्येक पंक्ति में भगवान शिव के स्वरूप, उनके अलौकिक आभूषणों, जटाओं, और उनके शांत एवं करुणापूर्ण विग्रह के प्रति अनन्य अनुराग झलकता है। जब एक भक्त भगवान शिव की प्रतिमा या उनके साक्षात स्वरूप का ध्यान करता है, तो उसे इस भौतिक संसार के सभी दुखों से मुक्ति का आभास होने लगता है। शिव शंकर की यह मनमोहक छवि साधक के मन में अगाध शांति और संबल प्रदान करती है। इस विस्तृत लेख में हम इस दिव्य भजन के संपूर्ण लिरिक्स, सरल हिंदी भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व, गायन विधि और शिव साधना से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
मुख्य विवरण
यह भजन महाशिवरात्रि, सावन मास के सोमवार, प्रदोष व्रत और दैनिक शिव आराधना के अवसरों पर विशेष रूप से गाया और सुना जाता है। इसे कंठस्थ कर भगवान शिव के चरणों में अर्पित करने से मानसिक शांति और आत्मबल की प्राप्ति होती है।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
|| मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन ||
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
मुझे जान से प्यारी है शिव शंकर की मूर्ति,
ओ सारे जग से न्यारी है (शिव शंकर की मूर्ति) -3
अभ्यंकर की मूर्ति, बड़ी सिद्धिकारक है शिव शंकर की मूर्ति,
ओ मुझे जान से प्यारी है शिव शंकर की मूर्ति!
ओह्हो-ओह्हो-ओह्हो...
सौ सूरज का तेज़ सा उस मुखड़े पर है झलक रहा,
नैनों से संजीवनी जैसा पवन अमृत छलक रहा -2
मन मोहक सुखदाई है शिव शंकर की मूर्ति,
मेरी सदा सहाय है शिव शंकर की मूर्ति,
ओ मुझे जान से प्यारी है शिव शंकर की मूर्ति!
कानों में बिछुओं के कुंडल, गले नाग की माला है,
अर्ध चंदा उसके मस्तक की जटा बहुत निराला है -2
बड़ी मंगल शुभकारी है शिव शंकर की मूर्ति,
सारे कश्त निवारण है शिव शंकर की मूर्ति,
ओ मुझे जान से प्यारी है शिव शंकर की मूर्ति!
इसके प्रमुख अलख जगा के कुंदन होती काया है,
आस की झोली खोल के मैंने जो मांगा सो पाया है -2
मोह मांगा फल देती है शिव शंकर की मूर्ति,
मेरे मन में बस्ती है शिव शंकर की मूर्ति,
ओ मुझे जान से प्यारी है शिव शंकर की मूर्ति!
सारे जग से न्यारी है शिव शंकर की मूर्ति,
ओ मुझे जान से प्यारी है शिव शंकर की मूर्ति!
शिव शंकर की मूर्ति।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
इस दिव्य भजन का प्रत्येक शब्द साधक की भगवान शिव के प्रति अनन्य निष्ठा और प्रेम को प्रकट करता है। भजन के भावार्थ को समझने से शिव आराधना का मार्ग और अधिक प्रशस्त होता है:
- प्रथम अंतरा (रूप और तेज): भक्त अपने इष्टदेव भगवान शिव की मूर्ति को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय बताता है। वह कहता है कि यह मूर्ति संपूर्ण संसार में सबसे अनूठी और विलक्षण है। महादेव का मुखमंडल सैकड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी है, जिनके नैनों से मानो संजीवनी और अमृत की धारा बह रही हो। यह विग्रह साधक के मन को मोहने वाला, परम सुखदायक और हर परिस्थिति में सहायता करने वाला है।
- द्वितीय अंतरा (दिव्य श्रृंगार एवं स्वरूप): भगवान शिव के अलौकिक स्वरूप का वर्णन करते हुए भक्त कहता है कि उनके कानों में बिछुओं (सर्पों या विशेष कुंडल) के कुंडल सुशोभित हैं, गले में नागराज की माला है, मस्तक पर अर्धचंद्र और जटाओं का मुकुट अत्यंत निराला है। यह मूर्ति सभी प्रकार के मंगलों को करने वाली और भक्तों के समस्त कष्टों का निवारण करने वाली है।
- तृतीय अंतरा (कृपा और फल प्राप्ति): भक्त अपने अनुभव को साझा करते हुए कहता है कि इस पावन विग्रह का स्मरण और ध्यान करने से शरीर और आत्मा कुंदन की भांति पवित्र हो जाती है। आशा की झोली फैलाकर भक्त ने भगवान शिव से जो भी मांगा, वह सब कुछ उसे प्राप्त हुआ है। यह शिव मूर्ति भक्तों को उनकी इच्छा के अनुसार मनोवांछित फल प्रदान करने वाली है और सदा उनके हृदय में निवास करती है।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
भक्तिकोल के इस विशेष आलेख में आइए जानते हैं कि इस भजन का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन में क्या विशेष महत्व है:
अनन्य भक्ति भाव
यह भजन साधक और आराध्य के बीच के औपचारिक संबंधों को समाप्त कर एक सहज, आत्मीय और प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करता है, जहाँ शिव ही सब कुछ हैं।
कष्ट निवारण शक्ति
शिव शंकर की मूर्ति और उनके नाम के स्मरण मात्र से जीवन के सभी कश्त, बाधाएं और मानसिक संताप दूर हो जाते हैं।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भगवान शिव के इस संकीर्तन को करने के लिए कोई कठोर नियम नहीं हैं, किंतु विधि-विधान से करने पर इसका फल अनंत गुना बढ़ जाता है:
- ब्रह्म मुहूर्त एवं प्रदोष काल: प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में या संध्याकालीन प्रदोष बेला में इस भजन का गान अत्यंत फलदायी माना गया है।
- सावन मास एवं शिवरात्रि: सावन के पवित्र महीनों में, प्रत्येक सोमवार को तथा महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इस भजन का सामूहिक या एकांत गान मन को अलौकिक ऊर्जा से भर देता है।
- पूजा स्थल पर: शिव मंदिर में शिवलिंग के समक्ष अथवा घर के पूजा घर में दीपक प्रज्वलित कर इस भजन का गान करने से चित्त एकाग्र होता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / पद | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| अभ्यंकर | अभय प्रदान करने वाला, निर्भय बनाने वाला | शिव अपने भक्तों के सभी प्रकार के भयों का नाश करते हैं। |
| सिद्धिकारक | सिद्धियां देने वाला, कार्यों को सफल बनाने वाला | साधना और तपस्या को पूर्णता प्रदान करने वाले महादेव। |
| संजीवनी | जीवन देने वाली औषधि | शिव की कृपा मृतप्राय जीवन में भी नया संचार कर देती है। |
| अलख जगाना | ईश्वरिय चेतना का प्रसार करना, भीतर की ज्योति जलाना | आध्यात्मिक जागृति और आत्मबोध की स्थिति। |
| कुंदन काया | तपा हुआ शुद्ध सोना जैसा शरीर व मन | भक्ति की अग्नि में तपकर शुद्ध हुआ अंतःकरण। |
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
शिव शंकर की मूर्ति के ध्यान और इस भजन के गायन के साथ निम्नलिखित महामृत्युंजय मंत्र या पंचाक्षर मंत्र का स्मरण करना अति उत्तम माना गया है:
ॐ नमः शिवाय ॥
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
इस संबंध में आप हमारे अन्य पावन अनुष्ठान जैसे शिव तांडव स्तोत्र और महामृत्युंजय मंत्र के विस्तृत आलेख भी पढ़ सकते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | जान से प्यारी शिव शंकर की मूर्ति (Jaan Se Pyaari Shiv Shankar Ki Murti) |
|---|---|
| आराध्य देव | देवाधिदेव महादेव भगवान शिव |
| भाषा | सरल हिंदी एवं ब्रज-अवधि मिश्रित भाव |
| मुख्य भाव | भक्ति, समर्पण, प्रेम और शरणागति |
| उपयुक्त अवसर | महाशिवरात्रि, सावन सोमवार, प्रदोष व्रत, दैनिक पूजा |
| संबंधित परंपरा | शिव संकीर्तन एवं भजन परंपरा |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह आलेख पारंपरिक सनातन लोक-भजन परंपरा और स्रोतों पर आधारित है। इसे पाठकों की सहजता और भक्ति भावना को ध्यान में रखते हुए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है। किसी भी त्रुटि या सुझाव के लिए आप संपर्क कर सकते हैं।
स्रोत एवं संदर्भ
- पारंपरिक शिव संकीर्तन एवं लोक भजन संग्रह
- सनातन धर्म ग्रंथ एवं शिव पुराण आधारित संदर्भ
- भक्तिकोल संपादकीय अभिलेखागार
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