भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

शेरोवाली बुलालो हमे भी दवार आने के काबिल नही है भजन इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें शेरोवाली बुलालो हमे भी दवार आने के काबिल नही है भजन इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भक्त

यह अत्यंत ही पावन, कारुणिक और भक्ति रस से सराबोर भजन "शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार, आने के काबिल नहीं हैं" आदिशक्ति मां दुर्गा के प्रति अनन्य शरणागति, दीनता और परम श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। सनातन धर्म की संकीर्तन परंपरा में इस भजन का एक विशिष्ट स्थान है, क्योंकि यह साधक के अहंकार को विगलित कर उसे भगवती के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित होने की प्रेरणा देता है। जब एक भक्त संसार के प्रपंचों, अपने पापों और दुर्बलताओं से थक जाता है, तब वह अपनी करुणामयी माता के समक्ष अपनी अयोग्यता को स्वीकार करते हुए केवल उसकी अहैतुकी कृपा की याचना करता है। यह भजन 'विनय भाव' और 'आर्त भाव' की पराकाष्ठा है, जिसे गाते समय भक्त की आंखों से अश्रुधारा बह निकलती है। नवरात्र के पावन पर्व, जगराता, माता की चौकी और दैनिक संध्या आरती के समय इस भजन का गायन साधक के अंतःकरण को शुद्ध कर उसमें दैवीय ऊर्जा का संचार करता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

(स्थायी)
शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार, आने के काबिल नहीं हैं।
हम पापी हैं गुनहगार हैं, तेरी रहमत के काबिल नहीं हैं।
शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार, आने के काबिल नहीं हैं॥

(अंतरा - 1)
लाखों पापी तरे हैं तुम्हारे दर पे आकर ओ मैया भवानी।
मेरी नैया भी पार लगा दो, ओ पहाड़ों की रानी॥
हम तो मजधार में अटके पड़े, पार जाने के काबिल नहीं हैं।
शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार, आने के काबिल नहीं हैं॥

(अंतरा - 2)
तेरे दर पे जो आता है मैया, वो तो खाली कभी न जाता।
जो भी सच्चे दिल से पुकारे, उसका बिगड़ा मुकद्दर बन जाता॥
हम तो किस्मत के मारे हुए, सिर उठाने के काबिल नहीं हैं।
शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार, आने के काबिल नहीं हैं॥

(अंतरा - 3)
माना अवगुण हमारे हैं भारी, पर तुम तो हो ममता की सागर।
अपनी करुणा की बूंद बहा दो, खाली बैठी है मेरी ये गागर॥
हम तो प्यासे ही रह जाएंगे, खुद से आने के काबिल नहीं हैं।
शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार, आने के काबिल नहीं हैं॥

(अंतरा - 4)
द्वार पे अपने बुला लो जननी, चरणों में थोड़ी जगह दे दो।
इस भटके हुए बालक को मैया, अपनी भक्ति का वरदान दे दो॥
हम तो चरणों की धूल हैं तेरी, मुंह दिखाने के काबिल नहीं हैं।
शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार, आने के काबिल नहीं हैं॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस मर्मस्पर्शी भजन का केंद्रीय भाव पूर्ण आत्मसमर्पण और दीनता है। भक्त अपनी सांसारिक सीमाओं, दुर्बलताओं और पापों को स्वीकार करते हुए जगदंबा से प्रार्थना करता है। वह कहता है कि हे सिंहवाहिनी मैया! मैं अपने कर्मों और आचरण से इस योग्य नहीं हूं कि आपके परम पावन दरबार में उपस्थित हो सकूं। मैं सांसारिक मोह-माया में लिप्त एक साधारण जीव हूं, जो निरंतर गलतियां करता रहता है। परंतु, आपकी दया और करुणा असीम है। यदि आप अपनी कृपा से मुझे नहीं बुलाएंगी, तो मैं कभी भी आपके दर्शन प्राप्त नहीं कर सकूंगा।

भजन के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि ईश्वर के दरबार में जाने के लिए किसी भौतिक योग्यता, धन या उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। वहां केवल एक ही सिक्का चलता है, और वह है 'निश्छल प्रेम' और 'समर्पण'। जब भक्त अपने अहंकार को शून्य कर देता है और यह मान लेता है कि वह स्वयं कुछ भी करने में असमर्थ है, तब मां भगवती का करुणामयी हृदय द्रवित हो उठता है। यह भजन जीवात्मा की परमात्मा से मिलन की तड़प को दर्शाता है, जहां भक्त अपनी अयोग्यता को ही अपनी सबसे बड़ी पुकार बना लेता है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह एक साधक की आंतरिक यात्रा का दस्तावेज है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • विनय और शरणागति: इस भजन में वैष्णव भक्ति के अंतर्गत आने वाले 'दार्शनिक विनय' का सुंदर चित्रण है, जहां भक्त स्वयं को दीन मानकर भगवान की शरण में जाता है।
  • अहंकार का विसर्जन: "आने के काबिल नहीं हैं" यह पंक्ति भक्त के भीतर के सूक्ष्म अहंकार को नष्ट करती है। जब तक मनुष्य को अपनी शक्ति का घमंड रहता है, तब तक उसे ईश्वरीय सहायता प्राप्त नहीं होती।
  • करुणा की याचना: यह भजन मां दुर्गा के संहारक रूप की जगह उनके ममतामयी और करुणामयी रूप की आराधना करता है, जो अपने कुपुत्रों को भी गले लगाने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।
  • सामूहिक संकीर्तन के लिए उपयुक्त: इसकी सरल लय और हृदयस्पर्शी शब्द इसे जगराता और सामूहिक कीर्तनों में अत्यंत लोकप्रिय बनाते हैं।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

यद्यपि मां की आराधना किसी भी समय की जा सकती है, परंतु इस भजन के गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष अवसर और विधियां शास्त्रों के अनुकूल मानी गई हैं:

  • सर्वोत्तम समय: इस भजन का गायन संध्या काल की आरती के पश्चात अथवा रात्रि संकीर्तन (मैया का जगराता) के समय अत्यंत फलदायी होता है। शांत मन से ब्रह्ममुहूर्त में इसका मानसिक जप भी किया जा सकता है।
  • गायन की विधि: इस भजन को गाते समय हाथ जोड़कर, नेत्र बंद करके मां के भव्य स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। स्वर में करुणा और पुकार का भाव होना अनिवार्य है।
  • विशेष अवसर: चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों के दौरान इस भजन का श्रवण और कीर्तन करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन साक्षात आदिशक्ति, महिषासुर मर्दिनी, पहाड़ों वाली माता वैष्णो देवी और शेरोवाली मां दुर्गा को समर्पित है। सनातन परंपरा में मां दुर्गा को ब्रह्मांड की आद्या शक्ति माना गया है, जो सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करती हैं। संतों का मानना है कि मां दुर्गा जितनी दुष्टों के लिए भयानक हैं, अपने भक्तों के लिए उतनी ही कोमल और वात्सल्यमयी हैं। इस भजन की रचना शैली उत्तर भारत की लोक-भक्ति परंपरा से प्रेरित है, जहां माता को एक लौकिक मां की भांति मान-मनुहार करके मनाया जाता है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन के मूल रचयिता के विषय में कोई स्पष्ट ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, परंतु यह भजन दशकों से भारत के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लोक-भजन गायकों द्वारा गाया जाता रहा है। इसकी पृष्ठभूमि वैष्णो देवी तीर्थ यात्रा और उत्तर भारतीय माता के जगरातों से जुड़ी है। जब भक्त पहाड़ों की कठिन चढ़ाई चढ़ते हैं और मां के भवन के समीप पहुंचते हैं, तब उनके मन में अपनी तुच्छता और मां की महानता का जो भाव जाग्रत होता है, उसी भाव को इस भजन में पिरोया गया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें उर्दू के कुछ अत्यंत लोकप्रिय शब्दों जैसे 'रहमत', 'काबिल', 'मुकद्दर' और 'मजधार' का बहुत ही सुंदर समन्वय किया गया है। यह भाषा शैली इसे जन-साधारण के लिए अत्यंत सुलभ बनाती है। काव्य शैली की दृष्टि से यह एक 'पद' है, जिसमें अंत्यानुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है। हर अंतरे के अंत में स्थायी पंक्ति का दोहराव मन को एक गहरी शांति और लयबद्धता प्रदान करता है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें केवल आध्यात्मिक रूप से ही समृद्ध नहीं करता, बल्कि हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए भी कई महत्वपूर्ण सीख देता है:

  1. विनम्रता का महत्व: जीवन में चाहे कितनी भी सफलता मिल जाए, ईश्वर और प्रकृति के समक्ष हमेशा विनम्र बने रहना चाहिए।
  2. अपनी गलतियों को स्वीकार करना: जब हम अपनी कमियों और पापों को स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारे भीतर सुधार की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
  3. असीम आशावाद: चाहे हमारी परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हों, हमें ईश्वर की दया पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।
  4. सच्ची पुकार की शक्ति: हृदय से निकली हुई पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती, ईश्वर उसे अवश्य सुनते हैं।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
रहमत कृपा, दया, अनुकंपा ईश्वर की अहैतुकी कृपा जो बिना किसी स्वार्थ के मिलती है।
काबिल योग्य, सामर्थ्यवान साधक की वह स्थिति जहां वह स्वयं को ईश्वर के योग्य नहीं मानता।
मजधार नदी के बीच की धारा, संकट संसार रूपी भवसागर जिसमें जीव फंसा हुआ है।
मुकद्दर भाग्य, किस्मत प्रारब्ध कर्म जो मां की कृपा से बदल सकते हैं।
गागर मिट्टी या धातु का घड़ा भक्त का अंतःकरण जो भक्ति रस से खाली है।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार, आने के काबिल नहीं हैं..."
हे सिंह पर सवारी करने वाली जगदंबा! आप स्वयं ही कृपा करके मुझे अपने पावन धाम बुला लीजिए, क्योंकि मेरे भीतर इतनी सामर्थ्य और पवित्रता नहीं है कि मैं स्वयं आपके पास आ सकूं।

"लाखों पापी तरे हैं तुम्हारे दर पे आकर ओ मैया भवानी..."
हे भवानी! आपके द्वार का इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़े पापियों का भी वहां उद्धार हुआ है। मेरी जीवन रूपी नैया भी इस संसार सागर के बीच फंसी है, इसे पार लगाने का दायित्व अब आपका है।

"तेरे दर पे जो आता है मैया, वो तो खाली कभी न जाता..."
जो भी भक्त आपके चरणों की शरण लेता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती। यदि कोई सच्चे मन से आपको पुकारता है, तो आप उसके सोए हुए भाग्य को भी जगा देती हैं।

"माना अवगुण हमारे हैं भारी, पर तुम तो हो ममता की सागर..."
मैं स्वीकार करता हूं कि मेरे भीतर अनगिनत दोष और बुराइयां हैं। परंतु आप तो करुणा और ममता की असीम सागर हैं। क्या एक मां अपने बच्चे के अवगुणों के कारण उसे भूखा छोड़ सकती है?

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के गायन से पूर्व या पश्चात मां दुर्गा के इस सिद्ध मंत्र का जाप करने से भजन का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है:

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे नारायणी! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हैं। आप कल्याणकारिणी, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरण देने योग्य और तीन नेत्रों वाली गौरी हैं। आपको हमारा बारंबार नमस्कार है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम शेरोवाली बुलालो हमें भी द्वार (Sherawaliye Mujhe Bhi Dwar Bula Le)
मुख्य आराध्य देवी मां दुर्गा / शेरोवाली माता / वैष्णो देवी
भक्ति का भाव दीनता, विनय, पूर्ण शरणागति (Dainya Bhava)
भाषा सरल हिंदी (खड़ी बोली)
उपयुक्त अवसर नवरात्रि, माता की चौकी, जगराता, संध्या आरती
मुख्य संदेश अहंकार का त्याग और मां की कृपा पर पूर्ण विश्वास

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को अपने कर्मों या शक्तियों पर घमंड नहीं करना चाहिए। ईश्वर की प्राप्ति केवल उनकी कृपा और भक्त के पूर्ण समर्पण से ही संभव है।

इस भजन को संध्या काल की आरती के समय या रात्रि संकीर्तन के दौरान गाना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि इस समय मन शांत और एकाग्र होता है।

हां, नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के समय इस भजन का गायन अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

'रहमत' एक उर्दू शब्द है जिसका अर्थ 'कृपा', 'दया' या 'अनुकंपा' होता है। भजन में इसका प्रयोग मां दुर्गा की असीम दयालुता को दर्शाने के लिए किया गया है।

इस भजन को गाते समय भक्त के मन में 'दीनता' और 'शिशु भाव' होना चाहिए, जैसे एक छोटा बच्चा अपनी मां को पुकारता है।

यह भजन श्रीमद्देवीभागवत महापुराण और दुर्गा सप्तशती में वर्णित 'शरणागति' के सिद्धांतों पर आधारित है, जहां देवी को सर्वव्यापी और परम दयालु बताया गया है।

इसके नियमित गायन और श्रवण से मन का अहंकार शांत होता है, मानसिक शांति मिलती है और साधक के भीतर भक्ति भाव सुदृढ़ होता है।

इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि सांसारिक वासनाओं और कर्मों के कारण जीव मलीन हो चुका है। वह अपनी साधना के बल पर ईश्वर तक नहीं पहुंच सकता, उसे केवल ईश्वर की कृपा ही वहां तक ले जा सकती है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन के पाठ और भावार्थ को तैयार करने में सनातन धर्म की संकीर्तन परंपरा, देवी भागवत पुराण के सिद्धांतों और प्रामाणिक लोक-साहित्य का विशेष ध्यान रखा गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक शुद्ध, त्रुटिहीन और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध सामग्री पहुंचाना है ताकि वे अपनी साधना यात्रा में इसका लाभ उठा सकें।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्देवीभागवत महापुराण: भगवती की करुणा और शरणागति के प्रसंग।
  • श्री दुर्गा सप्तशती: देवी स्तुति और मंत्रों के प्रामाणिक संदर्भ।
  • पारंपरिक भजन संग्रह: उत्तर भारतीय लोक संकीर्तन और जगराता परंपरा।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 29 Sep 2026

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