भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

सखी म्हारो कौन हुयो जो अपराधइन हिंदी - जीतू भाई

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निमाड़ की पावन धरा से प्रस्फुटित हुआ लोक भजन "सखी म्हारो कौन हुयो जो अपराध" संत सिंगाजी की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा का एक अनुपम रत्न है। जीतू भाई की सुमधुर आवाज में गाया गया यह निमाड़ी भजन जीवात्मा और परमात्मा के बीच के विरह, समर्पण और आत्म-मंथन को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। सनातन धर्म में ईश्वर प्राप्ति के लिए नवधा भक्ति का उल्लेख मिलता है, जिसमें विरह और विनय की भावना को सर्वोपरि माना गया है। इस भजन में जीवात्मा रूपी नायिका अपनी सखी (बुद्धि या सत्संग) से प्रश्न कर रही है कि उससे ऐसा कौन सा अनजाने में अपराध हो गया है, जिसके कारण साक्षात परमात्मा रूपी प्रियतम उसके घर आकर भी रूठकर चले गए। यह भजन केवल एक लोकगीत नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को अपने दैनिक आचरण, नैतिकता और जीव-दया के प्रति सचेत करने वाला एक गहरा आध्यात्मिक उपदेश है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

सखी म्हारो कुण हुयो जो अपराध


सखी म्हारो कुण हुयो जो अपराध,
सखी म्हारो कुण हुयो जो अपराध,
|| घर आया साजन रूठी गया हो ||

सखी मन दिवला सी दीवलो, कभी नही बाल्यो हो,
हो आसा नही पोयच्या, कवला सी हाथ,
|| घर आया साजन रूठी गया हो ||

सखी मन कंडा सी कंडो, कभी नहीं फोड़यो हो,
हो आसी नही फेंकी घुड़ा प राख,
|| घर आया साजन रूठी गया हो ||

सखी मन पानी पीती गौवा ख, कभी नही वालई हो,
हो असो नही मोड़यो, कन्या को ख्याल,
|| घर आया साजन रूठी गया हो ||

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस निमाड़ी भजन का भावार्थ अत्यंत गंभीर और व्यावहारिक वेदांत पर आधारित है। यहाँ जीवात्मा स्वयं को टटोलती है और सोचती है कि साधना के मार्ग पर उससे कहाँ चूक हुई। जब परमात्मा की कृपा रूपी 'साजन' द्वार पर आए, तो वे बिना मिले ही क्यों लौट गए? इस विरह वेदना में डूबी जीवात्मा अपनी सखी से कहती है कि उसने कभी भी किसी का अहित नहीं किया, फिर भी उसके प्रभु उससे रूठ गए।

भजन के प्रथम अंतरे में जीवात्मा कहती है कि उसने कभी भी एक दीपक से दूसरा दीपक नहीं जलाया, अर्थात उसने कभी किसी के घर में ईर्ष्या या द्वेष की अग्नि नहीं भड़काई। उसके हाथ कमल के समान कोमल और पवित्र रहे, जिनसे उसने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा। दूसरे अंतरे में वह कहती है कि उसने कभी भी कंडे से कंडा नहीं फोड़ा, जो कि आपसी कलह और विवाद का प्रतीक है। उसने कभी किसी के चूल्हे की राख को दूसरों पर नहीं फेंका, अर्थात किसी का अपमान नहीं किया। तीसरे अंतरे में वह अपनी जीव-दया और सामाजिक कर्तव्य का उल्लेख करती है कि उसने कभी पानी पीती हुई गायों को नहीं भगाया और न ही कभी कन्याओं का अनादर किया। यह संपूर्ण भजन इस बात का प्रतीक है कि जब तक मनुष्य का आचरण पूर्णतः शुद्ध नहीं होता, तब तक ईश्वर की पूर्ण कृपा प्राप्त नहीं होती।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन निमाड़ी लोक संस्कृति और कबीरपंथी विचारधारा का एक सुंदर मिश्रण है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • व्यावहारिक नैतिकता: इसमें धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रखकर दैनिक व्यवहार, जीव-दया और सामाजिक समरसता से जोड़ा गया है।
  • विरह भक्ति (Viraha Bhakti): जीवात्मा का परमात्मा के लिए तड़पना और अपनी कमियों को खोजना इस भजन का मुख्य स्वर है, जो मीराबाई के भजन की याद दिलाता है।
  • लोक जीवन के प्रतीक: कंडा, दीवला, पानी पीती गाय और कन्या जैसे प्रतीकों के माध्यम से अत्यंत गूढ़ दार्शनिक बातों को सहजता से समझाया गया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

निमाड़ अंचल में संत सिंगाजी के भजनों को गाने की एक विशेष परंपरा है। इस भजन को गाने और सुनने के लिए निम्नलिखित समय और विधि सर्वोत्तम मानी जाती है:

  • सत्संग और संध्या काल: इस भजन का गायन विशेष रूप से संध्या कालीन सत्संगों, सिंगाजी मेले और धार्मिक उत्सवों पर किया जाता है।
  • एकाग्र चित्त होकर श्रवण: इसे शांत वातावरण में बैठकर सुनने से मन को शांति मिलती है और आत्म-निरीक्षण की प्रेरणा जागृत होती है।
  • भक्ति भाव: इसे गाते समय मन में पूर्ण समर्पण और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम होना आवश्यक है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से संत सिंगाजी की वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है। संत सिंगाजी मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के एक महान संत थे, जिन्हें कबीर दास जी की परंपरा का माना जाता है। उन्होंने अपने भजनों के माध्यम से समाज में फैले पाखंड, छुआछूत और कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया। इस भजन में जिस 'साजन' का उल्लेख है, वे निराकार ब्रह्म या श्री कृष्ण भजन के आराध्य परमेश्वर हैं, जो घट-घट में वास करते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

संत सिंगाजी का जन्म १६वीं शताब्दी में हुआ था। उन्होंने पशुपालक और गृहस्थ जीवन जीते हुए परम ज्ञान प्राप्त किया था। यही कारण है कि उनके भजनों में ग्रामीण जीवन, पशुपालन और घरेलू कामकाज से जुड़े प्रतीकों की भरमार होती है। "सखी म्हारो कौन हुयो जो अपराध" भजन इसी पृष्ठभूमि से उपजा है, जहाँ एक साधारण ग्रामीण महिला के माध्यम से जीवात्मा की उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था को दर्शाया गया है। जीतू भाई ने इस पारंपरिक लोक भजन को आधुनिक समय में अपनी सुरीली आवाज देकर पुनः जन-जन तक पहुँचाया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा शुद्ध निमाड़ी बोली है, जो पश्चिमी हिंदी और राजस्थानी का एक सुंदर मिश्रण है। इसकी काव्य शैली अत्यंत सरल, गेय और संवादात्मक है। इसमें रूपक अलंकार का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया गया है। जैसे 'साजन' परमात्मा के लिए, 'सखी' विवेक के लिए और 'अपराध' मानवीय भूलों के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह शैली सीधे श्रोता के हृदय को स्पर्श करती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें कई महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  1. आत्म-लोचन (Self-Reflection): जब भी जीवन में असफलता या ईश्वर से दूरी महसूस हो, तो दूसरों को दोष देने के बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए।
  2. अहिंसा और जीव-दया: प्यासी गायों को पानी पीने देना और किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना ही सच्ची सेवा है।
  3. नारी शक्ति का सम्मान: कन्याओं के प्रति आदर भाव रखना और समाज में उनके अधिकारों की रक्षा करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है।
  4. वाणी और कर्म की पवित्रता: आपसी विवादों (कंडा फोड़ना) से दूर रहकर समाज में शांति स्थापित करना ही वास्तविक धर्म है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
कुण कौन सा अज्ञानता वश हुई भूल की खोज
साजन प्रियतम / पति परमात्मा (ईश्वर)
दिवला सी दीवलो दीपक से दीपक जलाना ईर्ष्या या विवाद की अग्नि भड़काना
कंडा सी कंडो उपले से उपला टकराना व्यर्थ के वाद-विवाद और कलह
गौवा गायें समस्त मूक प्राणी और प्रकृति
कन्या को ख्याल बेटियों का ध्यान रखना नारी जाति का सम्मान और सुरक्षा

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

१. "सखी म्हारो कुण हुयो जो अपराध, घर आया साजन रूठी गया हो..."
हे सखी! मुझसे ऐसा कौन सा अनजाने में पाप या अपराध हो गया है कि मेरे घर आए हुए प्रभु (साजन) मुझसे बिना मिले ही अत्यंत क्रोधित होकर लौट गए? मेरी साधना में कहाँ कमी रह गई?

२. "सखी मन दिवला सी दीवलो, कभी नही बाल्यो हो, हो आसा नही पोयच्या, कवला सी हाथ..."
मैंने कभी भी किसी के सुख को देखकर ईर्ष्या की आग नहीं जलाई। मेरे हाथ हमेशा कमल के समान कोमल और परोपकार में लगे रहे, मैंने कभी किसी का बुरा करने की चेष्टा नहीं की।

३. "सखी मन कंडा सी कंडो, कभी नहीं फोड़यो हो, हो आसी नही फेंकी घुड़ा प राख..."
मैंने कभी भी समाज में या परिवार में कलह और क्लेश उत्पन्न नहीं किया। मैंने कभी किसी के मान-सम्मान को ठेस नहीं पहुँचाई और न ही किसी पर लांछन लगाया।

४. "सखी मन पानी पीती गौवा ख, कभी नही वालई हो, हो असो नही मोड़यो, कन्या को ख्याल..."
मैंने कभी किसी प्यासे जीव को पानी पीने से नहीं रोका और न ही कभी कन्याओं के सम्मान और उनकी रक्षा के कर्तव्य से अपना मुंह मोड़ा। फिर भी हे प्रभु! आप मुझसे क्यों रूठ गए?

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन की मूल भावना श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक से मेल खाती है, जहाँ भगवान कृष्ण सर्वभूतहिते रत रहने वाले भक्तों की प्रशंसा करते हैं:

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ दोनों का त्यागी है, वह भक्तिमान पुरुष मुझे प्रिय है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम सखी म्हारो कौन हुयो जो अपराध
मुख्य गायक जीतू भाई (Jitu Bhai)
भजन की शैली निमाड़ी लोक भजन (Nimadi Bhajan)
प्रेरक संत संत सिंगाजी (Sant Singaji)
मुख्य रस / भाव विरह, करुणा, समर्पण और विनय भाव
उपयुक्त अवसर सत्संग, सिंगाजी पूर्णिमा, दैनिक प्रार्थना

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन निमाड़ के प्रसिद्ध लोक संत सिंगाजी की वैचारिक परंपरा से प्रेरित है और निमाड़ अंचल के लोक कलाकारों द्वारा पीढ़ियों से गाया जा रहा है।

इस भजन में 'साजन' शब्द का प्रयोग जीवात्मा के परम प्रियतम अर्थात निराकार परमात्मा या ईश्वर के लिए किया गया है।

इसका प्रतीकात्मक अर्थ है किसी के घर में ईर्ष्या, द्वेष या कलह की आग लगाना। भजन में नायिका कहती है कि उसने ऐसा कभी नहीं किया।

संत सिंगाजी मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र के एक महान मध्यकालीन संत थे। उनके उपदेश और भजन निमाड़ी भाषा में हैं, जो लोक कल्याण और निर्गुण भक्ति पर आधारित हैं।

भजन की पंक्ति "पानी पीती गौवा ख, कभी नही वालई हो" में स्पष्ट रूप से जीव-दया और मूक पशुओं के प्रति करुणा का संदेश दिया गया है।

यह भजन निमाड़ी लोक संगीत के सबसे लोकप्रिय और हृदयस्पर्शी भजनों में से एक माना जाता है, जो हर धार्मिक अनुष्ठान में गाया जाता है।

जीतू भाई ने निमाड़ी लोक भजनों को उनकी पारंपरिक मिठास और सादगी के साथ गाकर आधुनिक पीढ़ी के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनाया है।

यह भजन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि हमारे शुद्ध आचरण, परोपकार, अहिंसा और दूसरों के प्रति सम्मान में निहित है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पर आधारित है। इस भजन के माध्यम से निमाड़ की समृद्ध लोक संस्कृति और संत सिंगाजी के दार्शनिक विचारों को सहेजने का प्रयास किया गया है। लोक भजनों में प्रयुक्त क्षेत्रीय शब्दों का अर्थ और उनका आध्यात्मिक संदर्भ पाठकों की समझ को और अधिक गहरा बनाता है। यह सामग्री पूरी तरह से लोक परंपराओं और प्रामाणिक संतों के विचारों के विश्लेषण पर आधारित है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • संत सिंगाजी साहित्य एवं निमाड़ी लोक साहित्य संकलन।
  • मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के लोकगीत संग्रह।
  • सनातन धर्म की नवधा भक्ति और कबीर पंथी शब्दावली।

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 08 Oct 2026

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